भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १ * १३
चतुर्थं शिवधर्माख्यं साक्षान्नन्दीशभाषितम्।<br>दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदोक्तमतः परम्॥ १८॥<br><br>कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम्।<br>ब्रह्माण्डं वारुणं चाथ कालिकाह्वयमेव च॥ १९॥<br><br>माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसंचयम्।<br>पराशरोक्तमपरं मारीचं भार्गवाह्वयम्॥ २०॥चौथे पुराणका नाम शिवधर्म है जो साक्षात् भगवान् नन्दीश्वर (शिव)-के द्वारा कहा गया है। महर्षि दुर्वासाके द्वारा कहा गया आश्चर्यपुराण पाँचवाँ है और छठा पुराण देवर्षि नारदके द्वारा कहा गया नारदपुराण है। इसी प्रकार (सातवाँ) कपिल, (आठवाँ) मानव और शुक्राचार्यद्वारा प्रोक्त उशना नामक (नवाँ) पुराण है। (दसवाँ) ब्रह्माण्ड, (ग्यारहवाँ) वरुण तथा (बारहवाँ पुराण) कालिकापुराणके नामसे कहा गया है। (तेरहवाँ) माहेश्वरपुराण, (चौदहवाँ) साम्बपुराण तथा सभी प्रकारके अर्थोंसे युक्त (पंद्रहवाँ) सौरपुराण है। (सोलहवाँ) पराशरपुराण महर्षि पराशरके द्वारा कहा गया है। (सत्रहवाँ) मारीचपुराण है और (अठारहवाँ पुराण) भार्गवपुराणके नामसे कहा गया है॥ १८-२०॥
इदं तु पञ्चदशमं पुराणं कौर्ममुत्तमम्।<br>चतुर्धा संस्थितं पुण्यं संहितानां प्रभेदतः॥ २१॥<br><br>ब्राह्मी भागवती सौरी वैष्णवी च प्रकीर्तिताः।<br>चतस्रः संहिताः पुण्या धर्मकामार्थमोक्षदाः॥ २२॥यह कूर्मपुराण पंद्रहवाँ महापुराण है, जो पुराणोंमें श्रेष्ठ है। संहिताओंके भेदसे यह पवित्र पुराण चार भागों (चार संहिताओं)-में विभक्त है। ब्राह्मी, भागवती, सौरी तथा वैष्णवी नामक इस कूर्मपुराणकी चार पवित्र संहिताएँ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—इस प्रकार चतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाली कही गयी हैं॥ २१-२२॥
इयं तु संहिता ब्राह्मी चतुर्वेदैस्तु सम्मिता।<br>भवन्ति षट्सहस्राणि श्लोकानामत्र संख्यया॥ २३॥<br><br>यत्र धर्मार्थकामानां मोक्षस्य च मुनीश्वराः।<br>माहात्म्यमखिलं ब्रह्म ज्ञायते परमेश्वरः॥ २४॥<br><br>सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।<br>वंशानुचरितं दिव्याः पुण्याः प्रासंगिक्यः कथाः॥ २५॥<br><br>ब्राह्मणाद्यैरियं धार्या धार्मिकैः शान्तमानसैः।<br>तामहं वर्तयिष्यामि व्यासेन कथितां पुरा॥ २६॥यह ब्राह्मी संहिता है, जो चारों वेदोंद्वारा अनुमोदित है। इसकी श्लोक-संख्या छः हजार है। हे मुनीश्वरो! इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका अशेष माहात्म्य वर्णित है और (इसके श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पठन-पाठन एवं श्रवण आदिसे) परमेश्वर ब्रह्मका ज्ञान होता है। इसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित और दिव्य एवं पुण्य प्रासंगिक कथाएँ भी कही गयी हैं। यह पुराणसंहिता शान्त-चित्त एवं धर्मात्मा ब्राह्मणादिकोंके द्वारा धारण करने योग्य है। (सूतजी कहते हैं—) मैं उसी पुराणसंहिताका प्रवचन करूँगा, जिसे प्राचीन समयमें वेदव्यासजीने कहा था॥ २३-२६॥
पुरामृतार्थं दैतेयदानवैः सह देवताः।<br>मन्थानं मन्दरं कृत्वा ममन्थुः क्षीरसागरम्॥ २७॥<br><br>मध्यमाने तदा तस्मिन् कूर्मरूपी जनार्दनः।<br>बभार मन्दरं देवो देवानां हितकाम्यया॥ २८॥प्राचीन कालमें अमृतकी प्राप्तिके लिये देवताओंने दितिके पुत्र दैत्यों और दानवोंके साथ मन्दर नामक पर्वतको मथानी बनाकर क्षीरसागरको मथा। उस क्षीरसागरके मन्थन किये जाते समय देवताओंके कल्याणकी कामनासे जनार्दन भगवान् विष्णुने कूर्मरूप धारण करके उस मन्दराचलको ऊपर उठाये रखा॥ २७-२८॥