भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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अनुसार गुणलब्धि मिली ७। २ यह धनक्षेपकी है. ऋण क्षेपमें इन ७ । २ गुण- लोभ्यको अपने अपने तक्षक २१। ५ मेंसे घटाया तौ १४ । ३ रहे,यही ऋणक्षेपकी गुणलब्धि हुई ॥ इति लीलावत्यां कुट्टकाध्यायः । इति श्रीभास्कराचार्य्यविरचितलीलावत्याः स्वरूपप्रकाश- भाषाटीकायां कुट्टकाध्यायः॥ अथ गणितपाशे निर्द्दिष्टौकैः संख्यायाः विभेदे करणसूत्रं वृत्तम्- अब गणितपाशमें दिये हुए कुछ अंकोंको अलट पलट करके भेदोंकी संख्या और भेदोंकी संख्याओंका योग जाननेकी रीति- स्थानान्तमेकादिचयाङ्कघातः संख्याविभेदा नियतैः स्यु- रंकैः ॥ भक्तोऽकमित्यांकसमासनिघ्नः स्थानेषु युक्तो मितिसंयुतिः स्यात् ॥ ७८ ॥ अन्वयः-स्थानान्तम् एकादिचयाङ्कघातः कार्य्यः तदा नियतैः अंकैःसंख्याविभेदाः स्युः। सः एकादिचयांकघातः अंकसमासनिघ्नः अंकमित्या भक्तः ततः स्थानेषु युक्तः मितिसंयुतिः स्यात् ॥ ७८ ॥ अर्थः-जितने स्थानोंमें अंक दिये जायें उतने ही स्थानोंमें एक आदि अंक लिखकर परस्पर घात कर ले, जो गुणनफल हो वही उन अंकोंके भेदोंकी संख्या होगी, परन्तु दिये हुए अंकोंमें एक ही अंक दूसरी बार न हो और उसी एक आदि अङ्कोंके घातको दिये हुए अङ्कोंको योगसे गुणा करके जितने स्थानोंमें अङ्क दिये हों उस स्थानसंख्याका भाग दे जो लब्धि हो उसको जितने स्थानोंमें अंक दिये हों उतने ही स्थानोंमें एक एक स्थान बढा कर लिखके जोड ले तब सब भेदोंके अंकोंका योग मिलता है ॥ ७८ ॥ उदाहरणम्- द्विकाष्टकाभ्यां त्रिनवाष्टकैर्वा निरंतरं द्व्यादिनवावसानैः ॥ संख्याविभेदाः कति संभवंति तत्संख्यैक्यानि पृथग्व- दाशु ॥ ५० ॥ अन्वयः-द्विकाष्टकाभ्यां वा त्रिनवाष्टकैः तथा निरन्तरं द्व्यादिनवावसानैः कति संख्याविभेदाः सम्भवन्ति । तत्संख्यैक्यानि च पृथक् आशु वद ॥ ५० ॥