माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २१४ ) माधवनिदान । और पूज्य कहिये गौ आदिके मांस खानेसे दोष ( वात पित्त कफ ) कुपित होकर वंक्षणकी संधिमें अर्थात् वस्ति स्थानके समीप जिनको नल कहते हैं उनमें सूजनको प्रगट करे, उस सूजनके होनेसे ज्वर होय तथा सूजनमें पीडा होय, अंगोंमें अत्यन्त दाह होय, जिस मनुष्यके पहले फिरंग ( गरमी ) का रोग होकर शान्त होगया होय उसके यह बदका रोग होता है अथवा गरमीवाले पुरुषके लिंगमें व्रण घाव होय उसके यह बदरोग होता है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् अण्डवृद्धिनिदानं समाप्तम् ॥ अथ गलगण्डनिदानम् । निबद्धः श्वयथुर्यस्य मुष्कवल्लम्बते गले । महान्वा यदि वा ह्रस्वो गलगण्डं तमादिशेत् ॥ १ ॥ जिसके गलेमें अनुबंधयुक्त बडी अथवा छोटी अंडकोशके समान सूजन होकर लटके उसको गलगंड कहते हैं ॥ गलगंडकी सम्प्राप्ति । वातः कफश्चापि गले प्रदुष्टौ मन्ये समाश्रित्य तथैव मेदः । कुर्वन्ति गण्डं क्रमशः स्त्रिलिङ्गैः समन्वितं तं गलगण्डमाहुः ॥ २ ॥ गलेमें दुष्ट भये वात कफ और उसी प्रकार मेद गलेकी दोनों मन्यानाडियोंका आश्रय लेकर क्रमसे आप अपने लक्षणसंयुक्त गंड ( गोला ) उत्पन्न करै हैं उसको गलगंडरोग कहते हैं । यह रोग वात कफ और मेद् इन कारणोंसे तीन प्रकारका है। यह रोग अपने ही स्वभावसे पैत्तिक नहीं होय है, जैसे चातुर्थिक- ज्वर अपने प्रभावसे जंघोंमें कफका और मस्तकमें वातका प्रथम आता है इसमें भी पित्तका नहीं होय है, उसी प्रकार इस रोगमें भी जानो ॥ वातिक-गलगंडके लक्षण । तोदान्वितः कृष्णशिरावनद्धः श्यावोऽरुणो वा पवनात्मकस्तु । पारुष्ययुक्तश्चिरवृद्धिपाको यहच्छया पाकमियात्कदाचित् ॥ वैरस्यमास्यस्य च तस्य जन्तोर्भवेत्तथा तालुगलप्रशोषः ॥ ३ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA