संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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- अध्याय २ * २५
| वेदार्थवित्तमैः कार्यं यत्स्मृतं मुनिभिः पुरा।<br>स ज्ञेयः परमो धर्मो नान्यशास्त्रेषु संस्थितः ॥ २९ ॥ | वेदार्थ-ज्ञानमें श्रेष्ठ मुनियोंने प्राचीन समयमें जो कार्य (करने योग्य) बतलाया है, उसीको परम धर्म समझना चाहिये, (वह धर्म वेदारिक्त) अन्य शास्त्रोंमें प्रतिपादित नहीं है। वैदिक सिद्धान्तोंके विपरीत बातोंका प्रतिपादन करनेवाली जो स्मृतियाँ (धर्मशास्त्र) हैं और जो कोई भी कुदर्शन (नास्तिक दर्शन) हैं, पारलौकिक दृष्टिसे वे सभी निष्फल हैं, इसीलिये वे तामसी कहे गये हैं ॥ २९-३० ॥ |
| या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः ।<br>सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ॥ ३० ॥<br>पूर्वकल्पे प्रजा जाताः सर्वबाधाविवर्जिताः ।<br>शुद्धान्तःकरणाः सर्वाः स्वधर्मनिरताः सदा ॥ ३१ ॥ | पूर्व कल्पमें जो प्रजा उत्पन्न हुई थी, वह सभी बाधाओंसे रहित थी। सभी लोग निर्मल अन्तःकरणवाले थे और सर्वदा अपनी-अपनी धर्म-मर्यादामें स्थिर रहते थे। हे श्रेष्ठ मुनियो ! कुछ समय बाद कालकी गतिके प्रभावसे उन (लोगों)-में राग, द्वेष (लोभ, मोह तथा क्रोध) आदि उत्पन्न हो गये और स्वधर्ममें बाधा डालनेवाला अधर्म भी उत्पन्न हो गया ॥ ३१-३२ ॥ |
| ततः कालवशात् तासां रागद्वेषादिकोऽभवत् ।<br>अधर्मो मुनिशार्दूलाः स्वधर्मप्रतिबन्धकः ॥ ३२ ॥<br>ततः सा सहजा सिद्धिस्तासां नातीव जायते ।<br>रजोमात्रात्मिकास्तासां सिद्धयोऽन्यास्तदाभवन् ॥ ३३ ॥ | (इस कारण) उस समय उनमें (जो पहले सात्त्विक) सहज सिद्धि थी, वह धीरे-धीरे कम होने लगी और रजोगुणमूलक जो अन्य सिद्धियाँ थीं, वे ही उन्हें प्राप्त हुईं। उन सभी (रजोगुणमूलक सिद्धियों)-के भी कालयोगसे क्षीण हो जानेपर वे वार्तोपाय अर्थात् कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्यरूपी जीविकाके उपाय और कर्मसाध्य (परिश्रमसाध्य) हस्तसिद्धि अर्थात् शिल्पशास्त्र (हाथोंके माध्यमसे किये जानेवाले शिल्प, मूर्ति-कला आदि)-के उपाय करने लगे। तब विभु ब्रह्माजीने उन लोगोंके लिये कर्म एवं आजीविकाकी व्यवस्था की ॥ ३३-३४॥ |
| तासु क्षीणास्वशेषासु कालयोगेन ताः पुनः।<br>वार्तोपायं पुनश्चक्रुर्हस्तसिद्धिं च कर्मजाम् ।<br>ततस्तासां विभुर्ब्रह्मा कर्माजीवमकल्पयत् ॥ ३४ ॥<br>स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं धर्मान् प्रोवाच धर्मदृक् ।<br>साक्षात् प्रजापतेर्मूर्त्तिर्निस्सृष्टा ब्रह्मणा द्विजाः ।<br>भृग्वादयस्तद्वदनाच्छ्रुत्वा धर्मानथोचिरे ॥ ३५ ॥ | हे ब्राह्मणो ! ब्रह्मासे उत्पन्न साक्षात् प्रजापतिस्वरूप धर्मदर्शी स्वायम्भुव मनुने पूर्वकालमें धर्मोंका उपदेश किया (जो मनुस्मृतिके नामसे प्रसिद्ध हुई)। तदनन्तर उनके मुखसे उसे सुनकर भृगु आदि महर्षियोंने धर्मोंका वर्णन किया ॥ ३५ ॥ |
| यजनं याजनं दानं ब्राह्मणस्य प्रतिग्रहम् ।<br>अध्यापनं चाध्ययनं षट् कर्माणि द्विजोत्तमाः ॥ ३६ ॥<br>दानमध्ययनं यज्ञो धर्मः क्षत्रियवैश्ययोः ।<br>दण्डो युद्धं क्षत्रियस्य कृषिवैश्यस्य शस्यते ॥ ३७ ॥<br>शुश्रूषैव द्विजातीनां शूद्राणां धर्मसाधनम् ।<br>कारुकर्म तथाजीवः पाकयज्ञोऽपि धर्मतः ॥ ३८ ॥ | श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, अध्ययन और अध्यापन-ये ब्राह्मणोंके छः कर्म हैं। दान, अध्ययन और यज्ञ - ये तीन क्षत्रिय और वैश्यके (सामान्य) धर्म हैं, दण्ड-विधान और युद्ध क्षत्रियका तथा कृषिकर्म वैश्यका प्रशस्त कर्म है। द्विजातियोंकी सेवा करना शूद्रोंके लिये एकमात्र धर्मका साधन है। धर्मानुसार पाकयज्ञ तथा शिल्पविद्या उनकी आजीविका है ॥ ३६-३८ ॥ |