कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनमाला ४५ है, उसी प्रकार कर्मों से बँधा हुआ 'जीव' और कर्मों से छूटा हुआ जीव 'सदाशिव' माना जाता है। विप्रों का वेद (ज्ञान) अग्नि में, मनीषियों का हृदय में, अल्पबुद्धि लोगों का मूर्ति में और आत्मज्ञानी का सर्वत्र रहता है। जो निन्दा-स्तु त, सुख-दुःख, शत्रु-मित्र में समान भाव रखता है, वही 'योगीन्द्र' है । निःस्पृह, नित्य सन्तुष्ट, समदर्शी, जितेन्द्रिय, स्वर्गहीन और उसके लिए प्रयत्न न करनेवाला परम तत्व का ज्ञाता योगी है। पञ्च मुद्राओं से उत्पन्न परमा- नन्द में मग्न रहनेवाला योगीन्द्र सर्वत्र आत्मा में अपने को देखता रहता है। अलि, मांस और अंगना-सङ्ग में जो सुख मिलता है, वह विद्वानों के लिए तो पुण्य है किन्तु अधमों के लिए पाप है। हे देवि ! 'मैं', 'तुम' और 'वह' में ऐक्य भाव का चिन्तन करता हुआ संशयरहित हो वह मद्यपायी मांसाहारी हो स्वेच्छाचार-परायण रहता है। मांसाहार की सुरभि से हीन को सुख नहीं है, उसे प्रायश्चित्ती जानना चाहिए। वह पशु ही है, इसमें संदेह नहीं। जब तक आसव-गन्ध है, तब तक पशु भी साक्षात् पशुपति है और अलि-मांस की गन्ध के बिना साक्षात् पशुपति भी पशु के समान हैं। संसार में निकृष्ट को उत्कृष्ट और उत्कृष्ट को निकृष्ट मानना—महात्मा भैरव ने इसी को 'कुलमार्ग' निर्दिष्ट किया है। हे कुलेश्वरि ! कुलयोगीश्वर कौलिकों के लिए न विधि है, न निषेध । न पुण्य है, न पातक । न स्वर्ग है, न नरक । योगी लोकहित के लिए भोगों का भोग करता है, आकांक्षा से नहीं। सभी कुलों से भोजन ग्रहण करता हुआ वह पृथिवी पर क्रीड़ा करता है। सूर्यवत् वह सब कुछ पीता है, अग्निवत् सब कुछ खाता है। सभी भोगों का भोग करके भी योगी पापों से लिप्त नहीं होता ।