भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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३० हिन्दी कुलार्णव सकलीकरण कर मूलमन्त्र से दीप्तात्मा हो न्यासद्रव्योदक से तीन बार उसका प्रोक्षण करे—यह देवशुद्धि कही गई है । इस प्रकार पञ्चशुद्धि कर पूजन करे । तभी पूजन सफल होता है । मण्डल के बिना पूजा निष्फल होती है । अतः मण्डल की रचना कर विधिपूर्वक उसमें पूजा करे । चतुरस्र उद्यान है, वृत्त कामरूप है, चन्द्रार्द्ध जालन्धर है और त्रिकोण पूर्णगिरि है । ऐसे मण्डल की पूजा कर उस पर आधार रखे । आधार पर शंख, अर्घ्य, भोग, पूजा और बलि ये पाँच पात्र क्रमशः स्थापित करे । पात्र का मूलमन्त्र से पूजन कर उसमें माष-बराबर मत्स्य और मांसखण्ड छोड़े । अमृत-वत् स्वादिष्ट, सुगन्धित और मनोहर द्रव्य द्वारा जो तर्पण किया जाता है, वही सिद्धिदायक होता है । बासी, जूठे, दुर्गन्धयुक्त या गन्धहीन द्रव्य से स्थापित पात्रों से जो पूजन- तर्पण किया जाता है, वह निष्फल होता है । असंस्कृत सुरा का पान करने से कलह, व्याधि और दुःख की प्राप्ति होती है । अतः कुलद्रव्य का सविधि संस्कार कर ले । तब अर्चन करे । द्रव्यों की प्रतिष्ठा किए बिना न जप करे, न स्मरण करे । आसव के बिना मन्त्र मन्त्र नहीं होता और मन्त्र के बिना आसव निरर्थक होता है । वीक्षण, प्रोक्षण, ध्यान, मन्त्र और मुद्रा से शोधित द्रव्य द्वारा तर्पण करने से देवता प्रसन्न होता है । पहले अग्नि की धूम्रार्चि आदि १०, सूर्य की तपनी आदि १२, चन्द्र की अमृतादि १६, ब्रह्मा की सृष्टि आदि १०, विष्णु की जरादि १०, रुद्र की तीक्ष्णादि १०, ईश्वर की पीतादि ४, और सदाशिव की निवृत्यादि १६ कलाओं का पूजन द्रव्य में करे । ब्रह्मकलाओं के पूजन के बाद ‘हंसश्शुचि०’ इत्यादि मन्त्र से, विष्णुकलाओं के बाद ‘प्रतद्विष्णु०’ इत्यादि से, रुद्रकलाओं के बाद ‘त्र्यम्बकं०’ इत्यादि से, ईश्वरकलाओं के बाद ‘तद्विष्णोः’