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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( ३०२ ) माधवनिदान ।

( ३०२ ) माधवनिदान । स्वरघ्नो वलयो वृन्दो बलासश्च विदारिका । गलौघो मांसतानश्च शतघ्नी रोहिणी गले ॥ ६३ ॥ असाध्याः कीर्त्तिता ह्येते रोगा नव दशैव तु । तेषु चापि क्रियां वैद्यः प्रत्याख्याय समाचरेत् ॥ ६४ ॥ ओष्ठरोग (होठके रोगों) में मांसज, रक्तज और त्रिदोषज असाध्य हैं, मसूढोंके रोगोंमें सन्निपात, नाडी और शौषिर, दांतोंके रोगोंमें श्याव, दालन और भञ्जन, जिह्वाके रोगोंमें बलास और तालुएक रोगोंमें अर्बुद, तथा गलेके रोगोंमें स्वरघ्न, वलय, वृन्द, बलास, विदारिका, गलौघ, मांसतान, शतघ्नी और रोहिणी ये उन्नीस रोग असाध्य हैं, इनपर चिकित्सा करनेवाले वैद्यको प्रत्याख्यान (नटकर) अर्थात् असाध्य कहकर औषध देनी, क्योंकि इसकी मृत्यु निश्चय होय और कदाचित् बच भी जाय ऐसे विचारकर औषधी तो देनी ही चाहिये ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां मुखरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ कर्णरोगनिदानम् । कर्णशूलके लक्षण । समीरणः श्रोत्रगतोऽन्यथा चरन् समंततः शूलमतीव कर्णयोः । करोति दोषैश्च यथास्वमावृतः स कर्णशूलः कथितो दुरासदः ॥ १ ॥ कानमें वायु दोषोंकरके (कफ पित्त रुधिरसे) आवृत होकर कानोंमें उलटी फिरे तब अत्यन्त शूल (दरद) होय इस रोगको कर्णशूल कहते हैं । यह रोग कष्टसाध्य है, कर्णशूलके उपद्रव विदेहने इस प्रकार लिखे हैं- “मूर्च्छा दाहो ज्वरः कासः क्लमोऽथ वमथुस्तथा । उपद्रवाः कर्णशूले भवन्त्येते भविष्यतः ॥” इति ॥ कर्णनादके लक्षण । कर्णस्रोतःस्थिते वाते शृणोति विविधान्स्वरान् । भेरीमृदंगशंखानां कर्णनादः स उच्यते ॥ २ ॥ वायु कानके छिद्रमें स्थित होनेसे अनेक प्रकारके स्वर तथा भेरी मृदंग और शंख इनके शब्द सुनाई देवे, इस रोगको कर्णनाद कहते हैं ॥ १ कर्णशब्देन च कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नमदृष्टोपगृहीतं श्रोत्रमुच्यते ।

भाषाटीकासमेत । ( ३०३ ) बाधिर्य ( बहरा ) के लक्षण । यदा शब्दवहं वायुः स्रोत आवृत्य तिष्ठति । शुद्धश्लेष्मान्वितो वापि बाधिर्यं तेन जायते ॥ ३ ॥ जिस समय केवल वायु अथवा कफयुक्त वायु शब्द बहानेवाली नाडियोंमें स्थित होय, तब उस पुरुषके शब्द सुनाई नहीं देय अर्थात् बहरा हो जाय ॥ कर्णक्ष्वेडके लक्षण । वायुः पित्तादिभिर्युक्तो वेणुघोषसमं स्वनम् । करोति कर्णयोः क्ष्वेडं कर्णक्ष्वेडः स उच्यते ॥ ४ ॥ पित्तादि दाहकरके युक्त वायुसे कानोंमें वेणु ( बंसी ) का शब्द सुनाई देता है उसको कर्णक्ष्वेड कहते हैं ॥ कर्णस्रावके लक्षण । शिरोऽभिघातादथ वा निमज्जतां जले प्रपाकादथवापि विद्रधेः । स्रवेद्धि पूयं श्रवणोऽनिलार्दितः स कर्णसंस्राव इति प्रकीर्तितः ॥५॥ शिरमें किसी प्रकारकी चोट लगनेसे अथवा पानीमें गोता मारनेसे अथवा कानमें विद्रधि पकनेसे वायु कुपित होकर कानोंसे राध बहे उसको कर्णस्राव कहते हैं ॥ कर्णकण्डूके लक्षण । मारुतः कफसंयुक्तः कर्णकण्डूं करोति च । कफसे मिला वायु कानोंमें खुजली उत्पन्न करता है ॥ कर्णगूथके लक्षण । पित्तोष्मशोषितः श्लेष्मा जायते कर्णगूथकः ॥ ६ ॥ पित्तकी गरमीसे कफ सूखकर कानमें मैल जमे, उसको कर्णगूथ कहते हैं ॥ कर्णप्रतिनाहके लक्षण । स कर्णगूथो द्रवतां यदा गतो विलायितो घ्राणमुखं प्रपद्यते । तदा स कर्णप्रतिनाहसंज्ञितो भवेद्विकारः शिरसोऽर्द्धभेदकृत् ॥ ७ ॥ वही कानका मैल पतला होनेसे, अथवा स्नेह स्वेदादिकोंकरके पतला होकर मुख और नाकमें प्राप्त होय, तब उसको कर्णप्रतिनाह कहते हैं, इस रोगसे अर्द्धशिर ( आधासीसीका ) विकार होता है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३०४ ) माधवनिदान ।

( ३०४ ) माधवनिदान । कृमिकर्णके लक्षण । यदा तु मूर्च्छां त्वथवापि जन्तवः सृजन्त्यपत्यान्यथवापि मक्षिकाः । तदंजनत्वाच्छ्रवणो निरुच्यते भिषग्भिराद्यैः कृमिकर्णको गदः ॥ ८ ॥ जिस समय कीडे पडजायँ, अथवा मक्सी अण्डा धरे, कृमिलक्षण होनेसे श्रवण कहते हैं और इसी रोगको द्वितीय पर्यायवाची शब्द कृमिकर्ण कहते हैं ॥ कानमें पतंगादि कीडा धरनेके कारण । पतङ्गः शतपद्यश्च कर्णस्रोतः प्रविश्य हि । अरतिं व्याकुलत्वं च भृशं कुर्वन्ति वेदनाम् ॥ ९ ॥ कर्णो निस्तुद्यते तस्य तथा फुरफुरायते । कीटे चरति रुक्तीव्रा निस्पन्दे मन्दवेदना ॥ १० ॥ पतंग, कनखजूरा, गिजाई आदि कानमें धसनेसे बेचैनी होय, जीव व्याकुल होय और कानमें पीडा होय, तथा कानमें नोचनेकीसी पीडा होय और वह कीडा, कानके भीतर फडके और फिरे उस समय घोर पीडा होय और जब वह बन्द हो तब पीडा बन्द होवे ॥ विविधकर्णविद्रधिके लक्षण । क्षताभिघातप्रभवस्तु विद्रधिर्भवेत्तथा दोषकृतोऽपरः पुनः । स रक्तपीतारुणरक्तमास्रवेत्प्रतोदधूमायनदाहचोषवान् ॥ ११ ॥ कानमें खुजानेसे व्रण हो जाय, चोट लगनेसे कानमें व्रण होकर विद्रधि होय उसी प्रकार वातादिदोषों करके दूसरे प्रकारकी विद्रधि होय है, जब वह फूटे तब उसमेंसे लाल पीला रुधिर बहे, नोचनेकीसी पीडा होवै, धुआंसा निकलता मालूम होवै, दाह होवै, चूसनेकीसी पीडा होवै ॥ कर्णपाकके लक्षण । कर्णपाकस्तु पित्तेन कोथविक्लेदकृद्भवेत् । कर्णे विद्रधिपाकाद्वा जायते चाम्बुपूरणात् ॥ १२ ॥ पित्तसे अथवा कान पकनेसे कानमें पानी जानेसे कर्णपाक रोग होवे उस करके कान सडजावे और गीला रहै ॥ पूतिकर्णके लक्षण । पूयं स्रवति वा पूति स ज्ञेयः पूतिकर्णकः । जिसके कानमें राध निकले वा बास आवे, उसको पूतिकर्ण कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ३०५ ) कर्णशोथ कर्णार्बुद कर्णार्शका हवाला देते हैं- कर्णशोथार्बुदार्शांसि जानीयादुक्तलक्षणैः ॥ १३ ॥ कानकी सूजन, कानका अर्बुद और कानकी अर्श ( बवासीर ) ये रोग होयें तो इनके लक्षण उसी २ निदानके द्वारा जानले, कुछ थोडेसे यहां लिखभी देते हैं-कर्ण- शोथ चार प्रकारका है-वात, पित्त, कफ, रक्तजके भेदसे । इसी प्रकार कर्णार्श कानकी बवासीर भी चार ही प्रकारकी है, चारसे विशेष शोथ अर्शका होना अस- म्भव है इससे चारही हैं । कर्णार्बुदरोग सात प्रकारका है-वात, पित्त, कफ, रुधिर, मांस, मेदा और शिरा इनके भेदसे ॥ अब कहते हैं कि, कर्णरोग सुश्रुतके मतसे २८ प्रकारका है परन्तु चरकके मतसे उसके चारही भेद हैं, उनको कहते हैं- वातजके लक्षण । नादोऽतिरुक्कर्णमलस्य शोषः स्रावस्तनुश्चाश्रवणं च वातात् । बादीसे कानमें शब्द होय, पीडा होय, कानका मैल सूख जाय, पतला स्राव होय, सुनाई नहीं देवे अर्थात् बहरा हो जाय ॥ पित्तजके लक्षण । शोथः सरागो दरणं विदाहः सपीतपूतिस्रवणं च पित्तात् ॥ १४ ॥ पित्तसे कानमें सूजन हो, कान लाल हो, दाह हो, चिरासा हो जाय तथा किंचित् पीला दुर्गन्धयुक्त स्राव होय ॥ कफजके लक्षण । वैश्रुत्यकण्डूस्थिरशोथशुक्ला स्निग्धा स्रुतिः श्लेष्मभवेऽतिरुक् च । कफके प्रभावसे विरुद्ध सुनना, खुजली चले, कठिन सूजन होय, सफेद और चिकना ऐसा स्राव होय ॥ सन्निपातजके लक्षण । सर्वाणि रूपाणि च सन्निपातात्स्रावश्च तत्राधिकदोषवर्णः ॥ १५ ॥ सन्निपातसे सब लक्षण होयें, स्राव होय वा जौनसा दोष अधिक होय वैसाही दोषानुसार वर्णका स्राव होय ॥ कर्णपालीके रोग । कर्णशोथके लक्षण । सौकुमार्याच्चिरोत्सृष्टे सहसापि प्रवर्धिते । कर्णशोथो भवेत्पाल्यां सरुजः परिपोटवान् ॥ १६ ॥ सुकुमार स्त्री अथवा बालक कानकी लौरको एक साथ बहुत बढ़ावै तौ कानकी पाली ( लौर ) में सूजन होकर फूल जावे और दूखे ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३०६ ) माधवनिदान ।

( ३०६ ) माधवनिदान । परिपोटकके लक्षण । कृष्णारुणनिभः स्तब्धः स वातात्परिपोटकः ॥ १७ ॥ वादीसे काला लाल और कठिन ऐसा फूल जाय, उसको परिपोटक कहते हैं ॥ उत्पातके लक्षण । गुर्वाभरणसंयोगात्ताडनाद्धर्षणादपि । शोथः पाल्यां भवेच्छ्यावो दाहपाकरुजान्वितः ॥ रक्तो वा रक्तपित्ताभ्यामुत्पातः स गदो मतः ॥ १८ ॥ कानमें भारी आभरण ( गहना ) पहननेसे अथवा चोटके लगनेसे अथवा कानको खींचनेसे रक्तपित्त कुपित होकर कानकी पालीमें हरी नीली अथवा लाल सूजन होय उसमें दाह होवे, पीडा होवे और रक्त बहे, इस रोगको उत्पात कहते हैं ॥ उन्मन्थके लक्षण । कर्णं बलाद्वर्धयतः पाल्यां वायुः प्रकुप्यति ॥ १९ ॥ कफं संगृह्य कुरुते सशोफं स्तब्धवेदनम् । उन्मन्थकः सकण्डूको विकारः कफवातजः ॥ २० ॥ कानको बलपूर्वक बढानेसे पाली ( लौर ) में वायु कुपित होकर कफको संग लेकर कठिन तथा मन्द पीडायुक्त सूजनको प्रगट करे, उसमें खुजली चले, इस कफवातजन्य विकारको उन्मन्थक कहते हैं ॥ दुःखवर्द्धनके लक्षण । संवर्ध्यमाने दुर्विद्धे कण्डूदाहरुजान्वितः । शोफो भवति पाकश्च त्रिदोषो दुःखवर्द्धनः ॥ २१ ॥ दुष्टरीतिकरके कानको छेदनेसे तथा बढानेसे खुजली दाह पीडायुक्त ऐसी सूजन होय, वह पकजाय, उसको दुःखवर्द्धन कहते हैं ॥ परिलेहीके लक्षण । कफासृक्कृमिसंभूतः स विसर्पन्नितस्ततः । लिहेश्च शष्कुलीं पालिं परिलेहीत्यसौ स्मृतः ॥ २२ ॥ कफ रक्त कृमिसे उत्पन्न भई तथा सर्वत्र विचरनेवाली ऐसी जो सूजन कानकी पालीमें होय, वह कानकी पालीको खाय जाय अर्थात् उसका मांस झरने लगे उसको परिलेही कहते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां कर्णरोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ नासारोगनिदानम् ।

भाषाटीकासमेत । ( ३०७ ) अथ नासारोगनिदानम् । —०-०-०-०-०— पीनसके लक्षण । आनह्यते यस्य विशुष्यते च प्रक्लिद्यते धूप्यति चैव नासा । न वेत्ति यो गंधरसांश्च जन्तुर्जुष्टं व्यवस्येत्स तु पीनसेन ॥ तं चानिलश्लेष्मभवं विकारं ब्रूयात्प्रतिश्यायसमानलिंगम् ॥ १ ॥ जिसकी नाक रुकजाय, वात शोषित कफसे नाक भीतरसे सूखीसी गीली रहे धूआंसा निकले, जिसकी नाकमें सुगंध दुर्गन्ध मिष्ट रसादिककी गन्ध मालूम न हो, उसके पीनस प्रगट भई जाननी, इस वातजन्य विकारको प्रतिश्याय ( पीनस ) कहते हैं ॥ पूतिनस्यके लक्षण । दोषैर्विदग्धैर्गलतालुमूले संमूर्च्छितो यस्य समीरणस्तु । निरेति पूतिर्मुखनासिकाभ्यां तं पूतिनस्यं प्रवदंति रोगम् ॥ २ ॥ गले और तालुएमें दुष्ट भये पित्तरक्तादि दोषकरके वायु मिश्रित होकर नाक और मुखके मार्गोंसे दुर्गन्ध निकले, इस रोगको पूतिनस्य कहते हैं ॥ नासापाकके लक्षण । घ्राणाश्रितं पित्तमरूंषि कुर्याद्यस्मिन्विकारे बलवांश्च पाकः । तन्नासिकापाकमिति व्यवस्येदिक्लेदकोथावथ वापि यत्र ॥ ३ ॥ जिसकी नाकमें पित्त दूषित होकर फुन्सी प्रगट करे और नाक भीतरसे पक- जाय, उसको नासिकापाक कहते हैं, इसमें नाकसे राध बहे और दुर्गंध आवे ॥ पूयरक्तके लक्षण । दोषैर्विदग्धैरथवापि जन्तोर्ललाटदेशेऽभिहतस्य तैस्तैः । नासा स्रवेत्पूयममृग्विभिश्रं तं पूयरक्तं प्रवदन्ति रोगम् ॥ ४ ॥ दोष दुष्ट होनेसे अथवा कपालमें चोट लगनेसे नाकमेंसे राध बहे और रुधिर बहे इस रोगको पूयरक्त कहते हैं ॥ क्षवथु ( छींक ) के लक्षण । घ्राणाश्रिते मर्मणि संप्रदुष्टो यस्यानिलो नासिकया निरेति । कफानुयातो बहुशोऽतिशब्दं तं रोगमाहुः क्षवथुं विधिज्ञाः ॥ ५ ॥ नासिकाश्रित मर्म ( शृङ्गाटकमर्म ) के विषे वायु दुष्ट होकर कफसहित भारी शब्दको नासिकाके बाहर निकाले उसको क्षवथु ( छींक ) कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३०८ ) माधवनिदान ।

( ३०८ ) माधवनिदान । आगन्तुजक्षवथुके लक्षण । तीक्ष्णोपयोगादतिजिघ्रतो वा भावान्कटूनर्कनिरीक्षणाद्वा । सूत्रादिभिर्वा तरुणास्थिमर्मण्युद्घाटितेऽन्यः क्षवथुर्निरेति ॥ ६ ॥ तीखे राई आदि पदार्थ खानेसे, अथवा कडुवा खानेसे, मिरचआदि तीखी वस्तु- ओंके अत्यन्त सूंघनेसे, सूर्यके देखनेसे, अथवा कपडेकी बत्ती बनाकर नाकमें तरु- णास्थि मर्म (फणामर्म) में लगानेसे आगन्तुज क्षवथु (छींक) आती है। आग- न्तुज और दोषज छींक एक ही है ॥ भ्रंशथुके लक्षण । प्रभ्रश्यते नासिकया हि यस्य सांद्रो विदग्धो लवणः कफश्च । प्राक्संचितो मूर्द्धनि सूर्यतप्ते तं भ्रंशथुं व्याधिमुदाहरन्ति ॥ ७ ॥ सूर्यकी गरमी करके मस्तक तप्त होनेसे पूर्व संचितभया विदग्ध गाढा खारी ऐसा कफ नाकसे गिरे उस व्याधिको भ्रंशथुरोग कहते हैं ॥ दीप्तके लक्षण । घ्राणे भृशं दाहसमन्विते तु विनिश्चरेद्धूम इवेह वायुः । नासा प्रदीप्तेव च यस्य जन्तोर्व्याधिं तु तं दीप्तमुदाहरन्ति ॥८॥ नाक अत्यन्त दाहयुक्त होनेसे उसमें वायु धूएँके सदृश विचरे और नाक प्रदीप्त होवे अर्थात् गरम होवे इस रोगको दीप्त कहते हैं ॥ प्रतिनाहके लक्षण । उच्छ्वासमार्गं तु कफः सवातो रुंध्यात्प्रतिनाहमुदाहरेत्तम् । वायुसहित कफ श्वासके मार्गको बन्द करे, तब नाकका स्वर अच्छी रीतिसे चले नहीं, इसको प्रतिनाह कहते हैं ॥ नासास्रावके लक्षण । घ्राणाद्धनः पीतसितस्तनुर्वा दोषः स्रवेत्स्रावमुदाहरेत्तम् ॥ ९ ॥ नाकसे गाढा पीला अथवा सफेद पतला दोष (कफ) स्रवे, उसको स्राव कहते हैं ॥ नासापरिशोषके लक्षण । घ्राणाश्रिते स्रोतसि मारुतेन गाढं प्रतप्ते परिशोषिते च । कृच्छ्राच्छ्वसेदूर्ध्वमधश्च जंतुर्यस्मिन्स नासापरिशोष उक्तः ॥१०॥ वायुसे नासिकाका द्वार अत्यन्त तप्त होकर सूखजाय तब मनुष्य बडे कष्टसे ऊपर नीचेको श्वास लेय, उस रोगको नासापरिशोष कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

चिकित्साभेदार्थ पीनसके आमपक्वके लक्षण ।

भाषाटीकासमेत । ( ३०९ ) चिकित्साभेदार्थ पीनसके आमपक्वके लक्षण । शिरोगुरुत्वमरुचिर्नासास्रावस्तनुः स्वरः। क्षामः ष्ठीवेत्तथाऽभीक्ष्णमामपीनसलक्षणम् ॥ ११ ॥ आमलिंगान्वितः श्लेष्मा घनश्चाप्सु निमज्जति । स्वरवर्णविशुद्धिश्च पक्वपीनसलक्षणम् ॥ १२ ॥ शिरमें भारीपन, अन्नमें अरुचि, नासिकासे गरम गरम जलका झरना आवाज कुछ मन्दी हो और शरीरका कृश होना, बारवार थूकना, यह आम (कच्चे) पीनसके लक्षण हैं और जिसमें इसी पूर्वोक्त आम पीनसके भी लक्षण हों और कफ गाढा हो गया हो और जलमें गेरनेसे डूबजाय और मुखसे साफ आवाज निकले और मुखका रंग ( रूहानी ) अच्छा होय तो जानना कि, यह पीनस पक गया है ॥ प्रतिश्यायकी संप्राप्ति । सन्धारणाजीर्णरजोऽतिभाष्यक्रोधर्तुवैषम्यशिरोभितापैः । प्रजागरातिस्वपनाम्बुशीतावश्यायतो मैथुनबाष्पधूमैः ॥ १३ ॥ संस्त्यानदोषे शिरसि प्रवृद्धो वायुः प्रतिश्यायमुदीरयेच्च ॥ १४ ॥ वेगोंके रोकनेसे, अजीर्ण कारक पदार्थोंके खानेसे, रज ( धूल ) के नासिकाके भीतर जानेसे, अत्यन्त भाषण ( अत्यन्त पढने ) से और अत्यन्त गुस्सा करनेसे तथा ऋतुविपर्यय अर्थात् एक ऋतुमें दूसरे ऋतुके लक्षण होनेसे, शिरोभिताप अर्थात् ग्रीष्म ऋतुमें शिरसे अत्यन्त धूप सेवन करनेसे, रात्रिमें जागनेसे, दिनमें विशेष सोनेसे और शीत पदार्थोंके अधिक सेवन करनेसे इसी तरह कोहरके खानेसे अत्यन्त मैथुन करनेसे, पसीना अथवा आसुओंके रुकनेसे अथवा नासिकामें धूआँ रुकनेसे शिरमें दोष इकट्ठे हों फिर वायु वृद्धिगत होकर प्रतिश्याय रोग ( जुकाम ) उत्पन्न करे ये कारण सद्योजनक अर्थात् तत्काल पीनस करनेवाले हैं ॥ चयादिक्रमसे इसका दूसरा निदान । चयं गता मूर्द्धनि मारुतादयः पृथक्समस्ताश्च तथैव शोणितम् । प्रकुप्यमाना विविधैः प्रकोपनैस्ततः प्रतिश्यायकरा भवंति ॥ १५ ॥ मस्तकमें पृथक् वातादि दोष तथा सर्व दोष उसी प्रकार रुधिर संचय होकर अनेक प्रकारके कारणों ( बलवानसे वैर करना दिवास्वापादि ) से कुपित होकर प्रतिश्याय उत्पन्न करें ॥

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( ३१० ) माधवनिदान ।

( ३१० ) माधवनिदान । पूर्वरूपके लक्षण । क्षवप्रवृत्तिः शिरसोऽतिपूर्णता स्तम्भोऽङ्गमर्दः परिहृष्टरोमता । उपद्रवाश्चाप्यपरे पृथग्विधा नृणां प्रतिश्यायपुरःसराःस्मृताः ॥१६॥ छींकका आना, मस्तकका भारी होना, अंगोंका जकड जाना तथा अंगोंका टूटना, रोमांचं अवमंथसे आदि ले और धूमादिक तत्काल होनेवाला उपद्रव होय, जब जुकाम होनेहारी होती है तब ये लक्षण होते हैं ॥ वातिकप्रतिश्यायके लक्षण । आनद्धा पिहिता नासा तनुस्रावप्रसेकिनी । गलताल्वोष्ठशोषश्च निस्तोदः शङ्खयोरपि । भवेत्स्वरोपघातश्च प्रतिश्यायेऽनिलात्मजे ॥ १७ ॥ जिसकी नाकका मार्ग रुकजाय, आच्छादित होजाय और उसमेंसे पतला पानी निकले, गला तालू होठ ये सूखजायँ और कनपटी दूखे, गला बैठजाय ये वातके जुकामके लक्षण हैं ॥ पैत्तिकप्रतिश्यायके लक्षण । उष्णः सपीतकः स्रावो घ्राणात्स्रवति पैत्तिके ॥ १८ ॥ कृशोऽतिपाण्डुः सन्तप्तो भवेदुष्णाभिपीडितः । सधूममग्निं सहसा वमतीव च नासया ॥ १९ ॥ जिसकी नाकसे दाह और पीला स्राव होवे, वह मनुष्य कृश और पीला होजाय, उसका देह गरम रहे, नाकसे अग्निके समान धुआं निकले यह पित्तकी पीनसके लक्षण हैं ॥ श्लैष्मिकके लक्षण । घ्राणात्कफः कफकृते श्वेतः पीतः स्रवेद्बहुः । शुक्लाsubभासः शूनाक्षो भवेद्गुरुशिरा नरः ॥ २० ॥ कण्ठताल्वोष्ठशिरसां कण्डूभिरभिपीडितः ॥ २१ ॥ नाकसे सफेद पीला बहुत कफ गिरे, उसकी देह सफेद हो जाय, नेत्रोंके ऊपर सूजन होय और मस्तक भारी रहे और गला तालु होठ और शिर इनमें खुजली विशेष चले ये कफकी पीनसके लक्षण हैं ॥ १ पूर्वरूपाणि दृश्यंते प्रतिश्याये भविष्यति । घ्राणधूमायनं मन्याक्षवथुस्तालुदालनम् ॥ कंठे ध्वंसो मुखे स्रावः शिरस्यापूरणं तथा ॥

भाषाटीकासमेत । ( ३११ ) सान्निपातिकके लक्षण । भूत्वा भूत्वा प्रतिश्यायो यस्याकस्मान्निवर्त्तते । स पक्को वाप्यपक्को वा स तु सर्वभवः स्मृतः ॥ २२ ॥ जिसकी नाकमें पूर्वोक्त कहे सो सर्व लक्षण मिलें, तथा वह पीनस बारबार होकर पककर, अथवा बिना पके नष्ट हो जाय, उसको सन्निपातकी पीनस कहते हैं । यह विदेहे आचार्यके मतसे असाध्य है ॥ दुष्टप्रतिश्यायके लक्षण । प्रक्लिद्यते पुनर्नासा पुनश्च परिशुष्यति । पुनरानह्यते चापि पुनर्विव्रीयते तथा ॥ २३ ॥ निश्वासो वाति दुर्गन्धो नरो गन्धं न वेत्ति च । एवं दुष्टप्रतिश्यायं जानीयात्कृच्छ्रसाधनम् ॥ २४ ॥ बारबार जिसंकी नाक झड़ाकरे और सूखजाय और नाकसे अच्छी तरह श्वास नहीं आवे, नाक रुकजाय और फिर खुलजाय, श्वास लेनेमें बास आवे तथा उस रोगीको सुगंध दुर्गंधका ज्ञान जाता रहे, ऐसे लक्षण होनेसे इसको दुष्टप्रतिश्याय कहते हैं, यह कष्टसे साध्य होती है । यह पीनस पांच पीनसोंके अंतर्गत जाननी इनका ही भेद है यह छठी नहीं हैं ॥ रक्तप्रतिश्यायके लक्षण । रक्तजे तु प्रतिश्याये रक्तस्रावः प्रवर्तते । ताम्राक्षश्च भवेज्जन्तुरुरोघातप्रपीडितः ॥ २५ ॥ दुर्गन्धोच्छ्वासवदनो गन्धानपि न वेत्ति सः ॥ २६ ॥ रुधिरके पीनसमें नाकसे रुधिर गिरे, नेत्र लाल होयँ, उरःक्षतकी पीडाके सदृश पीडा होय, श्वास अथवा मुखमें बास आवे, सुगंध दुर्गंधका ज्ञान नहीं होय । उरःक्षतके लक्षण ग्रन्थान्तरमें लिखे हैं सो जानने । किसी पुस्तकमें-“ पित्तप्रतिश्यायकृतै- र्लिङ्गैश्चापि समन्वितः ” ऐसा पाठ है । इसका अर्थ यह है कि, जिसमें पित्तकी पीनसके लक्षण मिलते हों ॥ १ नृणां दुष्टप्रतिश्यायः सर्वजश्च न सिद्धयति । इति विदेहः । २ उरःक्षतं गुरुस्तम्भः पूतिकर्णकफो रसः । सकासः सज्वरो ज्ञेय उरोघातः सपीनसः ॥ अत्र पित्तप्रतिश्यायलिंगान्यपि बोद्धव्यानि, तुल्यत्वात् पित्तरक्तयोः ॥

