भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( ८७ ) आशय है और वाग्भटने इसको सर्व रोगोंका राजा कहा है इसीसे इसको राजयक्ष्मा नाम कहा है । इस श्लोकमें जो कहा है कि, त्रिदोषका एक ही यक्ष्मा रोग प्रगट होता है उसका तात्पर्य यह है कि, तीनों दोषोंके कारणभेदसे अनेक प्रकारका नहीं है सो सुश्रुतमें कहा भी है और इस श्लोकमें “वेगरोधात्” इस पदमें केवल वात, मूत्र, मल इनका ही ग्रहण करना चाहिये, श्रमादिक सबोंका ग्रहण नहीं है, सो चरकमें लिखा है ॥ राजयक्ष्माकी विशिष्टसंप्राप्ति । कफप्रधानैर्दोषैस्तु रुद्धेषु रसवर्त्मसु । अतिव्यवायिनो वापि क्षीणे रेतस्यनन्तराः ॥ क्षीयन्ते धातवः सर्वे ततः शुष्यति मानवः ॥ २ ॥ कफ है प्रधान जिनमें ऐसे जो वातादि दोष तिन करके रसके बहनेवाली नाडि- योंके मार्ग रुक जानेसे (इससे यह सूचना करी कि, रसमार्ग बन्द होनेसे हृदयमें स्थित जो रस उसको बिगाड और उसी स्थानमें विकृति कहिये और प्रकारका स्वरूप करके खांसीके वेगसे मुखमार्ग होकर निकाले) सो चरकमें लिखा भी है । (इससे अनुलोमक्षयं दिखाय अब प्रतिलोमक्षय कैसा होता है उसको कहते हैं-) अथवा अतिमैथुन करनेसे मनुष्यका वीर्य क्षीण होता है, जब शुक्र क्षीण होजाय तब समीपकी धातु क्षीण होयं तब पुरुष सूखने लगता है, जैसे शुक्र क्षीणके अनन्तर मज्जा क्षीण होय, मज्जा क्षीणके अनन्तर हड्डी क्षीण होयं ऐसे पूर्वपूर्व धातु क्षीण हो जायं । शंका--क्यों जी ! रस, रुधिर, मांस, मेदा, हड्डी, मज्जा, शुक्र इनमें क्रमसे प्रत्येक क्षीण होनेसे शुक्रका क्षय होना उचित है, परन्तु कार्यभूत शुक्रका क्षय होनेसे कारणभूत धातुओंका नाश कैसे होता है ? उत्तर--जब शुक्रका क्षय होता है तब वात कुपित होता है, सो तन्त्रान्तरोंमें लिखा है अर्थात् धातुके नष्ट होनेसे पवनको बहनेवाली नाडियोंका मार्ग बन्द होकर वायुको कुपित करे तब वही पवन समीपकी मज्जा धातुको सुखावे तदनंतर हड्डी और उसके पश्चात् मेदा इसी रीतिसे रसपर्यंत धातुओंको सुखावे है, इस जगहपर दृष्टान्त है-जैसे अग्निमें तपायभया लोहका गोला गीली पृथ्वीमें धरनेसे प्रथम समीपकी पृथ्वीके आर्द्रपनेको शोषण करे पीछे दूरका गीलापन शोषण करे उसी रीतिसे यहां जानना चाहिये ॥ १ “एक एव मतः शोषः स.त्रिपातात्मको यतः । उद्रेकात्तत्र लिंगानि दोषाणां निर्मितानि हि॥” इति । २ “ह्रीमत्त्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम् । वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः॥” इत्यादि । ३ रससे रुधिर, रुधिरसे मांस, इसी रीतिसे शुक्रपर्यंत धातुओंका क्षय हो सो । ४शुक्रसे रसपर्यंत धातुओंका शोष हो सो। ५ “वायोर्धातुक्षयात् कोपो मार्गस्यावरणेन च” इति॥