भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( ३०५ ) कर्णशोथ कर्णार्बुद कर्णार्शका हवाला देते हैं- कर्णशोथार्बुदार्शांसि जानीयादुक्तलक्षणैः ॥ १३ ॥ कानकी सूजन, कानका अर्बुद और कानकी अर्श ( बवासीर ) ये रोग होयें तो इनके लक्षण उसी २ निदानके द्वारा जानले, कुछ थोडेसे यहां लिखभी देते हैं-कर्ण- शोथ चार प्रकारका है-वात, पित्त, कफ, रक्तजके भेदसे । इसी प्रकार कर्णार्श कानकी बवासीर भी चार ही प्रकारकी है, चारसे विशेष शोथ अर्शका होना अस- म्भव है इससे चारही हैं । कर्णार्बुदरोग सात प्रकारका है-वात, पित्त, कफ, रुधिर, मांस, मेदा और शिरा इनके भेदसे ॥ अब कहते हैं कि, कर्णरोग सुश्रुतके मतसे २८ प्रकारका है परन्तु चरकके मतसे उसके चारही भेद हैं, उनको कहते हैं- वातजके लक्षण । नादोऽतिरुक्कर्णमलस्य शोषः स्रावस्तनुश्चाश्रवणं च वातात् । बादीसे कानमें शब्द होय, पीडा होय, कानका मैल सूख जाय, पतला स्राव होय, सुनाई नहीं देवे अर्थात् बहरा हो जाय ॥ पित्तजके लक्षण । शोथः सरागो दरणं विदाहः सपीतपूतिस्रवणं च पित्तात् ॥ १४ ॥ पित्तसे कानमें सूजन हो, कान लाल हो, दाह हो, चिरासा हो जाय तथा किंचित् पीला दुर्गन्धयुक्त स्राव होय ॥ कफजके लक्षण । वैश्रुत्यकण्डूस्थिरशोथशुक्ला स्निग्धा स्रुतिः श्लेष्मभवेऽतिरुक् च । कफके प्रभावसे विरुद्ध सुनना, खुजली चले, कठिन सूजन होय, सफेद और चिकना ऐसा स्राव होय ॥ सन्निपातजके लक्षण । सर्वाणि रूपाणि च सन्निपातात्स्रावश्च तत्राधिकदोषवर्णः ॥ १५ ॥ सन्निपातसे सब लक्षण होयें, स्राव होय वा जौनसा दोष अधिक होय वैसाही दोषानुसार वर्णका स्राव होय ॥ कर्णपालीके रोग । कर्णशोथके लक्षण । सौकुमार्याच्चिरोत्सृष्टे सहसापि प्रवर्धिते । कर्णशोथो भवेत्पाल्यां सरुजः परिपोटवान् ॥ १६ ॥ सुकुमार स्त्री अथवा बालक कानकी लौरको एक साथ बहुत बढ़ावै तौ कानकी पाली ( लौर ) में सूजन होकर फूल जावे और दूखे ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA