भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । (३) रोग जाननेके पांच उपाय हैं उनको कहते हैं- निदानं पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा । संप्राप्तिश्चेति विज्ञानं रोगाणां पञ्चधा स्मृतम् ॥ ४ ॥ रोगाणां विज्ञानं पञ्चधा स्मृतम् इत्यन्वयः ॥ निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और संप्राप्ति ये पांच प्रकार पृथक् पृथक् और समस्त व्याधियोंके बोधक होते हैं । इस प्रकार रोगोंका जानना मुनीश्वरोंने पांच प्रकारका कहा है ॥ इस श्लोकमें "उपशयस्तथा" यह जो पद धरा इसका यह आशय है कि, जैसे निदान, पूर्वरूप और रूपसे रोग जाना जाता है उसी प्रकार उपशयसे और संप्राप्तिसे भी रोग जाना जाता है "सम्प्राप्तिश्चेति" इस पदमें च और इतिके धरनेसे यह प्रयोजन है कि, रोग जाननेके इन पांचोंसे विशेष और उपाय नहीं है। अब कहते हैं कि, रोगोंका निदान संनिकृष्ट (समीप) और विप्रकृष्ट (दूर) इन भेदोंसे दो प्रकारका है। संनिकृष्ट-उसे कहते हैं कि, जैसे कुपित वातादिक ज्वरादिक रोगोंको प्रकट करे हैं और विप्रकृष्ट-उसे कहते हैं, हेमन्तऋतुमें संचित हुआ कफ वसन्त- ऋतुमें कुपित होता है। पूर्वरूप-उसे कहते हैं जैसे ज्वरमें आलस्यादि धर्म। रूप- उसे कहते हैं जैसे १८ वें श्लोकमें लिखा है-"स्वेदावरोध" इति अर्थात्-पसीनोंका अवरोध होना इत्यादिक। उपशय-उसे कहते हैं जैसे वातरोग तैल आदिके लगानेसे शान्त होता है। सम्प्राप्ति-उसे कहते हैं जैसे १० वें श्लोकमें लिखा है-"यथा दुष्टेन दोषेण" इत्यादि। शंका-क्यों जी ! ये पांच जो व्याधि जाननेके उपाय कहे इनमें एकहीसे रोगका निश्चय हो सकता है फिर माधवाचार्यने पांच प्रकार व्यर्थ क्यों लिखे ? क्योंकि पांचोंका प्रयोजन केवल रोगका जानना है। उत्तर- तुमने कहा सो ठीक है परन्तु इन पांचोंका पृथक् पृथक् प्रयोजन है, जैसे-निदानसे यह प्रयोजन है कि, जिस वस्तुके खानेसे या लगानेसे रोग प्रगट हो उसका त्याग करनेसे रोग नहीं बढे किन्तु उलटा शान्त ही होता है और पूर्वरूपके जाननेसे यह । प्रयोजन है, जैसे-सुश्रुतमें लिखा है कि, वातज्वरके पूर्वमें घृतपान करानेसे वात- ज्वरकी उत्पत्ति नहीं हो। रूपके जाननेसे प्रयोजन है कि, व्याधि अर्थात् रोगका साध्यासाध्य और कष्टसाध्यत्वै निश्चय होता है जैसे जिस रोगका अल्प रूप होवे वह १ अर्थात् नाडी नेत्र जिह्वा मलमूत्रादिकी परीक्षाओंसे रोगोंका ज्ञान यथार्थ नहीं होता। २ वातिकज्वरपूर्वरूपे घृतपानमिति तथा च साध्यासाध्यत्वमपि ज्ञायते। ३ कष्टसाध्यके लक्षण चरकमें लिखे हैं। यथा-निमित्तपूर्वरूपाणां रूपाणां मध्यमे बले। इति।