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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

भाषाटीकासमेत । ( ३५९ ) अब सर्पोंके भेद कहते हैं- तहां प्रथम दवकिर सर्पोंके भेद कहते हैं-कृष्णसर्प, महाकृष्ण, कृष्णोदर, श्वेत- कपोल, बलाहक, महासर्प, शंखपाल, लोहिताक्ष, गवेधुक, परिसर्प, खंडफण, ककुद- पद्म, महापद्म, दर्भपुष्प, दधिमुख, पुंडरीक, भ्रकुटीमुख, विष्किर, पुष्पामिकीर्ण, गिरिसर्प, ऋतुसर्प, श्वेतोदर, महाशिरा, अलगर्द, आशीविष ये दवकिर जातिके सर्प हैं । आदर्शमंडल, श्वेतमण्डल, रक्तमण्डल, चित्रमण्डल, पृषत, रोध्रपुष्प, मिलिंदक, गोनस, वृद्धगोनस, पनस, महापन्स, वेणुपत्रक, शिशुफ, बभ्रु, कषाय, कलुष, पारा वत, हस्ताभरण, चित्रक, एणीपद ये मण्डली जातिके सर्प हैं । पुण्डरीक, राजिचित्र, अंगुलरांजि, बिन्दुराजि, कर्दमक, तृणतोषुक, संसर्पक, श्वेतहनु, दर्भपुष्प, शक्रक, गोधूमक, किक्कसाद ये राजिल जातिके सर्प हैं। गुलगोली, शूकपत्र, अजगर, दिव्यक, वर्षाहिक, पुष्पशकली, ज्योतीरथ, क्षीरिक, पुष्पक, अहिपताक, अन्धाहिक, गौराह्निक, वृक्षेशय इतने सर्प हीनविष जानने । अब कहते हैं कि, द्वयंतर (वर्णसंकर) सर्पभी तीन प्रकार हैं-माकूली, पोटगल, स्निग्धरांजि । तहां कृष्णसप जातिकी सर्पिणी और गोनसजातिके सर्पसे जो प्रगट हो वह माकुली कहाता है । इसी प्रकार राजिलसर्प और गोनसी जातिकी सर्पिणीसे जो प्रगट सो पोटगलसर्प कहाता है । इसी प्रकार कृष्णसर्प और राजपती जातिकी सर्पिणीसे जो प्रगटहुए सर्प उनको स्निग्धराजी कहते हैं। तहां नाकुलीसर्पमें पिताकासा विष (जहर) होय है और पोटगल स्निग्धराजी इन दोनोंमें माताकासा विष होता है। इन तीनोंके विप- रीततासे दिव्येलक, लोध्रपुष्पक, राजिचित्रक, पोटगल, पुष्पाभिकीर्ण, दर्भपुष्प, वेल्लितक इन सात जातिके सर्प प्रगट होते हैं। इनमें भी प्रथमके तीन सर्पोंमें राजिल सर्पोंकासा विष होता है और शेषोंमें मण्डली सर्पोंकासा जानना। ऐसे सब मिलाकर अस्सी प्रकारके सर्प हैं। इनमें भी जिनके नेत्र, जीभ, मुख, शिर, बडे हों वह पुरुष जानने और छोटे होयँ वह स्त्री जाननी और जिनमें दोनों स्त्री पुरुषके लक्षण मिलते होयँ तथा मन्द विषवाले क्रोधरहित हों उनको नपुंसक जानना ॥ भोगिप्रभृतिसर्पके काटनेपर वातादिकोंके लक्षण । दंशो भोगिकृतः कृष्णः सर्ववातविकारकृत् । पीतो मण्डलिजः शोथो मृदुः पित्तविकारवान् ॥ १७ ॥ राजिलोत्थो भवेद्दंशः स्थिरशोथश्च पिच्छिलः । पाण्डुः स्निग्धोऽतिसान्द्रासृक् सर्वश्लेष्मविकारवान् ॥ १८ ॥ भोगी अथवा राजिल दवकर सर्पके काटनेसे काटनेकी ठौर काली हो और सर्व वातके विकार करे। इसके सुश्रुतमें अवगुण लिखे हैं। मण्डली सर्पके काटनेकी ठौर

( ३६० ) माधवनिदान ।

( ३६० ) माधवनिदान ।

पीली सूजनयुक्त और नरम और पित्तके विकार करें और राजिलका दंश चिकना पीले रंगका वा गाढा तथा उसकी सूजन कठोर होय, उसमें गाढा रुधिर निकले तथा सब प्रकारके कफविकार हों ये लक्षण राजिलसर्पके काटनेके हैं ॥ विशिष्टदेशमें तथा विशिष्टनक्षत्रमें काटनेके असाध्य लक्षण । अश्वत्थदेवतायतनश्मशानवल्मीकसंध्यासु चतुष्पथेषु । याम्ये च दष्टाः परिवर्जनीया ऋक्षे शिरामर्मसु ये च दष्टाः ॥१९॥ पीपलके वृक्षके नीचे, देवताओंके मन्दिरमें, मसानमें, बँबईमें सन्ध्याकाल ( प्रातः और सायंकालकी सन्धि ), चौराहेमें, भरणी नक्षत्रमें, चकारसे आर्द्रा, आश्लेषा, मूल, मघा, कृत्तिका ये नक्षत्रोंमें शिरानाडीके मर्ममें सर्पके काटनेसे मनुष्य बचे नहीं ॥ गर्मी होनेसे विषका जोर होता है उसके लक्षण । दर्वीकराणां विषमाशु हंति सर्वाणि चोष्णे द्विगुणीभवन्ति । दर्वीकर ( नाग ) का विष तत्काल प्राणनाश करे और विष गर्मीके योगसे दुगुना जोर करते हैं ॥ अजीर्णपित्तातपपीडितेषु बालेषु वृद्धेषु बुभुक्षितेषु । क्षीणक्षते मेहिनि कुष्ठदुष्टे रूक्षेऽबले गर्भवतोषु चापि ॥ २० ॥ अजीर्ण पित्त और सूर्यकी घाम इनसे पीडित, बालक, वृद्ध, भूखा, क्षीण होगया हो, उरःक्षती, प्रमेहवाला, कोढी, रूखा, निर्बल और गर्भिणी इनको सर्पके काटनेसे तत्काल मृत्यु हो ॥ सर्पके काटनेसे असाध्य लक्षण । शस्त्रक्षते यस्य न रक्तमस्ति राज्यो लताभिश्च न सम्भवंति । शीताभिरद्भिश्च न रोमहर्षो विषाभिभूतं परिवर्जयेत्तम् ॥ २१ ॥ जिसको विषका अमल चढ गया हो उसके शस्त्रके घाव करनेसे रुधिर निकले नहीं अथवा चाबुक मारनेसे अंगमें उपडे नहीं अथवा शीतल पानी अंगपर डालनेसे रोमांच न हों उस मनुष्यका जहर उतारनेका उद्योग न करें ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । जिह्मं मुखं यस्य च केशशातो नासावसादश्च सकंठभंगः । रक्तः सकृष्णः श्वयथुश्च दंशे हन्वोः स्थिरत्वं च विवर्जनीयः ॥२२॥ जिसका मुख टेढा और स्तब्ध हो जाय, केश ( बाल ) स्पर्श करनेसे टूट २ कर गिर पडें, नाककी हड्डी टेढी हो जाय, नाड नीचेको झुक पडे, ऊंची न होय और

काटनेकी जगह सूजन होय तथा वह दंश स्थान लाल अथवा काला होय तथा

भाषाटीकासमेत । ( ३६१ ) काटनेकी जगह सूजन होय तथा वह दंश स्थान लाल अथवा काला होय तथा स्थिर होय उस रोगीको त्यागदेय ॥ वर्तिर्घना यस्य निरेति वक्त्राद्रक्तं स्रवेदूर्ध्वमधश्च यस्य । दंष्ट्राभिघाताश्चतुरस्य यस्य तं चापि वैद्यः परिवर्जयेत्तु ॥ २३ ॥ उन्मत्तमत्यर्थमुपद्रुतं वा हीनस्वरं चाप्यथवा विवर्णम् । सारिष्टमत्यर्थमवेगिनं च जह्यान्नरं तत्र न कर्म कुर्यात् ॥ २४ ॥ जिसके मुखसे गाढी लारकी बत्ती गिरे और नाक मुखके मार्ग तथा गुदाके मार्गसे रुधिर निकले और जिसके चार दांत लगे होंय उसको त्याग देय, अत्यन्त उन्मत्त हो गया हो अथवा ज्वर अतिसार आदि उपद्रवोंकरके पीडित हो, बोलनेमें असमर्थ हो जिसके देहका वर्ण · काला हो गया हो, नासाभंगादि अरिष्टयुक्त, जिसका वेग ( लहर ) आवे नहीं, ऐसा अथवा विष्ठा मूत्रादि वेगरहित ऐसे विषवाले पुरुषको त्याग देय अर्थात् उसका उपचार चिकित्सा न करे ॥ दूषित विषके लक्षण । जीर्णं विषघ्नौषधिभिर्हतं वा दावाग्निवातातपशोषितं वा । स्वभावतो वा गुणविप्रहीनं विषं हि दूषीविषतामुपैति ॥ २५ ॥ जो विष पुराना हो गया हो अथवा विषकी नाशक औषधसे हतवीर्य होनेसे अथवा दावाग्नि, वायु, गरमी, अग्नि इनसे सूखी हुई अथवा जो स्वभावसे गुणरहित हैं ऐसे स्थावर जंगमात्मक विष दूषीविषताको प्राप्त होते हैं ॥ दूषीविषके उपद्रव । वीर्याल्पभावान्न निपातयेत्तत्कफान्वितं वर्षगणानुबंधि । तेनार्दितो भिन्नपुरीषवर्णो विगंधिवैरस्ययुतः पिपासी ॥ २६ ॥ मूच्छों भ्रमं गद्गदवाग्वमित्तवं विचेष्टमानोऽरतिमाप्नुयाद्वा ॥ २७ ॥ वे दूषीविष अल्पवीर्य होनेसे मारक नहीं होते, किन्तु कफसम्बन्ध होनेसे उष्णादि गुण मन्द होकर बहुत वर्षपर्यंत गर ( विष ) रूप होकर रहते हैं । उस विषसे पीडित हुए पुरुषके दस्त होते हैं उसका वर्ण पलट जाय, उसके मुखसे बुरी दुर्गंध निकले, उसके मुखका स्वाद जाता रहे, प्यास लगे, मूर्च्छा आवे, भ्रम होय, वह बोलते समय अक्षर चबावे, वमन करे, विरुद्ध चेष्टा करे और उसको चैन नहीं पडे ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३६२ ) माधवनिदान।

( ३६२ ) माधवनिदान। स्थानभेदकरके उसके विशिष्ट लक्षण। आमाशयस्थे कफवातरोगी पक्वाशयस्थेऽनिलपित्तरोगी । भवेत्समुद्धस्तशिरोरुहांगो विलूनपक्षस्तु यथा विहंगः ॥ २८ ॥ पूर्वोक्त विष आमाशयमें स्थित होनेसे कफवातजन्य रोग होय और पक्वाशयमें आनेसे वातपित्तजन्य विकार होय तथा उस रोगीके मस्तकके और सब देहके बाल उडकर पंखरहित पक्षी ( पखेरू ) के समान हो जाय ॥ निद्रा गुरुत्वं च विजृम्भणं च विश्लेषहर्षावथवांगमर्दः । ततः करोत्यन्नमदाविपाकावरोचकं मण्डलकोठजन्म ॥ २९ ॥ मांसक्षयं पादकरप्रशोथं मूर्च्छां तथा छर्द्दिमथातिसारम् । दूषीविषं श्वासतृषौ च कुर्य्याज्ज्वरप्रवृद्धिं जठरस्य चापि ॥ ३० ॥ उन्मादमन्यज्जनयेत्तथान्यद्दाहं तथान्यत्क्षपयेच्च शुक्रम् । गाद्गद्यमन्यज्जनयेच्च कुष्ठं तांस्तान्विकारांश्च बहुप्रकारान् ॥ ३१ ॥ दूषीविषके प्रभावसे निद्रा, भारीपन, जंभाई, अंग शिथिल, रोमांच, अंगोंका टूटना ये प्रथम होकर तदनन्तर भोजनके उपरांत हर्ष होना, अन्न पचे नहीं, अरुचि, देहमें चकत्ते तथा गांठ उठें, मांसक्षय, हाथपैरोंमें सूजन, मूर्च्छा, वमन, दस्त, श्वास, प्यास, ज्वर, उदररोग ये विकार होयँ तथा अनेक प्रकारके रोग होयँ सो इस प्रकार-किसीसे उन्माद रोग होय और किसीसे दाह होय, कोई नपुंसकत्व करे और कोई गद्गदवाणी करे, कोई कुष्ठरोग करे और विसर्प विस्फोट आदि अनेक प्रकारके रोग होयँ ॥ दूषीविषकी निरुक्ति । दूषितं देशकालान्नदिवास्वप्नैरभीक्ष्णशः । यस्मात्संदूषयेद्धातूंस्तस्माद्दूषीविषं स्मृतम् ॥ ३२ ॥ देश काल और अन्न और दिवा निद्रा इनसे वारंवार दूषित हुए विष धातु- ओंको दुष्ट करे, इसीसे इसको दूषीविष कहते हैं । दूषीविष दो प्रकारका है- एक कृत्रिम और दूसरा गरसंज्ञक । जो विष पदार्थोंसे बनाया जाय वह कृत्रिम और निर्विष द्रव्योंके संयोगसे होय उसको गर कहते हैं । सो वृद्धकाश्यपने और चरकने लिखा है ॥ १ वृद्धकाश्यपः-संयोगजं तु द्विविधं तृतीयं विषमुच्यते। गरः स्यादविषस्तत्र सविषं कृत्रिमं यतः ॥ २ चरकः-दंष्ट्राविषे मूलविषे सगरे कृत्रिमे विषे । इति ॥

भाषाटीकासमेत । ( ३६३ ) इन दोनों विषोंका लक्षण । सौभाग्यार्थं स्त्रियः स्वेदरजोनानांगजान्मलान् । शत्रुप्रयुक्तांश्च गरान्प्रयच्छन्त्यन्नमिश्रितान् ॥ ३३ ॥ तैः स्यात्पाण्डुः कृशोऽल्पाग्निर्ज्वरश्चास्योपजायते । मर्मप्रधमनाध्मानं हस्तयोः शोथलक्षणम् ॥ ३४ ॥ जाठरं ग्रहणीदोषो यक्ष्मगुल्मक्षयज्वराः । एवंविधस्य चान्यस्य व्याधेर्लिङ्गानि निर्दिशेत् ॥ ३५ ॥ घरका अधिकार स्वाधीन करनेको दुष्ट जनोंके कहनेसे पतिको वशीकरण कर- नेके निमित्त स्त्री अपने पतिको पसीना, आर्तव ( रजोदर्शनका रुधिर ) तथा अपनी देहके अनेक अंगोंका मैल अन्नमें मिलाकर खिलाती हैं । अथवा शत्रुकृत विषके प्रयोग अर्थात् वैरी विष अथवा विषके अन्न तथा जलमें मिलाकर खवाय देय, इससे मनुष्य पीला और कृश होय, उसकी अग्नि मन्द होय, सब मर्मोंमें पीडा, पेट फूलजाय, हाथोंमें सूजन, उदररोग, ग्रहणीरोग, राजयक्ष्मा, गुल्म, क्षय, ज्वर इन रोगोंके तथा इसी प्रकारके रोगोंके लक्षण होते हैं । दूषीविषके साध्यादि लक्षण । साध्यमात्मवतः सद्यो याप्यं संवत्सरोषितम् । दूषीविषमसाध्यं तु क्षीणस्याहितसेविनः ॥ ३६ ॥ दूषीविष पेटमें जानेसे तत्काल उपाय करनेसे और रोगी पथ्यसे रहनेसे साध्य है । और वर्ष दिन व्यतीत हो जाय तो याप्य जानना । और क्षीण तथा अपथ्य सेवन करनेवालेके असाध्य होय ॥ लूताविषकी उत्पत्ति । यस्माल्लूनं तृणं प्राप्ता मुनेः प्रस्वेदबिंदवः । तस्माल्लूताः प्रभाष्यन्ते संख्यया तास्तु षोडश ॥ ३७ ॥ विश्वामित्रराजा वसिष्ठकी कामधेनु जबरदस्ती लेकर चला, उस समय वसिष्ठ- जीको क्रोध आया, उससे ललाटमें पसीनेके बिंदु निकले, सो समीप जो कटे तृण गौके चरनेके अर्थ पडे थे उनपर वे बिंदु पडे, इसीसे लूता ( मकडी ) प्रगट हुई, इन मकडियोंकी सोलह जाति हैं । इन सोलहोंके भी दो भेद हैं एक कृच्छ्र- साध्य दूसरी असाध्य ॥

( ३६४ ) माधवनिदान ।

( ३६४ ) माधवनिदान । उनके काटनेके सामान्य लक्षण । ताभिर्दष्टे दंशकोथः प्रवृत्तिः क्षतजस्य च । ज्वरो दाहोऽतिसारश्च गदाः स्युश्च त्रिदोषजाः ॥ ३८ ॥ पिडिका विविधाकारा मण्डलानि महांति च । शोथा महान्तो मृदवो रक्तश्यावाश्चलास्तथा ॥ सामान्यं सर्वलूतानामेतद्दंशस्य लक्षणम् ॥३९॥ उन मकडियोंके काटनेसे वह स्थान सडे और उसमेंसे रुधिर बहे, ज्वर, दाह अतिसार और त्रिदोषज तथा अनेक प्रकारके फोडे, बडे बडे चकत्ते नरम लाल काली नीली और चञ्चल ऐसी सूजन होय इत्यादि लक्षण होते हैं, इस प्रकार सब लूताओंके सामान्य लक्षण जानने ॥ दूषीविषलूताके काटनेके लक्षण । दंशमध्ये तु यत्कृष्णं श्यावं वा जालकावृतम् ॥ ४० ॥ ऊर्ध्वाकृति भृशं पाकं क्लेदकोथज्वरान्वितम् । दूषीविषाभिर्लूताभिस्तं दष्टमिति निर्दिशेत् ॥ ४१ ॥ जिस दंशका मध्यभाग काला अथवा नीला अथवा हरा तथा जालके सदृश ऊंचा होकर शीघ्र पके तथा उसमेंसे दुर्गन्धयुक्त लस बहे, उसमें ज्वर होय उसको दूषीविष अथवा लूताका काटा हुआ जानना । प्राणहरलूताके लक्षण । सर्पाणामेव विण्मूत्रशवकोथसमुद्भवाः । दूषीविषाः प्राणहरा इति संक्षेपतो मताः ॥ ४२ ॥ शोथाः श्वेताऽसिता रक्ताः पीताः सपिडिका ज्वराः । प्राणान्तिकाभिर्जायन्ते दाहहिक्काशिरोग्रहाः ॥ ४३॥ सर्पोंके मलमूत्रसे अथवा मरे हुए सर्पके सडजानेसे जो दूषीविषके कीडे उत्पन्न होयँ वे प्राण हरनेवाले होते हैं, उनका काटा हुआ स्थान सूज जावे तथा वह सफेद काला लाल पीला होय और फुन्सी हो जायँ और रोगीको ज्वर आवे, दाह होय, हिचकी आवे, मस्तकमें शूल होय ॥ दूषीविषाखुलक्षण । आदंशाच्छोणितं पाण्डु मण्डलानि ज्वरोऽरुचिः । लोमहर्षश्च दाहश्चाप्याखुदूषीविषार्दिते ॥ ४४ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ३६५ ) विषैले आखु ( मूसे ) के काटनेसे पीला रुधिर निकले, देहमें गोल चकत्ते उठें, ज्वर होय, अरुचि होय, रोमांच और दाह होय, ये मूसेके काटनेके विषपीडित मनुष्यके लक्षण हैं ॥ प्राणहरमूषकविषके लक्षण । मूर्च्छाऽङ्गशोथो वैवर्ण्यं क्लेदो मन्दश्रुतिर्ज्वरः । शिरोगुरुत्वं लालासृक्छर्दिश्वासाध्यमूषकैः ॥ ४५ ॥ जिस मूसेके काटनेसे मूर्च्छा, मूसेके आकार सूजन, देहमें विवर्णता, क्लेद, मन्द सुनाई दे, ज्वर, मस्तक भारी, लार और रुधिर इनकी रद होय ये लक्षण प्राणहर्त्ता मूसेके असाध्य हैं ॥ कृकलास ( सरट ) के काटेके लक्षण । कार्ष्ण्यं श्यावत्वमथवा नानावर्णत्वमेव च । व्यामोहो वर्चसो भेदो दष्टे स्यात्कृकलासकैः ॥ ४६ ॥ सरटके काटनेसे देहका वर्ण काला अथवा नीला हरा तथा अनेक प्रकारका होय तथा उस रोगीको भ्रांति और अतिसार होय ॥ वृश्चिकविषके लक्षण । दहत्यग्निरिवाऽदौ तु भिनत्तीवोर्ध्वमाशु वै । वृश्चिकस्य विषं याति पश्चाद्दंशेऽवतिष्ठति ॥ ४७ ॥ बिच्छूके काटनेसे उस स्थानमें प्रथम अग्निसी चले पीछे ऊपरको चढे पीछे काटनेकी जगह फटनेकीसी पीडा होय ॥ अब कहते हैं कि, विच्छू मन्दविष, मध्य- विष, महाविषके भेदसे तीन प्रकारका है । तिनमें जो गौके गोबरसे प्रगट होय वह मन्दविष हैं और काठ ईंट इनसे प्रगट होय वह मध्यविष हैं और जो सर्पकी सडी देहसे प्रगट होय वह अथवा अन्य विषवाली वस्तुओंसे प्रगट होय वह विच्छू महा- विषवाला होता है, मन्दविषवाले बारह प्रकारके हैं और मध्यविषवाले तीन प्रकारके हैं और महाविषवाले पंद्रह प्रकारके हैं, ऐसे सब मिलकर तीस प्रकारके बिच्छू हैं । कोई आचार्य २७ प्रकारके कहते हैं । कृष्ण, श्याव, कर्बुर ( विचित्रवर्ण ), पीत, गोमूत्राभ, कर्कश, मेचक, श्वेत, लाल, रोमश, शाद्वलाभ, रक्त ये बारह मन्दवीर्य हैं, इनके काटनेसे पीडा, कंप, देहका स्तंभ, काले रुधिरका निकलना इत्यादि रोग होते हैं । रक्तोदर, पित्तोदर, कपिलोदर ये तीन मध्य विषवाले विच्छू हैं, इनके काटनेसे जीभमें सूजन, भोजनका न होना, घोर मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं। श्वेत, चित्र, श्यामल, लोहिताभ, रक्त, श्वेत, रक्तोदर, नीलोदर, रक्त, पीत, नीलपीत, रक्तनील, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १६६ ) माधवनिदान ।

