माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १५२ ) माधवनिदान । प्रतूनीके लक्षण । गुदोपस्थोत्थिता चैव प्रतिलोमं प्रधावति । वेगैः पक्वाशयं याति प्रतूनी चेह सोच्यते ॥ ६५ ॥ गुदा और उपस्थ इनसे उठी जो पीडा उलटी ऊपर जायकर प्राप्त हो और जोरसें पक्वाशयमें प्राप्त हो और तूनीके समान पीडा करे उसको प्रतूनी कहते हैं ॥ आध्मानरोगके लक्षण । साटोपमत्युग्ररुजमाध्मानमुदरं भृशम् । आध्मानमिति जानीयाद्घोरं वातनिरोधजम् ॥ ६६ ॥ गुडगुडशब्दयुक्त अत्यन्त पीडायुक्त ऐसा उदर (पक्वाशय) अत्यन्त फूले अर्थात् बादीसे भरकर चामकी थैलीके समान होजाय इस भयंकर रोगको आध्मानरोग कहते हैं, यह वातके रुकनेसे होता है ॥ प्रत्याध्मानके लक्षण । विमुक्तपार्श्वहृदयं तदेवामाशयोत्थितम् । प्रत्याध्मानं विजानीयात्कफव्याकुलितानिलम् ॥ ६७ ॥ और वही आध्मानरोग आमाशयमें उत्पन्न होय तो उसको प्रत्याध्मान कहते हैं इसमें पसवाडे और हृदयमें पीडा नहीं होय और वायु कफकरके व्याकुल हो ॥ वाताष्ठीलाके लक्षण । नाभेरधस्तात्सञ्जातः सञ्चारी यदि वाऽचलः । अष्ठीलावद् घनो ग्रन्थिरूर्ध्वमायत उन्नततः ॥ वाताष्ठीलां विजानीयाद्बहिर्मार्गावरोधिनीम् ॥ ६८ ॥ नाभीके नीचे उत्पन्न भई और इधर उधर फिरे अथवा अचल अष्ठीला (गोल- पाषाण) के समान कठिन ऊपरका भाग कुछ लम्बा होय और आडी कुछ ऊंची होय और बहिर्मार्ग कहिये अधोवायु, मल, मूत्र इनका अवरोध कहिये (रुकना) हो ऐसे गांठको वाताष्ठीला कहते हैं ॥ १ "श्रमातुरण पानीयं पीत्वा वेगविधारणम् । धावतो वा पिबेत्तोयं भुञ्जतो वा विदाहि च ॥ तथा पयोऽम्बुपानाद्वा दुर्जरा पललेन वा । साऽष्ठीला नाम विख्याता गुर्वी कुक्षिश्रितापि वा" इति आत्रेयः।