भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( २३६ ) लीलावती । फिर इसी प्रकार युगावमोंको भाज्यमाने चन्द्रदिनोंको हार माने और अवमशेषके ऋणक्षेप मानकर कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको गत अवम जाने, गुणको गत चन्द्रदिन जाने. संश्लिष्टकुट्टके करणसूत्रं वृत्तम्- मिले बहु कुट्टकमें गुणलब्धि जाननेकी रीति एक श्लोक- एको हरश्चेद्गुणकौ विभिन्नौ तदा गुणैक्यं परिकल्प्य भाज्यम् ॥ अग्रैक्यमग्रं क्रम उक्तवद्यः संश्लिष्टसंज्ञः स्फुटकुट्टकोऽसौ ॥७७॥ अन्वयः-चेत् हरः एकः गुणकौ विभिन्नौ स्यातां तदा गुणैक्यं भाज्यं परिकल्प्य अग्रैक्यम् अग्रं परिकल्प्य यः उक्तवत् क्रमः असौ संश्लिष्टसंज्ञः स्फुटकुट्टकः ॥ ७७ ॥ अर्थः-यदि हर एक हो और गुणक भिन्न भिन्न कई हों तो गुणकोंके योगको भाज्य कल्पना करें और शेषके ऐक्यको ऋणक्षेप कल्पना करे, फिर पहलेहीकी अनुसार वल्लीसे गुणलब्धि लावें, इसको संश्लिष्ट कुट्टक कहते हैं ॥ ७७ ॥ उदाहरणम्- कः पंचनिघ्नो विहृतस्त्रिषष्ट्या सप्तावशेषोऽथ स एव राशिः ॥ दशाहतः स्याद्विहृतस्त्रिषष्ट्या चतुर्दशाग्रो वद राशिमेनम् ॥४९। अन्वयः-कः राशिः पञ्चनिघ्नः त्रिषष्ट्या विहृतः सप्तावशेषः स्यात् । अथ सः एव राशिः दशाहतः त्रिषष्ट्या विहृतः चतुर्दशाग्रः स्यात् । एनं राशिं वद ॥ ४९ ॥ अर्थः- कौनसा राशि है? जिसको पांचसे गुणाकर तिरसठका भाग देनेसे सात ७ बाकी रहते हैं और उसी राशिको दशसे गुणाकर तिरसठका भाग देनेसे चौदह बचते हैं तो कहो वह कौन राशि है ॥ ४९ ॥ अत्र गुणैक्यं भाज्यः अग्रैक्यं शुद्धिः ॥ न्यासः- भाज्य १५ हारः ६३ क्षेपः २१ पूर्ववज्जातो गुणः ७ फलम् ५ एतौ स्वतक्षणाभ्यां शोधितौ जातौ वियोगजौ लब्धिगुणौ ३ ॥ १४ ॥ फैलाव-यहां गुणयोग भाज्य होता है और शेषयोग क्षेप होता है इस कारण गुणों ५ । १० को जोडा तो १५ हुए; यही भाज्य हुआ और शेषों ७ । १४ को जोडा तो २१ हुए; यही क्षेप है;इस प्रकार भाज्य १५ क्षेप २१ हर ६३ हुआ; इनमें तीनका अपवर्तन दिया तो दृढभाज्य ५ हार ७ क्षेप २१ हुए; इनसे पहले कही हुई रीतिके CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri