माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ११८ ) माधवनिदान ।
( ११८ ) माधवनिदान । रुधिरका यही स्वभाव है कि, जिसकी गन्धसे ही मनुष्य मूर्छित होता है । अब स्वभावको और भी दृढ करते हैं-“ दृष्ट्वा यदभिमुह्यति ” अर्थात् रक्तके देखनेसे भी मूर्च्छित होय सो लिखा भी है ॥ विष और मद्यसे उत्पन्न मूर्च्छाको कहते हैं— गुणास्तीव्रतरत्वेन स्थितास्तु विषमद्ययोः । त एव तस्मादाभ्यां तु मोहौ स्यातां यथेरितौ ॥ १५ ॥ तैलादिकोंमें जो दश गुण हैं वे ही गुण विष और मद्यमें अत्यंत तीव्रतासे रहते हैं । इसी विष और मद्यके सेवन करनेसे मोह होता है इसमें भी मद्यमें तीव्र रहै और विषमें तीव्रतर रहै इसीसे विषको मोह स्वयं शांत नहीं होता, क्योंकि, विष अपाकी है और मद्यका मोह मद्यके नशा उतरेपर शांत हो जाता है । यह भेद विष और मद्यमें रहता है ॥ रक्तादि तीन मूर्च्छाओंके लक्षण । स्तब्धाङ्गदृष्टिस्त्वसृजा मूढोच्छ्वासश्च मूर्च्छितः ॥ १६ ॥ मद्येन विलपञ्छेते नष्टविभ्रान्तमानसः । गात्राणि विक्षिपन्भूमौ जरां यावन्न याति तत् ॥ १७ ॥ वेपथुस्वप्नतृष्णाः स्युस्तमश्च विषमूर्च्छिते । वेदितव्यं तीव्रतरं यथास्वं विषलक्षणैः ॥ १८ ॥ रुधिरकी मूर्च्छामें अंग और नेत्र निश्चल हो जायं और श्वास अच्छे प्रकार आवे नहीं । बहुत मद्यके पीनेसे जो मूर्च्छा हो उसके ये लक्षण हैं । बहुत बकता हुआ सोय जाय, संज्ञा जाती रहै, भ्रमयुक्त होय और जबतक मद्य न पचे तबतक पृथ्वीमें हाथ पैर पटके । विषजन्य मूर्च्छामें कांपे, सोवे, प्यास लगे और अँधेरा आवे, एवं विष वृक्षके मूल, पत्र, दूध इनके भेदकर जो विषभक्षणसे लक्षण होते हैं, सो सब लक्षण होते हैं ॥ मूर्च्छा, भ्रम, तन्द्रा और निद्रा इनके भेद । मूर्च्छा पित्ततमःप्राया रजःपित्तानिलाद्भ्रमः³ । तमोवातकफात्तन्द्रा निद्रा श्लेष्मतमोभवा ॥ १९ ॥ १ यदुक्तं दृढबलेन—लघु रूक्षमाशु विशदं व्यवायि तीक्ष्णं विकाशि च । उष्णमनिर्देश्यरसं दशगुणमुक्तं विषं तज्ज्ञैः ॥ इति । २ ये विषस्य गुणाः प्रोक्ताः सन्निपातप्रकोपिनः । त एव मद्ये दृश्यन्ते विषे तु बलवत्तराः ॥ इति । ३ तत्र भ्रमः स्थाणौ पुरुषज्ञानं पुरुषे विपरीतसत्त्व- ज्ञानादिकम् । अन्ये चक्रस्थितस्येव संभ्रमवस्तुदर्शनमिति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ११९ ) मूर्च्छामें पित्त और तमोगुण अधिक रहे । रजोगुण पित्त और वायु इनसे भ्रम होय है । तमोगुण, वायु और कफ इनसे तन्द्रा और कफ तथा तमोगुण इनसे निद्रा उत्पन्न होती है ॥ तन्द्राके लक्षण । इन्द्रियार्थेष्वसंप्राप्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः । निद्रार्त्तस्येव यस्यैते तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥ इन्द्रियें अपने अपने विषयको ग्रहण न करें, देह भारी हो जाय अर्थात् सुस्त हो जाय, जम्भाई और क्लम होय ये लक्षण निद्रार्त्त पुरुषके सदृश जिसके होयं उसको तन्द्रा कहते हैं । इसमें आधे नेत्र खुले रहते हैं । निद्रामें इन्द्रिय और मनको मोह होय है, तन्द्रामें केवल इंद्रियोंको ही मोह होता है । निद्रा और भ्रम ये दोनों अति- प्रसिद्ध होनेसे माधवाचार्यने नहीं कहे, परन्तु चरकमें कहे हैं सो इस प्रकारकी- जिस समय मन और इन्द्रिय खेदको प्राप्त होयं और अपने अपने विषय ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ) को त्याग देयं, तब यह मनुष्यको निद्रा आती है ॥ संन्यासके भेदको कहते हैं- दोषेषु मदमूर्च्छाद्या गतवेगेषु देहिनाम् । स्वयमेवोपशाम्यन्ति संन्यासो नौषधैर्विना ॥ २१ ॥ दोषोंके वेग होनेसे मदमूर्च्छादि अपने आप शान्त हो जाते हैं परन्तु यह संन्यास औषधके बिना शान्त नहीं होता है ॥ संन्यासके लक्षण । वाग्देहमनसां चेष्टा आक्षिप्यातिबला मलाः । संन्यस्यन्त्यबलं जन्तुं प्राणायतनमाश्रिताः ॥ २२ ॥ स ना संन्याससंन्यस्तः काष्ठीभूतो मृतोपमः । प्राणैर्विमुच्यते शीघ्रं मुक्त्वा सद्यःफलां क्रियाम् ॥ २३ ॥ अत्यन्त बलिष्ठ भये जो दोष सो वाणी देह और मन इनके व्यापारको बन्दकर हृदयमें प्राप्त हो निर्बलमनुष्यको मूर्च्छा करे वह संन्याससे पीडित मनुष्य काष्ठकी भांति पृथ्वीपर गिरे, उसकी सद्यःफल चिकित्सा अर्थात् सुईसे छेदना, तीखा १ यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः । विषयेभ्योनिर्वर्त्तन्ते तदा स्वपिति मानवः॥ २ चक्रवद्भ्रमतो गात्रं भूमौ पतति सर्वदा । भ्रमरोग इति ज्ञेयो रजःपित्तानिलात्मकः ॥
( १२० ) माधवनिदान ।
