भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 506 में से

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२८ * कूर्मपुराण *


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्षमा दमो दया दानमलोभस्त्याग एव च।<br>आर्जवं चानसूया च तीर्थानुसरणं तथा॥ ६३॥<br><br>सत्यं संतोष आस्तिक्यं श्रद्धा चेन्द्रियनिग्रहः।<br>देवताभ्यर्चनं पूजा ब्राह्मणानां विशेषतः ॥ ६४॥<br><br>अहिंसा प्रियवादित्वमपैशुन्यमकल्मषता।<br>सामासिकमिमं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः ॥ ६५॥क्षमा, दम (इन्द्रियनिग्रह), दया, दान, अलोभ, त्याग, आर्जव (मन-वाणी आदिकी सरलता), अनसूया, तीर्थानुसरण अर्थात् गुरु एवं शास्त्रका अनुगमन या तीर्थसेवन, सत्य, संतोष, आस्तिकता (वेदादि शास्त्रोंमें श्रद्धा), श्रद्धा, जितेन्द्रियत्व, देवताओंका अर्चन, विशेष रूपसे ब्राह्मणोंकी पूजा, अहिंसा, मधुर भाषण, अपिशुनता तथा पापसे राहित्य—स्वायम्भुव मनुने चारों वर्णोंके लिये ये सामान्य धर्म कहे हैं॥ ६३–६५॥
प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम्।<br>स्थानमैन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वपलायिनाम्॥ ६६॥<br><br>वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तताम्।<br>गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचारेण वर्तताम्॥ ६७॥अपने ब्राह्मण-धर्मका यथावत् पालन करनेवाले क्रियानिष्ठ ब्राह्मणोंके लिये प्राजापत्य स्थान (प्राजापत्य लोक) तथा संग्राममें पलायन न करनेवाले क्षत्रियोंके लिये ऐन्द्र-स्थान (इन्द्रलोक) सुनिश्चित है। इसी प्रकार स्वधर्मका पालन करनेवाले वैश्योंके लिये मारुत-स्थान (वायुलोक) और परिचर्चारूप स्वधर्मका पालन करनेवाले शूद्रजातिवालोंके लिये गन्धर्वलोक सुनिश्चित है॥ ६६–६७॥
अष्टाशीतिसहस्राणामृषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।<br>स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम्॥ ६८॥<br><br>सप्तर्षीणां तु यत्स्थानं स्मृतं तद् वै वनौकसाम्।<br>प्राजापत्यं गृहस्थानां स्थानमुक्तं स्वयम्भुवा ॥ ६९॥ऊर्ध्वरेता अट्ठासी हजार (शौनक आदि) ऋषियोंका जो स्थान है, वही स्थान गुरुके अन्तेवासी ब्रह्मचारियोंको प्राप्त होता है। सप्तर्षियोंका जो स्थान है, वही स्थान वनमें रहनेवाले वानप्रस्थियोंको प्राप्त होता है और स्वयम्भू ब्रह्माने गृहस्थोंके लिये प्राजापत्य स्थान (प्राजापत्य लोक)-की प्राप्ति बतलायी है॥ ६८–६९॥
यतीनां यतचित्तानां न्यासिनामूर्ध्वरेतसाम्।<br>हैरण्यगर्भं तत् स्थानं यस्मान्नावर्तते पुनः॥ ७०॥<br><br>योगिनाममृतं स्थानं व्योमाख्यं परमाक्षरम्।<br>आनन्दमैश्वरं धाम सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ७१ ॥समाहित-चित्त यतात्मा ऊर्ध्वरेता संन्यासियोंको हिरण्यगर्भ नामक वह स्थान प्राप्त होता है, जहाँसे पुनः लौटना नहीं पड़ता। योगियोंको अविनाशी वह व्योमसंज्ञक श्रेष्ठ अमरस्थान प्राप्त होता है जो आनन्दस्वरूप और ऐश्वर धाम है, वही पराकाष्ठा (अन्तिम) और परम गति है ॥ ७०–७१ ॥
ऋषय ऊचुः<br><br>भगवन् देवतारिघ्न हिरण्याक्षनिषूदन।<br>चत्वारो ह्याश्रमाः प्रोक्ता योगिनामेक उच्यते ॥ ७२॥ऋषियोंने कहा— देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले, हिरण्याक्षका वध करनेवाले हे भगवन्! (आपने) चार आश्रम बताये (किंतु) योगियोंके लिये एक ही आश्रम बतलाया ॥ ७२॥
श्रीकूर्म उवाच<br><br>सर्वकर्माणि संन्यस्य समाधिमचलं श्रितः।<br>य आस्ते निश्चलो योगी स संन्यासी न पञ्चमः ॥ ७३॥<br><br>सर्वेषामाश्रमाणां तु द्वैविध्यं श्रुतिदर्शितम्।<br>ब्रह्मचार्युपकुर्वाणो नैष्ठिको ब्रह्मतत्परः ॥ ७४॥श्रीकूर्मने कहा— सभी कर्मोंका परित्याग कर एकमात्र अचल समाधिमें निरन्तर स्थिर रहनेवाला जो निश्चल योगी है, वही संन्यासी होता है, अतः (चार ही आश्रम होते हैं) पाँचवाँ कोई आश्रम नहीं होता। वेदमें बतलाया गया है कि सभी आश्रम दो प्रकारके होते हैं। ब्रह्मचारीके दो भेद हैं—उपकुर्वाण और नैष्ठिक ब्रह्मतत्पर ॥ ७३–७४॥
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