( ३१२ ) माधवनिदान ।

( ३१२ ) माधवनिदान । असाध्य लक्षण । सर्व एव प्रतिश्याया नरस्याप्रतिकारिणः । दुष्टतां यान्ति कालेन तदासाध्या भवन्ति च ॥ २७॥ मूर्च्छन्ति कृमयश्चात्र श्वेताः स्निग्धास्तथाऽणवः । कृमिजो यः शिरोरोगस्तुल्यं तेनास्य लक्षणम् ॥ २८ ॥ सर्व पीनस औषधी न करनेसे असाध्य होते हैं, इसमें नाकमें कीडे पड जायँ वे कृमि सफेद और चिकने और बारीक होते हैं । कृमिज शिरोरोगोंके सदृश लक्षण होयँ, कृमिज शिरोरोगके लक्षण शिरोरोगमें कह आये हैं ॥ प्रतिश्याय और विकारोंको भी करता है, उनको कहते हैं- बाधिर्यमान्ध्यमघ्रात्वं घोरांश्च नयनामयान् । शोथाग्निससादकासादीन् वृद्धाः कुर्वन्ति पीनसाः ॥ २९ ॥ पीनस बढनेसे बहरा होजाय, मन्द दीखे, वास आवे नहीं, भयंकर नेत्र रोग होय, सूजन मंदाग्नि खांसी इत्यादि विकार होते हैं ॥ सुश्रुतमें नासिकाके ३१ रोग कहे हैं और इस जगह पीनससे लेकर प्रतिश्या- यपर्यन्त १५ रोग कहे हैं, बाकी १६ रोगोंको संख्यापूरणके वास्ते लिखते हैं ॥ अर्बुदं सप्तधा शोथाश्चत्वारोऽर्शश्चतुर्विधम् । चतुर्विधं रक्तपित्तमुक्तं घ्राणेऽपि तद्विदुः ॥ ३० ॥ सात प्रकारके अर्बुद रोग, चार प्रकारके शोथ ( सूजन ), चार प्रकारके अर्श और चार प्रकारके रक्तपित्त ये पूर्वोक्त कहे रोग सोलह होते हैं । वात, पित्त, कफ, रुधिर, मांस, मेदकरके छः हुए और सातवां शालाक्यसिद्धांतके मतसे सन्निपातका ऐसे सात प्रकारके अर्बुदरोग हुए । वात पित्त कफ सन्निपातके भेदसे चार प्रकारकी, ( सूजन ) भई तथा वात पित्त कफ सन्निपातके भेदसे चारही प्रकारकी अर्श ( बवासीर ) और चारही प्रकारका रक्त रक्तपित्तकी समानतासे एक ही जानना पूर्वोक्त पीनससे लेकर प्रतिश्यायपर्यन्त १५ भये और अर्बुदादि १६ हुए ऐसे सब मिलकर नासिकारोग ३१ हुए ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां नासिकारोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ नेत्ररोगनिदानम् ।

भाषाटीकासमेत । ( ३१३ ) अथ नेत्ररोगनिदानम् । नेत्ररोगका कारण । उष्णाभितप्तस्य जलप्रवेशाद्दूरेक्षणात्स्वप्नविपर्ययाच्च । स्वेदाद्रजोधूमनिषेवणाच्च छर्देर्विघाताद्वमनातियोगात् ॥ १ ॥ द्रवान्नपानातिनिषेवणाच्च विण्मूत्रवातक्रमनिग्रहाच्च । प्रसक्तसंरोदनशोककोपाच्छिरोभिघातादतिमद्यपानात् ॥ २ ॥ तथा ऋतूनां च विपर्ययेण क्लेशाभिघातादतिमैथुनाच्च । बाष्पग्रहात्सूक्ष्मनिरीक्षणाच्च नेत्रे विकाराञ्जनयंति दोषाः ॥ ३ ॥ गरमीसे तप्त होकर जलमें प्रवेश ( स्नानादि करना ऐसा करनेसे शीतलतासे शरीर व्याप्त होकर शरीरकी गरमी ऊपर चढकर नेत्रके तेजको पराभव करनेसे नेत्ररोग उत्पन्न होता है), दूरकी वस्तुको देखनेसे, दिनमें सोने और रात्रिमें जागनेसे नेत्रमें पसीना जानेसे, बाफ लगनेसे, नेत्रोंमें धूल जानेसे, धुआं जानेसे, वमनके वेगको रोकनेसे, बहुत वमन (रद्द) होनेसे, पतले अन्नपानके अत्यन्त सेवन करनेसे, विष्ठा, मूत्र और अधोवायु इनके वेगको धीरे २ निग्रह (कहिये वेग धारण करने) से, निरन्तर रुदन करनेसे, शोकसे, कोपसे, मस्तकमें चोट लगनेसे, अतिमद्य पान करनेसे, उसी प्रकार ऋतुमें विपर्यय अर्थात् शीत कालमें गरमी और गरमीमें शीतकाल होनेसे, क्लेश कहिये कामादिक दुःख उससे, अभिघात कहिये दुःख होनेसे, अतिमैथुन करनेसे, अश्रुपातके वेग धारण करनेसे और सूक्ष्म पदार्थके अवलोकन करनेसे वातादिदोष नेत्रोंमें रोग पैदा करते हैं ॥ सुश्रुतमें नेत्ररोगकी सम्प्राप्ति इस प्रकार लिखी है- शिरानुसारिभिर्दोषैर्विगुणैरूर्ध्वमाश्रितैः । जायन्ते नेत्रभागेषु रोगाः परमदारुणाः ॥ ४ ॥ १ षट्सप्ततिर्नेत्ररोगा भवन्ति, यदाह सुश्रुतः-ततास्त्रिभिस्त्रिशदुक्तास्ते कफेनाधिकास्त्रयः । रक्तजाः षोडश प्रोक्ताः सर्वजाः पंचविंशतिः । बाह्यौ पुनद्वौ च तथा रोगाः षट्सप्ततिः स्मृताः॥ नेत्रप्रमाणं च सुश्रुतेनोक्तम्-द्विच्यङ्गुलंबाहुल्यं स्वांगुष्ठोदरसम्मितम् । द्वयंगुलं सर्वतः सार्धं भिषङ्नयनबुद्बुदम् ॥

( ३१४ ) माधवनिदान ।

( ३१४ ) माधवनिदान । कुपित हुए वातादि दोष नेत्रोंकी नसोंमें प्राप्त हो नेत्रोंका भाग व्याप्त करनेसे उनमें भयंकर रोग उत्पन्न होता है, ये वात पित्त कफ रुधिर सन्निपात और आगन्तुक इनसे होनेवाले ऐसे नेत्ररोग ( ७६ ) हैं ॥ नेत्ररोगमें प्रायः अभिष्यंद ( नेत्र आना ) होता है इसीसे प्रथम उसको कहते हैं- वातात्पित्तात्कफाद्रक्तादभिष्यन्दश्चतुर्विधः । प्रायेण जायते घोरः सर्वनेत्रामयाकरः ॥ ५ ॥ वात पित्त कफ और रुधिर इनसे चार प्रकारका अभिष्यन्दरोग होता है। इसकी पीडा नष्ट नहीं होय तथा यह अभिष्यन्दरोग सर्व नेत्ररोगों ( अधिमंथादिक ) का उत्पत्तिस्थान जानना । सो सुश्रुतमें लिखा है । ( इस रोगको भाषामें नेत्र दुखना कहते हैं अथवा आंखआई कहते हैं ) ॥ वाताभिष्यन्दके लक्षण । निस्तोदनस्तम्भनरोमहर्षसङ्घर्षपारुष्यशिरोभितापाः । विशुष्कभावः शिशिराश्रुता च वाताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ६ ॥ वादीसे नेत्र दुखने आये होयं उनमें सुई चुभानेकीसी पीडा हो, नेत्रोंके स्तम्भन ( ठहरजाना ), रोमांच नेत्रोंमें रेत गिरनेके समान खटके तथा रूक्ष होय, मस्तकमें पीडा हो, नेत्रोंसे पानी गिरे परन्तु नेत्र सूखेसे रहें और नेत्रोंसे आँसू गिरे वह शीतल हो ॥ पित्ताभिष्यन्दके लक्षण । दाहप्रपाकौ शिशिराभिनन्दा धूमायनं बाष्पसमुच्छ्रयश्च । उष्णाश्रुता पीतकनेत्रता च पित्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ७ ॥ पित्तसे नेत्र दुखने आनेसे उनमें बहुत दाह हो, नेत्र पकजायँ, उनमें शीतल पदार्थ लगानेकी इच्छा हो, नेत्रोंसे धूआं निकले अथवा नेत्रोंमें धूआं जानेकीसी पीडा हो, तथा नेत्रोंसे गरम अश्रु ( आंसू ) बहुत पडें, आंख पीलीसी मालूम पडें ॥ कफजाभिष्यन्दके लक्षण । उष्णाभिनन्दा गुरुताभिशोथः कण्डूपदेहावतिशीतता च । स्रावो बहुः पिच्छिल एव चापि कफाभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ८ ॥ कफसे नेत्र दुखने आये हों उसको गरम वस्तु नेत्रोंमें लगानेसे आराम मालूम हो अर्थात् नेत्रमें सेकसा मालूम हो तथा नेत्र भारी होयँ, सूजन हो, खुजली चले, कीचडसे नेत्र दूषित हों, शीतल हों उनमेंसे स्राव होय, सो गाढा और बहुत होय ॥ १ प्रायेण सर्वे नयनामयास्ते भवन्त्यभिष्यन्दनिमित्तमूलाः । इति ॥

भाषाटीकासमेत । ( ३१५ ) रक्ताभिष्यन्दके लक्षण । ताम्राश्रुता लोहितनेत्रता च राज्यः समन्तादतिलोहिताश्च । पित्तस्य लिङ्गानि च यानि तानि रक्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ९ ॥ रक्ताभिष्यन्दसे नेत्रोंसे लाल पानी गिरे, नेत्र लाल होंय, नेत्रोंमें आस पास रेखासी लाललाल दीखे, जो पित्ताभिष्यन्दके लक्षण कहे वे सब लक्षण होवें ॥ अभिष्यन्दसे अधिमन्थकी उत्पत्ति होती है, सो कहते हैं- वृद्धैरेतैरभिष्यन्दैर्नराणामक्रियावताम् । तावन्तस्त्वधिमन्थाः स्युर्नयने तीव्रवेदनाः ॥ १० ॥ इस अभिष्यन्दमें औषधोपचार न करनेसे यह बढकर उतनेही ( चार ) अभि- ष्यन्दरोग नेत्रोंमें प्रगट होंयँ, इससे नेत्रोंमें तीव्र पीडा होय, यह अधिमन्थके सामान्य लक्षण हैं । वेदनाशब्द इस जगह व्यथामात्रका वाचक है, इससे यह प्रगट हुआ कि, वातके अभिष्यन्दसे वातिक अधिमन्थ प्रगट होय, उसमें तीव्र वातज सर्व निस्तोदादि पीडा युक्त होंयँ, इसी प्रकार पित्तकेसे, कफकेसे, रुधिरकेसे पित्त कफ- रुधिरके अधिमन्थ स्वलक्षण करके जानने ॥ उत्पाट्यत इवात्यर्थं नेत्रं निर्मथ्यते तथा । शिरसोऽर्धं च तं विद्यादधिमन्थं स्वलक्षणैः ॥ ११ ॥ दूसरे सामान्य लक्षण-आधे शिरमें उपाडनेकीसी पीडा होय अथवा तोडनेकीसी तथा मथनेकीसी पीडा होय, व्याधिके प्रभावसे आधे शिरमें पीडा हो इसे अधिमन्थ कहते हैं इनके लक्षण वातज अभिष्यन्दके समान जानने ॥ दोषभेदसे कालमर्यादाके लक्षण । हन्याद्दृष्टिं श्लैष्मिकः सप्तरात्राद्योऽधीमन्थो रक्तजः पंचरात्रात् । षड्रात्राद्वा वातिको वै निहन्यान्मिथ्याचारात्पैत्तिकः सद्य एव ॥ १२॥ कफका अधिमन्थ सात दिनमें दृष्टिका नाश करे, रक्तज अधिमन्थ पांच दिनमें, वातिक अधिमन्थ छः ।दिनमें और पैत्तिक अधिमन्थ मिथ्योपचारसे तत्काल ( तीन दिनमें ) दृष्टिका नाशकरे अर्थात् आंख जाती रहे । इस जगह जो कालकी अवधि कही है सो व्याधिके स्वभावसे तथा लंघन प्रलेपादि क्रिया करके तथा अञ्जनानिषे- धके निमित्त कहीं है ॥ नेत्ररोगके सामान्य लक्षण । उदीर्णवेदनं नेत्रं रागोद्रेकसमन्वितम् । घर्षनिस्तोदशूलाश्रुयुक्तमामान्वितं विदुः ॥ १३ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३१६ ) माधवनिदान ।

( ३१६ ) माधवनिदान । जिस नेत्ररोगमें पीडा विशेष होय, लाली बहुत होकर चमका चलें, तथा उसमें घर्ष ( रेत गिरनेसे जैसी पीडा होती है वैसी पीडा ) होय और अर्थात् करकण होय, सुई चुभानेकीसी पीडा होय, शूलसा चले और स्रावयुक्त होवे, उन नेत्रोंको आमयुक्त जानना ॥ अंजन लगानेसे तथा हलका अन्न खानेसे ये लक्षण कहे हैं ॥ निरामके लक्षण । मन्दवेदनता कण्डूः संरम्भाश्रुप्रशान्तता । प्रसन्नवर्णता चाक्ष्णोः संपक्वं दोषमादिशेत् ॥ १४ ॥ नेत्रोंमें पीडा कम होवे, खुजली चले, सूजन मन्द होय, आंसुओंका गिरना होय नेत्रोंका वर्ण स्वच्छ होय, ये दोष पक्क होनेके लक्षण हैं ॥ शोथसहित नेत्रपाकके लक्षण । कण्डूपदेहाश्रुयुतः पक्कोदुम्बरसन्निभः । संरम्भी पच्यते यस्तु नेत्रपाकः स शोफजः । शोथहीनानि लिङ्गानि नेत्रपाके त्वशोथजे ॥ १५ ॥ नेत्रोंमें खुजली तथा लेप और आंसुओंसे युक्त हो और पके गूलरके समान लाल होयँ, ये लक्षण शोथसहित नेत्ररोगके हैं और शोथ ( सूजन ) के बिना जो नेत्र- पाक होय, उसमें शोथको छोडकर सब लक्षण होयँ, यह व्याधि त्रिदोषजन्य होय ॥ हताधिमन्थके लक्षण । उपेक्षणादक्षि यदाऽधिमन्थो वातात्मकः सादयति प्रसह्य । रुजाभिरुग्राभिरसाध्य एष हताधिमन्थः खलु नेत्ररोगः ॥ १६ ॥ वातज अधिमन्थकी उपेक्षा करनेसे वह नेत्रोंको सुखाय देवे, सो मनुष्यके नेत्रोंमें तोद् ( सुईके चुभानेकीसी पीडा ), दाहादि भारी पीडा होय, यह हताधिमंथ नामक नेत्ररोग असाध्य है । इसी रोगको विदेह दृष्टिच्युत्क्षेपणं कहते हैं । अथवा दृष्टिनिर्गम तथा सकलाक्षिशोष भी जानना । यही सुश्रुतकाभी मत है इस रोगसे नेत्र सूखे कम- लके समान हो जाते हैं ॥ १ अन्तर्गतः शिराणां तु यदा तिष्ठति मारुतः । स तदा नयनं प्राप्य शीघ्रं दृष्टिं निरस्यति ॥ तस्यां निरस्यमानायां निर्मथन्निव मारुतः । नयनं निर्वमत्याशु शूलतोदादिमन्थनैः ॥ २ अन्तःशिराणां श्वसनः स्थितो दृष्टिं च प्रक्षिपन् । हताधिमन्थं जनयेत्तमसाध्यं विदुर्बुधाः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ३१७ ) वातपर्ययके लक्षण । वारं वारं च पर्येति भ्रुवौ नेत्रे च मारुतः । रुजश्च विविधास्तीव्रा स ज्ञेयो वातपर्ययः ॥ १७ ॥ वायु क्रमसे कभी कभी भृकुटीमें प्राप्त हो कभी कभी नेत्रोंमें प्राप्त होकर और अनेक प्रकारकी तीव्र पीडा करे उसको वातपर्यय कहते हैं ॥ शुष्काक्षिपाकके लक्षण । यत्कूणितं दारुणरूक्षवर्त्म सन्दह्यते चाविलदर्शनं च । सुदारुणं यत्प्रतिबोधने च शुष्काक्षिपाकोपहतं तदक्षि ॥ १८ ॥ जो नेत्र खुले नहीं अर्थात् संकुचित हो जायँ, जिनकी बाफणी कठिन और रूक्ष होय, जिसकी नेत्रोंमें दाह विशेष होय, यथार्थ दीखे नहीं, जो खोलनेमें बहुत दुःख होय, उन नेत्रोंको शुष्काक्षिपाकनामक रोगसे पीडित जानना । यह रोग रक्तसहित वादीसे होता है सो करालाचार्यने लिखा है ॥ अन्यतोवातके लक्षण । यस्यावटुकर्णशिरोहनुस्थो मन्यागतो वाप्यनिलोऽन्यतो वा । कुर्याद्रुजं वै भ्रुवि लोचने च तमन्यतोवातमुदाहरन्ति ॥ १९ ॥ घाटी ( धार ) कान, मस्तक, ठोढी, मन्या, नाडी इनमें अथवा इतर ठिकाने स्थित जो वायु भृकुटी ( भौंह ) वा नेत्रोंमें तोद भेदादि पीडा करे, इस रोगको अन्यतोवातरोग कहते हैं अर्थात् अन्य स्थानोंमें स्थित होकर अन्य स्थानोंमें पीडा करे इसीसे इसको अन्यतोवातरोग कहते हैं सो विदेहका मत भी है ॥ अम्लाध्युषितके लक्षण । श्यावं लोहितपर्यन्तं सर्वं चाक्षि प्रपच्यते । सदाहशोथं सास्रावमम्लाध्युषितमम्लतः ॥ २० ॥ मध्यमें कुछ नीलवर्ण और आसपास लाल भरा हो ऐसे सर्व नेत्र पकजायँ और उनमें पीले रंगकी फुन्सी होयँ, उनमें दाह होकर सूजन होय, तथा नेत्रोंसे पानी झरे, यह रोग अम्ल खटाई आदि खानेसे होता है । सुश्रुतके मतसे यह रोग पित्तसे होता है, इसको अम्लाध्युषित कहते हैं ॥ १ अथवा शोषयेदक्ष्णोः क्षीणत्तेजोबलादयम् । तत्पद्ममिव संशुष्कमवसीदति लोचनम् ॥ २ कुणितः खरवर्त्माक्षिकृच्छ्रो मीलाविलेक्षणम् । सदाहमस्रजो वाताच्छुष्कपाकान्वितं वदेत् । ३ मन्यानामन्तरे वायुरुत्थितः पृष्ठतोऽपि वा । करोति भेदं निस्तोदं शंखं चाक्ष्णोः स्रवरतथा ॥ तमाहुरन्यतोवातरोगं दृष्टिविदो जनाः ॥ इति ॥

( ३१८ ) माधवनिदान ।

( ३१८ ) माधवनिदान । शिरोत्पातके लक्षण । अवेदना वापि सवेदना वा यस्याक्षिराज्यो हि भवन्ति ताम्राः । मुहुर्विराज्यन्ति च याः सदा दृग्व्याधिः शिरोत्पात इतिप्रदिष्टः ॥२१॥ जिसके नेत्रकी नस पीडासहित अथवा पीडारहित तांबेके समान लाल रंगकी होजायँ और वे सब बराबर अधिकाधिक ( जियादहसे जियादह ) लाल होजायें, इस रोगको शिरोत्पात ( सबलवायु ) कहते हैं। यह रोग रक्तजन्य है ॥ शिराहर्षके लक्षण । मोहाच्छिरोत्पात उपेक्षितस्तु जायेत रोगस्तु शिराप्रहर्षः । ताम्राभमस्रं स्रवति प्रगाढं तथा न शक्नोत्यभिवीक्षितुं च ॥ २२ ॥ अज्ञानकरके शिरोत्पात ( सबल वायु ) की उपेक्षा करनेसे अर्थात् इलाज न करनेसे शिराप्रहर्षरोग होता है उसमें नेत्रोंसे लाल स्वच्छ ऐसे आंसू गिरें और उस रोगीको नेत्रोंसे कुछ दिखाई न देवे ॥ इति सर्वनेत्रगता रोगाः ॥ कृष्णज रोग । अब नेत्रोंके काले रंगका होनेवाले रोग कहते हैं- सव्रणशुक्र लक्षण । निमग्नरूपं तु भवेद्धि कृष्णे सूच्येव विद्धं प्रतिभाति यद्वै । स्रावं स्रवेदुष्णमतीव यच्च तत्सव्रणं शुक्रमुदाहरंति ॥ २३ ॥ नेत्रके काले भागमें शुक्र कहिये फूलसा हो जाय और वह भीतरसे गडासा हो जाय, उसमें सुई चुभानेकीसी पीडा होवे तथा नेत्रोंसे अति गरम और बहुतस स्राव होवे, इस रोगको सव्रणशुक्र कहते हैं, इसमें पीडा बहुत होती है, क्षतमें पीडा होना ठीकही है और नेत्रसरीखे सुकुमार ठिकानेपर तो विशेष पीडा होती है ऐसे भोजविदेहादिकोंका मत है ॥ सव्रणशुक्रके साध्यासाध्य लक्षण । दृष्टेः समीपे न भवेत्त यत्तु न चावगाढं न च संस्रवेद्धि । अवेदनं वा न च युग्मशुक्रं तत्सिद्धिमायाति कदाचिदेव ॥ २४ ॥ जो शुक्र ( फूल ) दृष्टिके समीप होय नहीं और एक त्वचा में होय, बहुत स्रवे ( झरे ) नहीं, जिसम पीडा न होय और एकही स्थानमें दो बूंद ( फूल )

भाषाटीकासमेत । (३१९) न होयँ ऐसा शुक्र कदाचित् अच्छा भी हो जाय परन्तु इनसे विपरीत लक्षण दृष्टिके समीप होना, दूसरी त्वचा में होय, बहुत स्रवे, पीडा होय, एक स्थानमें दो बूंद होयँ यह शुक्र अच्छा नहीं होय ॥ अव्रणशुक्र लक्षण । स्यन्दात्मकं कृष्णगतं सचोषं शंखेन्दुकुन्दप्रतिमावभासम् । वैहायसाभ्रप्रतनु प्रकाशमथाव्रणं साध्यतमं वदंति ॥ २५ ॥ अभिष्यन्दसे उत्पन्न होकर नेत्रोंके काले भागमें चोष कहिये सींग तुमडीकी पीडा युक्त, शंख, चन्द्र, कुन्दपुष्प इनके समान सफेद, आकाशके समान पतला ऐसा जो व्रणरहित शुक्र होय उसको सुखसाध्य कहते हैं ॥ अव्रणशुक्र अवस्थाविशेष करके साध्य होय है, सो कहते हैं- गम्भीरजातं बहलं च शुक्रं चिरोत्थितं वापि वदंति कृच्छ्रम् ॥ २६ ॥ जो शुक्र गंभीर हो अर्थात् दो तीन त्वचाके भीतर हुआ हो तथा मोटा हो उसको कृच्छ्रसाध्य कहते हैं ॥ अव्रण अवस्थाभेद करके असाध्य होता है, उसको कहते हैं- विच्छिन्नमध्यं पिशितावृतं वा चलं शिरासूक्ष्ममदृष्टिकृच्च । द्वित्वग्गतं लोहितमन्ततश्च शिरोत्थितं चापि विवर्जनीयम् ॥ २७ ॥ जो शुक्रके बीचका मांस गिर जाय, इसीसे शुक्रके स्थानमें गडेला हो जाय अथवा इसके विपरीत कहिये पिशितावृत अर्थात् उसके चारों ओर मांस होय, चंचल कहिये एक ठिकाने न रहे, शिराओं करके व्याप्त हों, बारीक हो गया हो, दृष्टि नाश करनेवाला यह 'दृष्टेःसमीपेन भवेत्' इसका उलटा है, दो पटल कहिये पर- दोंके भीतर भया हो, चारों ओरसे लाल हो और बीचमें सफेद और बहुत दिनका शुक्र हो ऐसेको वैद्य त्याग दे ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । उष्णाश्रुपातः पिडिका च नेत्रे यस्मिन्भवेन्मुद्गनिभं च शुक्रम् । तदप्यसाध्यं प्रवदंति केचिदन्यच्च यत्तित्तिरिपक्षतुल्यम् ॥ २८ ॥ जिसके नेत्रोंसे गरम अश्रुपात (आँसू) गिरकर पिडिका उत्पन्न होवे (दो पटलमें शुक्र जानेसे ये लक्षण होते हैं) तथा जिसमें मूंगकी बराबर शुक्र होवे ऐसा नेत्रका शुक्र असाध्य है और जो तीतरके पंखके समान (काले रंगका) होवे उसकी भी कोई २ असाध्य कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

( ३२० ) माधव निदान ।

( ३२० ) माधव निदान । अक्षिपाकात्ययके लक्षण । श्वेतः समाक्रामति सर्वतो हि दोषेण यस्यासितमण्डलं तु । तमक्षिपाकात्ययमक्षिपाकं सर्वात्मकं वर्जयितव्यमाहुः ॥ २९ ॥ नेत्रके कृष्णभागमें दोषोंके योगसे चारों ओर सफेद ( शुक्र ) फैल जावे यह सन्निपातजन्य अक्षिपाकात्ययनामक रोग त्याज्य है ऐसा कहा है ॥ अजकाजातके लक्षण । अजापुरीषप्रतिमो रुजावान् सलोहितो लोहितपिच्छलाश्रु । विगृह्य कृष्णं प्रचयोऽभ्युपैति तच्चाजकाजातमिति व्यवस्येत् ॥३०॥ काले भागमें बकरीके शुष्क विष्ठाके समान, दुखनेवाली, लाल हो और गाढा कुछ कालेंसे आंसू वहे उसको अजकाजात ऐसे जानना चाहिये ॥ इतिकृष्णजरोग ॥ दृष्टिके रोग । पहले पटलमें दोष जानेसे उसके लक्षण । प्रथमे पटले यस्य दोषो दृष्टिं व्यवस्थितः । अव्यक्तानि च रूपाणि कदाचिदथ पश्यति ॥ ३१ ॥ प्रथम पटलमें दोष स्थित होनेसे वह पुरुष अव्यक्तरूप ( घटपटादि पदार्थ ) देखे । दृष्टिका प्रमाण सुश्रुतमें कहा है, यथा- मसूरदलमात्रं तु पंचभूतप्रसादजम् । आधे मसूरदलके समान पञ्चभूत ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ) से प्रगट है । शंका-इस श्लोकमें तो मसूरदलके समान लिखा है फिर आधे मसूरके समान ऐसा अर्थ आपने कैसे किया ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु यह अर्थ हमने निमि आचार्य्यके मतसे लिखा है। यथा-" पंचभूतात्मिका दृष्टिर्मसूरार्द्ध- दलोन्मिता " इति । अब कहते हैं कि मण्डल चार हैं सो सुश्रुतमें लिखा है, यथा- तेजोजलाश्रितं बाह्ये तेष्वन्यत्पिशिताश्रितम् । मेदस्तृतीयं पटलमाश्रितं त्वस्थि चापरम् ॥ पञ्चमांशसमं दृष्टेस्तेषां बाहुल्यमिष्यते ॥ ३२ ॥ १ अजकाजातका भेद विदेह दूसरा कहता है । यथा-कृष्णैरक्षणोर्भवेच्छुक्रं छागलीविट्- समप्रभम् । सांद्रपिच्छिलरक्तास्रात्रित्वग्गा त्वजकेति सः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत। (३२१) प्रथम पटल रुधिर और जलाश्चित है, दूसरा पटल पिशित (मांस) के आश्रित है, तीसरा पटल मेदके आश्रित है, चौथा पटल अस्थि (हड्डी) के आश्रित है, इन चारों पटलोंकी बहुलता दृष्टिके पञ्चमभागके समान होती है ॥ द्वितीयपटलस्थित दोषके लक्षण । दृष्टिर्भृशं विह्वलति द्वितीयं पटलं गते । मक्षिका मशकांन्केशाञ्जालकानि च पश्यति ॥ ३३ ॥ मण्डलानि पताकाश्च मरीचीन्कुण्डलानि च । परिप्लवांश्च विविधान्वर्षमभ्रं तमांसि च ॥ ३४ ॥ दूरस्थानि च रूपाणि मन्यते स समीपतः । समीपस्थानि दूरे च दृष्टेर्गोचरविभ्रमात् ॥ यत्नवानपि चात्यर्थं सूचीपाशं न पश्यति ॥ ३५ ॥ दूसरे पटलमें दोषके जानेसे दृष्टि विह्वल होजाय अर्थात् पदार्थोंके देखनेमें असमर्थ होय, उसी प्रकार नेत्रोंके आगे मक्खी मच्छर बाल जाली मंडल पताका किरण कुण्डल मंडूक आदि अनेक प्रकारके जलके समूह वर्षा मेघ (बादल) अन्धकार ये नहीं दीखें, ये दृष्टि विह्वल होनेसे होते हैं और विषयभ्रान्तिसे दूरकी वस्तु समीप दीखे समीपकी दूर दीखे अनेक यत्न करनेसेभी सुईका छिद्र न दीखे ॥ तृतीयपटलगत दोषके लक्षण । ऊर्ध्वं पश्यति नाधस्तात्तृतीयं पटलं गते ॥ ३६ ॥ महांत्यपि च रूपाणि च्छादितानीव चांबरैः । कर्णनासाक्षिहीनानि विकृतानि च पश्यति ॥ ३७ ॥ यथादोषं च रज्येत दृष्टिर्दोषे बलीयसि । अधःस्थे तु समीपस्थं दूरस्थं चोपरिस्थिते ॥ ३८ ॥ पार्श्वस्थिते पुनर्द्दोषे पार्श्वस्थं नैव पश्यति । समंततः स्थिते दोषे सङ्कुलानीव पश्यति ॥ ३९ ॥ दृष्टिमध्यस्थिते दोषे महद् ह्रस्वं च पश्यति । द्विधा स्थिते द्विधा पश्येद्बहुधा वाऽनवस्थिते ॥ दोषे दृष्टिस्थिते तिर्यगेकं वै मन्यते द्विधा ॥ ४० ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA