भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 84 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16

चौथा उल्लास श्री प्रसादपरा मन्त्र एवं महाषोढा श्री देवी ने कहा--हे ईशान ! मैं श्रीप्रसादपरा मन्त्र को सुनना चाहती हूँ। आप न्यास, ध्यान आदि के सहित उसे बताइये । ईश्वर बोले—हे देवि ! सुनो ! 'अनन्तचन्द्रभुवनमिन्दुविन्दु- युगान्वित' अर्थात् अनन्तचन्द्र है नादविन्दु (ँ), भुवन है औकार, विन्दु है हकार और विन्दुयुग है सकार। इस प्रकार 'ह्सौं' सिद्ध हुआ। यही सादि होने पर 'स्हौं' सिद्ध होता है। श्री प्रसादपरा मन्त्र भुक्ति और मुक्ति का देनेवाला है। पराप्रासाद मन्त्र हे कुलेश्वरि ! 'सादि' कहा गया है। शीघ्र प्रसन्न होकर फल देता है, इसलिए 'प्रासाद' मन्त्र कहलाता है और सब मन्त्रों से परे होने तथा परतत्त्व का निदर्शक होने के कारण इसे 'परा' मन्त्र कहा जाता है। हे देवि ! यह कुल- मन्त्र है। अब इसका न्यास सुनो। प्रातःकाल उठकर गुरुदेव का ध्यान करने के बाद एक बार मूलमन्त्र का स्मरण कर शौचादि से निवृत्त हो। फिर स्नान, संध्या, तर्पण आदि करे। एकान्त में द्वारपूजा, तीनों विघ्नों का उत्सारण (विनाश) कर पूजास्थान में प्रवेश कर आसन पर बैठे। फिर देवीपूजा के पूर्व ध्यान, शिवादि गुरु की वन्दना, आसन शोधन और गणपति-क्षेत्रपाल की वन्दना रे । तदनन्तर गुरुपादुका के मन्त्र का स्मरण कर दीपनाथ

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 16, कुल 84 में से · BharatKosha