भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( २३२ ) लीलावती । अन्वयः-यत्र क्षेपाभावः तत्र अथवा यत्र हरोद्धतः क्षेपः शुद्धः भवति तत्र अपि शून्यं गुणः ज्ञेयः हारहतः क्षेपः फलं भवति ॥ ७३ ॥ अर्थः-जिस कुट्टकके उदाहरणमें क्षेप शून्य हो तहां गुणक भी शून्य जानना, क्षेपमें हरका भाग देने से जो लब्धि मिले वह लब्धि होती है, अथवा जहां हरका भाग देनेसे क्षेपमें कुछ शेष न बचता हो तहां भी शून्य ही गुणक होता है और क्षेपमें हरका भाग देने से जो मिले वह लब्धि होती है ॥ ७३ ॥ उदाहरणम्- येन पञ्च गुणिताः खसंयुताः पञ्चषष्टिसहिताश्च तेऽथवा ॥ स्युस्त्रयोदशहता निरग्रकास्तं गुणं गणक कीर्तयाऽऽशु मे ४८ अन्वयः-येन गुणिताः पंच खसंयुताः अथवा पंचषष्टिसहिताः च ते त्रयो दशहताः निरग्रकाः स्युः हे गणक ! तं गुणं मे आशु कीर्तय ॥ ४८ ॥ अर्थः-किसी अंक से गुणा किये हुए पांच ५ में शून्य जोडा या ६५ जोडे, फिर तेरहका भाग दिया तो कुछ शेष नहीं रहा तो हे गणक ! उस गुणक अंकको बताओ जिससे कि, पांचको गुणा किया जाय ॥ ४८ ॥ न्यासः-भाज्यः ५ हारः १३ क्षेपः शून्यम् ० . “ ज्ञेयः शून्यं ० गुणस्तत्र क्षेपो हारहृतः फलमिति” ॥ क्षेपाभावे गुणाप्ती ० । ० इष्टाहतेत्यथवा १३ । ५ वा २६ । १० ॥ फैलाव-भाज्य ५ हार १३ क्षेप० यहां क्षेप० शून्य है, इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार शून्य० ही गुणक होगा और शून्यमें किसी अंकका भाग देनेसे शून्य ही लब्धि होता है इस कारण यहां क्षेपमें हरका भाग दिया तो शून्य ही लब्धि हुआ; इस प्रकार गुणलब्धि मिले । ० । ० । न्यासः-भाज्यः ५ हारः १३ क्षेपः ६५ “क्षेपः शुद्धो हरोद्धतः । ज्ञेयः शून्यं गुणस्तत्र क्षेपो हारहृतः फल- मिति” जाते गुणाप्ती ० । ५ ॥ फैलाव-भाज्य ५ हार १३ क्षेप ६५ यहां क्षेप ६५ में हार १३ का भाग देनेसे कुछ शेष नहीं रहता है; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार गुण मिला० और क्षेपमें हरका भाग देनेसे ५ मिले यही लब्धि हुई इस प्रकार गुणलब्धि० । ५ मिले॥

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