संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २६ | * कूर्मपुराण * |
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| ततः स्थितेषु वर्णेषु स्थापयामास चाश्रमान्।<br>गृहस्थं च वनस्थं च भिक्षुकं ब्रह्मचारिणम्॥ ३९ ॥ | तदनन्तर वर्णोंकी व्यवस्था स्थिर हो जानेपर (उन्होंने) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास (इन चार) आश्रमोंकी स्थापना की॥ ३९॥ |
| अग्नयोऽतिथिशुश्रूषा यज्ञो दानं सुरार्चनम्।<br>गृहस्थस्य समासेन धर्मोऽयं मुनिपुंगवाः॥ ४० ॥<br>होमो मूलफलाशित्वं स्वाध्यायस्तप एव च।<br>संविभागो यथान्यायं धर्मोऽयं वनवासिनाम्॥ ४१ ॥<br>भैक्षाशनं च मौनित्वं तपो ध्यानं विशेषतः।<br>सम्यग्ज्ञानं च वैराग्यं धर्मोऽयं भिक्षुके मतः॥ ४२ ॥<br>भिक्षाचर्या च शुश्रूषा गुरोः स्वाध्याय एव च।<br>संध्याकर्माग्निकार्यं च धर्मोऽयं ब्रह्मचारिणाम्॥ ४३ ॥ | हे मुनिश्रेष्ठो ! अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि)-की उपासना, अतिथि-सेवा, यज्ञ, दान एवं देवताओंकी पूजा—यह संक्षेपमें गृहस्थका धर्म है। हवन, कन्द-मूल-फलका सेवन, स्वाध्याय तथा तप, न्यायपूर्वक (सम्पत्तिका) विभाजन — यह वानप्रस्थोंका धर्म है। भिक्षावृत्तिसे प्राप्त पदार्थोंका सेवन, मौनव्रत, तप, सम्यक्-ध्यान, सम्यक्-ज्ञान तथा वैराग्य—यह संन्यासियोंका धर्म है। भिक्षा माँगना, गुरुकी सेवा करना, स्वाध्याय, संध्याकर्म तथा अग्निकार्य—यह ब्रह्मचारियोंका धर्म है॥ ४०-४३॥ |
| ब्रह्मचारिवनस्थानां भिक्षुकाणां द्विजोत्तमाः।<br>साधारणं ब्रह्मचर्यं प्रोवाच कमलोद्भवः॥ ४४॥<br><br>ऋतुकालाभिगामित्वं स्वदारेषु न चान्यतः।<br>पर्ववर्जं गृहस्थस्य ब्रह्मचर्यमुदाहृतम्॥ ४५॥<br><br>आगर्भसम्भवादाद्यात् कार्यं तेनाप्रमादतः।<br>अकुर्वाणस्तु विप्रेन्द्रा भ्रूणहा तु प्रजायते ॥ ४६ ॥ | श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! कमलसे प्रादुर्भूत ब्रह्माजीने ब्रह्मचर्यको ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा संन्यासीका साधारण धर्म कहा है अर्थात् ब्रह्मचर्य तीनों आश्रमियोंका सामान्य धर्म है। ऋतुकाल (स्त्रीके रजस्वलाकी चार रात्रियोंको छोड़कर) - में, विशेष पर्वोंको छोड़कर अपनी पत्नीमें गमन करना गृहस्थके लिये 'ब्रह्मचर्य' ही कहा गया है, अन्य रात्रियोंमें नहीं। प्रथम गर्भ धारण करनेतक उसे बिना किसी प्रमादके इस नियमका पालन करना चाहिये। हे विप्रेन्द्रो ! ऐसा न करनेवाला (गृहस्थ) भ्रूणघाती होता है॥ ४४-४६॥ |
| वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या श्राद्धं चातिथिपूजनम्।<br>गृहस्थस्य परो धर्मो देवताभ्यर्चनं तथा॥ ४७ ॥<br><br>वैवाह्यमग्निमिन्धीत सायं प्रातर्यथाविधि।<br>देशान्तरगतो वाथ मृतपत्नीक एव वा॥ ४८॥ | यथाशक्ति प्रतिदिन वेदका स्वाध्याय, श्राद्ध, अतिथि-सेवा तथा देवताओंकी पूजा—यह गृहस्थका श्रेष्ठ धर्म है। किसी दूसरे देशमें जानेपर अथवा पत्नीके मर जानेपर भी गृहस्थको चाहिये कि वह प्रातःकाल और सायंकाल विधिपूर्वक विवाहाग्नि (गार्हपत्याग्नि)-को प्रज्वलित करता रहे॥ ४७-४८॥ |
| त्रयाणामाश्रमाणां तु गृहस्थो योनिरुच्यते।<br>अन्ये तमुपजीवन्ति तस्माच्छ्रेयान् गृहाश्रमी॥ ४९ ॥<br><br>ऐकाश्रम्यं गृहस्थस्य त्रयाणां श्रुतिदर्शनात्।<br>तस्माद् गार्हस्थ्यमेवैकं विज्ञेयं धर्मसाधनम्॥ ५०॥ | गृहस्थ-आश्रमको तीनों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास)-का बीज कहा जाता है, क्योंकि तीनों आश्रमोंके लोग गृहस्थाश्रमपर ही निर्भर रहते हैं, इसलिये गृहस्थाश्रमी सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। वेदोंका अभिमत है कि केवल गृहस्थाश्रममें ही अन्य तीनों आश्रमोंका (समावेश) होता है, इसलिये एकमात्र गार्हस्थ्यको ही धर्मका साधन जानना चाहिये ॥ ४९-५०॥ |
| परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ।<br>सर्वलोकविरुद्धं च धर्ममप्याचरेन्न तु॥ ५१ ॥ | धर्मसे रहित जो अर्थ एवं काम नामक (पुरुषार्थ) हैं, उनका परित्याग करना चाहिये। साथ ही सभी प्रकारसे जो लोकविरुद्ध हो उस धर्मका भी आचरण नहीं करना चाहिये॥ ५१ ॥ |