माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ३२७ ) अभिघातज लिंगनाश दो प्रकारका है-एक निमित्तजन्य, दूसरा अनिमित्तजन्य, तिनमें शिरोभितापकरके ( विषवृक्षके फलसे मिले पवनका मस्तकमें स्पर्श होनेसे ) होय उसको निमित्तजन्य कहते हैं, इसमें रक्ताभिष्यंदके लक्षण होते हैं ॥ अनिमित्तके लक्षण । सुरर्षिगंधर्वमहोरगाणां सन्दर्शनेनापि च भास्करस्य । हन्येत दृष्टिर्मनुजस्य यस्य स लिंगनाशस्त्वनिमित्तसंज्ञः ॥ तत्राक्षि विस्पष्टमिवावभाति वैदूर्यवर्णा विमला च दृष्टिः ॥ ६६ ॥ देव, ऋषि, गंधर्व, महासर्प और सूर्य इनके संमुख दृष्टिको लगाकर ( टकटकी लगाकर ) देखनेसे जिस मनुष्यकी दृष्टि नष्ट होय, उसको अनिमित्तलिंगनाश कहते हैं, इस रोगमें नेत्र स्वच्छ दीखते हैं और दृष्टि वैदूर्यमणिके समान स्वच्छ कहिये श्यामवर्ण होय । अब कहते हैं कि, देवादिक भौतिक इन्द्रियोंको नहीं बिगाड़ें, परन्तु उनकी शक्तिका नाश करते हैं, सो चरकमें लिखा है ॥ अर्मरोग ५ प्रकारका है । प्रस्तार्यर्म तनु स्तीर्णं श्यावं रक्तनिभं सिते । सश्वेतं मृदु शुक्रार्म शुक्रे तद्वर्द्धते चिरात् ॥ ६७ ॥ पद्माभं मृदु रक्तार्म यन्मांसं चीयते सिते । पृथु मृद्धधिमांसार्म बहलं च यकृन्निभम् । स्थिरं प्रस्तारि मांसाढ्यं शुष्कं स्नाव्यर्म पंचमम् ॥ ६८ ॥ नेत्रोंके सफेद भागमें पतला विस्तीर्ण श्यामवर्ण तथा लाल ऐसा जो मांस बढ़े उसको प्रस्तारि अर्मरोग कहते हैं । शुक्लभागमें सफेद मृदुमांस बहुत दिनमें बढ़े उसको शुक्रार्म कहते हैं । कमलके समान लाल तथा मृदु मांस जो बढ़े उसको रक्तार्म कहते हैं । जो मांस विस्तीर्ण स्थूल कलेजाके समान ( कुछ काला लाल ) दीखे उसको अधिमांसार्म कहते हैं । जो कठिन तथा फैलनेवाले स्त्रावरहित मांस बढ़े, उसको स्नाव्यर्म कहते हैं । विदेहने कहा भी है ॥ १ देवादयोऽष्टौ हि महाप्रभावा न दूषयेयुः पुरुषस्य देहम् । विशंत्यदृश्यास्तरसा यथैव च्छाया तयोर्द्पणसूर्यकांतौ ॥ २ प्रस्तारिणोऽर्मणः स्रावं निरुणद्धि यथाऽनिलः । विना स्रावं विशुष्यं यत्स्नाव्यर्मेतीति तद्विदः ॥