संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय १ * | १५ |
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इत्युक्ता वासुदेवेन मुनयो विष्णुमब्रुवन् ।
ब्रूहि त्वं पुण्डरीकाक्ष यदि कालत्रयेऽपि च ।
को वा तरति तां मायां दुर्जयां देवनिर्मिताम् ॥ ४१ ॥
अथोवाच हृषीकेशो मुनीन् मुनिगणार्चितः ।
अस्ति द्विजातिप्रवर इन्द्रद्युम्न इति श्रुतः ॥ ४२ ॥
पूर्वजन्मनि राजासावधृष्यः शंकरादिभिः ।
दृष्ट्वा मां कूर्मसंस्थानं श्रुत्वा पौराणिकीं स्वयम् ।
संहितां मन्मुखाद् दिव्यां पुरस्कृत्य मुनीश्वरान् ॥ ४३ ॥
ब्रह्माणं च महादेवं देवांश्चान्यान् स्वशक्तिभिः ।
मच्छक्तौ संस्थितान् बुद्ध्वा मामेव शरणं गतः ॥ ४४ ॥
सम्भाषितो मया चाथ विप्रयोनिं गमिष्यसि ।
इन्द्रद्युम्न इति ख्यातो जातिं स्मरसि पौर्विकीम् ॥ ४५ ॥
सर्वेषामेव भूतानां देवानामप्यगोचरम् ।
वक्तव्यं यद् गुह्यतमं दास्ये ज्ञानं तवानघ ।
लब्ध्वा तन्मामकं ज्ञानं मामेवान्ते प्रवेक्ष्यसि ॥ ४६ ॥
अंशान्तरेण भूम्यां त्वं तत्र तिष्ठ सुनिर्वृतः ।
वैवस्वतेऽन्तरेऽतीते कार्यार्थं मां प्रवेक्ष्यसि ॥ ४७ ॥
मां प्रणम्य पुरीं गत्वा पालयामास मेदिनीम् ।
कालधर्मं गतः कालाच्छ्वेतद्वीपे मया सह ॥ ४८ ॥
भुक्त्वा तान् वैष्णवान् भोगान् योगिनामप्यगोचरान् ।
मदाज्ञया मुनिश्रेष्ठा जज्ञे विप्रकुले पुनः ॥ ४९ ॥
ज्ञात्वा मां वासुदेवाख्यं यत्र द्वे निहितेऽक्षरे ।
विद्याविद्ये गूढरूपे यत्तद् ब्रह्म परं विदुः ॥ ५० ॥
सोऽर्चयामास भूतानामाश्रयं परमेश्वरम् ।
व्रतोपवासनियमैर्होमैर्ब्राह्मणतर्पणैः ॥ ५१ ॥
भगवान् वासुदेवके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर मुनियोंने भगवान् विष्णुसे कहा—हे पुण्डरीकाक्ष! उस देवनिर्मित दुर्जय मायाको पार करनेवाला तीनों कालोंमें यदि कोई हुआ हो तो उसे आप बतलायें ॥ ४१ ॥
तदनन्तर मुनियोंद्वारा पूजित भगवान् हृषीकेशने उन मुनियोंसे कहा—इन्द्रद्युम्न नामका द्विजातियोंमें श्रेष्ठ एक ब्राह्मण था, ऐसा सुना गया है। पूर्वजन्ममें वह शंकर आदि देवताओंसे भी अजेय राजा था। 'मैंने कूर्म-अवतार धारण किया है' यह जानकर तथा स्वयं मेरे मुखसे दिव्य पुराण-संहिताको सुनकर वह (राजा इन्द्रद्युम्न) मुनीश्वरोंसहित ब्रह्मा, शिव एवं अपनी-अपनी शक्तियोंके साथ अन्य सभी देवताओंको मेरी ही शक्तिमें प्रतिष्ठित समझकर मुझे देखनेके लिये मेरी शरणमें आया ॥ ४२—४४ ॥
इसके बाद मैंने कहा—(इन्द्रद्युम्न!) तुम ब्राह्मणकी योनिमें उत्पन्न होओगे, तुम्हारा 'इन्द्रद्युम्न' यह नाम प्रसिद्ध होगा और तुम अपने पूर्वजन्मका स्मरण करोगे। हे अनघ! मैं तुम्हें सभी प्राणियों तथा देवताओंके लिये भी अज्ञात एवं जो अत्यन्त गूढ़रूपसे कहने योग्य है, उस ज्ञानको प्रदान करूँगा। उस मेरे ज्ञानको प्राप्तकर तुम अन्त समयमें मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे और अपने ही अंशसे दूसरे रूपमें तुम पृथ्वीपर शान्तिपूर्वक रहो। वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर तुम (अभीष्ट) कार्यके लिये मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे ॥ ४५—४७ ॥
(भगवान्ने पुनः कहा—) मुनिश्रेष्ठो! मुझे प्रणामकर वह राजा अपनी नगरीमें गया और पृथ्वीका पालन-पोषण करने लगा। यथासमय मृत्यु होनेपर वह मेरे स्थान—श्वेतद्वीपको प्राप्त हुआ और वहाँ मेरे साथ योगियोंके लिये भी अलभ्य दिव्य वैष्णव भोगोंको भोगकर पुनः मेरी ही आज्ञासे ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ ॥ ४८-४९ ॥
जिसमें अविनश्वर गूढ़ स्वरूपवाली विद्या एवं अविद्या—ये दोनों प्रतिष्ठित हैं तथा जिसे ज्ञानीजन परब्रह्मके नामसे जानते हैं, उस वासुदेव नामवाले मुझे जानकर इन्द्रद्युम्नने व्रत, उपवास, नियम, होम तथा ब्राह्मणोंकी संतुष्टि आदि उपायोंद्वारा सभी प्राणियोंके एकमात्र आश्रय परमेश्वरकी आराधना की ॥ ५०-५१ ॥
| १६ | * कूर्मपुराण * |
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| तदाशीस्तन्नमस्कारस्तन्निष्ठस्तत्परायणः ।<br>आराधयन् महादेवं योगिनां हृदि संस्थितम् ॥ ५२ ॥<br><br>तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित् परमा कला।<br>स्वरूपं दर्शयामास दिव्यं विष्णुसमुद्भवम् ॥ ५३ ॥<br><br>दृष्ट्वा प्रणम्य शिरसा विष्णोर्भगवतः प्रियाम्।<br>संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः कृताञ्जलिरभाषत ॥ ५४ ॥<br><div style="text-align:center">इन्द्रद्युम्न उवाच</div>का त्वं देवि विशालाक्षि विष्णुचिह्नाङ्किते शुभे।<br>याथातथ्येन वै भावं तवेदानीं ब्रवीहि मे ॥ ५५ ॥<br><br>तस्य तद् वाक्यमाकर्ण्य सुप्रसन्ना सुमङ्गला।<br>हसन्ती संस्मरन् विष्णुं प्रियं ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ ५६ ॥<br><br>न मां पश्यन्ति मुनयो देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>नारायणात्मिका चैका मायाहं तन्मया परा ॥ ५७ ॥<br><br>न मे नारायणाद् भेदो विद्यते हि विचारतः।<br>तन्मयाहं परं ब्रह्म स विष्णुः परमेश्वरः ॥ ५८ ॥<br><br>येऽर्चयन्तीह भूतानामाश्रयं परमेश्वरम्।<br>ज्ञानेन कर्मयोगेन न तेषां प्रभवाम्यहम् ॥ ५९ ॥<br><br>तस्मादनादिनिधनं कर्मयोगपरायणः।<br>ज्ञानेनाराधयानन्तं ततो मोक्षमवाप्स्यसि ॥ ६० ॥<br><br>इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नो महामतिः।<br>प्रणम्य शिरसा देवीं प्राञ्जलिः पुनरब्रवीत् ॥ ६१ ॥<br><br>कथं स भगवानीशः शाश्वतो निष्कलोऽच्युतः।<br>ज्ञातुं हि शक्यते देवि ब्रूहि मे परमेश्वरि ॥ ६२ ॥<br><br>एवमुक्ताथ विप्रेण देवी कमलवासिनी।<br>साक्षान्नारायणो ज्ञानं दास्यतीत्याह तं मुनिम् ॥ ६३ ॥<br><br>उभाभ्यामथ हस्ताभ्यां संस्पृश्य प्रणतं मुनिम्।<br>स्मृत्वा परात्परं विष्णुं तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६४ ॥ | वह उन्हींकी मङ्गलकामना करते हुए उन्हींको नमस्कार करता था, उनमें ही उसकी अनन्य निष्ठा थी तथा वह उन्हींके आश्रित होकर योगियोंके हृदयप्रदेशमें विराजमान रहनेवाले महादेवकी आराधना करने लगा। उसके इसी प्रकार आराधना करते हुए एक दिन वैष्णवी शक्तिने भगवान् विष्णुसे प्रादुर्भूत दिव्य स्वरूप उसे दिखलाया। भगवान् विष्णुकी प्रिया देवी विष्णुप्रियाका दर्शनकर उसने सिर झुकाकर विनीतभावसे उन्हें प्रणाम किया और विविध स्तुतियोंके द्वारा उनकी स्तुतिकर हाथ जोड़कर कहा—॥ ५२-५४॥<br><br>इन्द्रद्युम्नने कहा—वैष्णव चिह्नोंवाली, मङ्गलमयी तथा विशाल नेत्रोंवाली हे देवि ! आप कौन हैं ? आपका जो यथार्थ स्वरूप हो उसे इस समय मुझे बतलायें ॥ ५५ ॥<br><br>इन्द्रद्युम्नके वचन सुनकर अत्यन्त सुप्रसन्ना सुमङ्गला वह देवी विष्णुका स्मरणकर उस प्रिय ब्राह्मणसे हँसती हुई बोली—॥ ५६ ॥<br><br>मैं उन विष्णुकी प्रकृतिस्वरूपा परा माया हूँ। मुझ अद्वितीय नारायणस्वरूपा नारायणीको मुनि तथा इन्द्र आदि देवता भी नहीं देख पाते हैं। सूक्ष्म विचार करनेपर मुझमें और नारायणमें कोई भेद नहीं दीखता। मैं उनकी प्रकृतिरूपा हूँ, वे विष्णु परब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं। समस्त भूत (प्राणियों)-के आश्रयभूत उन परमेश्वरकी जो ज्ञानयोग अथवा कर्मयोगद्वारा यहाँ आराधना करते हैं ऐसे भक्तोंपर मेरा कोई वश नहीं चलता। अतः तुम कर्मयोगका आश्रय लेते हुए ज्ञानके द्वारा उन आदि और अन्तसे रहित अनन्त भगवान् विष्णुकी आराधना करो। इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे ॥ ५७-६०॥<br><br>ऐसा कहे जानेपर अत्यन्त बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ उस इन्द्रद्युम्नने देवीको विनयपूर्वक प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पुनः कहा—हे परमेश्वरी देवि ! शाश्वत, अखण्ड तथा अच्युत सबके स्वामी उन भगवान्को किस प्रकार जाना जा सकता है, यह मुझे बतलायें ॥ ६१-६२॥<br><br>ब्राह्मण (इन्द्रद्युम्न)-के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर कमलमें निवास करनेवाली देवीने उस मुनिसे कहा—'साक्षात् नारायण ही तुम्हें (वह) ज्ञान प्रदान करेंगे। तदनन्तर प्रणाम कर रहे उस मुनि (इन्द्रद्युम्न)-को अपने दोनों हाथोंसे भली-भाँति स्पर्श कर (वे देवी) परात्पर विष्णुका स्मरण करती हुई वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ ६३-६४॥ |
- अध्याय १ * १७
सोऽपि नारायणं द्रष्टुं परमेण समाधिना।
आराधयद्धृषीकेशं प्रणतार्तिप्रभञ्जनम्॥ ६५॥
ततो बहुतिथे काले गते नारायणः स्वयम्।
प्रादुरासीन्महायोगी पीतवासा जगन्मयः॥ ६६॥
दृष्ट्वा देवं समायान्तं विष्णुमात्मानमव्ययम्।
