भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 404 में से

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पृष्ठ 136

( ११८ ) माधवनिदान । रुधिरका यही स्वभाव है कि, जिसकी गन्धसे ही मनुष्य मूर्छित होता है । अब स्वभावको और भी दृढ करते हैं-“ दृष्ट्वा यदभिमुह्यति ” अर्थात् रक्तके देखनेसे भी मूर्च्छित होय सो लिखा भी है ॥ विष और मद्यसे उत्पन्न मूर्च्छाको कहते हैं— गुणास्तीव्रतरत्वेन स्थितास्तु विषमद्ययोः । त एव तस्मादाभ्यां तु मोहौ स्यातां यथेरितौ ॥ १५ ॥ तैलादिकोंमें जो दश गुण हैं वे ही गुण विष और मद्यमें अत्यंत तीव्रतासे रहते हैं । इसी विष और मद्यके सेवन करनेसे मोह होता है इसमें भी मद्यमें तीव्र रहै और विषमें तीव्रतर रहै इसीसे विषको मोह स्वयं शांत नहीं होता, क्योंकि, विष अपाकी है और मद्यका मोह मद्यके नशा उतरेपर शांत हो जाता है । यह भेद विष और मद्यमें रहता है ॥ रक्तादि तीन मूर्च्छाओंके लक्षण । स्तब्धाङ्गदृष्टिस्त्वसृजा मूढोच्छ्वासश्च मूर्च्छितः ॥ १६ ॥ मद्येन विलपञ्छेते नष्टविभ्रान्तमानसः । गात्राणि विक्षिपन्भूमौ जरां यावन्न याति तत् ॥ १७ ॥ वेपथुस्वप्नतृष्णाः स्युस्तमश्च विषमूर्च्छिते । वेदितव्यं तीव्रतरं यथास्वं विषलक्षणैः ॥ १८ ॥ रुधिरकी मूर्च्छामें अंग और नेत्र निश्चल हो जायं और श्वास अच्छे प्रकार आवे नहीं । बहुत मद्यके पीनेसे जो मूर्च्छा हो उसके ये लक्षण हैं । बहुत बकता हुआ सोय जाय, संज्ञा जाती रहै, भ्रमयुक्त होय और जबतक मद्य न पचे तबतक पृथ्वीमें हाथ पैर पटके । विषजन्य मूर्च्छामें कांपे, सोवे, प्यास लगे और अँधेरा आवे, एवं विष वृक्षके मूल, पत्र, दूध इनके भेदकर जो विषभक्षणसे लक्षण होते हैं, सो सब लक्षण होते हैं ॥ मूर्च्छा, भ्रम, तन्द्रा और निद्रा इनके भेद । मूर्च्छा पित्ततमःप्राया रजःपित्तानिलाद्भ्रमः³ । तमोवातकफात्तन्द्रा निद्रा श्लेष्मतमोभवा ॥ १९ ॥ १ यदुक्तं दृढबलेन—लघु रूक्षमाशु विशदं व्यवायि तीक्ष्णं विकाशि च । उष्णमनिर्देश्यरसं दशगुणमुक्तं विषं तज्ज्ञैः ॥ इति । २ ये विषस्य गुणाः प्रोक्ताः सन्निपातप्रकोपिनः । त एव मद्ये दृश्यन्ते विषे तु बलवत्तराः ॥ इति । ३ तत्र भ्रमः स्थाणौ पुरुषज्ञानं पुरुषे विपरीतसत्त्व- ज्ञानादिकम् । अन्ये चक्रस्थितस्येव संभ्रमवस्तुदर्शनमिति ॥

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