माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 22, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४ ) माधवनिदान । सुखसाध्य और मध्यरूप कष्टसाध्य और सम्पूर्णरूप असाध्य है इनको जाननेसें असाध्यका परित्याग करना और कष्टसाध्य तथा सुखसाध्यकी औषधि करानीं उचित है । उपशयके जाननेसे यह प्रयोजन है कि सुपरीक्षित व्याधिके सम्पूर्ण लक्षण न मिलनेसे व्याधिका यथार्थ ज्ञान नहीं हो, उसको उपशयके द्वारा निश्चय करे । सो चरकमें लिखा है कि, जिस व्याधिके लक्षण प्रगट न होयं उसकी उपशय और अनुशयके द्वारा परीक्षा करे उसी प्रकार सुश्रुतमें लिखा है जैसे-उबटना तेल लगाना स्वेदनविधि इत्यादि कर्म करनेसे वातरोग शान्त न हो तो उसके रुधिरका विकार जाने और सम्प्राप्तिके जाननेसे यह प्रयोजन है कि, सम्प्राप्तिके बिना जानें पूर्वरूपादिकोंकरके जानी हुई व्याधि चिकित्साके योग्य भी है परन्तु अंशांश विकल्प बल काल आदिको जबतक नहीं जाने तबतक चिकित्सा यथार्थ नहीं हो सकती इसीसे वैद्य निदानपञ्चकका अवश्यही परिचय करें ॥ अब निदानके पर्यायवाची शब्दोंको कहते हैं- निमित्तहेत्वायतनप्रत्ययोत्थानकारणैः । निदानमाहुः पर्यायैः प्राग्रूपं येन लक्ष्यते ॥ ५ ॥ निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान और कारण ये निदानके पर्यायवाची शब्द शास्त्र व्यवहारके अर्थ मुनीश्वरोंने कहे हैं, इनके कहनेका कारण यह है कि, व्यवहारके वास्ते अर्थात् शास्त्रमें इन छहों शब्दोंमेंसे कोई शब्द आवे उसको निदानवाचकही जानें ॥ व्याधिके प्राग्रूपका लक्षण । उत्पित्सुरामयो दोषविशेषेणाऽनधिष्ठितः । लिंगमव्यक्तमल्पत्वाद्याधीनां तद्यथायथम् ॥ ६ ॥ येन उत्पित्सुः आमयो लक्ष्यते तत्प्राग्रूपम्-किंभूतः आमयः दोषविशेषेणाऽनधि- ष्ठितः । अतः एव ज्वरादिव्याधीनाम् अल्पत्वात् अव्यक्तं लिंगं तत् यथायथं यस्य व्याधेर्यद्रूपं तदेवाव्यक्तं पूर्वरूपम् इत्यन्वयः ॥ जिस जम्भाई आलस्य आदि करके उत्पत्ति होनेवाली व्याधिका ज्ञान होवें उसको प्राग्रूप अर्थात् पूर्वरूप कहते हैं, फिर वह व्याधि दोष ( वात पित्त कफ ) सें बहुधा अप्रगट होवे । शंका-यदि वातादिक दोषोंसे अप्रगट होवेगी तो व्याधिका प्रगट होना असम्भव है क्योंकि कारण तो वातादिक दोष हैं । जब दोषहीं १ गूढलिंगं व्याधिमुपशयानुपशयाभ्यां बुध्येत इति । २ अभ्यङ्गस्नेहस्वेदाद्यैर्वातदोषो न शाम्यति । विकारस्तत्र विज्ञेयो दुष्टमत्रास्ति शोणितम् ॥ इति ॥