भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 404 में से

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पृष्ठ 392

( ३७४ ) माधवनिदानका परिशिष्ट । कोई शंका करे कि जब वीर्य सहित है तब आप उसको नपुंसक कैसे कहते हो ? इस वास्ते कहते हैं- अनया विप्रकृत्या तु तेषां शुक्रवहाः शिराः । हर्षात्स्फुटत्वमायान्ति ध्वजोच्छ्रायस्ततो भवेत् ॥ ८ ॥ इनकी विरुद्ध चेष्टाके करनेसे उनके शुक्रके बहनेवाली जो नाडी हैं सो हर्ष ( आनन्द ) से फूलती हैं, इससे उनको चैतन्य ( लिंग सतर होना ) होता है वीर्यके प्रभावसे नहीं होता, ये ध्वजभंग नपुंसकके पांच भेद हैं ॥ जरासम्भवपुंसकके लक्षण । क्लैब्यं जरासम्भवं हि प्रवक्ष्याम्यथ तच्छृणु । जघन्यमध्यप्रवरं वयस्त्रिविधमुच्यते ॥ २३ ॥ अथ च प्रवरे शुक्रं प्रायशः क्षीयते नृणाम् । रसादीनां संक्षयाच्च तथैवावृष्यसेवनात् ॥ २४ ॥ बलवर्णेन्द्रियाणां च क्रमेणैव परिक्षयात् । परिक्षयादायुषश्चाप्यनाहाराच्छ्रमात्क्रमात् । जरासम्भवजं क्लैब्यमित्येतैर्हेतुभिर्नृणाम् ॥ २५ ॥ अब मैं जरा ( बुढापे ) में नपुंसक होनेके लक्षण कहता हूँ, उनको सुन । अवस्था तीन-जघन्य ( छोटी ) और मध्यम, तथा प्रवर ( बडी ) इन तीनोंमें प्रवर अर्थात् वृद्ध अवस्थामें बहुधा करके शुक्र ( वीर्य ) क्षीण होता है । उसके हेतु ये हैं-रसादि धातुओंके क्षीण होनेसे, तथा वृष्य ( वीर्यकर्ता ) औषधिके न खानेसे, बल वर्ण इन्द्रिय इनके क्रमसे क्षीण होनेसे, आयु ( अवस्था ) के घटनेसे, भूखा रहनेसे, श्रम ( मेहनत ) के करनेसे इन कारणोंसे जरासम्भव नपुंसक होता है ॥ जायते तेन सोऽत्यर्थं क्षीणधातुः सुदुर्बलः ॥ २६ ॥ विवर्णो विह्वलो दीनः क्षिप्रं व्याधिमथाश्नुते । एतज्जरासम्भवं हि चतुर्थं क्षयजं शृणु ॥ २७ ॥ पूर्वोक्त जरासम्भवक्लीबके होनेसे मनुष्य धातुक्षीण, दुर्बल, देहका हीनवर्ण विह्वल, दीन ऐसा हो जाय और वह शीघ्रही व्याधि ( रोग ) को प्राप्त होय, यह जरास- म्भवके लक्षण कहे, अब चतुर्थ क्षयजक्लीबके लक्षण सुनो ॥ क्षयजक्लीबके लक्षण । अतिप्रचिन्तनाच्चैव शोकात्क्रोधाद्भयादपि । ईर्ष्यात्कण्ठा- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA