भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 404 में से

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पृष्ठ 394

( ३७६ ) माधवनिदानका परिशिष्ट । गर्भमें नपुंसक कौन कारणसे होता है ऐसे कोई प्रश्न करे उसके निमित्त कहते हैं-माता पिताके बीजदोषसे, पूर्वजन्मके पापोंसे, गर्भमें रेत ( वीर्य ) के बहनेवाली नाड़ियोंमें दोष प्राप्त होकर उन नाड़ियोंको सुखाय देवे, जब रेतके बहनेवाली नाडी सूख जावें तब वीर्यका क्षय हो इससे बालक जो प्रगट होय उसके सर्व अंग यथाय होयँ, परन्तु लिंग नहीं होवे, सन्निपातके बढनेसे ये असाध्य हैं ॥ शुक्रार्तवदोषनिदान । शुक्रं पौरुषमित्युक्तं तस्माद्वक्ष्यामि तच्छृणु । यथा हि बीजं कालाम्बुकृमिकीटाग्निदूषितम् ॥ १ ॥ न विरोहति सन्दुष्टं तथा शुक्रं शरीरिणाम् । अतिव्यवायाद्व्यायामादसात्म्यानां च सेवनात् ॥ २ ॥ अकाले चाप्ययोनौ वा मैथुनं चैव गच्छतः । रूक्षतिक्तकषायातिलवणाम्लोष्णसेवनात् ॥ ३ ॥ मधुरस्निग्धगुर्वन्नसेवनाज्जरया तथा । चिन्ताशोकादिविस्त्र- म्भाच्छस्त्रक्षाराग्निभिस्तथा ॥ ४ ॥ भयात्क्रोधादभीचारा- द्व्याधिभिः कर्शितस्य च । वेगाघातात्क्षयाच्चापि धातूनां सप्तदूषणात् ॥ ५ ॥ दोषाः पृथक्समस्ता वा प्राप्य रेतोवहाः शिराः । शुक्रं संदूषयन्त्याशु तद्वक्ष्यामि विभागशः ॥ ६ ॥ पूर्व नपुंसकके निदानमें यह कह आये हैं कि, मनुष्यमें पुरुषार्थ केवल वीर्यका ही है इसी कारण अब मैं वीर्यका वर्णन करता हूं, उसको सुन-जैसे काल ( समय ) जल, कृमि, कीट, अग्निसे दूषित बीज नहीं हरा होवे उसी प्रकार मनुष्यका दूषित वीर्य गर्भप्रद नहीं होता है। अत्यन्त मैथुन करनेसे, दण्ड कसरत करनेसे, अपनी प्रकृतिके विरुद्ध भोजन करनेसे, कुसमय और दुष्टयोनि ( गर्मी रोग आदिसे दूषित ) में विषय ( गमन ) करनेसे, बैठे रहनेसे, मधुर, रूक्ष, कडुवा, कसैला, अति- नोनफा, खट्टा, गरम ऐसे पदार्थके सेवन करनेसे मधुर, चिकने, भारी अन्नके भोजन करनेसे, वृद्ध अवस्थाके होनेसे, चिन्ता, शोक, अविश्वास, शस्त्र, खार और अग्निके प्रयोगसे, भय, क्रोध, क्षयी तथा धातुओंके दूषित होनेसे पृथक् २ दोष अथवा सर्व दोष ( वीर्य ) के बहनेवाली नाडीमें प्रवेश होकर शुक्रको दूषित करते हैं । उस दूषितशुक्रके लक्षण क्रमसे न्यारे २ कहता हूं ॥ दूषितशुक्रके भेद । फेनिलं तनु रूक्षं च विवर्णं पूति पिच्छिलम् । अन्यधातूपसंसृष्टमवसादि तथाष्टमम् ॥ ७ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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