लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुट्टकव्यवहारः । ( २३३ ) अथ सर्वत्र कुट्टके गुणलब्ध्योरनेकधा दर्शनार्थं करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- अब सब जगह कुट्टकमें अनेक प्रकारकी गुणलब्धि दिखानेकी रीति आधा श्लोक- इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते ते वा भवेतां बहुधा गुणाप्ती ॥ ऽऽ ॥ अन्वयः-वा ते गुणाप्ती इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते बहुधा भवेताम् ॥ अर्थः-अथवा वही गुणलब्धि इष्टसे गुणे हुए अपने अपने तक्षकमें जोड़नेसे अनेक प्रकारके हो जाते हैं ॥ अस्योदाहरणानि दर्शितानि पूर्वमिति । इसके उदाहरण पहले दिखाचुके हैं, इस कारण यहां नहीं लिखे. अथ स्थिरकुट्टककरणसूत्रं वृत्तम्- अब स्थिर कुट्टककी रीति लिखते हैं एक श्लोकमें- क्षेपे तु रूपे यदि वा विशुद्धे स्यातां क्रमाद्ये गुणकारलब्धी ॥ अभीप्सितक्षेपविशुद्धिनिघ्ने स्वहारतष्टे भवतस्तयोस्ते ॥ ७४ ॥ अन्वयः-यदि रूपे क्षेपे वा विशुद्धे तयोः ये गुणकारलब्धी स्यातां ते क्रमात् अभीप्सितक्षेपविशुद्धिनिघ्ने स्वहारतष्टे तयोः ते भवतः ॥ ७४ ॥ अर्थः-जहां इष्टक्षेपका अंक बडा हो वहां रूप १ को क्षेप मानकर पहले कही हुई रीतिसे गुणलब्धि लावे फिर उस गुणलब्धिको इष्टक्षेपसे गुणा करके उसको अपने अपने तक्षकसे तष्टे जो शेष बचे उसको गुणलब्धि जाने, यह गुणलब्धि धनक्षेपकी है, यदि ऋणक्षेप हो तो इन गुणलब्धिको अपने अपने तक्षकमेंसे घटादे जो शेष रहे वह गुणलब्धि होती है ॥ ७४ ॥ प्रथमोदाहरणे दृढभाज्यहारयोः रूपक्षेपयोर्न्यासः-भाज्यः १७ हारः १५ क्षेपः १ अत्र गुणाप्ती ७ । ८ एते त्विष्ट-- क्षेपेण पञ्चकेन गुणिते स्वहारतष्टे च जाते ५ । ६ ॥ अथ रूपशुद्धौ गुणाप्ती ७ । ८ तक्षणाच्छुद्धौ जातौ लब्धि- गुणौ ९ । ८ एते पञ्चगुणे स्वहारतष्टे च जाते १० । ११ एवं षष्टिविशुद्धौ ॥ एवं सर्वत्र ॥ फैलाव-इसको"एकविंशतियुतमित्यादि"पहिले उदाहरणमें दिखलाते हैं-भाज्य १७ हार १५ क्षेप ५ यहां इष्टक्षेप पांच ५ है, इसके स्थानमें रूप १ को क्षेप