लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२३४) लीलावती। माना तब भाज्य १७ हार १६ क्षेप १ ऐसा न्यास हुआ. पहली रीतिसे वल्ली बनाई ${|c|} १ १ १ ० $ इस वल्लीसे गुणलब्धिरूप दो राशि ७ । ८ इनको ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार इष्टक्षेप ५ से गुणा करा तो हुए ३५ । ४० इनको अपने २ तक्षक १६ । १७ से तष्टा तो शेष बचे ५ । ६ यही इस उदाहरणमें धनक्षेपकी गुणलब्धि हैं, इन ही गुणलब्धिको अपने अपने तक्षक १६ । १७ मेंसे घटाया तो शेष रहे, १० । ११ यही ऋणक्षेपकी गुण लब्धि हुई, इसी प्रकार सब जगह जानना ॥ अस्य ग्रहगणिते उपयोगस्तदर्थं किंचिदुच्यते- इस कुट्टकका ग्रहोंकी गणितमें प्रयोजन पडता हैं उसीके लिये कुछ कहते हैं- कल्प्याऽथ शुद्धिविकलावशेषं षष्टिश्च भाज्यः कुदिनानि हारः ॥ ७५ ॥ तज्जं फलं स्युर्विकला गुणस्तु लिप्ताग्रमस्माच्च कला लवाग्रम् ॥ एवं तदूर्द्धं च तथा- धिमासावमाग्राभ्यां दिवसा रवीन्द्रोः ॥ ७६ ॥ अन्वयः-अथ विकलावशेषं शुद्धिः कल्प्या षष्टिः च भाज्यः कल्प्यः कुदिनानि हारः कल्प्यः तज्जं फलं विकलाः स्युः गुणाः तु लिप्ताग्रम् अस्मात् च फलं कलाः गुणः तु लवाग्रम्। एवं तदूर्ध्वं च कार्यं तथा अधिमासावमाग्राभ्यां रवीन्द्रोः दिवसाः स्युः ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ अर्थः-कल्पभगणसे त्रैराशिक करके जो ग्रह मिले उसकी विकलाओंके शेषसे ग्रह और सायन अहर्गण तथा अधिमास शेष और अवमशेषसे सौरदिन तथा चांद- दिन जाननेके लिये पहिले विकला शेषको ऋणक्षेप कल्पना करे, साठको भाज्यक- ल्पना करे और कुदिनोंको हारकल्पना करके कुट्टककी रीतिसे वल्ली बनावे उस वल्लीसे जो लब्धि मिले उसको विकला जाने और गुणको कलाशेष जाने, इस कलाशेषको ऋणक्षेप मानकर फिर कुट्टककी रीतिसे गुणलब्धि लावे जो लब्धि मिले उसको कला जाने और गुणको भाग शेष जाने इसी प्रकार क्रिया करता जाय फिर अधि- मास शेष और अवम शेषसे सूर्य्य और चंद्रमाके दिन लावे ॥ ७५ ॥ ग्रहस्य विकलावशेषेण ग्रहाहर्गणयोरानयनं तद्यथा तत्र षष्टिर्भाज्यः कुदिनानि हारः विकलावशेषं शुद्धिरिति प्रकल्प्य साध्ये गुणाप्ती तत्र लब्धिर्विकलाः स्युः। गुणस्तु कलावशेषम् ।