भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६* कूर्मपुराण *

| तदाशीस्तन्नमस्कारस्तन्निष्ठस्तत्परायणः ।<br>आराधयन् महादेवं योगिनां हृदि संस्थितम् ॥ ५२ ॥<br><br>तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित् परमा कला।<br>स्वरूपं दर्शयामास दिव्यं विष्णुसमुद्भवम् ॥ ५३ ॥<br><br>दृष्ट्वा प्रणम्य शिरसा विष्णोर्भगवतः प्रियाम्।<br>संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः कृताञ्जलिरभाषत ॥ ५४ ॥<br><div style="text-align:center">इन्द्रद्युम्न उवाच</div>का त्वं देवि विशालाक्षि विष्णुचिह्नाङ्किते शुभे।<br>याथातथ्येन वै भावं तवेदानीं ब्रवीहि मे ॥ ५५ ॥<br><br>तस्य तद् वाक्यमाकर्ण्य सुप्रसन्ना सुमङ्गला।<br>हसन्ती संस्मरन् विष्णुं प्रियं ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ ५६ ॥<br><br>न मां पश्यन्ति मुनयो देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>नारायणात्मिका चैका मायाहं तन्मया परा ॥ ५७ ॥<br><br>न मे नारायणाद् भेदो विद्यते हि विचारतः।<br>तन्मयाहं परं ब्रह्म स विष्णुः परमेश्वरः ॥ ५८ ॥<br><br>येऽर्चयन्तीह भूतानामाश्रयं परमेश्वरम्।<br>ज्ञानेन कर्मयोगेन न तेषां प्रभवाम्यहम् ॥ ५९ ॥<br><br>तस्मादनादिनिधनं कर्मयोगपरायणः।<br>ज्ञानेनाराधयानन्तं ततो मोक्षमवाप्स्यसि ॥ ६० ॥<br><br>इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नो महामतिः।<br>प्रणम्य शिरसा देवीं प्राञ्जलिः पुनरब्रवीत् ॥ ६१ ॥<br><br>कथं स भगवानीशः शाश्वतो निष्कलोऽच्युतः।<br>ज्ञातुं हि शक्यते देवि ब्रूहि मे परमेश्वरि ॥ ६२ ॥<br><br>एवमुक्ताथ विप्रेण देवी कमलवासिनी।<br>साक्षान्नारायणो ज्ञानं दास्यतीत्याह तं मुनिम् ॥ ६३ ॥<br><br>उभाभ्यामथ हस्ताभ्यां संस्पृश्य प्रणतं मुनिम्।<br>स्मृत्वा परात्परं विष्णुं तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६४ ॥ | वह उन्हींकी मङ्गलकामना करते हुए उन्हींको नमस्कार करता था, उनमें ही उसकी अनन्य निष्ठा थी तथा वह उन्हींके आश्रित होकर योगियोंके हृदयप्रदेशमें विराजमान रहनेवाले महादेवकी आराधना करने लगा। उसके इसी प्रकार आराधना करते हुए एक दिन वैष्णवी शक्तिने भगवान् विष्णुसे प्रादुर्भूत दिव्य स्वरूप उसे दिखलाया। भगवान् विष्णुकी प्रिया देवी विष्णुप्रियाका दर्शनकर उसने सिर झुकाकर विनीतभावसे उन्हें प्रणाम किया और विविध स्तुतियोंके द्वारा उनकी स्तुतिकर हाथ जोड़कर कहा—॥ ५२-५४॥<br><br>इन्द्रद्युम्नने कहा—वैष्णव चिह्नोंवाली, मङ्गलमयी तथा विशाल नेत्रोंवाली हे देवि ! आप कौन हैं ? आपका जो यथार्थ स्वरूप हो उसे इस समय मुझे बतलायें ॥ ५५ ॥<br><br>इन्द्रद्युम्नके वचन सुनकर अत्यन्त सुप्रसन्ना सुमङ्गला वह देवी विष्णुका स्मरणकर उस प्रिय ब्राह्मणसे हँसती हुई बोली—॥ ५६ ॥<br><br>मैं उन विष्णुकी प्रकृतिस्वरूपा परा माया हूँ। मुझ अद्वितीय नारायणस्वरूपा नारायणीको मुनि तथा इन्द्र आदि देवता भी नहीं देख पाते हैं। सूक्ष्म विचार करनेपर मुझमें और नारायणमें कोई भेद नहीं दीखता। मैं उनकी प्रकृतिरूपा हूँ, वे विष्णु परब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं। समस्त भूत (प्राणियों)-के आश्रयभूत उन परमेश्वरकी जो ज्ञानयोग अथवा कर्मयोगद्वारा यहाँ आराधना करते हैं ऐसे भक्तोंपर मेरा कोई वश नहीं चलता। अतः तुम कर्मयोगका आश्रय लेते हुए ज्ञानके द्वारा उन आदि और अन्तसे रहित अनन्त भगवान् विष्णुकी आराधना करो। इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे ॥ ५७-६०॥<br><br>ऐसा कहे जानेपर अत्यन्त बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ उस इन्द्रद्युम्नने देवीको विनयपूर्वक प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पुनः कहा—हे परमेश्वरी देवि ! शाश्वत, अखण्ड तथा अच्युत सबके स्वामी उन भगवान्‌को किस प्रकार जाना जा सकता है, यह मुझे बतलायें ॥ ६१-६२॥<br><br>ब्राह्मण (इन्द्रद्युम्न)-के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर कमलमें निवास करनेवाली देवीने उस मुनिसे कहा—'साक्षात् नारायण ही तुम्हें (वह) ज्ञान प्रदान करेंगे। तदनन्तर प्रणाम कर रहे उस मुनि (इन्द्रद्युम्न)-को अपने दोनों हाथोंसे भली-भाँति स्पर्श कर (वे देवी) परात्पर विष्णुका स्मरण करती हुई वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ ६३-६४॥ |