माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २४६ ) माधवनिदान । जिस उपदंश करके लिंगका मांस गल गया हो और कृमि लिंगको खाय जावें केवल अण्डकोश मात्र रहजाय, उसको वैद्य त्याग दे ॥ असाध्य लक्षण । संजातमात्रे न करोति मूढः क्रियां नरो यो विषये प्रसक्तः । कालेन शोथक्रिमिदाहपाकैर्विशीर्णशिश्नो म्रियते स तेन ॥ ४ ॥ उपदंशके होतेही जो मूर्ख मनुष्य विषयमें आसक्त होकर समयपर इसका उप- चार नहीं करै उसका लिंग थोडे दिनमें सूजनयुक्त हो और कीडे पडें और उसमें दाह और पाकभी होय, पीछे वह गलजाय ऐसा रोगी मरजाय ॥ लिंगवर्त्तिके लक्षण । अंकुरैरिव सङ्घातैरुपर्युपरि संस्थितैः । क्रमेण जायते वर्त्तिस्ताम्रचूडशिखोपमा ॥ ५ ॥ कोशस्याभ्यन्तरे संधौ सर्वसंधिगतापि वा । लिङ्गवर्त्तिरिति ख्याता लिङ्गार्श इति चापरे ॥ ६ ॥ कुलित्थाकृतयः केचित्केचित्पद्मदलोपमाः । मेढ्रसन्धौ नृणां केचित्केचित्सर्वाश्रयाः स्मृताः ॥ ७ ॥ रुजादाहार्तिबहुलास्तृष्णातोदसमन्विताः । स्त्रीणां पुंसां च जायन्ते उपदंशाः सुदारुणाः ॥ ८ ॥ सुरगेकी चोटीके समान लिंगके ऊपर मांसके अंकुर एकके ऊपर एक प्रगट होयँ, कोषकी भीतरकी मणिमें अथवा सर्व सन्धियोंमें तो इस रोगको लिंगवर्त्ति कहते हैं और कोई लिंगार्श कहते हैं, यह त्रिदोषजन्य है । इसमें मांसके अंकुर कुलथीके समान और कोई पद्मदलके समान, किसीके अण्डकोशकी संधिमें किसीके सर्व आशयमें होते हैं और पीडा, दाह बहुत होय, प्यास, नोचनेकीसी पीडा होय, स्त्री पुरुषोंके यह उपदंश घोर पीडाकारक होते हैं। इसमें “कुलित्थाकृतयः” यहांसे लेकर “स्त्रीणां पुंसां च जायन्ते” यहां तक पाठ क्षेपक है, माधवका नहीं और स्त्रियोंके भी गरमीका रोग होय है यह मत सुश्रुतका है परन्तु यह आर्ष पाठ नहीं है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् उपदंशनिदानं समाप्तम् ॥
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