जानुभ्यामवनिं गत्वा तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ६७॥
इन्द्रद्युम्न उवाच
यज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव।
कृष्ण विष्णो हृषीकेश तुभ्यं विश्वात्मने नमः॥ ६८॥
नमोऽस्तु ते पुराणाय हरये विश्वमूर्तये।
सर्गस्थितिविनाशानां हेतवेऽनन्तशक्तये॥ ६९॥
निर्गुणाय नमस्तुभ्यं निष्कलायामलात्मने।
पुरुषाय नमस्तुभ्यं विश्वरूपाय ते नमः॥ ७०॥
नमस्ते वासुदेवाय विष्णवे विश्वयोनये।
आदिमध्यान्तहीनाय ज्ञानगम्याय ते नमः॥ ७१॥
नमस्ते निर्विकाराय निष्प्रपञ्चाय ते नमः।
भेदाभेदविहीनाय नमोऽस्त्वानन्दरूपिणे॥ ७२॥
नमस्ताराय शान्ताय नमोऽप्रतिहतात्मने।
अनन्तमूर्तये तुभ्यममूर्ताय नमो नमः॥ ७३॥
नमस्ते परमार्थाय मायातीताय ते नमः।
नमस्ते परमेशाय ब्रह्मणे परमात्मने॥ ७४॥
नमोऽस्तु ते सुसूक्ष्माय महादेवाय ते नमः।
नमः शिवाय शुद्धाय नमस्ते परमेष्ठिने॥ ७५॥
त्वयैव सृष्टमखिलं त्वमेव परमा गतिः।
त्वं पिता सर्वभूतानां त्वं माता पुरुषोत्तम॥ ७६॥
त्वमक्षरं परं धाम चिन्मात्रं व्योम निष्कलम्।
सर्वस्याधारमव्यक्तमनन्तं तमसः परम्॥ ७७॥
प्रपश्यन्ति परात्मानं ज्ञानदीपेन केवलम्।
प्रपद्ये भवतो रूपं तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७८॥
इन्द्रद्युम्न भी शरणागतके दुःखोंको सर्वथा दूर कर देनेवाले हृषीकेश भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये दीर्घकालीन समाधिमें निरत होकर आराधना करने लगा। तत्पश्चात् बहुत समय बीत जानेपर पीताम्बरधारी, जगन्मूर्ति महायोगी भगवान् नारायण उसके सामने स्वयं प्रकट हो गये। अविनाशी परमात्मा भगवान् विष्णुको आया हुआ देखकर घुटनोंके बल पृथ्वीपर स्थित होकर वह गरुडध्वजदेवकी स्तुति करने लगा॥ ६५—६७॥
इन्द्रद्युम्नने कहा— हे यज्ञोंके स्वामी ! अच्युत ! गोविन्द ! माधव ! अनन्त ! केशव ! कृष्ण ! विष्णु ! तथा हृषीकेश ! आप विश्वात्माको नमस्कार है। पुराण-पुरुष ! विश्वमूर्ति हे हरि ! आप सृष्टि, स्थिति तथा प्रलयके मूल कारण हैं, आप अनन्त शक्तिसम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आप निर्गुण-स्वरूप हैं, निष्कल एवं विमलात्मा हैं, आपको नमस्कार है। हे विश्वरूप पुरुष ! आपको नमस्कार है। विश्वकी योनि, वासुदेव भगवान् विष्णुको नमस्कार है। आप आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित ज्ञानद्वारा जानने योग्य हैं, आपको नमस्कार है। निर्विकार तथा प्रपञ्चरहित आपको नमस्कार है। भेद-अभेदसे रहित आनन्द-स्वरूप आपको नमस्कार है। (संसारसागरसे) पार उतारनेवाले, शान्तस्वरूप आपको नमस्कार है। शुद्धात्मा आपको नमस्कार है। आप अनन्तमूर्तिवाले हैं, अमूर्त हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप परमार्थरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप मायासे अतीत हैं, आपको नमस्कार है। ईशोंके भी ईश ! आपको नमस्कार है। परमात्मा परब्रह्मरूप आपको नमस्कार है। अत्यन्त सूक्ष्मरूप आपको नमस्कार है। देवोंके भी देव महादेव ! आपको नमस्कार है। विशुद्धस्वरूप शिव ! आपको नमस्कार है। परमेष्ठीस्वरूप आपको नमस्कार है॥ ६८—७५॥
आपने ही सम्पूर्ण सृष्टिकी रचना की है। आप ही परम गति हैं। हे पुरुषोत्तम ! आप ही सभी भूत-प्राणियोंके पिता हैं और आप ही सबकी माता हैं। आप अविनाशी हैं, परम धाम हैं, चित्स्वरूप हैं, व्योम हैं, निष्कल हैं, सबके आधार हैं, अव्यक्त हैं, अनन्त हैं और तमसे सर्वथा रहित नित्य प्रकाशस्वरूप हैं। (ज्ञानीजन) केवल ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा जिस परमात्माका दर्शन करते हैं, मैं आपके उस रूपकी शरण ग्रहण करता हूँ, वह विष्णुका परमपद है॥ ७६—७८॥
१८ * कूर्मपुराण *
एवं स्तुवन्तं भगवान् भूतात्मा भूतभावनः।
उभाभ्यामथ हस्ताभ्यां पस्पर्श प्रहसन्निव॥ ७९॥
स्पृष्टमात्रो भगवता विष्णुना मुनिपुंगवः।
यथावत् परमं तत्त्वं ज्ञातवांस्तत्प्रसादतः॥ ८०॥
ततः प्रहृष्टमनसा प्रणिपत्य जनार्दनम्।
प्रोवाचोन्निद्रपद्माक्षं पीतवाससमच्युतम्॥ ८१॥
त्वत्प्रसादादसंदिग्धमुत्पन्नं पुरुषोत्तम।
ज्ञानं ब्रह्मैकविषयं परमानन्दसिद्धिदम्॥ ८२॥
नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय वेधसे।
किं करिष्यामि योगेश तन्मे वद जगन्मय॥ ८३॥
श्रुत्वा नारायणो वाक्यमिन्द्रद्युम्नस्य माधवः।
उवाच सस्मितं वाक्यमशेषजगतो हितम्॥ ८४॥
श्रीभगवानुवाच
वर्णाश्रमाचारवतां पुंसां देवो महेश्वरः।
ज्ञानेन भक्तियोगेन पूजनीयो न चान्यथा॥ ८५॥
विज्ञाय तत्परं तत्त्वं विभूतिं कार्यकारणम्।
प्रवृत्तिं चापि मे ज्ञात्वा मोक्षार्थीश्वरमर्चयेत्॥ ८६॥
सर्वसंगान् परित्यज्य ज्ञात्वा मायामयं जगत्।
अद्वैतं भावयात्मानं द्रक्ष्यसे परमेश्वरम्॥ ८७॥
त्रिविधा भावना ब्रह्मन् प्रोच्यमाना निबोध मे।
एका मद्धिषया तत्र द्वितीया व्यक्तसंश्रया।
अन्या च भावना ब्राह्मी विज्ञेया सा गुणातिगा॥ ८८॥
इस प्रकार स्तुति करते हुए इन्द्रद्युम्नका सभी प्राणियोंके आत्मरूप भूतभावन भगवान् विष्णुने अपने दोनों हाथोंसे किञ्चित् मुसकराते हुए स्पर्श किया॥ ७९॥
भगवान् विष्णुके द्वारा स्पर्श करते ही मुनिश्रेष्ठ (इन्द्रद्युम्न)-को उन भगवान्की कृपासे परम तत्त्वका यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो गया। इसके बाद अत्यन्त प्रसन्न मनसे इन्द्रद्युम्नने प्रफुल्लित कमलके समान नेत्रवाले, पीताम्बरधारी अच्युत भगवान् जनार्दनको प्रणाम कर कहा—॥ ८०-८१॥
हे पुरुषोत्तम! आपकी कृपासे मुझे परमानन्दकी प्राप्ति करानेवाला एकमात्र ब्रह्मसम्बन्धी संदेहरहित ज्ञान प्राप्त हो गया है। हे भगवन्! हे वासुदेव! हे वेधा! आपको नमस्कार है। हे योगेश! हे जगन्मय! मैं क्या करूँ, उसे आप मुझे बतलायें॥ ८२-८३॥
इन्द्रद्युम्नके वचन सुनकर माधव भगवान् नारायणने समस्त संसारके कल्याणकी कामनासे मुसकराते हुए यह वचन कहा—॥ ८४॥
श्रीभगवान् बोले— वर्ण एवं आश्रमधर्मका पालन करनेवाले व्यक्तियोंको चाहिये कि वे ज्ञान एवं भक्तियोगके द्वारा भगवान् महेश्वरकी पूजा करें, अन्य साधनसे नहीं। मोक्षार्थीको चाहिये कि उस परम तत्त्व, विभूति एवं कार्यकारणरूपको ठीक-ठीक जानकर साथ ही मेरी प्रवृत्तिको समझकर ईश्वरकी उपासना करे। सभी प्रकारकी आसक्तियोंका सर्वथा परित्याग कर, इस संसारको माया-रूप जानकर अपनेमें अद्वैतकी भावना करे*। (ऐसा करनेसे इन्द्रद्युम्न! तुम) परमेश्वरका दर्शन करोगे॥ ८५-८७॥
ब्रह्मन् इन्द्रद्युम्न! तीन प्रकारकी भावनाएँ कही गयी हैं, उन्हें मैं बताता हूँ, तुम सुनो—उन तीनोंमेंसे पहली भावना है मद्धिषया अर्थात् मेरे सगुण स्वरूपकी भावना। दूसरी है व्यक्तसंश्रया अर्थात् भगवान्का जो विराट् स्वरूप है, उसका आश्रय ग्रहण कर उपासनाकी भावना और तीसरी जो भावना है उसे ब्राह्मी अर्थात् ब्रह्मज्ञानविषयक भावना जानना चाहिये, यह तीसरी भावना गुणातीत है (गुणातीतरूपमें ब्रह्मकी उपासना ही ब्राह्मी भावना है।) विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि इन तीनोंमेंसे किसी भी भावनाका आश्रय ग्रहण कर उपासना करे॥ ८८॥
* 'परमात्मासे अतिरिक्त कुछ नहीं है' यह भावना ही यहाँ अद्वैत भावना है।
| * अध्याय १ * | १९ |
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| आसामन्यतमां चाथ भावनां भावयेद् बुधः।<br>अशक्तः संश्रयेदाद्यामित्येषा वैदिकी श्रुतिः॥ ८९ ॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तन्निष्ठस्तत्परायणः।<br>समाराध्य विश्वेशं ततो मोक्षमवाप्स्यसि॥ ९० ॥ | जो असमर्थ व्यक्ति है उसे चाहिये कि वह प्रथम भावना अर्थात् वैष्णवी भावनाका अवलम्बन ग्रहण करे—ऐसा वेदका मत है। इसलिये (इन्द्रद्युम्न! तुम) समस्त प्रयत्नोंके द्वारा सम्पूर्ण संसारके स्वामी भगवान् विष्णुकी आराधना करो, उनमें ही निष्ठा रखो और उन्हींका आश्रय ग्रहण कर उन्हींके शरणागत हो जाओ, इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे॥ ८९-९०॥ |
| इन्द्रद्युम्न उवाच<br>किं तत् परतरं तत्त्वं का विभूतिर्जनार्दन।<br>किं कार्यं कारणं कस्त्वं प्रवृत्तिश्चापि का तव॥ ९१ ॥ | इन्द्रद्युम्न बोले— हे जनार्दन! वह परात्पर तत्त्व क्या है, विभूति क्या है? कार्य क्या है और कारण क्या है? आप कौन हैं? और आपकी प्रवृत्ति क्या है? ॥ ९१ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>परात्परतरं तत्त्वं परं ब्रह्मैकमव्ययम्।<br>नित्यानन्दं स्वयंज्योतिरक्षरं तमसः परम्॥ ९२ ॥<br><br>ऐश्वर्यं तस्य यन्नित्यं विभूतिरिति गीयते।<br>कार्यं जगत्तथाव्यक्तं कारणं शुद्धमक्षरम्॥ ९३ ॥<br><br>अहं हि सर्वभूतानामन्तर्यामीश्वरः परः।<br>सर्गस्थित्यन्तकर्तृत्वं प्रवृत्तिमर्म गीयते॥ ९४ ॥<br><br>एतद् विज्ञाय भावेन यथावदखिलं द्विज।<br>ततस्त्वं कर्मयोगेन शाश्वतं सम्यगर्चय॥ ९५ ॥ | श्रीभगवान् बोले— वह परसे परतर तत्त्व एकमात्र अखण्ड परम ब्रह्म ही है। वह नित्य आनन्दस्वरूप है, स्वयं प्रकाशमान है, अविनाशी है और तम (अन्धकार)- से सर्वथा परे है। उस परमात्माका जो नित्य रहनेवाला ऐश्वर्य है, वही विभूति नामसे कहा जाता है। यह संसार ही (परमात्माका) कार्यरूप है और अविनाशी विशुद्ध अव्यक्त तत्त्व ही (इस संसारका) कारणरूप है। मैं ही समस्त प्राणियोंमें रहनेवाला अन्तर्यामी ईश्वर हूँ। सृष्टि, पालन और संहार ही मेरी प्रवृत्ति कही जाती है। हे द्विज! इन सभी बातोंको यथार्थरूपसे जानकर तुम कर्मयोगके द्वारा श्रद्धाभावसे (उस) सनातन (ईश्वर)- की भलीभाँति अर्चना करो॥ ९२-९५॥ |
| इन्द्रद्युम्न उवाच<br>के ते वर्णाश्रमाचारा यैः समाराध्यते परः।<br>ज्ञानं च कीदृशं दिव्यं भावनात्रयसंस्थितम्॥ ९६ ॥<br><br>कथं सृष्टमिदं पूर्वं कथं संह्रियते पुनः।<br>कियत्यः सृष्टयो लोके वंशा मन्वन्तराणि च।<br>कानि तेषां प्रमाणानि पावनानि व्रतानि च॥ ९७ ॥<br><br>तीर्थान्यर्कादिसंस्थानं पृथिव्यायामविस्तरे।<br>कति द्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च नदीनदाः।<br>ब्रूहि मे पुण्डरीकाक्ष यथावदधुनाखिलम्॥ ९८ ॥ | इन्द्रद्युम्नने कहा— (भगवन्!) वर्णों तथा आश्रमोंके वे कौनसे पालनीय नियम हैं, जिनसे (उस) परतत्त्वकी आराधना की जाती है और वह दिव्य ज्ञान कैसा है जो तीन भावनाओंसे युक्त है? (परमात्माने) पूर्वकालमें इस (संसार)-की सृष्टि कैसे की और फिर कैसे इसका संहार होता है, लोकमें कितनी सृष्टियाँ हैं, कितने वंश हैं, कितने मन्वन्तर हैं। उनके कितने प्रमाण हैं और पवित्र व्रत तथा तीर्थ कौन-से हैं। सूर्य आदि ग्रहोंकी स्थिति कैसी है, पृथ्वीकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है, कितने द्वीप, समुद्र, पर्वत हैं और कितने नद हैं और कितनी नदियाँ हैं, हे पुण्डरीकाक्ष! इस समय यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताइये॥ ९६-९८॥ |
| श्रीकूर्म उवाच<br>एवमुक्तोऽथ तेनाहं भक्तानुग्रहकाम्यया।<br>यथावदखिलं सर्वमवोचं मुनिपुंगवाः॥ ९९ ॥ | श्रीकूर्मने कहा— हे श्रेष्ठ मुनियो! उस इन्द्रद्युम्नके द्वारा मुझसे इस प्रकार कहे जानेपर भक्तोंपर अनुकम्पा करनेकी कामनासे मैंने वे सभी बातें विस्तारसे ठीक-ठीक उसे बतला दीं॥ ९९॥ |
२० * कूर्मपुराण *
| व्याख्यायाशेषमेवेदं यत्पृष्टोऽहं द्विजेन तु।<br>अनुगृह्य च तं विप्रं तत्रैवान्तर्हितोऽभवम्॥ १००॥ | इस प्रकार उस ब्राह्मण इन्द्रद्युम्नने जो-जो भी मुझसे पूछा था, वह सब विस्तारसे बतलाकर और उसपर कृपा करके मैं वहीं अन्तर्धान हो गया॥ १००॥ |
| सोऽपि तेन विधानेन मदुक्तेन द्विजोत्तमः।<br>आराधयामास परं भावपूतः समाहितः॥ १०१॥ | उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने भी मेरे द्वारा बताये गये विधानसे अत्यन्त पवित्र भावनासे समाहित-चित्त होकर परम तत्त्वकी उपासना की। उसने अपने स्त्री-पुत्र आदिका मोह छोड़ दिया, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित हो गया, किसी भी वस्तुका संग्रह करना सर्वथा त्याग कर अपरिग्रही हो गया और सभी कर्मोंका परित्याग कर उसने परम वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। अपनी आत्मामें ही परमात्माका दर्शन करके और अपनी आत्मामें ही सम्पूर्ण विश्वका अनुभव कर अक्षर-तत्त्व-सम्बन्धी अन्तिम ब्राह्मी भावनाको प्राप्त किया, जिसके कारण उसे उस दुर्लभ परम योगकी प्राप्ति हुई। इस योगसे ही उस अद्वितीय तत्त्वका साक्षात्कार होता है जिसकी अभिलाषा निद्रात्यागी, श्वासजयी, मोक्षार्थी पुरुष भी करते हैं॥ १०१-१०४॥ |
| त्यक्त्वा पुत्रादिषु स्नेहं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः।<br>संन्यस्य सर्वकर्माणि परं वैराग्यमाश्रितः॥ १०२॥ | |
| आत्मन्यात्मानमन्वीक्ष्य स्वात्मन्येवाखिलं जगत्।<br>सम्प्राप्य भावनामन्त्यां ब्राह्मीमक्षरपूर्वकाम्॥ १०३॥ | |
| अवाप परमं योगं येनैकं परिपश्यति।<br>यं विनिद्रा जितश्वासाः कांक्षन्ते मोक्षकांक्षिणः॥ १०४॥ | |
| ततः कदाचिद् योगीन्द्रो ब्रह्माणं द्रष्टुमव्ययम्।<br>जगामादित्यनिर्देशान्मानसोत्तरपर्वतम् ।<br>आकाशेनैव विप्रेन्द्रो योगैश्वर्यप्रभावतः॥ १०५॥ | इसके बाद किसी दिन वह ब्राह्मणश्रेष्ठ योगीन्द्र इन्द्रद्युम्न भगवान् सूर्यके निर्देशसे अव्यय ब्रह्मका दर्शन करनेके लिये अपनी योग-सिद्धिके प्रभावसे प्रादुर्भूत सूर्यके समान प्रकाशमान श्रेष्ठ विमानमें चढ़कर आकाशमार्गसे मानसरोवरके उत्तरमें स्थित पर्वतपर गया। उस योगिराज इन्द्रद्युम्नको आकाशमार्गमें जाते हुए देखकर देवों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंका समूह भी उसके पीछे-पीछे गया और अन्य सिद्ध तथा ब्रह्मर्षियोंने भी उसका अनुसरण किया॥ १०५-१०६॥ |
| विमानं सूर्यसंकाशं प्रादुर्भूतमनुत्तमम्।<br>अन्वगच्छन् देवगणा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।<br>दृष्ट्वान्ये पथि योगीन्द्रं सिद्धा ब्रह्मर्षयो ययुः॥ १०६॥ | |
| ततः स गत्वा तु गिरि विवेश सुरवन्दितम्।<br>स्थानं तद् योगिभिर्जुष्टं यत्रास्ते परमः पुमान्॥ १०७॥ | तदनन्तर वहाँ जाकर इन्द्रद्युम्नने देवताओंद्वारा वन्दित तथा योगियोंद्वारा सेवित पर्वतके उस स्थानपर प्रवेश किया, जहाँ परम पुरुष परमात्मा प्रतिष्ठित रहते हैं। दस हजार सूर्योंके प्रकाशके समान प्रकाशित उस श्रेष्ठ स्थानपर पहुँचकर (इन्द्रद्युम्नने) देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य (उस स्थानके) अन्तर्गृहमें प्रवेश किया॥ १०७-१०८॥ |
| सम्प्राप्य परमं स्थानं सूर्यायुतसमप्रभम्।<br>विवेश चान्तर्भवनं देवानां च दुरासदम्॥ १०८॥ | |
| विचिन्तयामास परं शरण्यं सर्वदेहिनाम्।<br>अनादिनिधनं देवं देवदेवं पितामहम्॥ १०९॥ | (वहाँ पहुँचकर उसने) सभी प्राणियोंके परम शरणदाता, आदि-अन्तसे रहित, देवाधिदेव पितामह ब्रह्मदेवका ध्यान किया। इसके बाद उसके ध्यान करते ही वहाँ परमात्माका प्रकाश प्रादुर्भूत हुआ। इन्द्रद्युम्नने |
| ततः प्रादुर्भूत् तस्मिन् प्रकाशः परमात्मनः।<br>तन्मध्ये पुरुषं पूर्वमपश्यत् परमं पदम्॥ ११०॥ |
| * अध्याय १ * | २१ |
|---|---|
| महान्तं तेजसो राशिमगम्यं ब्रह्मविद्विषाम्।<br>चतुर्मुखमुदाराङ्गमर्चिभिरुपशोभितम् ॥ १११॥ | उस प्रकाशपुञ्जके मध्यमें महान् तेजकी राशिके रूपमें ब्रह्मविद्वेषियोंके लिये अगम्य, परमपदस्वरूप पूर्व पुरुषका दर्शन किया, जो चार मुखवाले थे, जिनके सभी अङ्ग शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे और प्रकाशकी किरणोंसे सुशोभित थे॥ १०९—१११॥ |
| सोऽपि योगिनमन्वीक्ष्य प्रणमन्तमुपस्थितम्।<br>प्रत्युद्गम्य स्वयं देवो विश्वात्मा परिषस्वजे ॥ ११२॥ | समीपमें आये प्रणाम करते हुए योगी इन्द्रद्युम्नको देखकर वह विश्वात्मा ब्रह्मदेव स्वयं भी उसके समीपमें गये और उसको अपने हृदयसे लगाया। |
| परिष्वक्तस्य देवेन द्विजेन्द्रस्याथ देहतः।<br>निर्गत्य महती ज्योत्स्ना विवेशादित्यमण्डलम्।<br>ऋग्यजुःसामसंज्ञं तत् पवित्रममलं पदम्॥ ११३॥ | ब्रह्मदेवके द्वारा आलिङ्गन करते ही उस ब्राह्मणश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नके शरीरसे एक महान् प्रकाश निकला, जो आदित्य-मण्डलमें प्रविष्ट हो गया। वह पवित्र निर्मल पद (आदित्य-मण्डल) ऋक्-यजुः एवं साम नामवाला है। जिस स्थानमें हव्य (देवताओंको प्राप्त होनेवाला हवनीय द्रव्य) तथा कव्य (पितरोंको प्राप्त कराया जानेवाला श्राद्धीय पदार्थ)-का उपभोग करनेवाले |
| हिरण्यगर्भो भगवान् यत्रास्ते हव्यकव्यभुक्।<br>द्वारं तद् योगिनामाद्यं वेदान्तेषु प्रतिष्ठितम्।<br>ब्रह्मतेजोमयं श्रीमन्निष्ठा चैव मनीषिणाम्॥ ११४॥ | भगवान् हिरण्यगर्भ निवास करते हैं। वह (स्थान) वेदान्तमें प्रतिपादित योगी जनोंका आद्य प्रवेश-द्वार है, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न है, श्रीयुक्त है और वह मनीषियोंकी निष्ठा भी है॥ ११२—११४॥ |
| दृष्टमात्रो भगवता ब्रह्मणार्चिर्मयो मुनिः।<br>अपश्यदैश्वरं तेजः शान्तं सर्वत्रगं शिवम्॥ ११५॥ | भगवान् ब्रह्माके देखते ही देखते वह मुनि इन्द्रद्युम्न तेजसे सम्पन्न हो गया और उसने सर्वत्र व्याप्त, परम कल्याणकारी, अत्यन्त शान्त स्वात्मस्वरूप, अक्षर, |
| स्वात्मानमक्षरं व्योम तद् विष्णोः परमं पदम्।<br>आनन्दमचलं ब्रह्म स्थानं तत्पारमेश्वरम्॥ ११६॥ | व्योम उस परमेश्वर-सम्बन्धी तेजको देखा। वह विष्णुका परम पद है। केवल आनन्दरूप, अचल वह ब्रह्मका स्थान परमेश्वररूप है। सभी प्राणियोंको अपनी ही आत्मा |
| सर्वभूतात्मभूतः स परमैश्वर्यमास्थितः।<br>प्राप्तवानात्मनो धाम यत्तन्मोक्षाख्यमव्ययम्॥ ११७॥ | समझनेवाला वह योगी इन्द्रद्युम्न परम ऐश्वर्यमें प्रतिष्ठित हो गया और उसने 'मोक्ष' पदसे कहे जानेवाले उस अव्यय परमात्मधामको प्राप्त कर लिया॥ ११५—११७॥ |
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वर्णाश्रमविधौ स्थितः।<br>समाश्रित्यान्तिमं भावं मायां लक्ष्मीं तरेद् बुधः ॥ ११८॥ | इसलिये सभी प्रयत्नोंसे वर्ण एवं आश्रमके नियमोंका पालन करते हुए अन्तिम भावका आश्रय ग्रहण कर विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह लक्ष्मीरूप मायासे पार उतरे॥ ११८॥ |
| सूत उवाच<br>व्याहता हरिणा त्वेवं नारदाद्या महर्षयः।<br>शक्रेण सहिताः सर्वे पप्रच्छुर्गुरुडध्वजम् ॥ ११९॥ | सूतजी बोले—हरिके द्वारा इस प्रकार कहनेपर इन्द्रसहित नारद आदि सभी महर्षियोंने गरुडध्वज भगवान् विष्णुसे पूछा— ॥ ११९॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>देवदेव हृषीकेश नाथ नारायणामल।<br>तद् वदाशेषमस्माकं यदुक्तं भवता पुरा॥ १२०॥<br>इन्द्रद्युम्नाय विप्राय ज्ञानं धर्मादिगोचरम्।<br>शुश्रूशुश्राप्ययं शक्रः सखा तव जगन्मय॥ १२१॥ | ऋषियोंने कहा—हे देवाधिदेव! हे हृषीकेश! हे नाथ! हे अमलरूप नारायण! जो आपने पूर्वकालमें ब्राह्मण इन्द्रद्युम्नसे धर्मादि-सम्बन्धी ज्ञान कहा था, वह सब आप हमें बतलायें। हे जगन्मूर्त्ति! ये आपके सखा इन्द्र भी सुननेके लिये इच्छुक हैं॥ १२०-१२१॥ |
| २२ | * कूर्मपुराण * |
|---|
ततः स भगवान् विष्णुः कूर्मरूपी जनार्दनः ।
रसातलगतो देवो नारदाद्यैर्महर्षिभिः ॥ १२२ ॥
पृष्टः प्रोवाच सकलं पुराणं कौर्ममुत्तमम् ।
संनिधौ देवराजस्य तद् वक्ष्ये भवतामहम् ॥ १२३ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं मोक्षप्रदं नृणाम् ।
पुराणश्रवणं विप्राः कथनं च विशेषतः ॥ १२४ ॥
श्रुत्वा चाध्यायमेवैकं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
उपाख्यानमथैकं वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १२५ ॥
इदं पुराणं परमं कौर्मं कूर्मस्वरूपिणा ।
उक्तं देवाधिदेवेन श्रद्धातव्यं द्विजातिभिः ॥ १२६ ॥ | इसके बाद (सूतजीने कहा—) रसातलमें स्थित कूर्मरूपी जनार्दन भगवान् विष्णुदेवने नारदादि महर्षियोंके द्वारा (इस प्रकार) पूछे जानेपर जिस श्रेष्ठ सम्पूर्ण कूर्मपुराणको देवराज इन्द्रके समीप सुनाया था, मैं उसे आप लोगोंको सुनाता हूँ॥ १२२-१२३॥
हे ब्राह्मणो! (इस कूर्म) पुराणका सुनना मनुष्योंके लिये यशकी प्राप्ति करानेवाला, दीर्घ आयु प्रदान करानेवाला, पुण्य प्रदान करानेवाला, कृतकृत्य करानेवाला तथा मोक्ष प्रदान करानेवाला है। इस पुराणके वाचन करनेकी तो और भी विशेष महिमा है। इसके मात्र एक अध्यायके सुननेसे ही सभी प्रकारके पापोंसे (व्यक्ति) मुक्त हो जाता है। अधिक क्या कहा जाय, केवल एक उपाख्यानके श्रवणमात्रसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। इस श्रेष्ठ कूर्मपुराणको कूर्मरूपधारी देवाधिदेव स्वयं भगवान् विष्णुने कहा है, द्विजातियोंको इसपर अवश्य श्रद्धा रखनी चाहिये॥ १२४—१२६॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पहला अध्याय समाप्त हुआ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव, रुद्र तथा लक्ष्मीका प्राकट्य, ब्रह्माद्वारा नौ मानस पुत्रों तथा चार वर्णोंकी सृष्टि, वेदज्ञानकी महिमा, ब्रह्म-सृष्टिका वर्णन, वर्ण और आश्रमोंके सामान्य तथा विशेष धर्म, गृहस्थाश्रमका माहात्म्य, चतुर्विध पुरुषार्थोंमें धर्मकी महिमा, आश्रमोंका द्वैविध्य, त्रिदेवोंका पूजन, त्रिपुण्ड्र, तिलक तथा भस्म-धारणकी महिमा
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा—समस्त ऋषिगणो! संसारके कल्याणके लिये आप लोगोंने जो कुछ मुझसे पूछा है और इन्द्रद्युम्नके प्रति मैंने जो कुछ कहा है, वह सब मैं बतला रहा हूँ, आप लोग सुनें॥ १ ॥ |
|---|---|
| शृणुध्वमृषयः सर्वे यत्पृष्टोऽहं जगद्धितम् ।<br>वक्ष्यमाणं मया सर्वमिन्द्रद्युम्नाय भाषितम् ॥ १ ॥ | |
| भूतैर्भव्यैर्भविष्यद्भिश्चरितैरुपबृंहितम् ।<br>पुराणं पुण्यदं नृणां मोक्षधर्मानुकीर्तनम् ॥ २ ॥ | इस (कूर्म) पुराणमें भूत, वर्तमान एवं भविष्यकालमें हुए वृत्तान्तोंको विस्तारसे बतलाया गया है। यह पुराण मनुष्योंको पुण्य प्रदान करनेवाला और मोक्षधर्मका वर्णन करनेवाला है॥ २॥ |
| अहं नारायणो देवः पूर्वमासं न मे परम् ।<br>उपास्य विपुलां निद्रां भोगिशय्यां समाश्रितः ॥ ३ ॥ | मैं ही नारायण देवरूपसे पूर्वकालमें विद्यमान था। मेरे अतिरिक्त और कोई दूसरा न था॥ ३॥ |
- अध्याय २ * २३
| चिन्तयामि पुनः सृष्टिं निशान्ते प्रतिबुध्य तु।<br>ततो मे सहसोत्पन्नः प्रसादो मुनिपुंगवाः॥ ४ ॥ | मैं प्रगाढ़ योगनिद्राका आश्रय लेकर शेष-शय्यामें पड़ा था। मुनिश्रेष्ठो! रात्रिके बीत जानेपर जागकर मैं पुनः सृष्टिविषयक चिन्तन करने लगा। उसी समय अकस्मात् मुझे प्रसन्नता प्राप्त हुई॥ ४॥ |
| चतुर्मुखस्ततो जातो ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>तदन्तरेऽभवत् क्रोधः कस्माच्चित् कारणात् तदा॥ ५॥ | तदुपरान्त समस्त संसारके पितामह चतुर्मुख ब्रह्माका आविर्भाव हुआ। इसी बीच किसी कारणसे अकस्मात् उस समय क्रोध उत्पन्न हुआ। हे मुनिश्रेष्ठो! (उस समय) क्रोधात्मज अपने तेजके द्वारा मानो त्रैलोक्यका संहार करनेके लिये हाथमें त्रिशूल धारण किये, तीन नेत्रोंवाले सूर्यके समान प्रकाशमान महेश्वर रुद्रदेव वहाँ उत्पन्न हुए॥ ५-६॥ |
| आत्मनो मुनिशार्दूलास्तत्र देवो महेश्वरः।<br>रुद्रः क्रोधात्मजो जज्ञे शूलपाणिस्त्रिलोचनः।<br>तेजसा सूर्यसंकाशस्त्रैलोक्यं संहरन्निव॥ ६ ॥ | |
| ततः श्रीरभवद् देवी कमलायतलोचना।<br>सुरूप सौम्यवदना मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥ ७ ॥ | तदनन्तर कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली, सुन्दर रूप एवं प्रसन्न मुखवाली तथा सभी प्राणियोंको मोहित करनेवाली देवी लक्ष्मी उत्पन्न हुईं। पवित्र मुस्कानवाली, अत्यन्त प्रसन्न, मङ्गलमयी, अपनी महिमामें प्रतिष्ठित, दिव्य कान्तिसे सुसम्पन्न, दिव्य माल्य आदिसे सुशोभित, अविनाशिनी महामाया मूलप्रकृतिरूपा वे नारायणी अपने तेजसे इस (संसार)-को आपूरित करती हुईं मेरे समीपमें आकर बैठ गयीं। उन्हें देखकर संसारके स्वामी भगवान् ब्रह्मा मुझसे कहने लगे—हे माधव! सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेके लिये इन सुरूपिणी (देवी)-को नियुक्त करो, जिससे यह मेरी सृष्टि और भी अधिक बढ़ने लगे॥ ७-१०॥ |
| शुचिस्मिता सुप्रसन्ना मङ्गला महिमास्पदा।<br>दिव्यकान्तिसमायुक्ता दिव्यमाल्योपशोभिता॥ ८ ॥ | |
| नारायणी महामाया मूलप्रकृतिरव्यया।<br>स्वधाम्ना पूरयन्तीदं मत्पार्श्वं समुपाविशत् ॥ ९ ॥ | |
| तां दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा मामुवाच जगत्पतिः।<br>मोहायाशेषभूतानां नियोजय सुरूपिणीम्।<br>येनेयं विपुला सृष्टिर्वर्धते मम माधव॥ १०॥ | |
| तथोक्तोऽहं श्रियं देवीमब्रुवं प्रहसन्निव।<br>देवीदमखिलं विश्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>मोहयित्वा ममादेशात् संसारे विनिपातय॥ ११॥ | ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मैंने मुसकराते हुए देवी लक्ष्मीसे कहा—हे देवि! मेरे आदेशसे तुम देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण विश्वको (अपनी मायासे) मोहित कर संसारमें प्रवृत्त करो। (किंतु) जो ज्ञानयोगमें निरत हैं, जितेन्द्रिय हैं, ब्रह्मनिष्ठ हैं, ब्रह्मवादी हैं, क्रोधशून्य हैं तथा सत्यपरायण हैं—ऐसे लोगोंको दूरसे ही छोड़ देना॥ ११-१२॥ |
| ज्ञानयोगरतान् दान्तान् ब्रह्मनिष्ठान् ब्रह्मवादिनः।<br>अक्रोधनान् सत्यपरान् दूरतः परिवर्जय॥ १२॥ | |
| ध्यायिनो निर्ममान् शान्तान् धार्मिकान् वेदपारगान्।<br>जापिनस्तापसान् विप्रान् दूरतः परिवर्जय॥ १३ ॥ | ध्यान करनेवाले, ममतारहित, शान्त, धार्मिक, वेदमें पारंगत, जप-परायण और तपस्वी विप्रोंको दूरसे ही छोड़ देना। वेद एवं वेदान्तके विशेष ज्ञानसे जिनके सम्पूर्ण संशय सर्वथा दूर हो गये हैं ऐसे तथा बड़े-बड़े यज्ञोंमें परायण द्विजॉंको दूरसे ही छोड़ देना। जो जप, होम, यज्ञ एवं स्वाध्यायके द्वारा देवाधिदेव महेश्वरका यजन करते हैं, उनका प्रयत्नपूर्वक दूरसे ही परित्याग कर देना॥ १३-१५॥ |
| वेदवेदान्तविज्ञानसंछिन्नाशेषसंशयान् ।<br>महायज्ञपरान् विप्रान् दूरतः परिवर्जय॥ १४॥ | |
| ये यजन्ति जपैर्होमैर्देवदेवं महेश्वरम्।<br>स्वाध्यायेनेज्यया दूरात् तान् प्रयत्नेन वर्जय॥ १५॥ |
२४ * कूर्मपुराण *
| भक्तियोगसमायुक्तानीश्वरार्पितमानसान् ।<br>प्राणायामादिषु रतान् दूरात् परिहरामलान् ॥ १६ ॥ | जो भक्तियोगमें लगे हुए हैं, जिन्होंने अपना चित्त भगवान्को अर्पण कर दिया है और जो प्राणायाम (धारणा, ध्यान तथा समाधि) आदिमें निरत हैं, ऐसे अमलात्माओंका दूरसे ही त्याग कर देना। जिनका मन |
| प्रणवासक्तमनसो रुद्रजप्यपरायणान् ।<br>अथर्वशिरसोऽध्येतॄन् धर्मज्ञान् परिवर्जय ॥ १७ ॥ | प्रणवोपासनामें आसक्त है, जो रुद्र (मन्त्रों)-का जप करनेवाले हैं और जो अथर्वशिरस्के अध्येता हैं, उन धर्मज्ञ व्यक्तियोंको छोड़ देना। और अधिक क्या कहा जाय, जो अपने धर्मका पालन करनेवाले हैं, ईश्वरकी |
| बहुनात्र किमुक्तेन स्वधर्मपरिपालकान् ।<br>ईश्वराराधनरतान् मन्नियोगान्न मोहय ॥ १८ ॥ | आराधनामें सतत रत हैं, (हे देवि!) उन्हें मेरे आदेशसे कदापि मोहित न करना ॥ १६–१८ ॥ |
| एवं मया महामाया प्रेरिता हरिवल्लभा ।<br>यथादेशं चकारासौ तस्माल्लक्ष्मीं समर्चयेत् ॥ १९ ॥ | इस प्रकार मेरे द्वारा प्रेरित हरिप्रिया महामायाने जैसी मेरी आज्ञा थी, उसी प्रकार किया, इसलिये (उन) लक्ष्मीकी आराधना करनी चाहिये। भगवत्पत्नी (देवी महालक्ष्मी) पूजा किये जानेपर विपुल ऐश्वर्य, पुष्टि, |
| श्रियं ददाति विपुलां पुष्टिं मेधां यशो बलम् ।<br>अर्चिता भगवत्पत्नी तस्माल्लक्ष्मीं समर्चयेत् ॥ २० ॥ | मेधा, यश एवं बल प्रदान करती हैं, इसलिये लक्ष्मीकी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये ॥ १९-२० ॥ |
| ततोऽसृजत् स भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।<br>चराचराणि भूतानि यथापूर्वं ममाज्ञया ॥ २१ ॥ | तदनन्तर लोकपितामह भगवान्ने मेरी आज्ञासे पूर्वकी भाँति ही समस्त चराचर भूत—प्राणियोंकी सृष्टि की। योगविद्याके प्रभावसे ब्रह्माजीने मरीचि, भृगु, |
| मरीचिभृग्वङ्गिरसः पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजद् योगविद्यया ॥ २२ ॥ | अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठको उत्पन्न किया ॥ २१–२२ ॥ |
| नवैते ब्रह्मणः पुत्रा ब्रह्माणो ब्राह्मणोत्तमाः ।<br>ब्रह्मवादिन एवैते मरीच्याद्यास्तु साधकाः ॥ २३ ॥ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ब्रह्माके मरीचि आदि ये नौ ‘ब्रह्माण’–संज्ञक पुत्र साधक हैं, ब्रह्मवादी हैं। पितामह विभु देव (ब्रह्मा)–ने मुखसे ब्राह्मणों तथा भुजासे |
| ससर्ज ब्राह्मणान् वक्त्रात् क्षत्रियांश्च भुजाद् विभुः ।<br>वैश्यानूरुद्वयाद् देवः पादाच्छूद्रान् पितामहः ॥ २४ ॥ | क्षत्रियोंकी सृष्टि की। दोनों जंघाओंसे वैश्योंको तथा पैरसे शूद्रोंको उत्पन्न किया। ब्रह्माने यज्ञकी निष्पत्ति एवं सभी वेदोंकी रक्षाके लिये शूद्रके अतिरिक्त (अन्य सभी |
| यज्ञनिष्पत्तये ब्रह्मा शूद्रवर्जं ससर्ज ह ।<br>गुप्तये सर्ववेदानां तेभ्यो यज्ञो हि निर्बभौ ॥ २५ ॥ | वर्णोंकी) सृष्टि की, क्योंकि उनसे यज्ञका निर्वाह होता है ॥ २३–२५ ॥ |
| ऋचो यजूंषि सामानि तथैवाथर्वणानि च ।<br>ब्रह्मणः सहजं रूपं नित्यैषा शक्तिरव्यया ॥ २६ ॥ | ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्ववेद ब्रह्माके सहज स्वरूप हैं और यह नित्य अव्यय शक्ति हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रारम्भमें आदि और अन्तसे रहित वेदमयी |
| अनादिनिधना दिव्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।<br>आदौ वेदमयी भूता यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ २७ ॥ | दिव्य वाग्रूपी शक्तिको उत्पन्न किया, जिसके द्वारा सभी व्यवहार होते हैं। पृथ्वीपर इन (वेदों)-से भिन्न जो कोई भी शास्त्र हैं उनमें धीर पुरुषका मन नहीं |
| अतोऽन्यानि तु शास्त्राणि पृथिव्यां यानि कानिचित् ।<br>न तेषु रमते धीरः पाषण्डी तेन जायते ॥ २८ ॥ | लगता क्योंकि ऐसे वेदातिरिक्त ग्रन्थोंके अध्ययनसे मनुष्य पाखंडी हो जाता है ॥ २६–२८ ॥ |
- अध्याय २ * २५
| वेदार्थवित्तमैः कार्यं यत्स्मृतं मुनिभिः पुरा।<br>स ज्ञेयः परमो धर्मो नान्यशास्त्रेषु संस्थितः ॥ २९ ॥ | वेदार्थ-ज्ञानमें श्रेष्ठ मुनियोंने प्राचीन समयमें जो कार्य (करने योग्य) बतलाया है, उसीको परम धर्म समझना चाहिये, (वह धर्म वेदारिक्त) अन्य शास्त्रोंमें प्रतिपादित नहीं है। वैदिक सिद्धान्तोंके विपरीत बातोंका प्रतिपादन करनेवाली जो स्मृतियाँ (धर्मशास्त्र) हैं और जो कोई भी कुदर्शन (नास्तिक दर्शन) हैं, पारलौकिक दृष्टिसे वे सभी निष्फल हैं, इसीलिये वे तामसी कहे गये हैं ॥ २९-३० ॥ |
| या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः ।<br>सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ॥ ३० ॥<br>पूर्वकल्पे प्रजा जाताः सर्वबाधाविवर्जिताः ।<br>शुद्धान्तःकरणाः सर्वाः स्वधर्मनिरताः सदा ॥ ३१ ॥ | पूर्व कल्पमें जो प्रजा उत्पन्न हुई थी, वह सभी बाधाओंसे रहित थी। सभी लोग निर्मल अन्तःकरणवाले थे और सर्वदा अपनी-अपनी धर्म-मर्यादामें स्थिर रहते थे। हे श्रेष्ठ मुनियो ! कुछ समय बाद कालकी गतिके प्रभावसे उन (लोगों)-में राग, द्वेष (लोभ, मोह तथा क्रोध) आदि उत्पन्न हो गये और स्वधर्ममें बाधा डालनेवाला अधर्म भी उत्पन्न हो गया ॥ ३१-३२ ॥ |
| ततः कालवशात् तासां रागद्वेषादिकोऽभवत् ।<br>अधर्मो मुनिशार्दूलाः स्वधर्मप्रतिबन्धकः ॥ ३२ ॥<br>ततः सा सहजा सिद्धिस्तासां नातीव जायते ।<br>रजोमात्रात्मिकास्तासां सिद्धयोऽन्यास्तदाभवन् ॥ ३३ ॥ | (इस कारण) उस समय उनमें (जो पहले सात्त्विक) सहज सिद्धि थी, वह धीरे-धीरे कम होने लगी और रजोगुणमूलक जो अन्य सिद्धियाँ थीं, वे ही उन्हें प्राप्त हुईं। उन सभी (रजोगुणमूलक सिद्धियों)-के भी कालयोगसे क्षीण हो जानेपर वे वार्तोपाय अर्थात् कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्यरूपी जीविकाके उपाय और कर्मसाध्य (परिश्रमसाध्य) हस्तसिद्धि अर्थात् शिल्पशास्त्र (हाथोंके माध्यमसे किये जानेवाले शिल्प, मूर्ति-कला आदि)-के उपाय करने लगे। तब विभु ब्रह्माजीने उन लोगोंके लिये कर्म एवं आजीविकाकी व्यवस्था की ॥ ३३-३४॥ |
| तासु क्षीणास्वशेषासु कालयोगेन ताः पुनः।<br>वार्तोपायं पुनश्चक्रुर्हस्तसिद्धिं च कर्मजाम् ।<br>ततस्तासां विभुर्ब्रह्मा कर्माजीवमकल्पयत् ॥ ३४ ॥<br>स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं धर्मान् प्रोवाच धर्मदृक् ।<br>साक्षात् प्रजापतेर्मूर्त्तिर्निस्सृष्टा ब्रह्मणा द्विजाः ।<br>भृग्वादयस्तद्वदनाच्छ्रुत्वा धर्मानथोचिरे ॥ ३५ ॥ | हे ब्राह्मणो ! ब्रह्मासे उत्पन्न साक्षात् प्रजापतिस्वरूप धर्मदर्शी स्वायम्भुव मनुने पूर्वकालमें धर्मोंका उपदेश किया (जो मनुस्मृतिके नामसे प्रसिद्ध हुई)। तदनन्तर उनके मुखसे उसे सुनकर भृगु आदि महर्षियोंने धर्मोंका वर्णन किया ॥ ३५ ॥ |
| यजनं याजनं दानं ब्राह्मणस्य प्रतिग्रहम् ।<br>अध्यापनं चाध्ययनं षट् कर्माणि द्विजोत्तमाः ॥ ३६ ॥<br>दानमध्ययनं यज्ञो धर्मः क्षत्रियवैश्ययोः ।<br>दण्डो युद्धं क्षत्रियस्य कृषिवैश्यस्य शस्यते ॥ ३७ ॥<br>शुश्रूषैव द्विजातीनां शूद्राणां धर्मसाधनम् ।<br>कारुकर्म तथाजीवः पाकयज्ञोऽपि धर्मतः ॥ ३८ ॥ | श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, अध्ययन और अध्यापन-ये ब्राह्मणोंके छः कर्म हैं। दान, अध्ययन और यज्ञ - ये तीन क्षत्रिय और वैश्यके (सामान्य) धर्म हैं, दण्ड-विधान और युद्ध क्षत्रियका तथा कृषिकर्म वैश्यका प्रशस्त कर्म है। द्विजातियोंकी सेवा करना शूद्रोंके लिये एकमात्र धर्मका साधन है। धर्मानुसार पाकयज्ञ तथा शिल्पविद्या उनकी आजीविका है ॥ ३६-३८ ॥ |
| २६ | * कूर्मपुराण * |
|---|
| ततः स्थितेषु वर्णेषु स्थापयामास चाश्रमान्।<br>गृहस्थं च वनस्थं च भिक्षुकं ब्रह्मचारिणम्॥ ३९ ॥ | तदनन्तर वर्णोंकी व्यवस्था स्थिर हो जानेपर (उन्होंने) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास (इन चार) आश्रमोंकी स्थापना की॥ ३९॥ |
| अग्नयोऽतिथिशुश्रूषा यज्ञो दानं सुरार्चनम्।<br>गृहस्थस्य समासेन धर्मोऽयं मुनिपुंगवाः॥ ४० ॥<br>होमो मूलफलाशित्वं स्वाध्यायस्तप एव च।<br>संविभागो यथान्यायं धर्मोऽयं वनवासिनाम्॥ ४१ ॥<br>भैक्षाशनं च मौनित्वं तपो ध्यानं विशेषतः।<br>सम्यग्ज्ञानं च वैराग्यं धर्मोऽयं भिक्षुके मतः॥ ४२ ॥<br>भिक्षाचर्या च शुश्रूषा गुरोः स्वाध्याय एव च।<br>संध्याकर्माग्निकार्यं च धर्मोऽयं ब्रह्मचारिणाम्॥ ४३ ॥ | हे मुनिश्रेष्ठो ! अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि)-की उपासना, अतिथि-सेवा, यज्ञ, दान एवं देवताओंकी पूजा—यह संक्षेपमें गृहस्थका धर्म है। हवन, कन्द-मूल-फलका सेवन, स्वाध्याय तथा तप, न्यायपूर्वक (सम्पत्तिका) विभाजन — यह वानप्रस्थोंका धर्म है। भिक्षावृत्तिसे प्राप्त पदार्थोंका सेवन, मौनव्रत, तप, सम्यक्-ध्यान, सम्यक्-ज्ञान तथा वैराग्य—यह संन्यासियोंका धर्म है। भिक्षा माँगना, गुरुकी सेवा करना, स्वाध्याय, संध्याकर्म तथा अग्निकार्य—यह ब्रह्मचारियोंका धर्म है॥ ४०-४३॥ |
