माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ९६ ) माधवनिदान । क्षतकासलक्षण । अतिव्यवायभाराध्वयुद्धाश्वगजनिग्रहैः। रूक्षस्योरःक्षतं वायु- र्गृहीत्वा कासमावहेत् ॥ ८ ॥ स पूर्वं कासते शुष्कं ततः ष्ठीवेत् सशोणितम् । कण्ठेन रुजताऽत्यर्थं विरुग्णेनेव चोरसा ॥ ९ ॥ सूचीभिरिव तीक्ष्णाभिस्तुद्यमानेन शूलिना । दुःख- स्पर्शेन शूलेन भेदपीडाभितापिना ॥१०॥ पर्वभेदज्वरश्वास- तृष्णावैस्वर्यपीडितः । पारावत इवाकूजन्कासवेगात्क्षतोद्भवात् १ १ बहुत स्त्रीसंग करनेसे, भारके उठानेसे, बहुत मार्ग चलनेसे, मलयुद्ध ( कुस्ती ) करनेसे, दौडते हुए हाथी घोडेको रोकनेसे इन कारणोंसे रूक्ष पुरुषका हृदय फूट- कर वायुकोप होकर खांसीको प्रगट करे । सो पुरुष प्रथम सूखा खांसे, पीछे रुधिर मिला थुके, कण्ठ अत्यन्त दूखे, हृदय फटे सदृश मालूम हो और तीखी सूईकेसे चुभक्का चलें और उसको हृदयका स्पर्श सुहाय नहीं, दोनों पसवाडोंमें शूल हो, यह वाग्भटका भी मत है तथा दाह हो उस रोगीके गांठ गांठमें पीडा हो, ज्वर, श्वास, प्यास, क्षतजन्य खांसीके वेगसे रोगी कबूतरकी तरह घुंघुं शब्द करे ॥ क्षयकी खांसीके लक्षण । विषमासात्म्यभोज्यातिव्यवायाद्वेगनिग्रहात् । घृणिनां शोचतां नॄणां व्यापन्नेऽग्नौ त्रयो मलाः ॥ १२ ॥ कुपिताः क्षयजं कासं कुर्युर्देहक्षयप्रदम् । स गात्रशूलज्वरदाहमोहान्प्राणक्षयं चापि लभेत कासी ॥ १३ ॥ शुष्यन्विनिष्ठीवति दुर्बलस्तु प्रक्षीणमांसो रुधिरं सपूयम् । तं सर्वलिङ्गं भृशदुश्चिकित्स्यं चिकित्सितज्ञाः क्षयजं वदन्ति ॥ १४ ॥ कुपथ्य और विषमाशनके करनेसे, अति मैथुन, मलमूत्रादिका वेग धारण इनसे, अति दया करनेसे, अति शोक करनेसे अग्नि मन्द होय अर्थात् आहार थक- कर वायु कुपित हो अग्निको नष्ट करे । तब तीनों दोष कोपको प्राप्त हों क्षयजन्य देहकी नाशक ऐसी खांसीको प्रगट करे । तब वह खांसी देहको क्षीण करे, शूल, ज्वर, दाह और मोह ये होयं, तब यह प्राणका नाश करे । सूखी खांसी, रुधिर, मांस, शरीरका सूखजाना, रुधिर और राध थूके इन सर्व लक्षणयुक्त और चिकित्सा करनेमें अतिकठिन ऐसी इस खांसीको वैद्य क्षयज कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA