कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी कुलार्णव पहला उल्लास जीव की स्थिति श्री देवी ने ईश्वर से कहा—हे भगवन् ! इस सारहीन कठिन संसार में नाना प्रकार के शरीरों से अनन्त जीवराशियाँ स्थित होकर उत्पन्न होती हैं और मरती हैं और उनका कोई अन्त नहीं है । घोर दुःख से व्याकुल होकर वे कभी सुखी नहीं होतीं । हे प्रभो ! किस उपाय से वे मुक्त हो सकती हैं, यह आप मुझे बतलाइये । ईश्वर ने उत्तर दिया—हे देवि ! सुनो। तुमने मुझसे जो पूछा है, उसे बताता हूँ। इसके सुनने मात्र से मनुष्य संशय से मुक्त हो जायगा । हे देवि ! परब्रह्मस्वरूपी शिव निष्कल है । वह सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सर्वेश और निर्मलहृदय है। वह आदि- अन्त से रहित एक ज्योति है तथा निर्विकार, पर से भी परे, निर्गुण और सच्चिदानन्द है। जीव-संज्ञावाले उसी के अंश हैं, जो असत्य विद्या के द्वारा भिन्न हुए हैं जैसे कि अग्नि में से चिन- गारियाँ फूटती हैं। वे विभिन्न उपाधियों और अनादि कर्मों आदि के कारण उससे पृथक् रहते हैं तथा अपने सुख एवं दुखदायक पुण्य-पापों से नियन्त्रित रहते हैं। अपने कर्मा-