भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २ *२७
धर्मात् संजायते ह्यर्थो धर्मात् कामोऽभिजायते ।<br>धर्म एवापवर्ग्याय तस्माद् धर्मं समाश्रयेत् ॥ ५२ ॥धर्मसे अर्थकी प्राप्ति होती है, धर्मसे ही कामकी भी सिद्धि होती है और धर्म (-के आचरण)-से ही मोक्ष प्राप्त होता है, इसलिये धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये ॥ ५२ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गस्त्रिगुणो मतः ।<br>सत्त्वं रजस्तमश्चेति तस्माद्धर्मं समाश्रयेत् ॥ ५३ ॥धर्म, अर्थ और कामरूपी त्रिवर्ग (क्रमशः) सत्त्व, रज और तमोरूपी त्रिगुणसे युक्त है, इसलिये धर्मका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। सात्त्विक गुणोंका आश्रय लेनेवाले ऊर्ध्व लोकको प्राप्त करते हैं, राजसी व्यक्ति मध्य लोकमें रहते हैं तथा तमोगुणके कार्यमें स्थित तामसी व्यक्ति अधोगतिको प्राप्त होते हैं। जिस व्यक्तिमें धर्मसे समन्वित अर्थ और काम प्रतिष्ठित रहते हैं, वह इस लोकमें सुखोंका उपभोग कर मृत्युके उपरान्त मोक्ष प्राप्त करनेमें समर्थ होता है ॥ ५३-५५ ॥
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।<br>जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ ५४ ॥
यस्मिन् धर्मसमायुक्तावर्थकामौ व्यवस्थितौ ।<br>इह लोके सुखी भूत्वा प्रेत्यानन्त्याय कल्पते ॥ ५५ ॥
धर्मात् संजायते मोक्षो ह्यर्थात् कामोऽभिजायते ।<br>एवं साधनसाध्यत्वं चातुर्विध्ये प्रदर्शितम् ॥ ५६ ॥धर्मसे (धर्माचरणसे) मोक्षकी प्राप्ति होती है और अर्थसे कामकी सिद्धि होती है। इस प्रकार चार प्रकारके पुरुषार्थोंमें साधन और साध्यका वर्णन दिखाया गया। जो मानव धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षके इस प्रकार बताये गये माहात्म्यको जानता है और तदनुसार आचरण करता है, वह मोक्ष (प्राप्त) करनेमें समर्थ होता है। इसलिये (धर्मविरुद्ध) अर्थ एवं काम (-रूपी पुरुषार्थ)-का सर्वथा परित्याग कर धर्मका ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये। धर्मसे ही सब कुछ सिद्ध हो जाता है—ऐसा ब्रह्मवादियोंका कहना है ॥ ५६-५८ ॥
य एवं वेद धर्मार्थकाममोक्षस्य मानवः ।<br>माहात्म्यं चानुतिष्ठेत स चानन्त्याय कल्पते ॥ ५७ ॥
तस्मादर्थं च कामं च त्यक्त्वा धर्मं समाश्रयेत् ।<br>धर्मात् संजायते सर्वमित्याहुर्ब्रह्मवादिनः ॥ ५८ ॥
धर्मेण धार्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।<br>अनादिनिधना शक्तिः सैषा ब्राह्मी द्विजोत्तमाः ॥ ५९ ॥धर्मके द्वारा ही स्थावर-जंगमात्मक सारा विश्व धारण किया जाता है। हे द्विजोत्तमो! यह (धर्मशक्ति) ब्रह्माजीकी वह ब्राह्मी शक्ति है जो आदि और अन्तसे रहित है। कर्म एवं ज्ञान—दोनोंके द्वारा ही धर्मकी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिये ज्ञानके* साथ ही कर्मयोगका भी आचरण ग्रहण करना चाहिये ॥ ५९-६० ॥
कर्मणा प्राप्यते धर्मो ज्ञानेन च न संशयः ।<br>तस्माज्ज्ञानेन सहितं कर्मयोगं समाचरेत् ॥ ६० ॥
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ।<br>ज्ञानपूर्वं निवृत्तं स्यात् प्रवृत्तं यदतोऽन्यथा ॥ ६१ ॥प्रवृत्त एवं निवृत्त—इस प्रकारसे वैदिक कर्म दो प्रकारका होता है। निवृत्तकर्म ज्ञानपूर्वक एवं प्रवृत्तकर्म इससे भिन्न प्रकारका होता है। निवृत्तकर्मका सेवन करनेवाला उस परमपद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है। अतः निवृत्तकर्म (निवृत्तिमार्ग)-का ही सेवन करना चाहिये, इससे अन्यथा करनेपर पुनः संसारमें आना पड़ता है ॥ ६१-६२ ॥
निवृत्तं सेवमानस्तु याति तत् परमं पदम् ।<br>तस्मान्निवृत्तं संसेव्यमन्यथा संसरेत् पुनः ॥ ६२ ॥

* यहाँ ज्ञानका तात्पर्य धर्मज्ञानसे है, आत्मज्ञानसे नहीं।