भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १ *१५

इत्युक्ता वासुदेवेन मुनयो विष्णुमब्रुवन् ।
ब्रूहि त्वं पुण्डरीकाक्ष यदि कालत्रयेऽपि च ।
को वा तरति तां मायां दुर्जयां देवनिर्मिताम् ॥ ४१ ॥

अथोवाच हृषीकेशो मुनीन् मुनिगणार्चितः ।
अस्ति द्विजातिप्रवर इन्द्रद्युम्न इति श्रुतः ॥ ४२ ॥

पूर्वजन्मनि राजासावधृष्यः शंकरादिभिः ।
दृष्ट्वा मां कूर्मसंस्थानं श्रुत्वा पौराणिकीं स्वयम् ।
संहितां मन्मुखाद् दिव्यां पुरस्कृत्य मुनीश्वरान् ॥ ४३ ॥

ब्रह्माणं च महादेवं देवांश्चान्यान् स्वशक्तिभिः ।
मच्छक्तौ संस्थितान् बुद्ध्वा मामेव शरणं गतः ॥ ४४ ॥
सम्भाषितो मया चाथ विप्रयोनिं गमिष्यसि ।
इन्द्रद्युम्न इति ख्यातो जातिं स्मरसि पौर्विकीम् ॥ ४५ ॥

सर्वेषामेव भूतानां देवानामप्यगोचरम् ।
वक्तव्यं यद् गुह्यतमं दास्ये ज्ञानं तवानघ ।
लब्ध्वा तन्मामकं ज्ञानं मामेवान्ते प्रवेक्ष्यसि ॥ ४६ ॥

अंशान्तरेण भूम्यां त्वं तत्र तिष्ठ सुनिर्वृतः ।
वैवस्वतेऽन्तरेऽतीते कार्यार्थं मां प्रवेक्ष्यसि ॥ ४७ ॥
मां प्रणम्य पुरीं गत्वा पालयामास मेदिनीम् ।
कालधर्मं गतः कालाच्छ्वेतद्वीपे मया सह ॥ ४८ ॥

भुक्त्वा तान् वैष्णवान् भोगान् योगिनामप्यगोचरान् ।
मदाज्ञया मुनिश्रेष्ठा जज्ञे विप्रकुले पुनः ॥ ४९ ॥
ज्ञात्वा मां वासुदेवाख्यं यत्र द्वे निहितेऽक्षरे ।
विद्याविद्ये गूढरूपे यत्तद् ब्रह्म परं विदुः ॥ ५० ॥

सोऽर्चयामास भूतानामाश्रयं परमेश्वरम् ।
व्रतोपवासनियमैर्होमैर्ब्राह्मणतर्पणैः ॥ ५१ ॥


भगवान् वासुदेवके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर मुनियोंने भगवान् विष्णुसे कहा—हे पुण्डरीकाक्ष! उस देवनिर्मित दुर्जय मायाको पार करनेवाला तीनों कालोंमें यदि कोई हुआ हो तो उसे आप बतलायें ॥ ४१ ॥

तदनन्तर मुनियोंद्वारा पूजित भगवान् हृषीकेशने उन मुनियोंसे कहा—इन्द्रद्युम्न नामका द्विजातियोंमें श्रेष्ठ एक ब्राह्मण था, ऐसा सुना गया है। पूर्वजन्ममें वह शंकर आदि देवताओंसे भी अजेय राजा था। 'मैंने कूर्म-अवतार धारण किया है' यह जानकर तथा स्वयं मेरे मुखसे दिव्य पुराण-संहिताको सुनकर वह (राजा इन्द्रद्युम्न) मुनीश्वरोंसहित ब्रह्मा, शिव एवं अपनी-अपनी शक्तियोंके साथ अन्य सभी देवताओंको मेरी ही शक्तिमें प्रतिष्ठित समझकर मुझे देखनेके लिये मेरी शरणमें आया ॥ ४२—४४ ॥

इसके बाद मैंने कहा—(इन्द्रद्युम्न!) तुम ब्राह्मणकी योनिमें उत्पन्न होओगे, तुम्हारा 'इन्द्रद्युम्न' यह नाम प्रसिद्ध होगा और तुम अपने पूर्वजन्मका स्मरण करोगे। हे अनघ! मैं तुम्हें सभी प्राणियों तथा देवताओंके लिये भी अज्ञात एवं जो अत्यन्त गूढ़रूपसे कहने योग्य है, उस ज्ञानको प्रदान करूँगा। उस मेरे ज्ञानको प्राप्तकर तुम अन्त समयमें मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे और अपने ही अंशसे दूसरे रूपमें तुम पृथ्वीपर शान्तिपूर्वक रहो। वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर तुम (अभीष्ट) कार्यके लिये मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे ॥ ४५—४७ ॥

(भगवान्ने पुनः कहा—) मुनिश्रेष्ठो! मुझे प्रणामकर वह राजा अपनी नगरीमें गया और पृथ्वीका पालन-पोषण करने लगा। यथासमय मृत्यु होनेपर वह मेरे स्थान—श्वेतद्वीपको प्राप्त हुआ और वहाँ मेरे साथ योगियोंके लिये भी अलभ्य दिव्य वैष्णव भोगोंको भोगकर पुनः मेरी ही आज्ञासे ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ ॥ ४८-४९ ॥

जिसमें अविनश्वर गूढ़ स्वरूपवाली विद्या एवं अविद्या—ये दोनों प्रतिष्ठित हैं तथा जिसे ज्ञानीजन परब्रह्मके नामसे जानते हैं, उस वासुदेव नामवाले मुझे जानकर इन्द्रद्युम्नने व्रत, उपवास, नियम, होम तथा ब्राह्मणोंकी संतुष्टि आदि उपायोंद्वारा सभी प्राणियोंके एकमात्र आश्रय परमेश्वरकी आराधना की ॥ ५०-५१ ॥