भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( ५ ) नहीं तो रोग कैसे प्रगट हो सकते हैं ! उत्तर-इस पदका यह अर्थ है कि दोष ( वात पित्त कफ ) का व्याधिके अल्प होनेसे अप्रगट होना रूप अर्थात् थोडा थोडा होना. अतएव तत्तत् ज्वरादिव्याधिका अपने अपने अप्रगट लक्षण पूर्वरूप तैसे तैसेही होते हैं । अब कहते हैं कि, पूर्वरूप दो प्रकारका हैं-एक सामान्य दूसरा विशिष्ट । सामान्यप्राग्रूप ( पूर्वरूप ) उसे कहते हैं जैसे दोष ( वात पित्त कफ ) से दूषित धातु उसके बिगडनेसे प्रगट होनेवाले ज्वरादि व्याधिमात्रकीही प्रतीति होवे और वात आदि दोषोंके चिह्न न मालूम हो जैसे-“ श्रमोऽरतिर्विवर्णत्वमिति ” अर्थात् ज्वरमें श्रम हो, मनका न लगना, देहका विवर्ण इत्यादि लक्षण और जिसमें होनहार रोगारम्भक दोष उन्होंके चिह्न तिसके एक अंशकी प्रतीति हो उसको विशिष्ट प्राग्रूप कहते हैं. जैसे-“ जृंभात्यर्थं समीराणात् ” अर्थात् जम्भाईका आना केवल वातके दोषसे ही है। इसमें होनहार रोग कौन ज्वर, उसका आरंभ कौन वात, उस वातका एक अंश कौन जम्भाई ऐसे और भी जानने चाहिये । इस विशिष्ट पूर्वरूपमें जम्भाई आदि रूप देखकर कदाचित् पूर्वरूपको रूप न समझना चाहिये । क्योंकि यह तो केवल व्याधिके आरम्भक दोषमात्रका सूक्ष्म चिह्न है, इस बातको दृष्टान्त देकर समझाते हैं । दृष्टान्त-जैसे तृणके समूहमें छोटी अग्निकी चिनगारी गिरनेसे धूम ( धुआँ ) मात्र प्रकट देखकर हाथ वस्त्र आदिके मारनेसे ही शान्ति कर सकते हैं, परन्तु जब अग्नि एक साथ जोरसे प्रज्वलित होगई तब शान्त नहीं होसके. ऐसे ही विशिष्ट पूर्वरूपके अल्प होनेसे चिकित्सा करनेसे शांति कर सकते हैं, परन्तु जब रूप होगया तब उसका उपाय नहीं होसकता है। इसीसे पूर्वरूप और रूपमें भेद है । अब कहते हैं-पूर्वरूप और रूप इन दोनोंमें कोई शारीरिक अर्थात् शरीरसे सम्बन्ध रखते हैं और कोई मानसिक अर्थात् मनसे सम्बन्ध रखते हैं । शारीरिक जैसे ज्वरमें मुखका विरस होना, देह भारी, नेत्रोंसे जल गिरना इत्यादिक और मानसिक जैसे मनका एक जगह न लगना और अपने हितकारक वचनोंसे शांति न होना तथा खट्टे चरपरे पदार्थपर मन चलना इत्यादि ॥ व्याधिके रूपके पर्याय शब्द । तदेव व्यक्ततां यातं रूपमित्यभिधीयते । संस्थानं व्यञ्जनं लिङ्गं लक्षणं चिह्नमाकृतिः ॥ ७ ॥ जब पूर्वोक्त प्राग्रूप प्रगट होजाय तब उसको रूप ऐसे कहते हैं और संस्थान, व्यञ्जन, लिंग, लक्षण, चिह्न और आकृति ये छः शब्द रूपके पर्यायवाचीक हैं ॥ अब उपशयके लक्षणको कहते हैं- हेतुव्याधिविपर्य्यस्तविपर्य्यस्तार्थकारिणाम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA