भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 377

भाषाटीकासमेत । ( ३५९ ) अब सर्पोंके भेद कहते हैं- तहां प्रथम दवकिर सर्पोंके भेद कहते हैं-कृष्णसर्प, महाकृष्ण, कृष्णोदर, श्वेत- कपोल, बलाहक, महासर्प, शंखपाल, लोहिताक्ष, गवेधुक, परिसर्प, खंडफण, ककुद- पद्म, महापद्म, दर्भपुष्प, दधिमुख, पुंडरीक, भ्रकुटीमुख, विष्किर, पुष्पामिकीर्ण, गिरिसर्प, ऋतुसर्प, श्वेतोदर, महाशिरा, अलगर्द, आशीविष ये दवकिर जातिके सर्प हैं । आदर्शमंडल, श्वेतमण्डल, रक्तमण्डल, चित्रमण्डल, पृषत, रोध्रपुष्प, मिलिंदक, गोनस, वृद्धगोनस, पनस, महापन्स, वेणुपत्रक, शिशुफ, बभ्रु, कषाय, कलुष, पारा वत, हस्ताभरण, चित्रक, एणीपद ये मण्डली जातिके सर्प हैं । पुण्डरीक, राजिचित्र, अंगुलरांजि, बिन्दुराजि, कर्दमक, तृणतोषुक, संसर्पक, श्वेतहनु, दर्भपुष्प, शक्रक, गोधूमक, किक्कसाद ये राजिल जातिके सर्प हैं। गुलगोली, शूकपत्र, अजगर, दिव्यक, वर्षाहिक, पुष्पशकली, ज्योतीरथ, क्षीरिक, पुष्पक, अहिपताक, अन्धाहिक, गौराह्निक, वृक्षेशय इतने सर्प हीनविष जानने । अब कहते हैं कि, द्वयंतर (वर्णसंकर) सर्पभी तीन प्रकार हैं-माकूली, पोटगल, स्निग्धरांजि । तहां कृष्णसप जातिकी सर्पिणी और गोनसजातिके सर्पसे जो प्रगट हो वह माकुली कहाता है । इसी प्रकार राजिलसर्प और गोनसी जातिकी सर्पिणीसे जो प्रगट सो पोटगलसर्प कहाता है । इसी प्रकार कृष्णसर्प और राजपती जातिकी सर्पिणीसे जो प्रगटहुए सर्प उनको स्निग्धराजी कहते हैं। तहां नाकुलीसर्पमें पिताकासा विष (जहर) होय है और पोटगल स्निग्धराजी इन दोनोंमें माताकासा विष होता है। इन तीनोंके विप- रीततासे दिव्येलक, लोध्रपुष्पक, राजिचित्रक, पोटगल, पुष्पाभिकीर्ण, दर्भपुष्प, वेल्लितक इन सात जातिके सर्प प्रगट होते हैं। इनमें भी प्रथमके तीन सर्पोंमें राजिल सर्पोंकासा विष होता है और शेषोंमें मण्डली सर्पोंकासा जानना। ऐसे सब मिलाकर अस्सी प्रकारके सर्प हैं। इनमें भी जिनके नेत्र, जीभ, मुख, शिर, बडे हों वह पुरुष जानने और छोटे होयँ वह स्त्री जाननी और जिनमें दोनों स्त्री पुरुषके लक्षण मिलते होयँ तथा मन्द विषवाले क्रोधरहित हों उनको नपुंसक जानना ॥ भोगिप्रभृतिसर्पके काटनेपर वातादिकोंके लक्षण । दंशो भोगिकृतः कृष्णः सर्ववातविकारकृत् । पीतो मण्डलिजः शोथो मृदुः पित्तविकारवान् ॥ १७ ॥ राजिलोत्थो भवेद्दंशः स्थिरशोथश्च पिच्छिलः । पाण्डुः स्निग्धोऽतिसान्द्रासृक् सर्वश्लेष्मविकारवान् ॥ १८ ॥ भोगी अथवा राजिल दवकर सर्पके काटनेसे काटनेकी ठौर काली हो और सर्व वातके विकार करे। इसके सुश्रुतमें अवगुण लिखे हैं। मण्डली सर्पके काटनेकी ठौर