( १६६ ) माधवनिदान । नीलशुक्र, रक्तबभ्रु, एकपर्वा, उपपर्वा ये घोर विषवाले १५ बिच्छू हैं। इनके काट- नेसे सर्पके समान वेग, फोडोंकी उत्पत्ति, भ्रांति, दाह, ज्वर, नाक कान आदिके छिद्रोंसे काला रुधिर निकले इसीसे शीघ्र प्राणत्याग होवे ॥ वृश्चिकविषके असाध्य लक्षण । दष्टोऽसाध्यस्तु हृद्घ्राणरसनोपहतो नरः । मांसैः पतद्भिरत्यर्थं वेदनात जहात्यसून् ॥ ४८ ॥ हृदय, नाक, जीभ इनमें बिच्छूके काटनेसे मांस गले, अत्यन्त वेदना होकर मनुष्य मरे ॥ कणभदष्टके लक्षण । विसर्पः श्वयथुः शूलं ज्वरश्छर्दिरथापि वा । लक्षणं कणभैर्दष्टे दंशश्चैवं विशीर्यते ॥ ४९ ॥ कणभ एक जातिका कीडा होता है उसके काटनेसे विसर्प, सूजन, शूल, ज्वर, वमन ये लक्षण होते हैं और वह काटनेका स्थान गलजाय ॥ अब कहते हैं कि, त्रिकंटक, कुणी, हस्तीकक्ष, अपराजित ये कणभकीडाके चार भेद हैं। इनके काट- नेसे पूर्वोक्त रोग होयँ और अंगोंका टूटना, देहमें भारीपन और काटनेकी ठौर काली होजाय ये लक्षण विशेष होयँ ॥ उच्चिटिंग ( झींगर ) विषके लक्षण । हृष्टरोमोच्चिटिंगेन स्तब्धलिंगो भृशार्तिमान् । दष्टः शीतोदकेनेव सिक्तान्यंगानि मन्यते ॥ ५० ॥ उच्चिटिंगनामक बिच्छूके काटने से देहमें रोमांच होय, लिंग जकड जाय, घोर पीडा होय और सब देहपर शीतल जल मानो डाल दिया है, उच्चिटिंगको सुश्रुत- वाला झींगर कहता है और कोई उष्ट्रधूम कहते हैं परन्तु आतंकदर्पण टीकाकारने बिच्छूका भेद माना है ॥ मंडूक ( मेंडक ) विषके लक्षण । एकदंष्ट्रार्दितः शूनः सरुजः पीतकः सतृट् । छर्दिर्निद्रा च सविषैर्मंडूकैर्दष्टलक्षणम् ॥ ५१ ॥ विषैले मेंडकके काटनेसे उसको एक दांत लगे, उस ठिकाने पीली सूजन होय, दूखे, प्यास, वमन और निद्रा ये लक्षण होयँ ॥ अब कहते हैं कि कृष्णसार, कुहक, हरित, रक्त, यववर्णाभ भुकुटी, कोटिक इन भेदोंसे मेंडक आठ प्रकारका है इनके काटनेसे पूर्वोक्त लक्षण होयँ और खुजली, मुखमें पीले झाग आना, इन CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ३६७ ) आठमें भी भ्रुकुटी और कोटिक इन दोनों मेंडकोंके काटनेसे पूर्वोक्त लक्षण होयँ और दाह, मूर्च्छा अत्यन्त होय ये विशेष लक्षण हैं ॥ विषैले मत्स्य ( मछली ) के विषके लक्षण । मत्स्यास्तु सविषाः कुर्युर्दाहं शोथं रुजं तथा । विषैले मछलीके काटनेसे दाह, सूजन और शूल ये होयँ, विषैले मछलीके सत्ता- ईस भेद हैं उनके नाम नहीं लिखे इस लिये कि मिले नहीं ॥ सविषजलौका ( जोंक ) के विषके लक्षण । कण्डूं शोथं ज्वरं मूर्च्छां सविषास्तु जलौकसः ॥ ५२ ॥ विषैले जोंकके काटनेसे खुजली, सूजन, ज्वर और मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं। विषैले जोंक काली, विचित्रवर्णकी, अलगर्दा, इन्द्रायुधा, सामुद्रिका, गोचन्दना इन भेदोंसे छः प्रकारकी है। इनमें भी अंजनचूर्णवर्णा और पृथुशिराके भेदसे काली जोंक दो प्रकारकी है। वर्म्मि मछलीके समान लम्बी छिन्नोन्नत कुक्षिक भेदसे विचित्र- वर्णकी जोंक दो प्रकारकी है। रोमशा, महापाश्र्वा, कृष्णमुखी इन भेदोंसे अल- गर्दा जोंक तीन प्रकारकी है-इन्द्रधनुषके समान ऊपरसे विचित्र होयँ वह इन्द्रा- युधा जोंक है, कुछ सफेद और पीला तथा विचित्रपुष्पके समान चित्रित ये दो भेद सामुद्रिका जोंकके हैं और बैलके अंडकोशके समान नीचेसे दो भाग होवें उसको गोचन्दना कहते हैं ॥ गृहगोधिका ( छिपकली ) के विषके लक्षण । विदाहं श्वयथुं तोदं स्वेदं च गृहगोधिका । छिपकलीके विषसे दाह होय, सूजन, नोंचनेकीसी पीडा और पसीना आवे कोई गृहगोधिकाको भाषामें विषखपरा कहते हैं ॥ शतपदी ( कानखजूरा ) के विषके लक्षण । दंशे स्वेदं रुजं दाहं कुर्याच्छतपदीविषम् ॥ ५३ ॥ कानखजूरेके काटनेसे स्थानमें पसीना आवे, शूल होय और दाह होय ॥ अब जानना चाहिये कि, परुषा, कृष्णा, चित्रा, कपीलिका, पित्तिका, रक्ता, श्वेता, अग्निप्रभा ये शतपदीके आठ भेद हैं। इनमेंसे छः तो पूर्वोक्त लक्षण करती हैं और श्वेता तथा अग्निप्रभा दो जातिकी शतपदीके काटनेसे दाह और मूर्च्छा अधिक होय ये विशेष लक्षण जानना ॥ मशक ( मच्छर वा डांस ) के विषके लक्षण । कण्डूमान्मशकैरीषच्छोथः स्यान्मन्दवेदनः । मच्छर अथवा डांसके काटनेसे किंचित् सूजन होय उसमें खुजली चले तथा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३६८ ) माधवनिदान ।

( ३६८ ) माधवनिदान । थोडी पीडा होय, सामुद्र, परिमण्डल हस्तिमस्तक, कृष्णा, पर्वतीय ये पांच भेद मच्छरोंके हैं ॥ असाध्य मशकक्षतके लक्षण । असाध्यकीटसदृशमसाध्यमशकक्षतम् ॥ ५४ ॥ पर्वतके ऊपर रहनेवाले मच्छर अथवा डांसके काटनेके क्षत असाध्य कीटके समान असाध्य है । असाध्य कीटके विषके लक्षण सुश्रुतमें लिखे हैं सो जान लेने ॥ सविषमक्षिका ( मक्खी ) दंशके लक्षण । सद्यः प्रस्राविणी स्याद्वा दाहमूर्च्छाज्वरान्विता । पिडिका मक्षिकादंशे तासां तु स्थविकाऽसुहृत् ॥ ५५ ॥ विषैले मक्खीके काटनेके ठिकाने काली फुन्सी प्रगट होय, वह तत्क्षण बहने लगे, उस ठिकाने दाह होय और मूर्च्छा, ज्वर होय । इनमें स्थविका नाम मक्खी प्राण- हर्त्री जाननी । मक्खीके छः भेद हैं-जैसे कान्तारिका, कृष्णा, पिंगलिका, मधूलिका, काषायी और स्थविका, इनमें काषायी और स्थविका दो असाध्य हैं ॥ चतुष्पादादिकोंके विषके साधारण लक्षण । चतुष्पद्भिर्द्विपद्भिर्वा नखदन्तविषं च यत् । पूयते पच्यते चापि स्रवति ज्वरयत्यपि ॥ ५६ ॥ व्याघ्रादि चतुष्पाद और वनमनुष्यादि वानरादि द्विपाद इनके नखदांतोंके विषसे सूज आवे, पकजावे, बहे तथा इसके योगसे ज्वर आवे ॥ अब कहते हैं कि, श्रीमाधवाचार्यने विश्वंभरा, अहिंडूका, कण्डूमका, शुकवृन्तादि, पिपीलिका, गोधेरका और सर्षपिका इनके विषका निदान नहीं लिखा परन्तु इनका निदान सुश्रुतमें कहा है सो ग्रन्थकी परिशिष्टमें लिखेंगे ॥ विष उतरगया हो उसके लक्षण । प्रसन्नदोषं प्रकृतिस्थधातुमन्नाभिकांक्षं सममूत्रविट्कम् । प्रसन्नवर्णेन्द्रियचित्तचेष्टं वैद्योऽवगच्छेदविषं मनुष्यम् ॥ ५७ ॥ जिस पुरुषके वातादि दोष निर्मल होयँ, रस रक्तादि धातु निरोग अवस्थामें जैसे होते हैं वैसेही होयँ, अन्न खानेकी इच्छा होय, मलमूत्र जैसे होते हैं वैसे होय शरीरका वर्ण, इन्द्रिय मन और व्यापार ( देहकी चेष्टा ) ये जिसके शुद्ध होयँ उसका विष उतरगया ऐसे वैद्य जाने ॥ इति श्रीमाथुरकुलकमलप्रकाशक श्रीमत्कन्हैयालालपाठकतनयदत्तरामानिर्मित- माधवभावार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां विषरोगनिदानं समाप्तम् ॥ इति माधवनिदानं समाप्तम् ॥

