भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

२० * कूर्मपुराण *


व्याख्यायाशेषमेवेदं यत्पृष्टोऽहं द्विजेन तु।<br>अनुगृह्य च तं विप्रं तत्रैवान्तर्हितोऽभवम्॥ १००॥इस प्रकार उस ब्राह्मण इन्द्रद्युम्नने जो-जो भी मुझसे पूछा था, वह सब विस्तारसे बतलाकर और उसपर कृपा करके मैं वहीं अन्तर्धान हो गया॥ १००॥
सोऽपि तेन विधानेन मदुक्तेन द्विजोत्तमः।<br>आराधयामास परं भावपूतः समाहितः॥ १०१॥उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने भी मेरे द्वारा बताये गये विधानसे अत्यन्त पवित्र भावनासे समाहित-चित्त होकर परम तत्त्वकी उपासना की। उसने अपने स्त्री-पुत्र आदिका मोह छोड़ दिया, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित हो गया, किसी भी वस्तुका संग्रह करना सर्वथा त्याग कर अपरिग्रही हो गया और सभी कर्मोंका परित्याग कर उसने परम वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। अपनी आत्मामें ही परमात्माका दर्शन करके और अपनी आत्मामें ही सम्पूर्ण विश्वका अनुभव कर अक्षर-तत्त्व-सम्बन्धी अन्तिम ब्राह्मी भावनाको प्राप्त किया, जिसके कारण उसे उस दुर्लभ परम योगकी प्राप्ति हुई। इस योगसे ही उस अद्वितीय तत्त्वका साक्षात्कार होता है जिसकी अभिलाषा निद्रात्यागी, श्वासजयी, मोक्षार्थी पुरुष भी करते हैं॥ १०१-१०४॥
त्यक्त्वा पुत्रादिषु स्नेहं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः।<br>संन्यस्य सर्वकर्माणि परं वैराग्यमाश्रितः॥ १०२॥
आत्मन्यात्मानमन्वीक्ष्य स्वात्मन्येवाखिलं जगत्।<br>सम्प्राप्य भावनामन्त्यां ब्राह्मीमक्षरपूर्वकाम्॥ १०३॥
अवाप परमं योगं येनैकं परिपश्यति।<br>यं विनिद्रा जितश्वासाः कांक्षन्ते मोक्षकांक्षिणः॥ १०४॥
ततः कदाचिद् योगीन्द्रो ब्रह्माणं द्रष्टुमव्ययम्।<br>जगामादित्यनिर्देशान्मानसोत्तरपर्वतम् ।<br>आकाशेनैव विप्रेन्द्रो योगैश्वर्यप्रभावतः॥ १०५॥इसके बाद किसी दिन वह ब्राह्मणश्रेष्ठ योगीन्द्र इन्द्रद्युम्न भगवान् सूर्यके निर्देशसे अव्यय ब्रह्मका दर्शन करनेके लिये अपनी योग-सिद्धिके प्रभावसे प्रादुर्भूत सूर्यके समान प्रकाशमान श्रेष्ठ विमानमें चढ़कर आकाशमार्गसे मानसरोवरके उत्तरमें स्थित पर्वतपर गया। उस योगिराज इन्द्रद्युम्नको आकाशमार्गमें जाते हुए देखकर देवों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंका समूह भी उसके पीछे-पीछे गया और अन्य सिद्ध तथा ब्रह्मर्षियोंने भी उसका अनुसरण किया॥ १०५-१०६॥
विमानं सूर्यसंकाशं प्रादुर्भूतमनुत्तमम्।<br>अन्वगच्छन् देवगणा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।<br>दृष्ट्वान्ये पथि योगीन्द्रं सिद्धा ब्रह्मर्षयो ययुः॥ १०६॥
ततः स गत्वा तु गिरि विवेश सुरवन्दितम्।<br>स्थानं तद् योगिभिर्जुष्टं यत्रास्ते परमः पुमान्॥ १०७॥तदनन्तर वहाँ जाकर इन्द्रद्युम्नने देवताओंद्वारा वन्दित तथा योगियोंद्वारा सेवित पर्वतके उस स्थानपर प्रवेश किया, जहाँ परम पुरुष परमात्मा प्रतिष्ठित रहते हैं। दस हजार सूर्योंके प्रकाशके समान प्रकाशित उस श्रेष्ठ स्थानपर पहुँचकर (इन्द्रद्युम्नने) देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य (उस स्थानके) अन्तर्गृहमें प्रवेश किया॥ १०७-१०८॥
सम्प्राप्य परमं स्थानं सूर्यायुतसमप्रभम्।<br>विवेश चान्तर्भवनं देवानां च दुरासदम्॥ १०८॥
विचिन्तयामास परं शरण्यं सर्वदेहिनाम्।<br>अनादिनिधनं देवं देवदेवं पितामहम्॥ १०९॥(वहाँ पहुँचकर उसने) सभी प्राणियोंके परम शरणदाता, आदि-अन्तसे रहित, देवाधिदेव पितामह ब्रह्मदेवका ध्यान किया। इसके बाद उसके ध्यान करते ही वहाँ परमात्माका प्रकाश प्रादुर्भूत हुआ। इन्द्रद्युम्नने
ततः प्रादुर्भूत् तस्मिन् प्रकाशः परमात्मनः।<br>तन्मध्ये पुरुषं पूर्वमपश्यत् परमं पदम्॥ ११०॥