भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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साधनमाला ११ का अर्चन करे। फिर कर और षडङ्गों का शोधन, प्राणायाम, दिग्बन्धन कर दोनों अङ्गन्यास और दस प्रकार के मातृका- न्यास (अन्तर्मातृका, सृष्टि-स्थिति संहार ये तीन बहिर्मातृका, कला मातृका, श्रीकण्ठमातृका, केशवमातृका, लज्जाबीज- मातृका, रमाबीजमातृका, कामबीजमातृका) आदि करे। तब— अस्य श्रीपराप्रासादमन्त्रस्य परशम्भुः ऋषिः, अव्यक्ता गायत्री छन्दः, मन्त्रेश्वरी परा देवता, ह्सां स्हां बीजं, ह्सीं स्हीं शक्तिः, ह्सूं स्हूं कीलकं श्रीपरादेवताप्रसादसिद्ध्यर्थे विनियोगः । करन्यास— ह्सांस्हां अंगुष्ठाभ्यां नमः। ह्सींस्हीं तर्जनीभ्यां नमः। ह्सूंस्हूं मध्यमाभ्यां नमः। ह्सैं स्हैं अनामिकाभ्यां नमः। ह्सौं स्हौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ह्सः स्हः करतलकर- पृष्ठाभ्यां नमः। षडङ्गन्यास— ह्सांस्हां हृदयाय नमः। ह्सीं स्हीं शिरसे स्वाहा। ह्सूं स्हूं शिखायै वषट्। ह्सैं स्हैं कवचाय हुं। ह्सौंस्हौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ह्सः स्हः अस्त्राय फट्। मूर्तिन्यास — ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौं स्हौं हों ईशानाय नमः—अंगुष्ठयोः। ,, ,, हैं तत्पुरुषाय नमः—तर्जन्यौः। ,, ,, हूं अघोराय नमः—मध्यमयोः। ,, ,, हिं वामदेवाय नमः—अनामिकयोः ,, ,, हं सद्योजाताय नमः—कनिष्ठिकयोः