क्लीब ( नपुंसक ) का निदान चरकसे लिखते हैं ॥

श्रीः । परिशिष्ट ( ग्रंथशेष ) । विदित हो कि माधवाचार्य भिषक्शिरोमणिजीने बहुतसे रोगोंके निदान स्वग्रन्थमें नहीं लिखे परन्तु उन रोगोंके निदानोंसे बहुधा वैद्योंको काम पडता है, इसी कारण उन निदानोंको अन्य ग्रन्थोंसे संग्रह करके इस जगह लिखते हैं । प्रथम क्लीब ( नपुंसक ) का निदान चरकसे लिखते हैं ॥ क्लीबके लक्षण । रेतोदोषोद्भवं क्लैब्यं यस्माच्छुद्धैव सिध्यति । अतो वक्ष्यामि ते सम्यगग्निवेश यथातथम् ॥ १ ॥ बीजध्वजोपघाताभ्यां जरया शुक्रसंक्षयात् । वैक्लव्यसम्भवस्तस्य शृणु सामान्यलक्षणम् ॥ २ ॥ क्लैब्य ( नपुंसक होना ) केवल वीर्यके दोषसे होता है, वीर्य शुद्ध होनेसेही उसकी शुद्धि है इसी कारण हे अग्निवेश ! मैं तेरे आगे क्लीबका लक्षण कहता हूं । नपुंसक चार प्रकारके होते हैं, उनको कहते हैं-१ बीजके उपघातसे, २ ध्वजोपघा- तसे, ३ बुढापेसे और ४ शुक्र ( वीर्य ) के क्षय होनेसे जो नपुंसकता प्राप्त होती है उसके सामान्य लक्षणको तू सुन ॥ क्लैब्यके सामान्य लक्षण । संकल्पप्रवणो नित्यं प्रियां वश्यामथापि वा । न याति लिङ्गशैथिल्यात्कदाचिद्याति वा पुमान् ॥ ३ ॥ श्वासार्त्तः स्विन्नगात्रांसो मोघसंकल्पचेष्टितः । म्लानशिश्नश्च निर्बीजः स्यादेतत्क्लैब्यलक्षणम् ॥ ४ ॥ प्रिय और वशीभूत स्त्रीको भी प्राप्त होकर जो पुरुष लिंगकी शिथिलता होनेसे नित्य विषय न करे और कदाचित् करे तो जब कभी करे, वह पुरुष श्वाससे व्याकुल हो, देहमें पसीना होय, निष्फलमनोरथ और चेष्टा ( विषयादि ) होय, लिंग जिसका ढीला और बीजरहित होय ये नपुंसकके सामान्य लक्षण हैं ॥ बीजोपघात क्लीबके लक्षण । सामान्यलक्षणं ह्येतद्विस्तरेण प्रवक्ष्यते । शीतरूक्षाम्लसंक्लिष्ट- विषमासात्म्यभोजनात् ॥ ५ ॥ शोकचिन्ताभयत्रासात्स्त्रीणां चात्यर्थसेवनात् । अभिचारादविस्रम्भाद्रसादीनां च संक्ष- यात् ॥ ६ ॥ वातादीनां च वैषम्याद्विरुद्धाध्यशनाच्छ्रमात् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३७० ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।

( ३७० ) माधवनिदानका परिशिष्ट । नारीणामनभिज्ञत्वात्पंचकर्मापचारतः ॥ ७ ॥ बीजोपघातो भवति पाण्डुवर्णः सुदुर्बलः । अल्पप्रजोऽल्पहर्षश्च प्रमदासु भवेन्नरः॥ ८॥ हृत्पांडुरोगतमककामलाश्रमपीडितः । बीजो- पघातजं क्लीब्यं ध्वजभंगकृतं शृणु ॥ ९ ॥ प्रथम जो कहे वे नपुंसकके सामान्य लक्षण हैं, अब उनको विस्तारसे कहता हूं-शीतल, रूक्ष, थोडा खटाई मिलाहुआ तथा विषम असात्म्य ( अहितकारी ) अन्न इत्यादि पदार्थोंके भोजन करनेसे, आदिशब्दसे खट्टा, चरपरा, कसैला पदार्थ खानेसे, शोक ( सोच ), चिन्ता, भय और त्रास तथा अत्यन्त स्त्रीरमण करनेसे, किसी शत्रु‌का अभिचार ( जादू टोना ) से तथा किसीका विश्वास न करनेसे रसादि धातुओंके क्षीण होनेसे, वातादि दोषोंके बढनेसे, उसी प्रकार विरुद्ध ( क्षीर मत्स्यादि ) भोजन, उपवास ( व्रतादि ) और श्रम करनेसे स्त्रीसुखके न जाननेसे, पञ्चकर्म ( वमन विरेचनादि ) के अपचारसे, बीजोपघात अर्थात् बीजमें किसी प्रकारका विकार होता है उसके होनेसे, बीजका वर्ण पीला होता है तथा देह दुर्बल होजाय, उस पुरुषके सन्तान थोडी हो तथा स्त्रीगमनमें इच्छा न होना, हृदयरोग और पांडुरोग होय, तमक श्वास कामला अनायास श्रम इनसे पीडित होय ये लक्षण बीजोपघात क्लीबके हैं ॥ ध्वजभंगक्लीबकी उत्पत्ति । अत्यम्ललवणक्षारविरुद्धाजीर्णभोजनात् । अत्यम्बुपानाद्वि- षमपिष्टान्नगुरुभोजनात् ॥ १० ॥ दधिक्षीरानूपमांससेवना- दतिकर्शनात् । कन्यानां चैव गमनादयोनिगमनादपि ॥ ११ ॥ दीर्घरोग्रीं चिरोत्सृष्टां तथैव च रजस्वलाम् । दुर्गन्धां दुष्ट- योनिं च तथैव च परिश्रुताम् ॥ १२ ॥ नरस्य प्रमदां मोहा- दतिहर्षात्प्रगच्छतः । चतुष्पदाभिगमनाच्छेफसश्चाभिघा- ततः ॥ १३ ॥ अधावनाद्वा मेद्रस्य शस्त्रदंतनखक्षतात् । काष्ठप्रहारनिश्शेषशूकानां चातिसेवनात् ॥ रेतसश्च प्रती- घाताद्ध्वजभङ्गः प्रवर्त्तते ॥ १४ ॥ अत्यन्त खट्टा, नोनका खार, विरुद्ध ( क्षीरमत्स्यादि ), अपक्क अन्न भोजन कर- नेसे तथा बहुत जल पीनेसे, विषमान्न और भारी ऐसे पदार्थोंके खानेसे, दही, दूध, जलसमीप रहनेवाले पक्षीका मांस खानेसे, व्याधिकरके कृश होनेसे, कन्याके साथ गमन करनेसे, जिसके योनि नहीं ऐसी स्त्रीके साथ गमन करनेसे अथवा

भाषाटीकासमेत । ( ३७१ ) अयोनिकहिये गुदाभंजन करनेसे तथा जिसकी योनिपर बडे बाल हों और जिस स्त्रीने बहुत दिनोंसे मैथुन करना छोड़दिया हो तथा रजस्वला और जिसकी योनिमें दुर्गंधि आती हो तथा दुष्टयोनि और जिसकी सोमादिरोगोंसे योनि चुचाती हो ऐसी स्त्रियोंसे मैथुन करनेसे तथा उन्मत्त होकर गमन करनेसे और अतिहर्षसे गमन करनेसे तथा चतुष्पाद ( बकरी कुतिया आदि ) से गमन करनेसे तथा लिंगमें किसी प्रकारकी चोट लगनेसे तथा लिंगके न धोनेसे तथा शस्त्र, दांत, नख इन करके घाव होनेसे, लकडी आदिकी चोट लगनेसे, लिंगके पिसजानेसे तथा लिंगके मोटे करनेके निमित्त शूकादि प्रयोग करनेसे अर्थात् इनका अत्यन्त सेवन करनेसे तथा वीर्यके बिगडनेसे मनुष्यके ध्वजभंग अर्थात् लिंग खडा होकर तुरंत मुरझाय यह रोग होता है ॥ इसके लक्षण आगे कहते हैं— ध्वजभंगके लक्षण । श्वयथुर्वेदना मेढ्रे रागश्चैवोपलक्ष्यते ॥ १५ ॥ स्फोटाश्च तीव्रा जायन्ते लिङ्गपाको भवत्यपि ॥ मांसवृद्धिर्भवेच्चापि व्रणाः क्षिप्रं भवन्त्यपि ॥ १६ ॥ पुलाकोदकसंकाशः स्रावः श्यावा- रुणप्रभः । वलयीकुरुते चापि कठिनं च परिग्रहम ॥ १७ ॥ ज्वरस्तृष्णा भ्रमो मूर्च्छा च्छर्दिश्चास्योपजायते । रक्तं कृष्णं स्रवेच्चापि नीलमाविललोहितम् ॥ १८ ॥ अग्निनेव च दग्धस्य तीव्रो दाहः सवेदनः । बस्तौ वृषणयोर्वाऽपि सेवन्यां वंक्षणेषु च ॥ १९ ॥ कदाचित्पिच्छिलो वापि पाण्डुस्रावश्च जायते । श्वयथुश्च भवेन्मंदस्तिमितोऽल्पपरिस्रवः ॥ २० ॥ चिरात्स पाकं व्रजति शीघ्रं वाथ प्रपद्यते । जायन्ते कृमयश्चापि क्लियते पूतिगंधि च ॥ २१ ॥ प्रशीर्यते मणिश्चास्य मेढ्रं मुष्कावथा- पि च । ध्वजभंगकृतं क्लैव्यमित्येतत्समुदाहृतम् । एवं पंच- विधं केचिद् ध्वजभंगं वदंत्यपि ॥ २२ ॥ ध्वजभंगवाले मनुष्यके लिंगपर सूजन हो और लिंगमें पीडा हो तथा लाल हो, उसके ऊपर घोर फोडे होते हैं, तथा लिंगमें पाक हो, मांसकी वृद्धि हो लाल होय तथा लिंगमें फोडे होंय उसमें चावलके मांडके समान और काला लाल स्राव होय कंकणके समान गोल लपेटा होय और उसकी जड कठिन होय, तथा उस पुरुषको ज्वर, प्यास, भ्रम, मूर्च्छा, वमन ये रोग हों तथा लिंगमेंसे काला नीला लोहित और

