भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १ * १७

सोऽपि नारायणं द्रष्टुं परमेण समाधिना।
आराधयद्धृषीकेशं प्रणतार्तिप्रभञ्जनम्॥ ६५॥

ततो बहुतिथे काले गते नारायणः स्वयम्।
प्रादुरासीन्महायोगी पीतवासा जगन्मयः॥ ६६॥

दृष्ट्वा देवं समायान्तं विष्णुमात्मानमव्ययम्।
जानुभ्यामवनिं गत्वा तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ६७॥

इन्द्रद्युम्न उवाच

यज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव।
कृष्ण विष्णो हृषीकेश तुभ्यं विश्वात्मने नमः॥ ६८॥

नमोऽस्तु ते पुराणाय हरये विश्वमूर्तये।
सर्गस्थितिविनाशानां हेतवेऽनन्तशक्तये॥ ६९॥

निर्गुणाय नमस्तुभ्यं निष्कलायामलात्मने।
पुरुषाय नमस्तुभ्यं विश्वरूपाय ते नमः॥ ७०॥

नमस्ते वासुदेवाय विष्णवे विश्वयोनये।
आदिमध्यान्तहीनाय ज्ञानगम्याय ते नमः॥ ७१॥

नमस्ते निर्विकाराय निष्प्रपञ्चाय ते नमः।
भेदाभेदविहीनाय नमोऽस्त्वानन्दरूपिणे॥ ७२॥

नमस्ताराय शान्ताय नमोऽप्रतिहतात्मने।
अनन्तमूर्तये तुभ्यममूर्ताय नमो नमः॥ ७३॥

नमस्ते परमार्थाय मायातीताय ते नमः।
नमस्ते परमेशाय ब्रह्मणे परमात्मने॥ ७४॥

नमोऽस्तु ते सुसूक्ष्माय महादेवाय ते नमः।
नमः शिवाय शुद्धाय नमस्ते परमेष्ठिने॥ ७५॥

त्वयैव सृष्टमखिलं त्वमेव परमा गतिः।
त्वं पिता सर्वभूतानां त्वं माता पुरुषोत्तम॥ ७६॥

त्वमक्षरं परं धाम चिन्मात्रं व्योम निष्कलम्।
सर्वस्याधारमव्यक्तमनन्तं तमसः परम्॥ ७७॥

प्रपश्यन्ति परात्मानं ज्ञानदीपेन केवलम्।
प्रपद्ये भवतो रूपं तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७८॥


इन्द्रद्युम्न भी शरणागतके दुःखोंको सर्वथा दूर कर देनेवाले हृषीकेश भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये दीर्घकालीन समाधिमें निरत होकर आराधना करने लगा। तत्पश्चात् बहुत समय बीत जानेपर पीताम्बरधारी, जगन्मूर्ति महायोगी भगवान् नारायण उसके सामने स्वयं प्रकट हो गये। अविनाशी परमात्मा भगवान् विष्णुको आया हुआ देखकर घुटनोंके बल पृथ्वीपर स्थित होकर वह गरुडध्वजदेवकी स्तुति करने लगा॥ ६५—६७॥

इन्द्रद्युम्नने कहा— हे यज्ञोंके स्वामी ! अच्युत ! गोविन्द ! माधव ! अनन्त ! केशव ! कृष्ण ! विष्णु ! तथा हृषीकेश ! आप विश्वात्माको नमस्कार है। पुराण-पुरुष ! विश्वमूर्ति हे हरि ! आप सृष्टि, स्थिति तथा प्रलयके मूल कारण हैं, आप अनन्त शक्तिसम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आप निर्गुण-स्वरूप हैं, निष्कल एवं विमलात्मा हैं, आपको नमस्कार है। हे विश्वरूप पुरुष ! आपको नमस्कार है। विश्वकी योनि, वासुदेव भगवान् विष्णुको नमस्कार है। आप आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित ज्ञानद्वारा जानने योग्य हैं, आपको नमस्कार है। निर्विकार तथा प्रपञ्चरहित आपको नमस्कार है। भेद-अभेदसे रहित आनन्द-स्वरूप आपको नमस्कार है। (संसारसागरसे) पार उतारनेवाले, शान्तस्वरूप आपको नमस्कार है। शुद्धात्मा आपको नमस्कार है। आप अनन्तमूर्तिवाले हैं, अमूर्त हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप परमार्थरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप मायासे अतीत हैं, आपको नमस्कार है। ईशोंके भी ईश ! आपको नमस्कार है। परमात्मा परब्रह्मरूप आपको नमस्कार है। अत्यन्त सूक्ष्मरूप आपको नमस्कार है। देवोंके भी देव महादेव ! आपको नमस्कार है। विशुद्धस्वरूप शिव ! आपको नमस्कार है। परमेष्ठीस्वरूप आपको नमस्कार है॥ ६८—७५॥

आपने ही सम्पूर्ण सृष्टिकी रचना की है। आप ही परम गति हैं। हे पुरुषोत्तम ! आप ही सभी भूत-प्राणियोंके पिता हैं और आप ही सबकी माता हैं। आप अविनाशी हैं, परम धाम हैं, चित्स्वरूप हैं, व्योम हैं, निष्कल हैं, सबके आधार हैं, अव्यक्त हैं, अनन्त हैं और तमसे सर्वथा रहित नित्य प्रकाशस्वरूप हैं। (ज्ञानीजन) केवल ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा जिस परमात्माका दर्शन करते हैं, मैं आपके उस रूपकी शरण ग्रहण करता हूँ, वह विष्णुका परमपद है॥ ७६—७८॥