( १२० ) माधवनिदान । अञ्जनका लगाना, अनामिकाको पीडित करना, कौंचकी फली लगाना, दाह देना, नास देना इत्यादिक न करे तो वह रोगी प्राणवियुक्त कहिये मरणको प्राप्त हो अन्यथा बचे है ॥ मधुकोशं सुनिर्मथ्य सारमाकृष्य यत्नतः । ब्रजभाषाकृता टीका माधवार्थप्रकाशिका ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां मूर्च्छानिदानं समाप्तम् ॥ अथ मदात्ययनिदानम् । ये विषस्य गुणाः प्रोक्तास्तेऽपि मद्ये प्रतिष्ठिताः । तेन मिथ्योपयुक्तेन भवत्युग्रो मदात्ययः ॥ १ ॥ किंतु मद्यं स्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम् । अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथाऽमृतम् ॥ २ ॥ विषके जो गुण कहे हैं सोई गुण मद्यमें हैं अर्थात् यही मद्य अविधिसे सेवन करामया घोर भयंकर मदात्यय रोग प्रगट करे हैं। कोई ऐसी शंका करे कि, विषके गुण मद्यमें हैं इससे विषके समान मद्यको सेवन न करे । इस विषयमें कहते हैं कि, मद्य यह स्वभावसे ही जैसे अन्न देहधारक है ऐसा ही है, परन्तु वह मद्य अविधिसे पावे तो रोगकारक होता है और विधिंसे सेवन करे तो अमृतके समान गुण करे ॥ विधिसे मद्य पीनेका लक्षण। विधिना मात्रया काले हितैरन्नैर्यथाबलम् । प्रहृष्टो यः पिबेन्मद्यं तस्य स्यादमृतं यथा ॥ ३ ॥ स्निग्धैः सदन्नैर्मासैश्च सह भक्ष्यैश्च सेवितम् । भवेदायुःप्रकर्षाय बलायोपचयाय च ॥ ४ ॥ १ विधिश्चायं तद्यथा-कुसुमितलतोपगूढः प्रकटनिरन्तरनवां कुरनिकररोमांचैः मधुकरमधुर- झंकारसीत्कारैर्मुक्ककण्ठकलकण्ठकूजितै-दक्षिणसमीरणोद्विजितसमुल्लसितपल्लवकरप्रचारैस्तबणे स्तबभिरुपक्रांततरललताभिरतिशोभनेषु वनोपवनेषु तुषारकिरणै रंजितप्रदोषेषु श्रृंगारसमुचि- तालंकृतिकमनीयकामिनीसमर्पितं ललिटललनोपनीयमानं सुरभिरुचिररूपरसोपदंशकं नाम परिमितपराद्धंमधुपानं कं न सुखयति । चरकेण तु विस्तरेणैतदुक्तं विद्धि।
भाषाटीकासमेत। ( १२१ ) विधिपूर्वक प्रमाणके संग, योग्यकालमें, चिकना आदि अच्छे अन्नके संग बला- बलके अनुसार अत्यन्त हर्षकें साथ जो मद्यपान करे उसको अमृतके तुल्य गुण करे। इसके पीनेकी विधि मदात्ययके दूसरे श्लोककी टिप्पणीमें लिख आये हैं तथा अन्यान्तरोंमें विधि तथा मात्रा कालका नियम लिखा है अर्थात् शुद्ध शरीर होकर प्रातःकाल सोपदंश ( अर्थात् मद्यपान करनेके बाद जो चटनी आदि पदार्थ खायेजाते हैं सो ) इन करके सहित दो पल पीवे, मध्याह्नको चार पल पीवे, तदनन्तर चिकना पदार्थ भोजन करे और सायंकालको आठ पल पीवे, इस जगह पल नाम जयपुरसाई १ टके पक्केको कहते हैं। अथवा चिकने अन्नके साथ मांसके साथ अथवा और भक्ष्य हैं उनके साथ मद्यके सेवन करे तो मनुष्यकी आयुष्य बढे, बल बढे तथा देह पुष्ट हो। इस श्लोकमें "स्निग्धैः सदन्नैः" यह जो पद धरा सो स्निग्धका एक उपलक्षण है अर्थात् जो मद्यसे विपरीत गुण रखते हैं जैसे तीक्ष्णादि दश गुण हैं उनसे विपरीत होय उसके साथ मद्य पीना चाहिये सो तीक्ष्णादि दशगुण ग्रन्थां- तरोंमें लिखे हैं और विशेष देखना होय तो भावप्रकाशमें देख लेवे, इस स्थलमें ग्रन्थविस्तारभयसे हमने त्याग दिये हैं ॥ विधिसे मद्य पीनेके दूसरे गुण । काम्यता मनसस्तुष्टिस्तेजो विक्रम एव च । विधिवत्सेव्यमाने तु मद्ये सन्ति हिता गुणाः ॥ ५ ॥ मद्यको विधिपूर्वक पीनेसे सुन्दर (स्वरूप) वस्तुओंमें मनकी वृत्ति, मनको सन्तोष, उत्साह, दूसरेको जीतनेकी सामर्थ्य इत्यादि हितकारक गुण होते हैं। कही हुई विधिसे विरुद्ध मद्यपान करनेसे मदात्यय रोग होता है। सो मदात्यय तीन प्रकारका है-पूर्वमद मध्यमद और अन्त्यमद ॥ १ शुद्धकायः पिबेत्प्रातः सोपदंशंपलद्वयम् । मध्याह्ने द्विगुणं तच्च स्निग्धाहारेण पाचयेत् ॥ प्रदोषेऽष्टपलं तद्वन्मात्रा मद्ये रसायनम् । आरोग्यं धातुसात्म्यं च कांतिपुष्टिबलप्रदम् । अनेन विधिना सेव्ये मद्य नित्यमतंद्रितैः । अन्यैर्बुद्ध्यादयो यावदुल्लसंति निरत्ययाः ॥ मात्रेयं विहिता मद्ये पाने रोगाय चापरा ॥ इति । २ तत्र कालो द्विविधः-नित्यकः आवश्यकश्च । तत्र नित्यकः ऋतुसम्बन्धी । यथा ग्रीष्मे शीतमधुरं माध्वीकादि । शिते उष्णं तीक्ष्णं गौडिकपैष्टिकादि । तथा आवश्यके काले वाते स्निग्धादि एवं वयस्युदाहार्यम् ॥ ३-लघुतीक्ष्णो हि सूक्ष्माम्लो व्यवायाशुगमेव च । रूक्षं विकाशि विशदं मद्ये दशगुणाः स्मृताः ॥ तथा च सुश्रुते-" मद्यं ह्यम्लं तथा तीक्ष्णं सूक्ष्मं विशदमेव च । रूक्षमाशुकरं चैव व्यवायि च विकासि च ॥" इति ॥ अत्र अम्लरसत्वं चास्योद्भूतरसत्वेनोक्तम् । यदुक्तमन्यत्र " सर्वेषामम्लजातीनां मद्यं मूर्ध्नि व्यवस्थितम् ।" इति ॥ १ मद्यपानानन्तरं भक्षणीयद्रव्यविशेषः ॥
( १३२ ) माधवनिदान ।
( १३२ ) माधवनिदान । पूर्वमदके लक्षण । बुद्धिस्मृतिप्रीतिकरः सुखश्च पानान्ननिद्रारतिवर्धनश्च । संपाठगीतस्वरवर्धनश्च प्रोक्तोऽतिरम्यः प्रथमो मदो हि ॥ ६ ॥ बुद्धि, स्मरण और प्रीति इनको करे, सुख करे, पान ( पीना ), अन्न, निद्रा और रति इनको बढावे, सुन्दर पाठ और गीत गानेको बढावे, ऐसा प्रथम मद अति- रमणीय कहा है । शंका-क्यों जी ! मद तो मनमें विकार उत्पन्न करे है फिर आप इनको रमणीय कैसे कहते हो ? उत्तर-आपने कहा सो ठीक है परन्तु दुःखको दूर करनेसे इनको रमणीयता है, इसी कारण सुश्रुतने हर्षको मनके विकारोंमें कहा है ॥ द्वितीय मदके लक्षण । अव्यक्तबुद्धिस्मृतिवाग्विचेष्टः सोन्मत्तलीलाकृतिरप्रशान्तः । आलस्यनिद्राभिहतो मुहुश्च मध्येन मत्तः पुरुषो मदेन ॥ ७ ॥ मध्यम मदसे मतवाले पुरुषकी बुद्धि स्मरण और वाणी यथार्थ नहीं होय विरुद्ध चेष्टा करे और बावलेकीसी चेष्टा करे, प्रचण्ड हो जाय, बारंबार आलसक और निद्रासे पीडित हो जाय ॥ तृतीय मदके लक्षण । गच्छेदगम्यां न गुरू॑श्च पश्येत्खादेदभक्ष्याणि च नष्टसंज्ञः । ब्रूयाच्च गुह्यानि हृदि स्थितानि मदे तृतीये पुरुषोऽस्वतन्त्रः ॥ ८ ॥ तीसरे मदसे पुरुष मदके अधीन होकर अगम्या (गुरुकी स्त्री आदिसे) गमन करे, बडोंका तिरस्कार करे, जो वस्तु खानेके योग्य नहीं हैं उनको खाय, संज्ञा जाती रहे और जो गुप्तवात हृदयमें हैं उनको कहने लगे ॥ चतुर्थ मदके लक्षण । चतुर्थे तु मदे मूढो भग्नदार्विव निष्क्रियः । कार्याकार्यविभागाज्ञो मृतादप्यपरो मृतः ॥ ९ ॥ को मदं तादृशं गच्छेदुन्मादमिव चापरम् । बहुदोषमिवारूढः कान्तारं स्ववशः कृती ॥ १० ॥ चतुर्थ मदसे मनुष्य मूढ होकर टूटे वृक्षके समान क्रियारहित होय, कार्य ( करने योग्य ) अकार्य ( नहीं करने योग्य ) इनको न समझे वह पुरुष मरेसे भी अधिक CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १२३ ) भरा भया है कौन ऐसा स्ववश अथवा सुकृती पुरुष ऐसे निंद्य मद (अमल) का सहनशील होता है किन्तु कोई नहीं होता. कैसे कि, सिंह व्याघ्रादि हिंसक पशु जिस वनमें बहुत हैं ऐसे निर्जन वनमें मार्गमें कौन चतुर मनुष्य जायगा। शंका-चरक विदेह वाग्भट आदि आचार्योंने तो चतुर्थमद कहा ही नहीं है और सुश्रुतने कहा है इनमें विरोध क्यों है ? उत्तर-चरकमें जो दूसरे और तीसरेमें अन्तर कहा है सोही सुश्रुतने तृतीय मदको मानकर उसके लक्षण कहे हैं और जो चरकमें तृतीय मदके लक्षण कहे हैं, सो सुश्रुतने चतुर्थ मदके लक्षण कहे हैं। ऐसे विरोध नहीं हैं, वास्तवमें तीनही मद हैं। शंका- योंजी ! एकमदसे तीन प्रकारके मद होते हैं इसमें क्या कारण है ? उत्तर-मद्य यह अग्निके समान है जैसे अग्निमें सुवर्ण ( सोना ) तपानेसे, उत्तम मध्यम अधमकी परीक्षा होती है ऐसे ही मद्य भी सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणवाले पुरुषोंकी प्रकृतिसूचक है अर्थात् सत्त्वगुणवाले पुरुषको प्रथम मद, रजोगुणवाले पुरुषको दूसरा मद, तमोगुणवाले पुरुषको तीसरा मद प्राप्त होता है। सो चरकमें लिखा है ॥ विधिहीन मद्यसेवनसे और विकार होते हैं उनको कहते हैं- निर्भुक्तमेकान्तत एव मद्यं निषेव्यमाणं मनुजेन नित्यम् । आपादयेत्कष्टमान्विकारानापादयेच्चापि शरीरभेदम् ॥ ११ ॥ जिस पुरुषने अन्नरहित निरन्तर मद्यपान नित्य करा होय वह अत्यन्त दुःख- दायक विकार (पानात्ययादिक) उत्पन्न करे है और शरीरका विनाश करे है ॥ अन्नके साथ मद्य सेवन करा भया भी क्रुद्धादिकारणोंसे विकारकर्त्ता होता है, सो कहते हैं-- क्रुद्धेन भीतेन पिपासितेन शोकाभितप्तेन बुभुक्षितेन । व्यायामभाराध्वपरिक्षतेन वेगावरोधाभिहतेन चापि ॥ १२ ॥ अत्यम्लभक्ष्यावततोदरेण साजीर्णभुक्तेन तथाऽबलेन । उष्णाभितप्तेन च सेव्यमानं करोति मद्यं विविधान्विकारान् १३॥ क्रोधयुक्त, भयसे पीडित, प्यास, शोकवान्, क्षुधायुक्त, दंड कसरत और भारसे जो क्षीण हो गया होय, मलमूत्रादि वेगसे पीडित हो, अत्यन्त अम्लरस खानेसे जिसका पेट भरा रहा हो, अजीर्णमें भोजन करनेवाले पुरुषके निर्बल पुरुषके गरमीसे तपायमान ऐसे मनुष्यके मद्य सेवन करनेसे अनेक विकार उत्पन्न होते हैं ॥ १ प्रधानावरमध्यानां रुक्माणां व्यक्तिदर्शकः। यथाग्निरेवं सत्त्वानां मद्यं प्रकृतिदर्शकम् ॥
( १२४ ) माधवनिदान ।
( १२४ ) माधवनिदान । उन विकारोंको कहते हैं- पानात्ययं परमदं पानाजीर्णमथापि वा । पानविभ्रममुग्रं च तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १४ ॥ पानात्यय, परमद, पानाजीर्ण और पानविभ्रम इत्यादि विकार होते हैं उनके लक्षण कहता हूं ॥ वातमदात्ययके लक्षण । हिक्काश्वासशिरःकम्पपार्श्वशूलप्रजागरैः । विद्याद्बहुप्रलापस्य वातप्रायं मदात्ययम् ॥ १५ ॥ हिचकी, श्वास, मस्तकका कंप होना, पसवाडोंमें पीडा, निद्राका नाश और अत्यंत बकवाद ये लक्षण जिसमें होय उसको वातप्रधान मदात्यय जानना ॥ पित्तमदात्ययके लक्षण । तृष्णादाहज्वरस्वेदमॊहातीसारविभ्रमैः । विद्याद्धरितवर्णस्य पित्तप्रायं मदात्ययम् ॥ १६ ॥ प्यास, दाह, ज्वर, पसीना, मोह, अतिसार, विभ्रम ( कुछ कुछ ज्ञान होय ) देहका वर्ण हरा होय इन लक्षणोंसे पित्तप्रधान मदात्यय जानना ॥ कफमदात्ययके लक्षण । छर्द्यरोचकहृल्लासतन्द्रास्तैमित्यगौरवैः । विद्याच्छीतपरीतस्य कफप्रायं मदात्ययम् ॥ १७ ॥ वमन ( रद् ), अन्नमें अरुचि, खाली रद् ( ओकारी ), तन्द्रा, देह गीली और भारी और शीत लगे इन लक्षणोंसे कफप्रधान मदात्यय जानना ॥ सन्निपात मदात्ययके लक्षण । ज्ञेयस्त्रिदोषजश्चापि सर्वलिङ्गैर्मदात्ययः ॥ १८ ॥ जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हों उसको सन्निपातप्रधान मदात्यय जानना ॥ परमदके लक्षण । श्लेष्मोच्छ्रयोऽङ्गगुरुता मधुरास्यता च विण्मूत्रसक्तिरथ तन्द्रि- ररोचकश्च । लिङ्गं परस्य तु मदस्य वदन्ति तज्ज्ञास्तृष्णा रुजा शिरसि सन्धिषु चातिभेदः ॥ १९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १२६ ) कफका कोप ( यह नासास्रावादिक जानना ), देहका जड होना, मुखमें मिठास, मलमूत्रका अवरोध, तन्द्रा । अरुचि, प्यास, मस्तकमें पीडा और सन्धियोंमें कुठारीसे तोडने सरीखी पीडा होय ये परमदके लक्षण जानने ॥ पानाजीर्णके लक्षण । आध्मानमुग्रमथवोद्गिरणं विदाहः पाने त्वजीर्णमुपगच्छति लक्षणानि । पेटका अत्यन्त फूलना, वमन, डकारका आना, जलन होना ये लक्षण जब मद्याजीर्ण होय है तब होते हैं ॥ पानविभ्रमके लक्षण । हृद्गात्रतोदकफसंस्रवकण्ठधूममूर्च्छावमिज्वरशिरोरुजनप्रदेहाः॥ २० द्वेषः सुरान्नविकृतेष्वपि तेषु तेषु तं पानविभ्रममुशन्त्यखिलेनधीराः ॥ हृदय और गात्र इनमें सुई चुभानेकीसी पीडा होय, कफका स्राव होय, कण्ठसे धुवां निकलनेकीसी पीडा, मूर्च्छा, वमन, ज्वर, शिरमें पीडा, मुख कफसे लिप्तसासा होय, अनेक प्रकारकी मैरेय पैष्टिक इत्यादिक सुराविकृति और लड्डू, पेडा आदि अन्नविकृति इनमें द्वेष होय इन सर्व लक्षणसे इस रोगको ( पानविभ्रम ) ऐसे कहते हैं । सन्निपातके अन्तर्गत होनेसे ये परमदादिक तीनों चरकने नहीं कहे और पूर्वोक्त मदात्ययके लक्षणसे विलक्षण होनेसे सुश्रुतमें उक्त त्रिदोषज मदात्य- यको पृथक् कहा है ॥ पानविभ्रमके असाध्य लक्षण । हीनोत्तरोष्ठमतिशीतममन्ददाहं तैलप्रभास्यमतिपानहतं त्यजेत्तम् ॥ २१ ॥ जिह्वौष्ठदन्तमसितं त्वथवापि नीलं पीतं च यस्य नयने रुधिरप्रभे वा । ऊपरके होठसे नीचेका होठ कुछ लम्बा होय, देहके बाहर अतिशीत लगे और भीतर अत्यन्त दाह होय, तेलसे लिप्तसदृश मुख हो, जीभ होठ दांत ये काले अथवा नीले हो जायँ, नेत्र पीले, अथवा रुधिरके समान लाल होयँ ऐसे अतिपानसे अर्थात् अतिमद्य पीनेसे नष्ट मनुष्यको वैद्य त्याग दे । चरकमें ध्वंसक, विक्षेपक दो मद्यविकार और कहे हैं ॥ १ विच्छिन्नमद्यः सहसा योऽतिमद्यं निषेवते । ध्वंसो विक्षेपकश्चैव रोगस्तस्योपजाते ॥ १॥ श्लेष्माप्रसेकः कंठास्यशोषः सर्वासहिष्णुता । निद्रातन्द्रातियोगश्च ज्ञेयं ध्वंसकलक्षणम् ॥ २ ॥ हृत्कण्ठरोगसंमोहच्छर्द्दिरंगरुजाज्वरः । तृष्णाकासशिरःशूलमेतद्विक्षेपलक्षणम् ॥ ३ ॥
( १२६ ) माधवनिदान ।
( १२६ ) माधवनिदान । पानविभ्रमके उपद्रव कहते हैं— हिक्काज्वरौ वमथुवेपथुपार्श्वशूलाः कासभ्रमावपि च पानहतं त्यजेत्तम् ॥ २२ ॥ हिचकी, ज्वर, वमन, कंप, पसवाडोंमें पीडा होय, खांसी, भ्रम ये उपद्रव जिसको होयँ उसको वैद्य त्याग दे, परन्तु जैजट आचार्य कहते हैं कि, असाध्य लक्षणसे पृथक् पाठ होनेसे और यह लक्षण होनेसे रोगी कृच्छ्रसाध्य जानना असाध्य न जानना ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरी- भाषाटीकायां मदात्ययरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ दाहनिदानम् । दाहरोग सात प्रकारका है—तिसमें प्रथम मद्यजन्य दाहके लक्षण कहते हैं— त्वचं प्राप्तः स पानोष्मा पित्तरक्ताभिमूर्च्छितः । दाहं प्रकुरुते घोरं पित्तवत्तत्र भेषजम् ॥ १ ॥ मद्यपान करनेसे कुपित भया जो पित्त उस पित्तकी उष्णता पित्तरक्तको बढ़ाय भयंकर दाहरोग उत्पन्न करे इसमें पित्तके समान औषध करे ॥ रक्तज और पित्तज दाहके लक्षण । कृत्स्नदेहानुगं रक्तमुद्रिक्तं दहति ध्रुवम् । समुष्यते तृष्यते च ताम्राभस्ताम्रलोचनः ॥ २ ॥ लोहगन्धाङ्गवदनो वह्निनेवाव- कीर्यते । पित्तज्वरसमः पित्तात्स चाप्यस्य विधिः स्मृतः ॥ ३ ॥ सर्व देहका रुधिर कुपित होकर अत्यन्त दाह करे और वह रोगी अग्निके समीप रहनेसे जैसा तपे है ऐसा तपे, प्यासयुक्त, ताम्रके रंगसदृश देहका रंग होय और नेत्र भी लाल होयँ, तथा मुखसे और देहसे तप्त लोहेपर जल डालनेकीसी गन्ध आवे और अंगोंमें मानों किसीने अग्नि लगाय दीनी ऐसी वेदना होय, पित्तसे जो दाह होय उसमें पित्तज्वरकेसे लक्षण होते हैं उसपर पित्तज्वरकी चिकित्सा करनी चाहिये । पित्तज्वरमें और पित्तके दाहमें इतना अन्तर है कि, पित्तज्वरमें अरति आमा शयका दुष्ट होना होता है और पित्तके दाहमें नहीं होता और सब लक्षण होते हैं ॥ प्यास रोकनेके लक्षण । तृष्णानिरोधादब्धातौ क्षीणे तेजः समुद्धतम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १२७ ) स बाह्याभ्यन्तरं देहं प्रदहेन्मन्दचेतसः ॥ ४ ॥ संशुष्कगलताल्वोष्ठो जिह्वां निष्कृष्य वेपते । प्यासके रोकनेसे जलरूप धातु क्षीण होकर तेज कहिये पित्तकी गरमीको बढावे तब वह गरमी देहके बाहर और भीतर दाह करे, इस दाहसे रोगी बेसुध होय और गला, तालु, होठ यह अत्यन्त सूखें और जीभको बाहर काढ दे कांपे ॥ शस्त्रघातज दाहके लक्षण । असृजः पूर्णकोष्ठस्य दाहोऽन्यः स्यात्सुदुःसहः ॥ ५ ॥ शस्त्र कहिये तलवार आदिके लगनेसे प्रगट रुधिर उस रुधिरसे कोष्ठ कहिये हृदय भरजाय तब दाह अत्यन्त दुःसह प्रगट होय ॥ धातुक्षयजन्यदाहके लक्षण । धातुक्षयोत्थो यो दाहस्तेन मूर्च्छातृषान्वितः । क्षामस्वरः क्रियाहीनः स सीदेद्भृशपीडितः ॥ ६ ॥ धातुके क्षय होनेसे जो दाह होय उससे रोगी मूर्च्छा प्यास इनसे युक्त होय, स्वरभंग और चेष्टाहीन होय और इस दाहसे पीडित होकर यदि चिकित्सा न करावे तो वह रोगी मरणको प्राप्त होय ॥ क्षतज दाहके लक्षण । क्षतजोऽनश्नतश्चान्यः शोचतो वाप्यनेकधा । तेनान्तर्दाह्यतेऽत्यर्थं तृष्णामूर्च्छाप्रलापवान् ॥ ७ ॥ क्षत (घाव) के होनेसे जो दाह हो उससे आहार थोडा रहजावे और अनेक प्रकारके शोककर दाह होय और इस दाहकरके अभ्यन्तरदाह होय तथा प्यास मूर्च्छा और प्रलाप (बकवाद) ये लक्षण होयँ ॥ मर्माभिघातज दाहके लक्षण । मर्माभिघातजोऽप्यस्ति सोऽसाध्यः सप्तमो मतः । मर्मस्थान (हृदय शिरा बस्ति) में चोट लगनेसे जो दाह होय सो सातवां असाध्य है अर्थात् और जो छः दाह हैं वे साध्य हैं ॥ सर्व एव च वर्ज्याः स्युः शीतगात्रस्य देहिनः ॥ ८ ॥ सब दाहोंमें शीतल देहवाला रोगी त्याज्य है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा टीकायां दाहनिदानं समाप्तम् ॥
