माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २९९ ) कफसे ऊंची और लम्बी गांठ कंठमें उत्पन्न होय उसके योगसे कंठमें प्राप्त ग्रास ( गस्सा ) उतरे नहीं, तथा उसमें कोई उपाय नहीं चले, इस रोगको वलय कहते हैं । इसको वैद्य त्याग देय ॥ बलासके लक्षण । गले तु शोथं कुरुतः प्रवृद्धौ श्लेष्मानिलौ श्वासरुजोपपन्नम् । मर्मच्छिदं दुस्तरमेनमाहुर्बलाससंज्ञं निपुणा विकारम् ॥ ४९ ॥ कुपित भये जो कफ वायु सो गलेमें सूजन उत्पन्न करें उससे श्वास होय तथा कंठ दूखे, इस मर्मभेद करनेवाले दुस्तर व्याधिको वैद्य बलास कहते हैं ॥ एकवृंदके लक्षण । वृत्तोन्नतोऽन्तः श्वयथुः सदाहः सकण्डुरोऽपाक्यमृदुर्गुरुश्च । नाम्नैकवृन्दः परिकीर्तितोऽसौ व्याधिर्बलासक्षतजप्रसूतः ॥ ५० ॥ गलेमें गोल, ऊंची, किंचित् दाहयुक्त, खुजानेवाली ऐसी सूजन होय, वह किंचित् पके और कुछ नरम होय, तथा भारी होय इसका नाम एकवृन्द है । यह व्याधि कफरक्तसे होय है ॥ वृन्दके लक्षण । समुन्नतं वृत्तममन्ददाहं तीव्रज्वरं वृन्दमुदाहरन्ति । तं चापि पित्तक्षतजप्रकोपाद्विद्यात्सतोदं पवनात्मकं तु ॥ ५१ ॥ गलेमें गोल ऊंची तीव्रदाह तथा ज्वरयुक्त जो सूजन होय उसको वृन्द कहते हैं, यह भी रक्त पित्तके कोपसे होय है, इसमें वायुके संबंध होनेसे सुईके नोचनेकीसी पीडा होय । शंका-क्यों जी ! कंठके १७ रोग कहे हैं और वृन्दको मिलायकर अठारह रोग हुए तो कहिये कि, सत्रहकी संख्यामें भेद हुआ ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु तुल्यस्थान आकृति होनेसे एकवृन्दका ही भेद वृन्दरोग जानना ऐसे माननेसे संख्यामें विरोध नहीं पडे, यद्यपि एकवृन्द कफरक्तज है और वृन्दरोग पित्तरक्तज कहा है, तथापि जैसे वृन्दको चोंटनी होने करके वातात्मकत्व कहा है तो भी एकवृन्दकी अवस्थाविशेष होनेसे वृन्दको एकवृन्दके साथ ग्रहण करा है, जैसे कामलाके लक्षणसे भिन्न भी है तथापि हलीमक कामलाकाही भेद जानना और भोजने भी इसको एकवृन्दका ही भेद कहा है । गदाधर कहता है कि, छंदोनुरोधके निमित्त एकवृन्द शब्दके एक शब्दका लोप कर वृन्दशब्दही मूलमें धरा इससे वृन्द और एक वृन्द ये दोनों एकही हैं ॥ १ श्लेष्मरक्तसमुत्थानमेकवृन्दं विभावयेत् । तुल्यस्थानाकृतिर्वृंदो वृंदजो रक्तपित्तजः ॥ इति ॥