| ब्रह्मचारिवनस्थानां भिक्षुकाणां द्विजोत्तमाः।<br>साधारणं ब्रह्मचर्यं प्रोवाच कमलोद्भवः॥ ४४॥<br><br>ऋतुकालाभिगामित्वं स्वदारेषु न चान्यतः।<br>पर्ववर्जं गृहस्थस्य ब्रह्मचर्यमुदाहृतम्॥ ४५॥<br><br>आगर्भसम्भवादाद्यात् कार्यं तेनाप्रमादतः।<br>अकुर्वाणस्तु विप्रेन्द्रा भ्रूणहा तु प्रजायते ॥ ४६ ॥ | श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! कमलसे प्रादुर्भूत ब्रह्माजीने ब्रह्मचर्यको ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा संन्यासीका साधारण धर्म कहा है अर्थात् ब्रह्मचर्य तीनों आश्रमियोंका सामान्य धर्म है। ऋतुकाल (स्त्रीके रजस्वलाकी चार रात्रियोंको छोड़कर) - में, विशेष पर्वोंको छोड़कर अपनी पत्नीमें गमन करना गृहस्थके लिये 'ब्रह्मचर्य' ही कहा गया है, अन्य रात्रियोंमें नहीं। प्रथम गर्भ धारण करनेतक उसे बिना किसी प्रमादके इस नियमका पालन करना चाहिये। हे विप्रेन्द्रो ! ऐसा न करनेवाला (गृहस्थ) भ्रूणघाती होता है॥ ४४-४६॥ |
| वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या श्राद्धं चातिथिपूजनम्।<br>गृहस्थस्य परो धर्मो देवताभ्यर्चनं तथा॥ ४७ ॥<br><br>वैवाह्यमग्निमिन्धीत सायं प्रातर्यथाविधि।<br>देशान्तरगतो वाथ मृतपत्नीक एव वा॥ ४८॥ | यथाशक्ति प्रतिदिन वेदका स्वाध्याय, श्राद्ध, अतिथि-सेवा तथा देवताओंकी पूजा—यह गृहस्थका श्रेष्ठ धर्म है। किसी दूसरे देशमें जानेपर अथवा पत्नीके मर जानेपर भी गृहस्थको चाहिये कि वह प्रातःकाल और सायंकाल विधिपूर्वक विवाहाग्नि (गार्हपत्याग्नि)-को प्रज्वलित करता रहे॥ ४७-४८॥ |
| त्रयाणामाश्रमाणां तु गृहस्थो योनिरुच्यते।<br>अन्ये तमुपजीवन्ति तस्माच्छ्रेयान् गृहाश्रमी॥ ४९ ॥<br><br>ऐकाश्रम्यं गृहस्थस्य त्रयाणां श्रुतिदर्शनात्।<br>तस्माद् गार्हस्थ्यमेवैकं विज्ञेयं धर्मसाधनम्॥ ५०॥ | गृहस्थ-आश्रमको तीनों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास)-का बीज कहा जाता है, क्योंकि तीनों आश्रमोंके लोग गृहस्थाश्रमपर ही निर्भर रहते हैं, इसलिये गृहस्थाश्रमी सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। वेदोंका अभिमत है कि केवल गृहस्थाश्रममें ही अन्य तीनों आश्रमोंका (समावेश) होता है, इसलिये एकमात्र गार्हस्थ्यको ही धर्मका साधन जानना चाहिये ॥ ४९-५०॥ |
| परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ।<br>सर्वलोकविरुद्धं च धर्ममप्याचरेन्न तु॥ ५१ ॥ | धर्मसे रहित जो अर्थ एवं काम नामक (पुरुषार्थ) हैं, उनका परित्याग करना चाहिये। साथ ही सभी प्रकारसे जो लोकविरुद्ध हो उस धर्मका भी आचरण नहीं करना चाहिये॥ ५१ ॥ |
| * अध्याय २ * | २७ |
|---|
| धर्मात् संजायते ह्यर्थो धर्मात् कामोऽभिजायते ।<br>धर्म एवापवर्ग्याय तस्माद् धर्मं समाश्रयेत् ॥ ५२ ॥ | धर्मसे अर्थकी प्राप्ति होती है, धर्मसे ही कामकी भी सिद्धि होती है और धर्म (-के आचरण)-से ही मोक्ष प्राप्त होता है, इसलिये धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये ॥ ५२ ॥ |
| धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गस्त्रिगुणो मतः ।<br>सत्त्वं रजस्तमश्चेति तस्माद्धर्मं समाश्रयेत् ॥ ५३ ॥ | धर्म, अर्थ और कामरूपी त्रिवर्ग (क्रमशः) सत्त्व, रज और तमोरूपी त्रिगुणसे युक्त है, इसलिये धर्मका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। सात्त्विक गुणोंका आश्रय लेनेवाले ऊर्ध्व लोकको प्राप्त करते हैं, राजसी व्यक्ति मध्य लोकमें रहते हैं तथा तमोगुणके कार्यमें स्थित तामसी व्यक्ति अधोगतिको प्राप्त होते हैं। जिस व्यक्तिमें धर्मसे समन्वित अर्थ और काम प्रतिष्ठित रहते हैं, वह इस लोकमें सुखोंका उपभोग कर मृत्युके उपरान्त मोक्ष प्राप्त करनेमें समर्थ होता है ॥ ५३-५५ ॥ |
| ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।<br>जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ ५४ ॥ | |
| यस्मिन् धर्मसमायुक्तावर्थकामौ व्यवस्थितौ ।<br>इह लोके सुखी भूत्वा प्रेत्यानन्त्याय कल्पते ॥ ५५ ॥ | |
| धर्मात् संजायते मोक्षो ह्यर्थात् कामोऽभिजायते ।<br>एवं साधनसाध्यत्वं चातुर्विध्ये प्रदर्शितम् ॥ ५६ ॥ | धर्मसे (धर्माचरणसे) मोक्षकी प्राप्ति होती है और अर्थसे कामकी सिद्धि होती है। इस प्रकार चार प्रकारके पुरुषार्थोंमें साधन और साध्यका वर्णन दिखाया गया। जो मानव धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षके इस प्रकार बताये गये माहात्म्यको जानता है और तदनुसार आचरण करता है, वह मोक्ष (प्राप्त) करनेमें समर्थ होता है। इसलिये (धर्मविरुद्ध) अर्थ एवं काम (-रूपी पुरुषार्थ)-का सर्वथा परित्याग कर धर्मका ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये। धर्मसे ही सब कुछ सिद्ध हो जाता है—ऐसा ब्रह्मवादियोंका कहना है ॥ ५६-५८ ॥ |
| य एवं वेद धर्मार्थकाममोक्षस्य मानवः ।<br>माहात्म्यं चानुतिष्ठेत स चानन्त्याय कल्पते ॥ ५७ ॥ | |
| तस्मादर्थं च कामं च त्यक्त्वा धर्मं समाश्रयेत् ।<br>धर्मात् संजायते सर्वमित्याहुर्ब्रह्मवादिनः ॥ ५८ ॥ | |
| धर्मेण धार्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।<br>अनादिनिधना शक्तिः सैषा ब्राह्मी द्विजोत्तमाः ॥ ५९ ॥ | धर्मके द्वारा ही स्थावर-जंगमात्मक सारा विश्व धारण किया जाता है। हे द्विजोत्तमो! यह (धर्मशक्ति) ब्रह्माजीकी वह ब्राह्मी शक्ति है जो आदि और अन्तसे रहित है। कर्म एवं ज्ञान—दोनोंके द्वारा ही धर्मकी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिये ज्ञानके* साथ ही कर्मयोगका भी आचरण ग्रहण करना चाहिये ॥ ५९-६० ॥ |
| कर्मणा प्राप्यते धर्मो ज्ञानेन च न संशयः ।<br>तस्माज्ज्ञानेन सहितं कर्मयोगं समाचरेत् ॥ ६० ॥ | |
| प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ।<br>ज्ञानपूर्वं निवृत्तं स्यात् प्रवृत्तं यदतोऽन्यथा ॥ ६१ ॥ | प्रवृत्त एवं निवृत्त—इस प्रकारसे वैदिक कर्म दो प्रकारका होता है। निवृत्तकर्म ज्ञानपूर्वक एवं प्रवृत्तकर्म इससे भिन्न प्रकारका होता है। निवृत्तकर्मका सेवन करनेवाला उस परमपद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है। अतः निवृत्तकर्म (निवृत्तिमार्ग)-का ही सेवन करना चाहिये, इससे अन्यथा करनेपर पुनः संसारमें आना पड़ता है ॥ ६१-६२ ॥ |
| निवृत्तं सेवमानस्तु याति तत् परमं पदम् ।<br>तस्मान्निवृत्तं संसेव्यमन्यथा संसरेत् पुनः ॥ ६२ ॥ |
* यहाँ ज्ञानका तात्पर्य धर्मज्ञानसे है, आत्मज्ञानसे नहीं।
२८ * कूर्मपुराण *
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| क्षमा दमो दया दानमलोभस्त्याग एव च।<br>आर्जवं चानसूया च तीर्थानुसरणं तथा॥ ६३॥<br><br>सत्यं संतोष आस्तिक्यं श्रद्धा चेन्द्रियनिग्रहः।<br>देवताभ्यर्चनं पूजा ब्राह्मणानां विशेषतः ॥ ६४॥<br><br>अहिंसा प्रियवादित्वमपैशुन्यमकल्मषता।<br>सामासिकमिमं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः ॥ ६५॥ | क्षमा, दम (इन्द्रियनिग्रह), दया, दान, अलोभ, त्याग, आर्जव (मन-वाणी आदिकी सरलता), अनसूया, तीर्थानुसरण अर्थात् गुरु एवं शास्त्रका अनुगमन या तीर्थसेवन, सत्य, संतोष, आस्तिकता (वेदादि शास्त्रोंमें श्रद्धा), श्रद्धा, जितेन्द्रियत्व, देवताओंका अर्चन, विशेष रूपसे ब्राह्मणोंकी पूजा, अहिंसा, मधुर भाषण, अपिशुनता तथा पापसे राहित्य—स्वायम्भुव मनुने चारों वर्णोंके लिये ये सामान्य धर्म कहे हैं॥ ६३–६५॥ |
| प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम्।<br>स्थानमैन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वपलायिनाम्॥ ६६॥<br><br>वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तताम्।<br>गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचारेण वर्तताम्॥ ६७॥ | अपने ब्राह्मण-धर्मका यथावत् पालन करनेवाले क्रियानिष्ठ ब्राह्मणोंके लिये प्राजापत्य स्थान (प्राजापत्य लोक) तथा संग्राममें पलायन न करनेवाले क्षत्रियोंके लिये ऐन्द्र-स्थान (इन्द्रलोक) सुनिश्चित है। इसी प्रकार स्वधर्मका पालन करनेवाले वैश्योंके लिये मारुत-स्थान (वायुलोक) और परिचर्चारूप स्वधर्मका पालन करनेवाले शूद्रजातिवालोंके लिये गन्धर्वलोक सुनिश्चित है॥ ६६–६७॥ |
| अष्टाशीतिसहस्राणामृषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।<br>स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम्॥ ६८॥<br><br>सप्तर्षीणां तु यत्स्थानं स्मृतं तद् वै वनौकसाम्।<br>प्राजापत्यं गृहस्थानां स्थानमुक्तं स्वयम्भुवा ॥ ६९॥ | ऊर्ध्वरेता अट्ठासी हजार (शौनक आदि) ऋषियोंका जो स्थान है, वही स्थान गुरुके अन्तेवासी ब्रह्मचारियोंको प्राप्त होता है। सप्तर्षियोंका जो स्थान है, वही स्थान वनमें रहनेवाले वानप्रस्थियोंको प्राप्त होता है और स्वयम्भू ब्रह्माने गृहस्थोंके लिये प्राजापत्य स्थान (प्राजापत्य लोक)-की प्राप्ति बतलायी है॥ ६८–६९॥ |
| यतीनां यतचित्तानां न्यासिनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>हैरण्यगर्भं तत् स्थानं यस्मान्नावर्तते पुनः॥ ७०॥<br><br>योगिनाममृतं स्थानं व्योमाख्यं परमाक्षरम्।<br>आनन्दमैश्वरं धाम सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ७१ ॥ | समाहित-चित्त यतात्मा ऊर्ध्वरेता संन्यासियोंको हिरण्यगर्भ नामक वह स्थान प्राप्त होता है, जहाँसे पुनः लौटना नहीं पड़ता। योगियोंको अविनाशी वह व्योमसंज्ञक श्रेष्ठ अमरस्थान प्राप्त होता है जो आनन्दस्वरूप और ऐश्वर धाम है, वही पराकाष्ठा (अन्तिम) और परम गति है ॥ ७०–७१ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br><br>भगवन् देवतारिघ्न हिरण्याक्षनिषूदन।<br>चत्वारो ह्याश्रमाः प्रोक्ता योगिनामेक उच्यते ॥ ७२॥ | ऋषियोंने कहा— देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले, हिरण्याक्षका वध करनेवाले हे भगवन्! (आपने) चार आश्रम बताये (किंतु) योगियोंके लिये एक ही आश्रम बतलाया ॥ ७२॥ |
| श्रीकूर्म उवाच<br><br>सर्वकर्माणि संन्यस्य समाधिमचलं श्रितः।<br>य आस्ते निश्चलो योगी स संन्यासी न पञ्चमः ॥ ७३॥<br><br>सर्वेषामाश्रमाणां तु द्वैविध्यं श्रुतिदर्शितम्।<br>ब्रह्मचार्युपकुर्वाणो नैष्ठिको ब्रह्मतत्परः ॥ ७४॥ | श्रीकूर्मने कहा— सभी कर्मोंका परित्याग कर एकमात्र अचल समाधिमें निरन्तर स्थिर रहनेवाला जो निश्चल योगी है, वही संन्यासी होता है, अतः (चार ही आश्रम होते हैं) पाँचवाँ कोई आश्रम नहीं होता। वेदमें बतलाया गया है कि सभी आश्रम दो प्रकारके होते हैं। ब्रह्मचारीके दो भेद हैं—उपकुर्वाण और नैष्ठिक ब्रह्मतत्पर ॥ ७३–७४॥ |
- अध्याय २ * २९
| योऽधीत्य विधिवद्वेदान् गृहस्थाश्रममाव्रजेत्।<br>उपकुर्वाणको ज्ञेयो नैष्ठिको मरणान्तिकः ॥ ७५ ॥ | जो ब्रह्मचारी विधिवत् वेदोंका अध्ययन कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करता है, उसे उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी समझना चाहिये और जो यावज्जीवन गुरुके पास रहकर ब्रह्मविद्याका अभ्यास करता है, वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहलाता है ॥ ७५ ॥ |
| उदासीनः साधकश्च गृहस्थो द्विविधो भवेत्।<br>कुटुम्बभरणे यत्तः साधकोऽसौ गृही भवेत् ॥ ७६ ॥ | (इसी प्रकार) गृहस्थाश्रमी भी दो प्रकारका होता है—(१) उदासीन और (२) साधक। जो कुटुम्बके भरण-पोषणमें लगा रहता है, वह गृहस्थ साधक कहलाता है और जो देवऋण, पितृऋण एवं ऋषिऋण—इन तीन ऋणोंसे उऋण होकर स्त्री, धन आदिका परित्याग कर देता है तथा एकाकी विचरण करता है, वह मोक्ष-प्राप्तिकी इच्छावाला गृहस्थ उदासीन कहलाता है ॥ ७६-७७ ॥ |
| ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य त्यक्त्वा भार्याधनादिकम्।<br>एकाकी यस्तु विचरेदुदासीनः स मौक्षिकः ॥ ७७ ॥<br>तपस्तप्यति योऽरण्ये यजेद् देवान् जुहोति च।<br>स्वाध्याये चैव निरतो वनस्थस्तापसो मतः ॥ ७८ ॥ | जो वनमें अनुष्ठान करता है, देवताओंकी पूजा करता है, हवन करता है और स्वाध्यायमें निरत रहता है, वह वनमें रहनेवाला 'तापस' नामक वानप्रस्थ कहलाता है और जो अत्यन्त तपसे अपने शरीरको कृश कर लेता है तथा निरन्तर ध्यानपरायण रहता है, वह वानप्रस्थ-आश्रममें रहनेवाला सांन्यासिक वानप्रस्थी कहलाता है ॥ ७८-७९ ॥ |
| तपसा कर्शितोऽत्यर्थं यस्तु ध्यानपरो भवेत्।<br>सांन्यासिकः स विज्ञेयो वानप्रस्थाश्रमे स्थितः ॥ ७९ ॥<br>योगाभ्यासरतो नित्यमारुरुक्षुर्जितेन्द्रियः।<br>ज्ञानाय वर्तते भिक्षुः प्रोच्यते पारमेष्ठिकः ॥ ८० ॥ | नित्य योगाभ्यासमें रत रहनेवाला, मोक्षमार्गमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाला, जितेन्द्रिय तथा ज्ञानप्राप्तिके लिये प्रयत्नशील संन्यासीको 'पारमेष्ठिक' संन्यासी कहा जाता है और जो केवल आत्मामें ही रमण करनेवाला है, नित्य-तृप्त महामुनि है, सम्यक्-दर्शन-सम्पन्न है वह संन्यासी 'योगी' कहलाता है ॥ ८०-८१ ॥ |
| यस्वात्मरतिरेव स्यान्नित्यतृप्तो महामुनिः।<br>सम्यग् दर्शनसम्पन्नः स योगी भिक्षुरुच्यते ॥ ८१ ॥<br>ज्ञानसंन्यासिनः केचिद् वेदसंन्यासिनोऽपरे।<br>कर्मसंन्यासिनः केचित् त्रिविधाः पारमेष्ठिकाः ॥ ८२ ॥ | पारमेष्ठिक (संन्यासी)-के तीन भेद होते हैं—(१) कोई ज्ञानसंन्यासी होते हैं, (२) कोई वेदसंन्यासी होते हैं और (३) कोई कर्मसंन्यासी होते हैं। (इसी प्रकार) योगी भी तीन प्रकारका समझना चाहिये—पहला भौतिक, दूसरा सांख्य और तीसरे प्रकारका योगी अत्याश्रमी कहा गया है, जो श्रेष्ठ योगमें ही नित्य स्थित रहता है। पहले भौतिक योगीमें प्रथम भावना, (दूसरे) सांख्ययोगीमें अक्षर-भावना और तीसरे अत्याश्रमी नामक योगीमें जो अन्तिम भावना रहती है, वह पारमेश्वरी भावना कहलाती है ॥ ८२–८४ ॥ |
| योगी च त्रिविधो ज्ञेयो भौतिकः सांख्य एव च।<br>तृतीयोऽत्याश्रमी प्रोक्तो योगमुत्तममास्थितः ॥ ८३ ॥<br><br>प्रथमा भावना पूर्वे सांख्ये त्वक्षरभावना।<br>तृतीये चान्तिमा प्रोक्ता भावना पारमेश्वरी ॥ ८४ ॥ | |
| तस्मादेतद् विजानीध्वमाश्रमाणां चतुष्टयम्।<br>सर्वेषु वेदशास्त्रेषु पञ्चमो नोपपद्यते ॥ ८५ ॥ | इसलिये (हे ऋषियो!) सभी वेदशास्त्रोंमें चार ही आश्रम निश्चित किये गये हैं, ऐसा जानना चाहिये। पाँचवाँ कोई आश्रम नहीं है ॥ ८५ ॥ |
३० * कूर्मपुराण *
| एवं वर्णाश्रमान् सृष्ट्वा देवदेवो निरञ्जनः ।<br>दक्षादीन् प्राह विश्वात्मा सृजध्वं विविधाः प्रजाः ॥ ८६ ॥<br><br>ब्रह्मणो वचनात् पुत्रा दक्षाद्या मुनिसत्तमाः ।<br>असृजन्त प्रजाः सर्वा देवमानुषपूर्विकाः ॥ ८७ ॥ | इस प्रकार (चार) वर्ण तथा (चार) आश्रमोंकी सृष्टि करके देवाधिदेव निरञ्जन विश्वात्मा (ब्रह्माजी)-ने दक्ष आदि (प्रजापतियों)-से कहा—'अनेक प्रकारकी सृष्टि करो'। हे मुनिश्रेष्ठो! ब्रह्माजीके कहनेपर उनके दक्ष आदि (मानस) पुत्रोंने देवताओं एवं मनुष्योंके साथ ही अन्य भी सभी प्रजाओं (प्राणियों)-की सृष्टि की ॥ ८६-८७॥ |
|---|---|
| इत्येष भगवान् ब्रह्मा स्रष्टृत्वे स व्यवस्थितः ।<br>अहं वै पालयामीदं संहरिष्यति शूलभृत् ॥ ८८ ॥ | इस प्रकार ये भगवान् ब्रह्मा सृष्टिके कार्यमें नियत हैं। मैं इस (सृष्टि)-का पालन-पोषण करता हूँ और शूलधारी भगवान् शंकर इसका संहार करेंगे ॥ ८८ ॥ |
| तिस्रस्तु मूर्तयः प्रोक्ता ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।<br>रजःसत्त्वतमयोगात् परस्य परमात्मनः ॥ ८९ ॥<br><br>अन्योन्यमनुरक्तास्ते ह्यन्योन्यमुपजीविनः ।<br>अन्योन्यं प्रणताश्चैव लीलया परमेश्वराः ॥ ९० ॥ | परात्पर परमात्माकी रज, सत्त्व एवं तमोगुणके योगसे (क्रमशः) ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर नामक तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं। ये तीनों विग्रह परस्पर एक-दूसरेमें अनुरक्त तथा एक-दूसरेके उपजीवी (आश्रित) हैं। ये तीनों परमेश्वर हैं और लीलावश एक-दूसरेको प्रणाम करते रहते हैं ॥ ८९-९० ॥ |
| ब्राह्मी माहेश्वरी चैव तथैवाक्षरभावना ।<br>तिस्रस्तु भावना रुद्रे वर्तन्ते सततं द्विजाः ॥ ९१ ॥<br><br>प्रवर्तते मय्यजस्रमाद्या चाक्षरभावना ।<br>द्वितीया ब्रह्मणः प्रोक्ता देवस्याक्षरभावना ॥ ९२ ॥ | हे ब्राह्मणो! रुद्रमें ब्राह्मी, माहेश्वरी तथा अक्षर (वैष्णवी) नामक तीन प्रकारकी भावनाएँ सर्वदा विद्यमान रहती हैं। मुझमें प्रथम अक्षरभावना निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। भगवान् ब्रह्माजीकी द्वितीय अक्षरभावना कही गयी है ॥ ९१-९२ ॥ |
| अहं चैव महादेवो न भिन्नौ परमार्थतः ।<br>विभज्य स्वेच्छयात्मानं सोऽन्तर्यामीश्वरः स्थितः ॥ ९३ ॥<br><br>त्रैलोक्यमखिलं स्रष्टुं सदेवासुरमानुषम् ।<br>पुरुषः परतोऽव्यक्ताद् ब्रह्मत्वं समुपागमत् ॥ ९४ ॥ | पारमार्थिक दृष्टिसे मुझमें और महादेवमें कोई भिन्नता नहीं है। वही अन्तर्यामी ईश्वर अपनी इच्छासे अपनेको विभाजित कर (मेरे तथा महादेवके रूपमें) स्थित है। देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंके साथ ही सम्पूर्ण त्रैलोक्यकी सृष्टि करनेके लिये (इसी परम) पुरुषने अपने परात्पर अव्यक्त स्वरूपद्वारा ब्रह्मत्वको स्वीकार किया अर्थात् वे ही अव्यक्त परमात्मा सृष्टि करनेके लिये ब्रह्माके रूपमें व्यक्त हुए ॥ ९३-९४॥ |
| तस्माद् ब्रह्मा महादेवो विष्णुर्विश्वेश्वरः परः ।<br>एकस्यैव स्मृतास्तिस्रस्तनूः कार्यवशात् प्रभोः ॥ ९५ ॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वन्द्याः पूज्याः प्रयत्नतः ।<br>यदिच्छेदचिरात् स्थानं यत्तन्मोक्षाख्यमव्ययम् ॥ ९६ ॥<br><br>वर्णाश्रमप्रयुक्तेन धर्मेण प्रीतिसंयुतः ।<br>पूजयेद् भावयुक्तेन यावज्जीवं प्रतिज्ञया ॥ ९७ ॥ | अतः ब्रह्मा, महादेव एवं परात्पर विश्वेश्वर भगवान् विष्णु (ये तीनों ही) पृथक्-पृथक् कार्यकी दृष्टिसे एक ही प्रभुकी तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे विशेषतः (ये तीनों ही) वन्दनीय हैं, पूजनीय हैं। मोक्ष नामसे कहे जानेवाले उस अविनाशी स्थानको यदि शीघ्र ही प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो वर्णाश्रम-धर्मके नियमोंका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक पालन करते हुए प्रतिज्ञापूर्वक बड़े श्रद्धाभावसे जीवनपर्यन्त इन (त्रिदेवों)-का पूजन करना चाहिये ॥ ९५—९७॥ |
- अध्याय २ * ३१
चतुर्णामाश्रमाणां तु प्रोक्तोऽयं विधिवद्विजाः।
आश्रमो वैष्णवो ब्राह्मो हराश्रम इति त्रयः॥ ९८ ॥
तल्लिङ्गधारी सततं तद्भक्तजनवत्सलः।
ध्यायेदथार्चयेदेतान् ब्रह्मविद्यापरायणः॥ ९९ ॥
सर्वेषामेव भक्तानां शाम्भोर्लिङ्गमनुत्तमम्।
सितेन भस्मना कार्यं ललाटे तु त्रिपुण्ड्रकम्॥ १००॥
यस्तु नारायणं देवं प्रपन्नः परमं पदम्।
धारयेत् सर्वदा शूलं ललाटे गन्धवारिभिः॥ १०१॥
प्रपन्ना ये जगद्बीजं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
तेषां ललाटे तिलकं धारणीयं तु सर्वदा॥ १०२॥
योऽसावनादिर्भूतादिः कालात्मासौ धृतो भवेत्।
उपर्यधो भावयोगात् त्रिपुण्ड्रस्य तु धारणात्॥ १०३॥
यत्तत् प्रधानं त्रिगुणं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्।
धृतं त्रिशूलधारणाद् भवत्येव न संशयः॥ १०४॥
ब्रह्मतेजोमयं शुक्लं यदेतन्मण्डलं रवेः।
भवत्येव धृतं स्थानमैश्वरं तिलके कृते॥ १०५॥
तस्मात् कार्यं त्रिशूलाङ्कं तथा च तिलकं शुभम्।
त्रियायुषं च भक्तानां त्रयाणां विधिपूर्वकम्॥ १०६॥
यजेत जुहुयादग्नौ जपेद् दद्याज्जितेन्द्रियः।
शान्तो दान्तो जितक्रोधो वर्णाश्रमविधानवित्॥ १०७॥
एवं परिचरेद् देवान् यावज्जीवं समाहितः।
तेषां संस्थानमचलं सोऽचिरादधिगच्छति॥ १०८॥
हे ब्राह्मणो ! विधिपूर्वक इस प्रकार चारों आश्रमोंका वर्णन किया गया। (इनमें) वैष्णव, ब्राह्म तथा हर (शैव) नामक तीन आश्रम (सम्प्रदाय) होते हैं। उन (शैव, वैष्णव तथा ब्राह्म आश्रमों)-का लिङ्ग (चिह्न) धारणकर उस (देवता)-के भक्तजनोंके प्रति प्रेम रखते हुए ब्रह्मविद्यापरायण व्यक्तिको चाहिये कि वह इन देवोंका निरन्तर ध्यान करे, पूजन करे॥ ९८-९९॥
शिवके सभी भक्तोंके लिये (चिह्न-रूपमें) शिवलिङ्ग धारण करना श्रेष्ठ है। शैवोंको चाहिये कि वे श्वेत भस्मसे ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करें। जो परम पद (-स्वरूप) भगवान् नारायणके शरणागत (भक्त) हो उसे ललाटपर (कस्तूरी आदिके) सुगन्धित जलसे त्रिशूल (-की आकृति)-का तिलक सर्वदा धारण करना चाहिये। जो संसारके बीज परमेष्ठी ब्रह्माके भक्त हैं, उन्हें ललाटपर सर्वदा तिलक धारण करना चाहिये॥ १००-१०२॥
ऊपर-नीचे भावपूर्वक त्रिपुण्ड्रके धारण करनेसे अनादि (होते हुए भी) जो प्राणियोंका आदि है, कालात्मा है उसका धारण करना हो जाता है। त्रिशूल (चिह्न)-के धारण करनेसे जो वह त्रिगुणात्मक प्रधान ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवस्वरूप है निश्चयरूपसे उसका धारण हो जाता है। तिलक लगानेसे जो आदित्यमण्डलका प्रकाशमान ब्रह्मतेजोमय ऐश्वर्ययुक्त स्थान है उसका धारण हो जाता है॥ १०३-१०५॥
इसलिये (शैव, वैष्णव तथा ब्राह्म) तीनों प्रकारके भक्तोंको विधिपूर्वक मङ्गलमय तथा दीर्घ आयु प्रदान करनेवाले त्रिशूलके चिह्न तथा तिलकको धारण करना चाहिये॥ १०६॥
वर्ण तथा आश्रमके विधि-विधानको जाननेवाले शान्त, दान्त, जितेन्द्रिय तथा क्रोधजयीको यज्ञ, अग्निमें हवन, जप तथा दान करना चाहिये। इस प्रकार यावज्जीवन समाहित-मन होकर देवोंकी आराधना करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उसे शीघ्र ही अचल स्थानकी प्राप्ति होती है॥ १०७-१०८॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें दूसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ २॥
३२ * कूर्मपुराण *
तीसरा अध्याय
आश्रमधर्मका वर्णन, संन्यास ग्रहण करनेका क्रम, ब्रह्मार्पणका लक्षण तथा निष्कामकर्मयोगकी महिमा
| ऋषय ऊचुः<br>वर्णा भगवतोद्दिष्टाश्चत्वारोऽप्याश्रमास्तथा।<br>इदानीं क्रममस्माकमाश्रमाणां वद प्रभो॥ १॥ | **ऋषियोंने कहा—**प्रभो! आपने चारों वर्णों तथा चारों आश्रमोंका वर्णन किया। अब हमें आश्रमोंका क्रम बतलायें॥ १॥ |
| श्रीकूर्म उवाच<br>ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा।<br>क्रमेणैवाश्रमाः प्रोक्ताः कारणादन्यथा भवेत्॥ २॥ | **श्रीकूर्म बोले—**ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास—ये क्रमसे आश्रम कहे गये हैं। किसी कारणसे (इस क्रममें) परिवर्तन भी होता है॥ २॥ |
| उत्पन्नज्ञानविज्ञानो वैराग्यं परमं गतः।<br>प्रव्रजेद् ब्रह्मचर्यात् तु यदीच्छेत् परमां गतिम्॥ ३॥ | जो ज्ञान-विज्ञान-सम्पन्न हो तथा परम वैराग्यको प्राप्त हो गया हो ऐसा ब्रह्मचारी यदि परमगतिको प्राप्त करना चाहे तो वह ब्रह्मचर्य-आश्रमसे (सीधे) संन्यास ग्रहण कर ले। इसके विपरीत (अर्थात् ब्रह्मचर्य-आश्रमसे सीधे संन्यास न ग्रहण कर) विधिपूर्वक स्त्रीसे विवाह कर विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए पुत्रोंको उत्पन्न करे और विरक्त होनेपर संन्यास ग्रहण करे॥ ३-४॥ |
| दारानाहृत्य विधिवदन्यथा विविधैर्मखैः।<br>यजेदुत्पादयेत् पुत्रान् विरक्तो यदि संन्यसेत्॥ ४॥ | |
| अनिष्ट्वा विधिवद् यज्ञैरनुत्पाद्य तथात्मजम्।<br>न गार्हस्थ्यं गृही त्यक्त्वा संन्यसेद् बुद्धिमान् द्विजः॥ ५॥ | बुद्धिमान् गृहस्थ द्विजको चाहिये कि वह विधिपूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान तथा पुत्रोंको उत्पन्न किये बिना गृहस्थ-आश्रमका परित्यागकर संन्यास ग्रहण न करे। श्रेष्ठ विद्वान् द्विज यदि तीव्र वैराग्यके वेगके कारण गृहस्थाश्रममें रहनेके लिये उत्सुक न हो तो यज्ञ किये बिना भी वहीं संन्यास ग्रहण कर ले॥ ५-६॥ |
| अथ वैराग्यवेगेन स्थातुं नोत्सहते गृहे।<br>तत्रैव संन्यसेद् विद्वाननिष्ट्वापि द्विजोत्तमः॥ ६॥ | |
| अन्यथा विविधैर्यज्ञैरिष्ट्वा वनमथाश्रयेत्।<br>तपस्तप्त्वा तपोयोगाद् विरक्तः संन्यसेद् यदि॥ ७॥ | अन्यथा विविध यज्ञोंका सम्पादन कर वनका आश्रय लेना चाहिये एवं तपोयोगद्वारा तप करनेके बाद यदि विराग हो जाय तो संन्यास लेना चाहिये। वानप्रस्थ-आश्रम ग्रहण कर फिर गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश नहीं करना चाहिये, न संन्यासी वानप्रस्थ-आश्रममें वापस आये और न साधक गृहस्थ ब्रह्मचर्याश्रममें वापस लौटे॥ ७-८॥ |
| वानप्रस्थाश्रमं गत्वा न गृहं प्रविशेत् पुनः।<br>न संन्यासी वनं चाथ ब्रह्मचर्यं न साधकः॥ ८॥ | |
| प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमाग्नेयीमथवा द्विजः।<br>प्रव्रजेत गृही विद्वान् वनाद् वा श्रुतिचोदनात्॥ ९॥ | विद्वान् गृहस्थ द्विज प्राजापत्य इष्टि अथवा आग्नेयी इष्टिका सम्पादन कर संन्यास ग्रहण करे या वैदिक विधानसे वानप्रस्थसे (संन्यास-आश्रममें) प्रवेश करे। हवन तथा यज्ञ-सम्बन्धी क्रियाओंको करनेमें असमर्थ होनेपर भी अन्धा, लँगड़ा अथवा दरिद्र द्विज वैराग्य होनेपर संन्यास ग्रहण करे। सभीके लिये संन्यासके निमित्त वैराग्यका विधान किया गया है। जो आसक्तियुक्त पुरुष संन्यास-आश्रम ग्रहण करना चाहता है वह अवश्य ही पतित हो जाता है॥ ९-११॥ |
| प्रकर्तुमसमर्थोऽपि जुहोतियजतिक्रियाः।<br>अन्धः पंगुर्दरिद्रो वा विरक्तः संन्यसेद् द्विजः॥ १०॥ | |
| सर्वेषामेव वैराग्यं संन्यासाय विधीयते।<br>पतत्येवाविरक्तो यः संन्यासं कर्तुमिच्छति॥ ११॥ |
श्रीशिव-पार्वतीद्वारा श्रीकृष्णको वरदान
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान्
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् शिव-पार्वती