( ३७२ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।

( ३७२ ) माधवनिदानका परिशिष्ट । दुष्ट रुधिर निकले उसका लिंग अग्निसे दग्धके समान होजाय, मूत्राशय अंडकोश ऊरुकी सन्धियोंमें घोर दाह और पीडा होय, कभी कभी गाढा और पीला स्राव होय, सूजन मन्द और गीली होय, तथा थोडा स्राव होय देरमें पके, अथवा शीघ्रही पक जावे, उसके लिंगमें कीडे पडजायँ, क्लेदयुक्त और दुर्गंध आवे, लिंगके ऊपरकी सुपारी गलजाय, तथा लिंग और अंडकोश दोनों गलकर गिरजायँ, यह ध्वजभंग- नपुंसकके लक्षण कहे हैं ॥ कोई सुश्रुतादिक आचार्य इस ध्वजभंग नपुंसकके ईर्ष्यक, सौगन्धिक, कुंभिक, आसेक्य और महापंढ इन भेदोंसे पांच प्रकारका बतलाते हैं ॥ उनको भी प्रसंग- बशसे इस जगह सुश्रुतसे लिखते हैं । तहां प्रथम आसेक्य नपुंसकके लक्षण । पित्रोरत्यल्पवीर्यत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत् । स शुक्रं प्राश्य लभते ध्वजोच्छ्रायमसंशयम् ॥ १ ॥ मातापिताके अत्यल्पवीर्यसे जो गर्भ रहे वह पुरुष आसेक्यनाम नपुंसक होता है, वह पुरुष अन्य पुरुषसे अपने मुखमें मैथुन कराकर उसके वीर्यको खा जाय तब उसको चैतन्य अर्थात् लिंग सत्तर हो तब स्त्रीसे मैथुन करे इसका दूसरा नाम मुखयोनि है ॥ सौगन्धिकनपुंसकके लक्षण । यः पूतियोनौ जायेत स सौगन्धिकसंज्ञितः । स योनिशेफसोग्न्धमाघ्राय लभते बलम् ॥ २ ॥ जो पुरुष दुष्टयोनिसे उत्पन्न होय, उसको योनि तथा लिंगके सूंघनेसे चैतन्यता प्राप्ति होय, उसको सौगंधिक कहते हैं, इसका दूसरा पर्यायवाची नाम नासायोनि है ॥ कुम्भिक नपुंसकके लक्षण । स्वगुदेऽब्रह्मचर्याद्यः स्त्रीषु पुंवत्प्रवर्तते। कुम्भिकः स तु विज्ञेयः- जो पुरुष पहले अपनी गुदा भंजन करावे तब उसको चैतन्यता प्राप्त होय तब स्त्रीके विषयपुरुषके समान प्रवृत्त होय, उसको कुम्भिक नपुंसक कहते हैं । कोई आचार्य इसका और प्रकारसे अर्थ करते हैं अर्थात् जो पुरुष लोंडेबाजी करते हैं वे प्रथम स्त्रीके पीछे बैठकर पशुके समान शिथिल लिंगसेही उसकी गुदाभंजन करें, इस प्रकार करनेसे जब चैतन्यता प्राप्त होती है तब मैथुन करें, उसका नाम कुम्भिक कहते हैं और गुदायोनी यह इसका पर्यायवाची नाम है। इसकी उत्पत्ति काश्यपने इस प्रकार लिखी है कि, ऋतुकालमें अल्परजस्क स्त्रीसे श्लेष्म रेतवाले पुरुषके सम्भोग करनेसे उस स्त्रीका कामदेव शान्त न हो इस कारण उस स्त्रीका मन अन्य पुरुषसे सम्भोग करनेकी इच्छा करे तब उसको कुम्भिकनामक नपुंसक होता है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ३७३ ) ईर्ष्याकनपुंसकके लक्षण । -ईर्ष्यकं शृणु चापरम् ॥ ३ ॥ दृष्ट्वा व्यवायमन्येषाम् व्यवाये यः प्रवर्तते । ईर्ष्यकः स तु विज्ञेयो दृग्योनिरयमीर्ष्यकः ॥ ४ ॥ जो मनुष्य दूसरेको मैथुन करते देख आप मैथुन करे उसको ईर्ष्यक नपुंसक कहते हैं। दूसरा पर्यायवाचक नाम दृग्योनि है। कोई 'दृग्योनिरयमीर्ष्यकः' इस जगह 'षण्ढकं शृणु पञ्चमम्' ऐसा पाठ कहते हैं अर्थात् षण्ढक जो पञ्चम नपुंसक उसके लक्षण सुन ॥ महाषण्ढनपुंसक लक्षण । यो भार्यायामृत्तौ मोहादंगनेव प्रवर्तते । ततः स्त्रीचेष्टिताकारो जायते षण्ढसंज्ञितः ॥ ५ ॥ जो पुरुष ऋतुकालमें मोहसे स्त्रीके सदृश प्रवृत्त होय अर्थात् आप नीचेसे सीधा हो ऊपर स्त्रीको चढाकर मैथुन करे उससे जो गर्भ रहे वह पुरुष स्त्रीकीसी चेष्टा करे और स्त्रीकी आकार होय, स्त्रीकी चेष्टा करे (आप स्त्रीके समान नीचे होकर अन्य पुरुषसे अपने लिंगके ऊपर वीर्य पतन करावे) ॥ नारीषण्ढनपुंसकके लक्षण । ऋतौ पुरुषवद्वापि प्रवर्त्तेताङ्गना यदि । तत्र कन्या यदि भवेत्सा भवेन्नरचेष्टिता ॥ ६ ॥ ऋतुसमय यदि स्त्री पुरुषके सदृश प्रवृत्त होय अर्थात् पुरुषको नीचे सुलाय उसके ऊपर चढ पुरुषके समान मैथुन करे, उस मैथुनसे जो कन्या प्रगट हो वह पुरुषकेसे आकारवान् होय और पुरुषकीसी चेष्टा करे (अर्थात् स्वयं स्त्रीरूप भी होकर दूसरी स्त्रीके ऊपर पुरुषके समान उसकी योनिसे अपनी योनि घर्षण करे) ये षण्ढनपुंसकके दोनों भेद हैं। इससे पांच प्रकारके ही ध्वजभंग नपुंसक जानने परन्तु चरकके मतसे नपुंसक स्त्री पुरुषके भेदसे दो प्रकारका है और जितने पुरुषके नपुंसक भेद हैं उतनेही स्त्रीके जानने ॥ उक्त श्लोकोंका संग्रह । आसेक्यश्च सुगंधी च कुम्भिकश्चैर्ष्यकस्तथा । सरेतसस्त्वमी ज्ञेया अशुक्रः षण्ढसंज्ञितः ॥ ७ ॥ आसेक्य, सुगन्धी, कुंभिक और ईर्ष्यक ये चारों प्रकारके नपुंसक शुक्र (वीर्य) सहित जानने और षण्ढसंज्ञक नपुंसकके वीर्य नहीं होता है वह वीर्यरहित जानना ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३७४ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।

( ३७४ ) माधवनिदानका परिशिष्ट । कोई शंका करे कि जब वीर्य सहित है तब आप उसको नपुंसक कैसे कहते हो ? इस वास्ते कहते हैं- अनया विप्रकृत्या तु तेषां शुक्रवहाः शिराः । हर्षात्स्फुटत्वमायान्ति ध्वजोच्छ्रायस्ततो भवेत् ॥ ८ ॥ इनकी विरुद्ध चेष्टाके करनेसे उनके शुक्रके बहनेवाली जो नाडी हैं सो हर्ष ( आनन्द ) से फूलती हैं, इससे उनको चैतन्य ( लिंग सतर होना ) होता है वीर्यके प्रभावसे नहीं होता, ये ध्वजभंग नपुंसकके पांच भेद हैं ॥ जरासम्भवपुंसकके लक्षण । क्लैब्यं जरासम्भवं हि प्रवक्ष्याम्यथ तच्छृणु । जघन्यमध्यप्रवरं वयस्त्रिविधमुच्यते ॥ २३ ॥ अथ च प्रवरे शुक्रं प्रायशः क्षीयते नृणाम् । रसादीनां संक्षयाच्च तथैवावृष्यसेवनात् ॥ २४ ॥ बलवर्णेन्द्रियाणां च क्रमेणैव परिक्षयात् । परिक्षयादायुषश्चाप्यनाहाराच्छ्रमात्क्रमात् । जरासम्भवजं क्लैब्यमित्येतैर्हेतुभिर्नृणाम् ॥ २५ ॥ अब मैं जरा ( बुढापे ) में नपुंसक होनेके लक्षण कहता हूँ, उनको सुन । अवस्था तीन-जघन्य ( छोटी ) और मध्यम, तथा प्रवर ( बडी ) इन तीनोंमें प्रवर अर्थात् वृद्ध अवस्थामें बहुधा करके शुक्र ( वीर्य ) क्षीण होता है । उसके हेतु ये हैं-रसादि धातुओंके क्षीण होनेसे, तथा वृष्य ( वीर्यकर्ता ) औषधिके न खानेसे, बल वर्ण इन्द्रिय इनके क्रमसे क्षीण होनेसे, आयु ( अवस्था ) के घटनेसे, भूखा रहनेसे, श्रम ( मेहनत ) के करनेसे इन कारणोंसे जरासम्भव नपुंसक होता है ॥ जायते तेन सोऽत्यर्थं क्षीणधातुः सुदुर्बलः ॥ २६ ॥ विवर्णो विह्वलो दीनः क्षिप्रं व्याधिमथाश्नुते । एतज्जरासम्भवं हि चतुर्थं क्षयजं शृणु ॥ २७ ॥ पूर्वोक्त जरासम्भवक्लीबके होनेसे मनुष्य धातुक्षीण, दुर्बल, देहका हीनवर्ण विह्वल, दीन ऐसा हो जाय और वह शीघ्रही व्याधि ( रोग ) को प्राप्त होय, यह जरास- म्भवके लक्षण कहे, अब चतुर्थ क्षयजक्लीबके लक्षण सुनो ॥ क्षयजक्लीबके लक्षण । अतिप्रचिन्तनाच्चैव शोकात्क्रोधाद्भयादपि । ईर्ष्यात्कण्ठा- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

तथोद्वेगात्सदा विंशतिको नरः ॥ २८ ॥ कृशो वा सेवते रूक्ष- मन्नपानमथौषधम् । दुर्बलप्रकृतिश्चैव निराहारो भवेद्यदि ॥ २९ ॥ अथाल्यभोजनाच्चापि हृदये यो व्यवस्थितः । रस- प्रधानधातुर्हि क्षीयेताशु नरस्ततः ॥ ३० ॥ अत्यन्त चिन्ता, अतिशोक, अतिक्रोध, अतिभय, ईर्ष्या, उत्कण्ठा, उद्वेग और जो पुरुष बीस वरसका होय, तथा जो पुरुष कृश होकर अन्नपानकी वस्तु तथा रूखी औषधियोंका सेवन करे और दुर्बल प्रकृति होकर निराहार रहे अथवा थोडा भोजन करे वह भी हृदयमें ही स्थितरहे इन कारणोंसे रस है प्रधान जिनमें ऐसी जो धातु क्षीण होयँ, इसी कारणसे वह मनुष्य क्षीण होता जाय ॥ रक्तादयश्च क्षीयन्ते धातवस्तस्य देहिनः । शुक्रावसानास्तेभ्यो हि शुक्रं धाम परं मतम् ॥ ३१ ॥ चेतसो वापि हर्षेण व्यवायं सेवते तु यः । शुक्रं तु क्षीयते तस्य ततः प्राप्नोति संक्षयम् ॥ ३२ ॥ घोरं व्याधिमवाप्नोति मरणं वा समृच्छति । शुक्रं तस्माद्विशेषेण रक्ष्यमारोग्यमिच्छता ॥ एवं निदान- लिङ्गाभ्यामुक्तं क्लैब्यं चतुर्विधम् ॥ ३३ ॥ उस पुरुषके रक्तादि धातु क्षीण होयँ उन धातुओंकी शुक्र अवसान ( मर्यादा ) है क्योंकि सबका शुक्रही धाम ( ठिकाना ) है, चित्तके हर्षसे जो मैथुन करे, तब उसका शुक्र क्षीण होय, तदनन्तर संक्षयको प्राप्त होय, जब मनुष्यका शुक्र क्षीण हो जाता है तब घोर व्याधि इस मनुष्यको प्राप्त होती है और मरण होता है, अतएव आरोग्यकी इच्छा करनेवाला मनुष्य शुक्र ( वीर्य ) की जरूर रक्षा करे यह निदान और चिह्नोंसे नपुंसक चार प्रकारका कहा है ॥ केचित्क्लैब्ये त्वसाध्ये द्वे ध्वजभङ्गक्षयोद्भवे । वदन्ति शेफसश्छेदाद् वृषणोत्पाटनेन वा ॥ ३४ ॥ कोई आचार्य लिंग और अंडकोशोंके गिरनेसे ध्वजभंग और क्षयज इन दोनों नपुंसकोंको असाध्य कहते हैं ॥ मातापित्रोर्बीजदोषादशुभैश्चाकृतात्मनः ॥ ३५॥ गर्भस्थस्य यदा दोषाः प्राप्य रेतोवहाः शिराः । शोषयन्त्याशु तन्नाशां- द्वेतश्चाप्युपहन्यते ॥ ३६॥ तत्र सम्पूर्णसर्वाङ्गः स भवत्यपुमान् पुमान् । एते त्वसाध्या व्याख्याताः सन्निपातसमुच्छ्रयात् ॥३७॥

( ३७६ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।

( ३७६ ) माधवनिदानका परिशिष्ट । गर्भमें नपुंसक कौन कारणसे होता है ऐसे कोई प्रश्न करे उसके निमित्त कहते हैं-माता पिताके बीजदोषसे, पूर्वजन्मके पापोंसे, गर्भमें रेत ( वीर्य ) के बहनेवाली नाड़ियोंमें दोष प्राप्त होकर उन नाड़ियोंको सुखाय देवे, जब रेतके बहनेवाली नाडी सूख जावें तब वीर्यका क्षय हो इससे बालक जो प्रगट होय उसके सर्व अंग यथाय होयँ, परन्तु लिंग नहीं होवे, सन्निपातके बढनेसे ये असाध्य हैं ॥ शुक्रार्तवदोषनिदान । शुक्रं पौरुषमित्युक्तं तस्माद्वक्ष्यामि तच्छृणु । यथा हि बीजं कालाम्बुकृमिकीटाग्निदूषितम् ॥ १ ॥ न विरोहति सन्दुष्टं तथा शुक्रं शरीरिणाम् । अतिव्यवायाद्व्यायामादसात्म्यानां च सेवनात् ॥ २ ॥ अकाले चाप्ययोनौ वा मैथुनं चैव गच्छतः । रूक्षतिक्तकषायातिलवणाम्लोष्णसेवनात् ॥ ३ ॥ मधुरस्निग्धगुर्वन्नसेवनाज्जरया तथा । चिन्ताशोकादिविस्त्र- म्भाच्छस्त्रक्षाराग्निभिस्तथा ॥ ४ ॥ भयात्क्रोधादभीचारा- द्व्याधिभिः कर्शितस्य च । वेगाघातात्क्षयाच्चापि धातूनां सप्तदूषणात् ॥ ५ ॥ दोषाः पृथक्समस्ता वा प्राप्य रेतोवहाः शिराः । शुक्रं संदूषयन्त्याशु तद्वक्ष्यामि विभागशः ॥ ६ ॥ पूर्व नपुंसकके निदानमें यह कह आये हैं कि, मनुष्यमें पुरुषार्थ केवल वीर्यका ही है इसी कारण अब मैं वीर्यका वर्णन करता हूं, उसको सुन-जैसे काल ( समय ) जल, कृमि, कीट, अग्निसे दूषित बीज नहीं हरा होवे उसी प्रकार मनुष्यका दूषित वीर्य गर्भप्रद नहीं होता है। अत्यन्त मैथुन करनेसे, दण्ड कसरत करनेसे, अपनी प्रकृतिके विरुद्ध भोजन करनेसे, कुसमय और दुष्टयोनि ( गर्मी रोग आदिसे दूषित ) में विषय ( गमन ) करनेसे, बैठे रहनेसे, मधुर, रूक्ष, कडुवा, कसैला, अति- नोनफा, खट्टा, गरम ऐसे पदार्थके सेवन करनेसे मधुर, चिकने, भारी अन्नके भोजन करनेसे, वृद्ध अवस्थाके होनेसे, चिन्ता, शोक, अविश्वास, शस्त्र, खार और अग्निके प्रयोगसे, भय, क्रोध, क्षयी तथा धातुओंके दूषित होनेसे पृथक् २ दोष अथवा सर्व दोष ( वीर्य ) के बहनेवाली नाडीमें प्रवेश होकर शुक्रको दूषित करते हैं । उस दूषितशुक्रके लक्षण क्रमसे न्यारे २ कहता हूं ॥ दूषितशुक्रके भेद । फेनिलं तनु रूक्षं च विवर्णं पूति पिच्छिलम् । अन्यधातूपसंसृष्टमवसादि तथाष्टमम् ॥ ७ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ३७७ ) दुष्ट शुक्र आठ प्रकारका है-फेनिल अर्थात् झागवाला, पतला, रूखा, विवर्ण, ( खोटे रंगका ) पूति ( सडा ), पिच्छिल ( गाढा ) और धातुके साथ मिला भया तथा अवसादि ये आठ भेद हुए ॥ वातदूषित शुक्रके लक्षण । वातेन फेनिलं शुष्कं कृच्छ्रेण पिच्छिलं तनु । भवत्युपहतं शुक्रं न तद्गर्भाय कल्पते ॥ ८ ॥ बादीसे शुक्र झागवाला, सूखा, कुछ गाढा और थोडा तथा क्षीण हो । यह गर्भके अर्थका नहीं है ॥ पित्तदूषित शुक्रके लक्षण । सनीलमथवा पीतमत्युष्णं पूतिगंधि च । दहेल्लिङ्गं विनिर्याति शुक्रं पित्तैश्च दूषितम् ॥ ९ ॥ पित्तसे दूषित शुक्र नीला, अत्यन्त गरम होता है उसमें बुरी वास आवे और जब निकले तब लिंगमें दाह होवे ॥ कफदूषित शुक्रके लक्षण । श्लेष्मणा रुद्धमार्गं तु भवत्यत्यर्थपिच्छिलम् । कफसे शुक्र शुक्रवहा नाडियोंके मार्ग रुकनेसे अत्यन्त गाढा होजाता है ॥ स्त्रियमत्यर्थगमनादभिघातात्क्षयादपि । शुक्रं प्रवर्तते जन्तोः प्रायेण रुधिरान्वयम् ॥ १० ॥ अत्यन्त स्त्रीगमन करनेसे, चोट लगनेसे, मनुष्यके रुधिरसंयुक्त वीर्य निकलता है॥ कृच्छ्रेण याति ग्रथितमवसादि तथाष्टमम् । इति दोषाः समाख्याताः शुक्रस्याष्टौ सलक्षणाः ॥ ११ ॥ अष्टम जो अवसादि शुक्र है सो बडी कठिनतासे गांठके समान निकलता है, शुक्रके आठ दोष कहे हैं ॥ शुद्धशुक्रके लक्षण । स्निग्धं घनं पिच्छिलं च मधुरं चाविदाहि च । रेतः शुद्धं विजानीयात्स्निग्धं स्फटिकसन्निभम् ॥ १२ ॥ सचिक्कण, गाढा, पिच्छिल ( मलाईके समान ), मीठा, दाहरहित और जो स्निग्ध स्फटिक मणिके समान होय ये शुद्धवीर्यके लक्षण हैं ॥ सुश्रुतसे-शुक्रदोषनिदान । वातपित्तश्लेष्मशोणितकुणपगन्ध्यनलपग्रंथिपूतिपूयक्षीणरेतसः

( ३७८ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।

( ३७८ ) माधवनिदानका परिशिष्ट । प्रजोत्पादने न समर्थाः ॥ १३ ॥ तत्र वातवर्णवेदनं वातेन । पीतवर्णवेदनं पित्तेन । श्लेष्मवर्णवेदनं श्लेष्मणा । शोणित- वर्णपित्तवेदनं रक्तेन । कुणपगन्ध्यनल्पं च रक्तेन पित्तेन च । ग्रंथीभूतं श्लेष्मवाताभ्यां पूयनिभं पित्तवाताभ्यां क्षीणं शुक्रं प्रागुक्तं पित्तवाताभ्यां मूत्रपुरीषगंधि सर्ववर्णवेदनं सन्नि- पातेनेति तेषु कुणपग्रंथिपूयक्षीणरेतः कृच्छ्रसाध्या मूत्र- पुरीषरेतसोऽसाध्याः ॥ वात, पित्त, कफ, रुधिर इनसे दूषित हुआ शवगंधि और बहुत दुर्गंध युक्त तथा राधके समान ऐसा जिस पुरुषका रेत ( वीर्य ) होय उसके सन्तान नहीं होय, जिसका वीर्य वादीसे दुष्ट होय उसका वर्ण काला, लाल होय । तथा उसमें तोदा- दिक पीडा होय । पित्तसे दुष्टहुए शुक्रका वर्ण पीला, नीला इत्यादि वर्णोंका होय तथा उसमें चोषादि पीडा होय । कफसे दुष्टहुए शुक्रका वर्ण श्वेत होय, तथा उसमें मन्द पीडा होय, रुधिरसे दुष्ट हुए शुक्रका वर्ण लाल होवे उसमें चोषादि ( चूसने- कीसी पीडा होय ) तथा रुधिरसे दूषित शुक्रमें मुर्देकीसी बास आवे और विशेष ऐसा हो-कफसे दूषित हुआ शुक्र गांठदार होय, पित्त कफसे दूषित शुक्रमें राध- कीसी वास आवे । पित्तवातसे शुक्र क्षीण होता है । सन्निपातसे दूषितभये शुक्रमें पूर्वोक्त सब वर्ण होयँ और पीडा होय तथा उसमें मूत्र और विष्ठाकीसी बास आवे, इनमें कुणप, ग्रंथि, पूय, क्षीणरेतस ये चार कृच्छ्रसाध्य हैं और पुरीष ( विष्ठा ) रेतस असाध्य और बाकीके सब साध्य हैं ॥ आर्त्तवदोषके लक्षण । आर्त्तवमपि त्रिभिर्दोषैः शोणितचतुर्थैः पृथग्द्वन्द्वैः समस्तै- श्चोपसृष्टमबीजं भवति । तदपि दोषवर्णवेदनाभिर्ज्ञेयम् । तेषु कुणपग्रंथिपूतिपूयक्षीणमूत्रपुरीषप्रकाशमसाध्यम् ॥ आर्त्तव अर्थात् स्त्रियोंका रज वातादि पृथक् दोष, रक्त, द्वंद्व और सन्निपात इनकरके दुष्ट होनेसे गर्भ धारणके अयोग्य होय तिन दोषोंकरके वर्ण और वेदना जाननी चाहिये । तिनमें कुणप, पूति, पूय, क्षीण मलमूत्रके समान जो होय सो असाध्य हैं, बाकीके साध्य जानने ॥ विष्टम्भगर्भके लक्षण । गर्भिणीके कुसमय भोजन करनेसे अथवा रूक्षादि पदार्थ खानेसे, वायुसे कुपित होकर गर्भ शुक्र शुष्य करे अर्थात् गर्भको सुखाय देवे, इसीसे उस गर्भका हलना चलना बढना बन्द होय और समय पाकर उसका बादीकी पीडा होकर स्राव होय॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA