भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 404 में से

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तथोद्वेगात्सदा विंशतिको नरः ॥ २८ ॥ कृशो वा सेवते रूक्ष- मन्नपानमथौषधम् । दुर्बलप्रकृतिश्चैव निराहारो भवेद्यदि ॥ २९ ॥ अथाल्यभोजनाच्चापि हृदये यो व्यवस्थितः । रस- प्रधानधातुर्हि क्षीयेताशु नरस्ततः ॥ ३० ॥ अत्यन्त चिन्ता, अतिशोक, अतिक्रोध, अतिभय, ईर्ष्या, उत्कण्ठा, उद्वेग और जो पुरुष बीस वरसका होय, तथा जो पुरुष कृश होकर अन्नपानकी वस्तु तथा रूखी औषधियोंका सेवन करे और दुर्बल प्रकृति होकर निराहार रहे अथवा थोडा भोजन करे वह भी हृदयमें ही स्थितरहे इन कारणोंसे रस है प्रधान जिनमें ऐसी जो धातु क्षीण होयँ, इसी कारणसे वह मनुष्य क्षीण होता जाय ॥ रक्तादयश्च क्षीयन्ते धातवस्तस्य देहिनः । शुक्रावसानास्तेभ्यो हि शुक्रं धाम परं मतम् ॥ ३१ ॥ चेतसो वापि हर्षेण व्यवायं सेवते तु यः । शुक्रं तु क्षीयते तस्य ततः प्राप्नोति संक्षयम् ॥ ३२ ॥ घोरं व्याधिमवाप्नोति मरणं वा समृच्छति । शुक्रं तस्माद्विशेषेण रक्ष्यमारोग्यमिच्छता ॥ एवं निदान- लिङ्गाभ्यामुक्तं क्लैब्यं चतुर्विधम् ॥ ३३ ॥ उस पुरुषके रक्तादि धातु क्षीण होयँ उन धातुओंकी शुक्र अवसान ( मर्यादा ) है क्योंकि सबका शुक्रही धाम ( ठिकाना ) है, चित्तके हर्षसे जो मैथुन करे, तब उसका शुक्र क्षीण होय, तदनन्तर संक्षयको प्राप्त होय, जब मनुष्यका शुक्र क्षीण हो जाता है तब घोर व्याधि इस मनुष्यको प्राप्त होती है और मरण होता है, अतएव आरोग्यकी इच्छा करनेवाला मनुष्य शुक्र ( वीर्य ) की जरूर रक्षा करे यह निदान और चिह्नोंसे नपुंसक चार प्रकारका कहा है ॥ केचित्क्लैब्ये त्वसाध्ये द्वे ध्वजभङ्गक्षयोद्भवे । वदन्ति शेफसश्छेदाद् वृषणोत्पाटनेन वा ॥ ३४ ॥ कोई आचार्य लिंग और अंडकोशोंके गिरनेसे ध्वजभंग और क्षयज इन दोनों नपुंसकोंको असाध्य कहते हैं ॥ मातापित्रोर्बीजदोषादशुभैश्चाकृतात्मनः ॥ ३५॥ गर्भस्थस्य यदा दोषाः प्राप्य रेतोवहाः शिराः । शोषयन्त्याशु तन्नाशां- द्वेतश्चाप्युपहन्यते ॥ ३६॥ तत्र सम्पूर्णसर्वाङ्गः स भवत्यपुमान् पुमान् । एते त्वसाध्या व्याख्याताः सन्निपातसमुच्छ्रयात् ॥३७॥

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