( १२८ ) माधवनिदान ।
( १२८ ) माधवनिदान । अथोन्मादनिदानम् । ――-oo>0<§>0<oo-―― मदयन्त्युद्गता दोषा यस्मादुन्मार्गमाश्रिताः । मानसोऽयमतो व्याधिरुन्माद इति कीर्त्यते ॥ १ ॥ दोष ( वात पित्त कफ ) बढकर अपने २ मार्गको छोड अन्यमार्ग अर्थात् मनोवह धमनियोंमें प्राप्त होकर मनको उन्मत्त करें और यह व्याधि मानसी है अतएव इसको उन्माद ऐसे कहते हैं ॥ एकैकशः सर्वशश्च दोषैरत्यर्थमूर्च्छितैः । मानसेन च दुःखेन स पञ्चविध उच्यते ॥ २ ॥ विषाद्भवति षष्ठश्च यथास्वं तत्र भेषजम् । स चाप्रवृद्धस्तरुणो मदसंज्ञां बिभर्ति च ॥ ३ ॥ अत्यन्त कुपित भये पृथक् पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपात ४ और ५ मानसिक दुःखसे यह रोग पांच प्रकारका और ६ विषखानेसे छठा, इनमें यथादोषानुसार औषध देनी चाहिये, जबतक यह रोग बढे नहीं और जबतक तरुण रहे तबतक इस रोगको मद ऐसे कहते हैं ॥ उन्मादके सामान्य कारण और सम्प्राप्ति । विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि प्रधर्षणं देवगुरुद्विजानाम् । उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वो मनोऽभिघातो विषमाश्च चेष्टाः ॥ ४ ॥ तैरल्पसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा बुद्धेर्निवासं हृदयं प्रदूष्य । स्रोतांस्यधिष्ठाय मनोवहानि प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः ॥ ५ ॥ विरुद्ध दुष्ट कहिये जहर मिला अन्न आदि, अशुचि चाण्डालादिसे स्पर्श करा ऐसा भोजन, देवता, गुरु, ब्राह्मण इसका तिरस्कार करनेसे, भय और हर्षके होनेसे मनको बिगाड सब चेष्टा विपरीत करे अर्थात् टेढा तिरछा चले, बलवान्से वैर करे, बकने लगे । इस श्लोकमें पूर्वशब्द कारणका है और चकारसे काम क्रोध लोभादिक भी उन्माद रोगके कारण हैं यह जैज्जटका मत है । इनमें कहे जो कार- णोंसे अल्प सत्त्वगुणवाले पुरुषके वातादिक दोष कुपित होकर बुद्धिका निवासस्थान ( रहनेका ठिकाना ) जो हृदय उसको बिगाड मनके बहनेवाले स्रोतोंमें प्राप्त हो मनुष्यके अन्तःकरणको मोहित करें ॥ १ उत् ऊर्ध्वं हृदयं गता दोषा मदयन्ति मनोविभ्रमं कुर्वन्तीत्युन्मादः ॥
भाषाटीकासमेत । ( १२९ ) उन्मादका स्वरूप । धीविभ्रमः सत्त्वपरिप्लवश्च पर्याकुला दृष्टिरधीरता च । अबद्धवाक्यं हृदयं च शून्यं सामान्यमुन्मादगदस्य चिह्नम् ॥ ६ ॥ बुद्धिमें भ्रम, मनका चञ्चल होना, दृष्टिका सर्वत्र चलना, अधीरजपना ( डर- पना ); कुछका कुछ बोलना, हृदय शून्य हो जाय ( अर्थात् विचार शक्तिका नाश होना ) ये उन्मादरोगके सामान्य लक्षण हैं ॥ विशेष लक्षण । रूक्षाल्पशीतान्नविरेकधातुक्षयोपवासैरनिलोऽतिवृद्धः । चिन्तादिदुष्टं हृदयं प्रदूष्य बुद्धिं स्मृतिं चापि निहन्ति शीघ्रम् ॥७॥ अस्थानहासस्मितनृत्यगीतवागङ्गविक्षेपणरोदनानि । पारुष्यकाश्यर्यारुणवर्णता च जीर्णे बलं चानिलजस्वरूपम् ॥ ८ ॥ रूखा, थोडा और शीतल ऐसा 'अन्नविरेक' इस शब्दसे इस जगह दस्त और वमन जानना, धातुक्षय और उपवास इन कारणोंसे अत्यन्त बढी जो वायु सो चिन्ता शोकादिकरके युक्त होकर हृदयको अत्यन्त दुष्टकर बुद्धि और स्मरण इनका शीघ्र नाश करे और हँसनेके कारण विना हँसे ( मन्दमुसकान करे ) नाचे, बिना प्रसंगके गीत और बोलना करे, हाथोंको सर्वत्र चलावे, रोवे और शरीर रूखा तथा कृश और लाल हो जाय और आहारका परिपाक भयंकर ज्यादा जोर होय ये वातज उन्मादके लक्षण हैं ॥ पित्तज उन्मादके कारण और लक्षण । अजीर्णकट्वम्लविदाह्यशीतैर्भोज्यैश्चितं पित्तमुदीर्णवेगम् । उन्मादमत्युग्रमनात्मकस्य हृदि स्थितं पूर्ववदाशु कुर्यात् ॥ ९ ॥ अमर्षसंरंभविनग्नभावाः सन्तर्जनाभिद्रवणौष्ण्यरोषाः । प्रच्छायशीतान्नजलाभिलाषः पीतास्यता पित्तकृतस्य लिङ्गम्॥१०॥ अधकच्ची, कडवी, खट्टी, दाह करनेवाली और गरम ऐसी २ वस्तु भोजन कर- नेसे संचित भया जो पित्त सो तीव्रवेग होकर अजितेन्द्रिय पुरुषके हृदयमें प्रवेश कर पूर्ववत् अति उग्र उन्माद तत्काल उत्पन्न करे । इस उन्मादसे असहनशील, हाथ पैरोंको पटकनेवाला, नग्न हो जाय, डरपे, भाजने लगे, देह गरम होजाय, क्रोध करे, छायामें रहे, शीतल अन्न और शीतल जल इनकी इच्छा, पीला मुख होजाय ये लक्षण पित्तज उन्मादके हैं ॥ ६
( १३० ) माधवनिदान ।
( १३० ) माधवनिदान । कफजन्य उन्मादके कारण और लक्षण । संपूरणैर्मन्दविचेष्टितस्य सोष्मा कफो मर्मणि संप्रवृत्तः । बुद्धिं स्मृतिं चाप्युपहन्ति चित्तं प्रमोहयन्संजनयेद्विकारम् ॥ ११ ॥ वाक्चेष्टितं मन्दमरोचकश्च नारीविविक्तप्रियताऽतिनिद्रा । छर्दिश्च लाला च बलं च भुंक्ते नखादिशौक्ल्यं च कफात्मके स्यात् १२ मन्द भूखमें भोजन कर कुछ परिश्रम न करे, ऐसे पुरुषके पित्तयुक्त कफ हृद्- यमें अत्यन्त बढकर बुद्धि स्मरण और चित्त इनकी शक्तिका नाश करे और मोहित हो, उन्मादरूपविकारको उत्पन्न करे उस विकारसे वाणीका व्यापार कहिये बोलना इत्यादि मन्द हो, अरुचि होय, स्त्री प्यारी लगे, एकांतवास करे, निद्रा अत्यन्त आवे, वमन होय, मुखसे लार बहे, भोजन करे पिछाडी इस रोगका जोर हो । नख आदि- शब्दसे त्वचा, मूत्र, नेत्रादिक ये सफेद होयँ ये लक्षण कफके उन्मादके हैं ॥ सन्निपात उन्मादके लक्षण । यः सन्निपातप्रभवोऽतिघोरः सर्वैः समस्तैरपि हेतुभिः स्यात् । सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति तादृग्विरुद्धभैषज्यविधिर्विवर्ज्यः ॥ १३ ॥ जो उन्माद वातादिक दोष करके अथवा तीनों दोषोंके कारण करके होय वह सन्निपातजन्य उन्माद बहुत भयंकर होता है । उसमें सब दोषोंके लक्षण होते हैं। इसमें विरुद्ध औषधकी विधि वर्जित है। यह उन्माद वैद्यों करके त्याज्य है। कारण यह कि, असाध्य है ॥ शोकज उन्मादके लक्षण । चौरैर्नरेन्द्रपुरुषैररिभिस्तथान्यैर्वित्रासितस्य धनबान्धवसंक्ष- याद्वा । गाढं क्षते मनसि च प्रियया रिरंसोर्जायेत चोत्कटतरो मनसो विकारः ॥ १४ ॥ चित्रं ब्रवीति च मनोऽनुगतं विसंज्ञो गायत्यथो हसति रोदिति चातिमूढः । चोरोंने, राजाके मनुष्योंने अथवा शत्रुओंने उसी प्रकार सिंह, व्याघ्र, हाथी आदि किसीने त्रास दिया होय अथवा धन बंधुके नाश होनेसे ऐसे पुरुषका अन्तःकरण अत्यन्त दुखे, अथवा प्यारी स्त्रीसे संभोग करनेकी इच्छावाले पुरुषके मनमें भयंकर विकार उत्पन्न होय, वह पुरुष गुप्त बातको भी कहने लगे और अनेक प्रकारसे बोले, विपरीत ज्ञान होय तथा गावे, हँसे और रोवे तथा मूर्ख हो जाय ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (१३१) विषजन्य उन्मादके लक्षण । रक्तेक्षणो हतबलेन्द्रियभाः सुदीनः श्यावाननो विषकृतेन भवेद्विसंज्ञः। विषसे प्रगट उन्मादमें नेत्र लाल होयँ, बल इन्द्रिय और शरीरकी कान्ति नष्ट हो जाय, अति दीन हो जाय, उसके मुखपर कालौंच आजाय और संज्ञा जाती रहे ॥ विषज उन्मादके असाध्य लक्षण । अवाङ्मुखस्तूर्ध्वमुखो वा क्षीणमांसबलो नरः । जागरूको ह्यसन्देहमुन्मादेन विनश्यति ॥ १६ ॥ जिसका मुख नीचेको हो अथवा ऊपरको हो और जिसकामांस और बल क्षीण होगया हो तथा जिसकी निद्रा जाती रही हो ऐसा मनुष्य निश्चय इस उन्माद- करके नाशको प्राप्त हो ॥ भूतज उन्मादके लक्षण । अमर्त्यवाग्विक्रमवीर्यचेष्टाज्ञानादिविज्ञानबलादिभिर्यः । उन्मादकालो नियतश्च यस्य भूतोत्थमुन्मादमुदाहरेत्तम् ॥ १७॥ वाणी, पराक्रम, शक्ति, देहका व्यापार, तत्त्वज्ञान, शिल्पादि ज्ञान अथवा ज्ञान कहिये शास्त्रज्ञान और विज्ञाननाम तदर्थनिश्चय, आदिशब्दसे स्मृत्यादिक ये जिसकी मनुष्यकीसी न होयँ और जिसका उन्मत्त होनेका काल निश्चय होय, ऐसे उन्मादको भूतोन्माद कहते हैं। भूतशब्दसे यहां आगे कहेंगे सो सब देवता जानने ॥ देवग्रहजके लक्षण । सन्तुष्टः शुचिरतिदिव्यमाल्यगन्धो निस्तन्द्रस्त्ववितथसंस्कृत- प्रभाषी । तेजस्वी स्थिरनयनो वरप्रदाता ब्रह्मण्यो भवति नरः स देवजुष्टः ॥ १८ ॥ सदा संतोषयुक्त रहे, पवित्र रहे, देहमें दिव्यपुष्पके समान सुगंध, नेत्रोंके पलक लगे नहीं, सत्य और संस्कृतका बोलनेवाला हो, तेजस्वी, स्थिरदृष्टि, वरका देनेवाला (तेरा कल्याण हो ऐसे वर देवे), ब्राह्मणसे प्रीति राखे ऐसा मनुष्य देवग्रहपीडित जानना । देवशब्दसे गणमातृकादि ग्राह्य हैं सो विदेहने कहा भी है ॥ १ क्रोधेन स्तब्धसर्वाङ्गो लालाफेनाविलाननः । निद्रालुः कंपते मूको गणमातृभिरार्दितः ॥
( १३२ ) माधवनिदान । असुरपीडितके लक्षण । संस्वेदी द्विजगुरुदेवदोषवक्ता जिह्माक्षो विगतभयो विमार्ग- दृष्टिः । सन्तुष्टो न भवति चान्नपानजातैर्दुष्टात्मा भवति स देवशत्रुजुष्टः ॥ १९ ॥ पसीनायुक्त देह, ब्राह्मण, गुरु और देव इनमें दोषारोपण करनेवाला, टेढ़ी दृष्टिसे देखनेवाला, निर्भय, वेदविरुद्ध मार्गका चलनेवाला और बहुत अन्न जलसे भी जिसको सन्तोष न होय और दुष्टबुद्धि ऐसा मनुष्य दैत्यग्रहपीडित जानना ॥ गन्धर्वग्रहजके लक्षण । तुष्टात्मा पुलिनवनान्तरोपसेवी स्वाचारः प्रियपरिगीतगन्ध- माल्यः । नृत्यन्वै प्रहसति चारु चाल्पशब्दं गन्धर्वग्रहपरि- पीडितो मनुष्यः ॥ २० ॥ गन्धर्व ग्रहसे पीडित मनुष्य प्रसन्नचित्त, पुलिन और बाग बगीचेमें रहनेवाला अनिन्दित आचारको करनेवाला, गान सुगन्ध और पुष्प ये जिसको प्यारे लगे वह पुरुष नाचे, हंसे, सुन्दर बोले, थोडा बोले ॥ यक्षग्रहजके लक्षण । ताम्राक्षः प्रियतनुरक्तवस्त्रधारी गम्भीरो द्रुतगतिरल्पवाक् सहिष्णुः । तेजस्वी वदति च किं ददामि कस्मै यो यक्षग्रह- परिपीडितो मनुष्यः ॥ २१ ॥ यक्षग्रहसे पीडित मनुष्यके नेत्र लाल हों, सुन्दर बारीक ऐसे रक्तवस्त्रका धारण करनेवाला, गम्भीर, बुद्धिमान्, जल्दी चलनेवाला, प्रमाणका बोलनेवाला, सहन- शील, तेजस्वी, किसको क्या देऊं ऐसे बोलनेवाला ऐसा होय ॥ पितृग्रहजके लक्षण । प्रेतानां स दिशति संस्तरेषु पिण्डान् भ्रान्तात्मा जलमपि चापसव्यहस्तः । मांसेप्सुस्तिलगुडपायसाभिकामस्तद्भक्तो भवति पितृग्रहाभिजुष्टः ॥ २२ ॥ कुशाके ऊपर प्रेतोंको (पितरोंको) पिंड दे, चित्तमें भ्रांति रहे और उत्तरीयवस्त्र अपसव्य करके तर्पण भी करे, मांस खानेकी इच्छा होय, तथा तिल, गुड खीर इनपर मन चले । इस कहनेका प्रयोजन यह है कि जिसकी जिस पदार्थपर इच्छा
भाषाटीकासमेत । ( १३३ ) होय उसको उसी पदार्थकी बलि देनेसे उस ग्रहकी शांति होती है, ऐसे ही सर्वत्र जानना । यह डल्लनका मत है । और वह मनुष्य पितरोंकी भक्ति करे । ये लक्षण पितृग्रहपीडित मनुष्यके हैं ॥ सर्पग्रहयुक्तके लक्षण । यस्त्वूर्व्यां प्रसरति सर्पवत्कदाचित्सृक्किण्यौ विलिहति जिह्वया तथैव। क्रोद्धालुर्मधुगुडदुग्धपायसेप्सुर्विज्ञेयो भवति भुजङ्ग- मेशजुष्टः ॥ २३ ॥ जो सर्पके समान पृथ्वीमें लोटा करे अर्थात् छातीके बल चले तथा सर्पके समान अपने ओष्ठप्रान्त (होठों) को चाटा करे, सदा क्रोधी रहे, शहद, गुड, दूध और खीरकी इच्छा करे वह सर्पग्रहग्रस्त जानना ॥ राक्षसग्रहपीडितके लक्षण । मांसासृग्विविधसुराविकारलिप्सुर्निर्लज्जो भृशमतिनिष्ठुरोऽति शूरः। क्रोद्धालुर्विपुलबलो निशाविहारी शौचद्विड् भवति च राक्षसैर्गृहीतः ॥ २४ ॥ जो मनुष्य मांस, रुधिर, नाना प्रकारके मद्य पीनेकी इच्छा करे और निर्लज्ज, अत्यन्त निष्ठुर, अत्यन्त शूर, क्रोधी, बडा बली, रात्रिमें डोलनेवाला, अपवित्र ऐसा होय वह राक्षसकरके ग्रस्त जानना॥ पिशाचजुष्टके लक्षण । उद्धस्तः कृशपरुषश्चिरप्रलापी दुर्गन्धो भृशमशुचिस्तथाऽतिलोलः । बह्वाशी विजनवनान्तरोपसेवी व्याचेष्टन्भ्रमति रुदन्पिशाचजुष्टः २५ जो अपने हाथ ऊपरको करे, “उद्वस्त्र” ऐसा भी पाठ है, उस जगह उद्वस्त्र नाम नंगा हो जाय, तेजरहित, बहुत देरपर्यत बकनेवाला, जिसके देहमें दुर्गन्ध आवे, अपवित्र तथा अतिचञ्चल कहिये सब अन्नपानमें इच्छा करनेवाला खानेको मिले तो बहुत भोजन करे, एकान्त वनांतरोंमें रहनेवाला, विरुद्ध चेष्टा करनेवाला, रुदन कर्त्ता, डोलनेवाला ऐसा मनुष्य पिशाचग्रस्त जानना ॥ प्रसंगवशसे ब्रह्मराक्षस और भूतोन्मादके लक्षण ग्रन्थान्तरोंसे लिखते हैं— देवविप्रगुरुद्वेषी वेदवेदाङ्गविच्छुचिः । आशुपीड़ाकरोऽहिंस्रो ब्रह्मराक्षससेवितः ॥ २६ ॥
( १३४ ) माधवनिदान ।
( १३४ ) माधवनिदान ।
देव, ब्राह्मण, गुरुसे द्वेषकर्त्ता, वेद और वेदके अंग ( शिक्षा, कल्प, व्याकरण आदि ) को पढा भया, पवित्र रहनेवाला, शीघ्र पीडाका कर्त्ता, हिंसा करे नहीं ये लक्षण ब्रह्मराक्षसजुष्ट मनुष्यके हैं ॥ भूतोन्मादके लक्षण । महापराक्रमो यश्च दिव्यं ज्ञानं च भाषते । उन्मादकालानैश्चित्यो भूतोन्मादी स उच्यते ॥ २७ ॥ महापराक्रमी और जो श्रेष्ठज्ञानको कहे और जो उन्मादकालका निश्चय न होय उसको भूतोन्मादी कहते हैं ॥ अब कहते हैं कि, देवादिकग्रह इस मनुष्यको तीन कार्यके वास्ते ग्रहण करते हैं, हिंसा अर्थात् मारनेके निमित्त और पूजाके निमित्त तथा विहारके निमित्त । इनमें हिंसाके निमित्त ग्रस्त मनुष्य साध्य (अच्छा) नहीं होय उसके लक्षण आगे कहते हैं॥ स्थूलाक्षो द्रुतमटनः सफेनलेही निद्रालुः पतति च कम्पते च यो हि । यश्चाद्रिद्विरदनगादिविच्युतः स्यात्सोऽसाध्यो भवति तथा त्रयोदशेऽब्दे ॥ २८ ॥ नेत्र भयानक होजायँ, शीघ्र चले, मुखमें जो झाग है उसको चाटनेवाला और जिसको निद्रा बहुत आवे तथा गिरपडे, काँपे और जो पर्वत, हाथी ( अथवा ) नग नाम वृक्ष, आदिशब्दसे भीत मन्दिर आदि जानने, इनसे गिरकर ग्रहग्रस्त होय वह असाध्य है । तैसेही तेरहवें वर्षमें सर्व देवादि उन्मादी असाध्य जानने । विदेहने विशेष लक्षण कहे हैं सो ग्रन्थान्तरोंसे जानलेवे ॥ देवादिकोंका आवेशसमय । देवग्रहाः पौर्णमास्यामसुराः सन्ध्ययोरपि । गन्धर्वाः प्रायशोऽष्टम्यां यक्षाश्च प्रतिपद्यथ ॥ २९ ॥ पितृग्रहास्तथा दर्श पञ्चम्यामपि चोरगाः । रक्षांसि रात्रौ पैशाचाश्चतुर्दश्यां विशन्ति हि ॥ ३० ॥ देवग्रह पूर्णमासीको प्रवेश करते हैं, असुरग्रह सायंकालमें, अपिशब्दसे पूर्णमा- सीको भी प्रवेश करते हैं, गन्धर्वग्रह बहुधा अष्टमीको, प्रायःशब्दसे सन्ध्याको भी गन्धर्व ग्रह प्रवेश करते हैं, यक्षग्रह पडवाको, पितृग्रह अमावश्याको, सर्पग्रह पंचमीको, अपिशब्दसे अमावास्याको भी प्रवेश करते हैं, राक्षस रात्रिमें और पिशाच चतु-
१ सन्ध्या त्रिनाडीप्रमिताऽर्कबिम्बादद्धॉदितास्तादध ऊर्ध्वमत्र । इति ॥
र्दशीको मनुष्यदेहमें प्रवेश करते हैं। तिथि कहनेका यह प्रयोजन है कि, जिस जिस तिथिको जो ग्रह मनुष्यको ग्रस्त करे उसको उसी तिथिमें शांतिके निमित्त बलिदाना- दिक कराने चाहिये । शंका-क्योंजी ! जब ग्रहग्रस्त मनुष्योंको उन्माद होता है तो वह ग्रह मनुष्य देहमें प्रवेश करते क्यों नहीं दीखते हैं ? इसवास्ते उत्तर कहते हैं- दर्पणादीन् यथा छाया शीतोष्णं प्राणिनो यथा । स्वमणिं भास्करांशुश्च यथा देहं च देहधृक् । विशन्ति न च दृश्यन्ते ग्रहास्तद्वच्छरीरिणाम् ॥ ३१ ॥ जैसे दर्पणमें मनुष्यका प्रतिबिम्ब पडे है, आदिशब्द इस जगह प्रकारवाची है अर्थात् जल, तैल आदिमें जैसे छाया पडती है और सरदी, गरमी जैसे मनुष्योंको लगती है अथवा जैसे सूर्यकिरण सूर्यकान्तमणि ( आतसीकाच ) में प्रवेश करे है अथवा जैसे जीव देहमें प्रवेश करे है, इसी प्रकार सब ग्रह मनुष्यके शरीरमें प्रवेश करते हैं परन्तु दीखते नहीं हैं। इस श्लोकके पोषक दृष्टान्त जैज्जट आचार्यने बहुत दिये हैं परन्तु ग्रन्थ बढनेके भयसे नहीं लिखे ॥ इस उन्मादरोगमें सर्वत्र देवशब्दकरके देवताओंकेसे आचरणवाले देवताओंके अनुचर ( दास ) जानने चाहिये, क्योंकि देवताओंको मनुष्यके अपवित्र देहमें प्रवेश होना असम्भव है। सो सुश्रुतमें लिखा है-- न ते मनुष्यैः सह संविशन्ति न वा मनुष्यान् कचिदाविशन्ति । ये त्वाविशन्तीति वदन्ति मोहात्ते भूतविद्याविषयादपोह्याः ॥ ३२ ॥ तेषां ग्रहाणां परिचारका ये कोटीसहस्रायुतपद्मसंख्याः । असृग्वसामांसभुजः सुभीमा निशाविहाराश्च तथा विशंति ॥ ३३ ॥ जो देवादिक मनुष्यके साथ मिलते नहीं हैं न वे मनुष्योंकी देहमें प्रवेश करते हैं और जो वैद्य ' प्रवेश करते हैं ' ऐसे कहते हैं, वे अज्ञानसे कहते हैं, ऐसा वैद्य ' भूतविद्यावाला जानकर त्याज्य है । तौ कौन प्रवेश करते हैं ? इस वास्ते कहते हैं ' तेषाम् ' अर्थात् उन देवताओंके परिचारक ( नौकर ) जो करोडों हजारों पद्म- संख्यक रुधिर, वसा, मांसके भोजन करनेवाले भयंकर, रात्रिमें विचरनेवाले हैं वें प्रवेश करते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायामुन्मादरोगनिदानं समाप्तम् ॥ १ ग्रहा गृह्णन्ति ये येषु तेषां तेषु विशेषतः । दिनेषु बलिहोमादीन्प्रयुंजीत चिकित्सकः ॥
( १३६ ) माधवनिदान ।
( १३६ ) माधवनिदान । अथापस्मारनिदानम् । प्रथम सुश्रुतोक्त इस रोगकी निरुक्ति लिखते हैं- स्मृतिर्भूतार्थविज्ञानमपस्तत्परिवर्जने । अपस्मार इति प्रोक्तस्ततोऽयं व्याधिरन्तकृत् ॥ १ ॥ स्मृतिशब्द प्राणियोंके अर्थज्ञानको कहता है और अपशब्द उसका नाशक है इसीसे स्मृति और अप इन दोनों शब्दोंसे अपस्मार यह शब्द सिद्ध हुआ । इसी पूर्वोक्त हेतुके नाशसे यह रोग जलादिकके विषे प्रवेश होनेसे प्राणान्तकारक है ॥ अपस्मारकी निदानपूर्वक सम्प्राप्ति । चिन्ताशोकादिभिर्दोषाः क्रुद्धा हृत्स्रोतसि स्थिताः । कृत्वा स्मृतेरपध्वंसमपस्मारं प्रकुर्वते ॥ २ ॥ चिन्ता, शोक, आदिशब्दसे क्रोध, लोभ, मोहादिसे कुपित भये जो दोष ( वात, पित्त, कफ ) सो हृदयमें स्थित जो मनके बहनेवाली नाडी उनमें प्राप्त हो स्मरण ( ज्ञान ) का नाश कर अपस्माररोगको प्रगट करे ॥ वाग्भटके मतसे निदान । मिथ्यायोगेन्द्रियार्थानां कर्मणामतिसेवनात् । निरुद्धमलिनां कर्मविहारकुपितैर्मलैः ॥ ३ ॥ वेगनिग्रहशीलानामहताशुचि- भोजिनाम् । रजस्तमोभिभूतानां गच्छतां वा रजस्वलाम् । तथा कामभयोद्वेगक्रोधशोकादिभिर्भृशम् । चेतसोऽभिभवैः पुंसामपस्मारोऽभिजायते ॥ ४ ॥ इन्द्रियोंके अर्थ कहिये विषय और कर्म, उनका मिथ्यायोग, अतियोग और अयोगके सेवन करनेसे तथा निरुद्धमल भोजन और विहारसे कुपित भये जो दोष उनसे तथा मूत्रमलादि वेगोंके धारण करनेवालोंके अहित और अपवित्र भोजन करनेसे रजोगुणी मनुष्योंके, रजस्वला स्त्रीगमन करनेसे तथा काम, भय, उद्वेग, क्रोध, शोक इन कारणोंसे, चित्त ( मन ) के बिगडनेसे मनुष्योंके अपस्माररोग प्रगट होता है । तहां श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, रसन, घ्राण ये इंद्रियोंके अर्थ हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये इन्द्रियोंके विषय हैं । इनके अतिसेवनसे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १३७ ) उदाहरण दिखाते हैं, जैसे-पुरुषका इष्टनाशादि सुनना मिथ्यायोग है, पटहादि बाजोंका सुनना अतियोग है, कुछ न सुनना अयोग है । ऐसेही अपवित्र आदिको छूना मिथ्यायोग है, अतिशीतल अतिगरम छूना, स्नान उबटना आदिका सेवन अतियोग है, किसीको न छूना अयोग है । छोटी वस्तुका देखना मिथ्यायोग है, बड़ी वस्तुका देखना अतियोग और किसीको न देखना अयोग है । रसोंका अतिसेवन अतियोग है, थोडा सेवन मिथ्यायोग है, असेवन अयोग है । दुर्गन्धका सूँघना मिथ्यायोग है, अतितीक्ष्ण गन्धका सूँघना अतियोग है, किसीको न सूँघना अयोग है । तहां कायिक, वाचिक, मानसिक तीन प्रकारका कर्म कहा है । तहां कायिक कर्म जैसे कुसमयमें दंडकसरतका करना मिथ्यायोग, बहुत करना अतियोग, कुछ न करना अयोग है । खोटा और झूठा बोलना वाणीका मिथ्यायोग है, बहुत बोलना अतियोग है, चुप होजाना अयोग है । मानसकर्म जैसे शोकादि चिंतवन मानसिक मिथ्यायोग है, अत्यन्त चिंता करना अतियोग है और किसीकी चिंता न करना अयोग है इति ॥ आगे श्लोक माधवके हैं ॥ अपस्मारके सामान्य लक्षण । तमःप्रवेशः संरम्भो दोषोद्रेकहतस्मृतिः । अपस्मार इति ज्ञेयो गदो घोरश्चतुर्विधः ॥ १ ॥ अन्धकारमें प्रवेश करनेके समान ज्ञानका नाश होना, नेत्र टेढे बांके फिर दोषोंके बढनेसे ज्ञानका नष्ट होना ये लक्षण जिस रोगमें होयं ऐसा भयंकर अपस्मार रोग चार प्रकारका है, इसको लोग संसारमें मिरगी ऐसे कहते हैं ॥ पूर्वरूप । हृत्कम्पः शून्यता स्वेदो ध्यानं मूर्च्छा प्रमूढता । निद्रानाशश्च तस्मिंस्तु भविष्यति भवन्त्यथ ॥ २ ॥ जब अपस्मार होनेवाला होय है तब ये लक्षण होते हैं, हृदय कांपे और शून्य पड जाय-कुछ सूझे नहीं, चिन्ता, मूर्च्छा, पसीने आवे, ध्यान लगजाय, मूर्च्छा कहिये मनका मोह और प्रमूढता कहिये इन्द्रियोंका मोह होय, निद्रा जाती रहे ॥ वातज अपस्मारके लक्षण । कम्पते प्रदशेदन्तान्फेनोद्वामी श्वसित्यपि । परुषारुणकृष्णानि पश्येदूपाणि चानिलात् ॥ ३ ॥