भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १ *१९
आसामन्यतमां चाथ भावनां भावयेद् बुधः।<br>अशक्तः संश्रयेदाद्यामित्येषा वैदिकी श्रुतिः॥ ८९ ॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तन्निष्ठस्तत्परायणः।<br>समाराध्य विश्वेशं ततो मोक्षमवाप्स्यसि॥ ९० ॥जो असमर्थ व्यक्ति है उसे चाहिये कि वह प्रथम भावना अर्थात् वैष्णवी भावनाका अवलम्बन ग्रहण करे—ऐसा वेदका मत है। इसलिये (इन्द्रद्युम्न! तुम) समस्त प्रयत्नोंके द्वारा सम्पूर्ण संसारके स्वामी भगवान् विष्णुकी आराधना करो, उनमें ही निष्ठा रखो और उन्हींका आश्रय ग्रहण कर उन्हींके शरणागत हो जाओ, इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे॥ ८९-९०॥
इन्द्रद्युम्न उवाच<br>किं तत् परतरं तत्त्वं का विभूतिर्जनार्दन।<br>किं कार्यं कारणं कस्त्वं प्रवृत्तिश्चापि का तव॥ ९१ ॥इन्द्रद्युम्न बोले— हे जनार्दन! वह परात्पर तत्त्व क्या है, विभूति क्या है? कार्य क्या है और कारण क्या है? आप कौन हैं? और आपकी प्रवृत्ति क्या है? ॥ ९१ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>परात्परतरं तत्त्वं परं ब्रह्मैकमव्ययम्।<br>नित्यानन्दं स्वयंज्योतिरक्षरं तमसः परम्॥ ९२ ॥<br><br>ऐश्वर्यं तस्य यन्नित्यं विभूतिरिति गीयते।<br>कार्यं जगत्तथाव्यक्तं कारणं शुद्धमक्षरम्॥ ९३ ॥<br><br>अहं हि सर्वभूतानामन्तर्यामीश्वरः परः।<br>सर्गस्थित्यन्तकर्तृत्वं प्रवृत्तिमर्म गीयते॥ ९४ ॥<br><br>एतद् विज्ञाय भावेन यथावदखिलं द्विज।<br>ततस्त्वं कर्मयोगेन शाश्वतं सम्यगर्चय॥ ९५ ॥श्रीभगवान् बोले— वह परसे परतर तत्त्व एकमात्र अखण्ड परम ब्रह्म ही है। वह नित्य आनन्दस्वरूप है, स्वयं प्रकाशमान है, अविनाशी है और तम (अन्धकार)- से सर्वथा परे है। उस परमात्माका जो नित्य रहनेवाला ऐश्वर्य है, वही विभूति नामसे कहा जाता है। यह संसार ही (परमात्माका) कार्यरूप है और अविनाशी विशुद्ध अव्यक्त तत्त्व ही (इस संसारका) कारणरूप है। मैं ही समस्त प्राणियोंमें रहनेवाला अन्तर्यामी ईश्वर हूँ। सृष्टि, पालन और संहार ही मेरी प्रवृत्ति कही जाती है। हे द्विज! इन सभी बातोंको यथार्थरूपसे जानकर तुम कर्मयोगके द्वारा श्रद्धाभावसे (उस) सनातन (ईश्वर)- की भलीभाँति अर्चना करो॥ ९२-९५॥
इन्द्रद्युम्न उवाच<br>के ते वर्णाश्रमाचारा यैः समाराध्यते परः।<br>ज्ञानं च कीदृशं दिव्यं भावनात्रयसंस्थितम्॥ ९६ ॥<br><br>कथं सृष्टमिदं पूर्वं कथं संह्रियते पुनः।<br>कियत्यः सृष्टयो लोके वंशा मन्वन्तराणि च।<br>कानि तेषां प्रमाणानि पावनानि व्रतानि च॥ ९७ ॥<br><br>तीर्थान्यर्कादिसंस्थानं पृथिव्यायामविस्तरे।<br>कति द्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च नदीनदाः।<br>ब्रूहि मे पुण्डरीकाक्ष यथावदधुनाखिलम्॥ ९८ ॥इन्द्रद्युम्नने कहा— (भगवन्!) वर्णों तथा आश्रमोंके वे कौनसे पालनीय नियम हैं, जिनसे (उस) परतत्त्वकी आराधना की जाती है और वह दिव्य ज्ञान कैसा है जो तीन भावनाओंसे युक्त है? (परमात्माने) पूर्वकालमें इस (संसार)-की सृष्टि कैसे की और फिर कैसे इसका संहार होता है, लोकमें कितनी सृष्टियाँ हैं, कितने वंश हैं, कितने मन्वन्तर हैं। उनके कितने प्रमाण हैं और पवित्र व्रत तथा तीर्थ कौन-से हैं। सूर्य आदि ग्रहोंकी स्थिति कैसी है, पृथ्वीकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है, कितने द्वीप, समुद्र, पर्वत हैं और कितने नद हैं और कितनी नदियाँ हैं, हे पुण्डरीकाक्ष! इस समय यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताइये॥ ९६-९८॥
श्रीकूर्म उवाच<br>एवमुक्तोऽथ तेनाहं भक्तानुग्रहकाम्यया।<br>यथावदखिलं सर्वमवोचं मुनिपुंगवाः॥ ९९ ॥श्रीकूर्मने कहा— हे श्रेष्ठ मुनियो! उस इन्द्रद्युम्नके द्वारा मुझसे इस प्रकार कहे जानेपर भक्तोंपर अनुकम्पा करनेकी कामनासे मैंने वे सभी बातें विस्तारसे ठीक-ठीक उसे बतला दीं॥ ९९॥