भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४ | * कूर्मपुराण * |


देवाश्च तुष्टुवुर्देवं नारदाद्या महर्षयः।<br>कूर्मरूपधरं दृष्ट्वा साक्षिणं विष्णुमव्ययम्॥ २९॥कूर्म (कच्छप)-रूप धारण किये हुए सर्वद्रष्टा अविनाशी भगवान् विष्णुको देखकर देवताओं तथा नारदादि महर्षियोंने उन देवकी स्तुति की॥ २९॥
तदन्तरेऽभवद् देवी श्रीर्नारायणवल्लभा।<br>जग्राह भगवान् विष्णुस्तामेव पुरुषोत्तमः॥ ३०॥उसी समय नारायण भगवान् विष्णुकी प्रिया देवी श्रीलक्ष्मीका आविर्भाव हुआ। उन्हें पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने ही ग्रहण किया। लक्ष्मीके तेजसे मोहित हुए इन्द्रसहित नारद आदि महर्षियोंने अव्यक्त भगवान् विष्णुसे यह वचन कहा—॥ ३०-३१॥
तेजसा विष्णुमव्यक्तं नारदाद्या महर्षयः।<br>मोहिताः सह शक्रेण श्रियो वचनमब्रुवन्॥ ३१॥
भगवन् देवदेवेश नारायण जगन्मय।<br>कैषा देवी विशालाक्षी यथावद् ब्रूहि पृच्छताम्॥ ३२॥हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे नारायण! हे जगन्मय! हम पूछनेवालोंको आप ठीक-ठीक बतलायें कि विशाल नेत्रोंवाली यह देवी कौन है?॥ ३२॥
श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं विष्णुर्दानवमर्दनः।<br>प्रोवाच देवीं सम्प्रेक्ष्य नारदादीनकल्मषान्॥ ३३॥उस समय उन देवताओं तथा महर्षियोंका वह वाक्य सुनकर दानवोंका मर्दन करनेवाले भगवान् विष्णु देवी लक्ष्मीकी ओर देखकर नारद आदि परम पवित्र महर्षियोंसे बोले—॥ ३३॥
इयं सा परमा शक्तिर्मन्मयी ब्रह्मरूपिणी।<br>माया मम प्रयानन्ता ययेदं मोहितं जगत्॥ ३४॥<br><br>अनयैव जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>मोहयामि द्विजश्रेष्ठा ग्रसामि विसृजामि च॥ ३५॥<br><br>उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्।<br>विज्ञायान्वीक्ष्य चात्मानं तरन्ति विपुलामिमाम्॥ ३६॥<br><br>अस्यास्त्वंशानधिष्ठाय शक्तिमन्तोऽभवन् द्विजाः।<br>ब्रह्मेशानादयो देवाः सर्वशक्तिरियं मम॥ ३७॥यह मेरी स्वरूपभूता ब्रह्मरूपिणी परम शक्ति है, यही माया है, यही अनन्ता है और यही मेरी वह प्रिया है जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है। हे श्रेष्ठ द्विजो! इसीके द्वारा मैं देवताओं, असुरों एवं मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण विश्वको मोहित करता हूँ, संहार करता हूँ और पुनः सृष्टि करता हूँ। (ज्ञानीजन जगत्की) उत्पत्ति एवं प्रलयको तथा प्राणियोंके जन्म एवं मोक्षको ठीक-ठीक समझकर और आत्मतत्त्वका दर्शनकर इस महामायाके बन्धनसे पार उतरते हैं। द्विजो! मेरी सब प्रकारकी शक्ति यही है, इसीके अंशोंका आश्रय ग्रहणकर ब्रह्मा तथा शिव आदि देवता शक्तिमान् हुए हैं॥ ३४—३७॥
सैषा सर्वजगत्सूतिः प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका।<br>प्रागेव मत्तः संजाता श्रीकल्पे पद्मवासिनी॥ ३८॥<br><br>चतुर्भुजा शङ्खचक्रपद्महस्ता शुभान्विता।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशा मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥ ३९॥<br><br>नालं देवा न पितरो मानवा वसवोऽपि च।<br>मायामेतां समुत्तर्तुं ये चान्ये भुवि देहिनः॥ ४०॥यही वह सत्त्व-रज तथा तम—तीनों गुणोंसे युक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृति है और यही सारे संसारको उत्पन्न करनेवाली है। प्राचीन कालमें श्रीकल्पमें यह पद्मवासिनीके रूपमें मुझसे ही आविर्भूत हुई थी। ये चार भुजावाली हैं, ये हाथोंमें शंख, चक्र तथा कमल धारण किये रहती हैं, सभी मङ्गलमय गुणोंसे युक्त हैं, करोड़ों सूर्योंके समान इनकी आभा है, ये सभी प्राणियोंको मोहित करनेवाली हैं। देवता, पितर, मनुष्य, वसुगण तथा पृथ्वीपर रहनेवाले जितने भी अन्य देहधारी प्राणी हैं, वे सभी अर्थात् कोई भी ऐसा नहीं है जो इस मायाको पार करनेमें समर्थ हो॥ ३८—४०॥
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