संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २२ | * कूर्मपुराण * |
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ततः स भगवान् विष्णुः कूर्मरूपी जनार्दनः ।
रसातलगतो देवो नारदाद्यैर्महर्षिभिः ॥ १२२ ॥
पृष्टः प्रोवाच सकलं पुराणं कौर्ममुत्तमम् ।
संनिधौ देवराजस्य तद् वक्ष्ये भवतामहम् ॥ १२३ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं मोक्षप्रदं नृणाम् ।
पुराणश्रवणं विप्राः कथनं च विशेषतः ॥ १२४ ॥
श्रुत्वा चाध्यायमेवैकं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
उपाख्यानमथैकं वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १२५ ॥
इदं पुराणं परमं कौर्मं कूर्मस्वरूपिणा ।
उक्तं देवाधिदेवेन श्रद्धातव्यं द्विजातिभिः ॥ १२६ ॥ | इसके बाद (सूतजीने कहा—) रसातलमें स्थित कूर्मरूपी जनार्दन भगवान् विष्णुदेवने नारदादि महर्षियोंके द्वारा (इस प्रकार) पूछे जानेपर जिस श्रेष्ठ सम्पूर्ण कूर्मपुराणको देवराज इन्द्रके समीप सुनाया था, मैं उसे आप लोगोंको सुनाता हूँ॥ १२२-१२३॥
हे ब्राह्मणो! (इस कूर्म) पुराणका सुनना मनुष्योंके लिये यशकी प्राप्ति करानेवाला, दीर्घ आयु प्रदान करानेवाला, पुण्य प्रदान करानेवाला, कृतकृत्य करानेवाला तथा मोक्ष प्रदान करानेवाला है। इस पुराणके वाचन करनेकी तो और भी विशेष महिमा है। इसके मात्र एक अध्यायके सुननेसे ही सभी प्रकारके पापोंसे (व्यक्ति) मुक्त हो जाता है। अधिक क्या कहा जाय, केवल एक उपाख्यानके श्रवणमात्रसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। इस श्रेष्ठ कूर्मपुराणको कूर्मरूपधारी देवाधिदेव स्वयं भगवान् विष्णुने कहा है, द्विजातियोंको इसपर अवश्य श्रद्धा रखनी चाहिये॥ १२४—१२६॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पहला अध्याय समाप्त हुआ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय
विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव, रुद्र तथा लक्ष्मीका प्राकट्य, ब्रह्माद्वारा नौ मानस पुत्रों तथा चार वर्णोंकी सृष्टि, वेदज्ञानकी महिमा, ब्रह्म-सृष्टिका वर्णन, वर्ण और आश्रमोंके सामान्य तथा विशेष धर्म, गृहस्थाश्रमका माहात्म्य, चतुर्विध पुरुषार्थोंमें धर्मकी महिमा, आश्रमोंका द्वैविध्य, त्रिदेवोंका पूजन, त्रिपुण्ड्र, तिलक तथा भस्म-धारणकी महिमा
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा—समस्त ऋषिगणो! संसारके कल्याणके लिये आप लोगोंने जो कुछ मुझसे पूछा है और इन्द्रद्युम्नके प्रति मैंने जो कुछ कहा है, वह सब मैं बतला रहा हूँ, आप लोग सुनें॥ १ ॥ |
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| शृणुध्वमृषयः सर्वे यत्पृष्टोऽहं जगद्धितम् ।<br>वक्ष्यमाणं मया सर्वमिन्द्रद्युम्नाय भाषितम् ॥ १ ॥ | |
| भूतैर्भव्यैर्भविष्यद्भिश्चरितैरुपबृंहितम् ।<br>पुराणं पुण्यदं नृणां मोक्षधर्मानुकीर्तनम् ॥ २ ॥ | इस (कूर्म) पुराणमें भूत, वर्तमान एवं भविष्यकालमें हुए वृत्तान्तोंको विस्तारसे बतलाया गया है। यह पुराण मनुष्योंको पुण्य प्रदान करनेवाला और मोक्षधर्मका वर्णन करनेवाला है॥ २॥ |
| अहं नारायणो देवः पूर्वमासं न मे परम् ।<br>उपास्य विपुलां निद्रां भोगिशय्यां समाश्रितः ॥ ३ ॥ | मैं ही नारायण देवरूपसे पूर्वकालमें विद्यमान था। मेरे अतिरिक्त और कोई दूसरा न था॥ ३॥ |