भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( ३१३ ) अथ नेत्ररोगनिदानम् । नेत्ररोगका कारण । उष्णाभितप्तस्य जलप्रवेशाद्दूरेक्षणात्स्वप्नविपर्ययाच्च । स्वेदाद्रजोधूमनिषेवणाच्च छर्देर्विघाताद्वमनातियोगात् ॥ १ ॥ द्रवान्नपानातिनिषेवणाच्च विण्मूत्रवातक्रमनिग्रहाच्च । प्रसक्तसंरोदनशोककोपाच्छिरोभिघातादतिमद्यपानात् ॥ २ ॥ तथा ऋतूनां च विपर्ययेण क्लेशाभिघातादतिमैथुनाच्च । बाष्पग्रहात्सूक्ष्मनिरीक्षणाच्च नेत्रे विकाराञ्जनयंति दोषाः ॥ ३ ॥ गरमीसे तप्त होकर जलमें प्रवेश ( स्नानादि करना ऐसा करनेसे शीतलतासे शरीर व्याप्त होकर शरीरकी गरमी ऊपर चढकर नेत्रके तेजको पराभव करनेसे नेत्ररोग उत्पन्न होता है), दूरकी वस्तुको देखनेसे, दिनमें सोने और रात्रिमें जागनेसे नेत्रमें पसीना जानेसे, बाफ लगनेसे, नेत्रोंमें धूल जानेसे, धुआं जानेसे, वमनके वेगको रोकनेसे, बहुत वमन (रद्द) होनेसे, पतले अन्नपानके अत्यन्त सेवन करनेसे, विष्ठा, मूत्र और अधोवायु इनके वेगको धीरे २ निग्रह (कहिये वेग धारण करने) से, निरन्तर रुदन करनेसे, शोकसे, कोपसे, मस्तकमें चोट लगनेसे, अतिमद्य पान करनेसे, उसी प्रकार ऋतुमें विपर्यय अर्थात् शीत कालमें गरमी और गरमीमें शीतकाल होनेसे, क्लेश कहिये कामादिक दुःख उससे, अभिघात कहिये दुःख होनेसे, अतिमैथुन करनेसे, अश्रुपातके वेग धारण करनेसे और सूक्ष्म पदार्थके अवलोकन करनेसे वातादिदोष नेत्रोंमें रोग पैदा करते हैं ॥ सुश्रुतमें नेत्ररोगकी सम्प्राप्ति इस प्रकार लिखी है- शिरानुसारिभिर्दोषैर्विगुणैरूर्ध्वमाश्रितैः । जायन्ते नेत्रभागेषु रोगाः परमदारुणाः ॥ ४ ॥ १ षट्सप्ततिर्नेत्ररोगा भवन्ति, यदाह सुश्रुतः-ततास्त्रिभिस्त्रिशदुक्तास्ते कफेनाधिकास्त्रयः । रक्तजाः षोडश प्रोक्ताः सर्वजाः पंचविंशतिः । बाह्यौ पुनद्वौ च तथा रोगाः षट्सप्ततिः स्मृताः॥ नेत्रप्रमाणं च सुश्रुतेनोक्तम्-द्विच्यङ्गुलंबाहुल्यं स्वांगुष्ठोदरसम्मितम् । द्वयंगुलं सर्वतः सार्धं भिषङ्नयनबुद्बुदम् ॥