भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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कुट्टकव्यवहारः । (२३५) एवं कलावशेषः शुद्धिस्तत्र षष्टिर्भाज्यः कुदिनानि हारः लब्धिः कला । गुणस्तु भागशेषम् ॥ भागशेषं शुद्धिस्रिं- शद्भाज्यः कुदिनानि हारः फलं भागाः।गुणो राशिशेषम् ॥ एवं राशिशेषे शुद्धिर्द्वादशभाज्यः । कुदिनानि हारः फलं गतराशयः । गुणो भगणशेषम् ॥ कल्पभगणो भाज्यः कुदिनानि हारः भगणशेषम् । शुद्धिः फलं गतभगणः गणोऽहर्गणः स्यादिति ॥ अस्योदाहरणानि-त्रिप्रश्नाध्याये ॥ एवं कल्पाधिमासाः भाज्याः रविदिनानि हारः अधिमास- शेषं शुद्धिः फलं गताधिमासाः । गुणो गतरविदिवसाः ॥ एवं युगावमानि भाज्यः चान्द्रदिवसा हारः । अवमशेषं शुद्धिः । फलं गतावमानि । गुणो गतचान्द्रदिवसाः ॥ अर्थः-ग्रहकी विकलाके शेषसे ग्रह और अहर्गण मिलता है, सो दिखाते हैं, साठ ६० को भाज्य माना, कुदिनोंको हार माना, विकला शेषको ऋणक्षेप माना फिर कुट्टककी रीतिसे गुणलब्धि साधे तहाँ जो लब्धि मिले वह विकला होती है और गुण कलावशेष होता है. फिर कलावशेषको ऋणक्षेप माने साठको भाज्य माने और कुदिनोंको हार मान- कर कुट्टककी रीति गुणलब्धि साधे, तहां जो लब्धि मिले वह कला होती है और गुण भागशेष होता है. फिर भागशेषको ऋणक्षेप माने तीसको भाज्य माने और कुदिनोंको हार मानकर कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको भाग माने और गुणको राशिशेष मानै. फिर राशिशेषको ऋणक्षेप माने, बारहको भाज्य माने कुदिनोंको हार मानकर जो कुट्टककी रीतिसे लब्धि मिलेउसको गतराशि माने और गुणको भगणशेष माने. फिर भगणशेषको ऋणक्षेप माने, कल्पभगणको भाज्य माने, कुदिनोंको हार माने- तब कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको गतभगण माने, गुणको अहर्गण माने. इसके उदाहरण-त्रिप्रश्नाध्यायमें कहे हैं. इसी प्रकार कल्पाधिमासको भाज्यमानै;रविदिनोंको हार माने;अधिमास शेषको ऋणक्षेप माने; तब कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको गताधिमास जाने गुणको गतसूर्य्यदिन माने. CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri