माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ६२ ) माधवनिदान ।
( ६२ ) माधवनिदान । इच्छा इत्यादि दुःख तिनसे पीडित होय, हीनवर्ण, बल उत्साह पराक्रमका नाश होय, सम्पूर्ण इंद्रियोंका व्याकुल होना, उसका काला, कठिन और रूखा ऐसा मल होय, अपानवायु करे नहीं, ये लक्षण रुधिरकी बवासीरके जानने चाहिये ॥ अब इसी रक्तार्शनिदानके वातादिभेदकरके लक्षण कहते हैं— तनु चारुणवर्णं च फेनिलं चासृगर्र्शसाम् । कट्यूरुगुदशूलं च दौर्बल्यं यदि चाधिकम् ॥ तत्रानुबन्धो वातस्य हेतुर्यदि च रूक्षणम् ॥ २८ ॥ बवासीरमें रुधिर थोडा, अरुणवर्ण और झागसंयुक्त निकले और कमर जाँघ और गुदा इनमें दर्द होवे । यदि दुर्बलता विशेष होजावे और उसमें कोई रूक्ष हेतु पहुँचा होवे तो इस रक्तार्शको वातका सम्बन्ध है ऐसे जानना ॥ कफसम्बन्धके लक्षण । शिथिलं श्वेतपीतं च विट् स्निग्धं गुरु शीतलम् । यच्चार्शसां घनं चासृक्तन्तुमत्पाण्डु पिच्छिलम् ॥ २९ ॥ गुदं सपिच्छं स्तिमितं गुरु स्निग्धं च कारणम् । श्लेष्मानुबन्धो विज्ञेयस्तत्र रक्तार्शसां बुधैः ॥ ३० ॥ जिसमेंसे शिथिल, सफेद, पीला, चिकना, भारी और शीतल ऐसा दस्त होय और जिसका रुधिर गाढा तन्तुयुक्त पीला तथा बबूलेयुक्त निकले और गुदा बबूलयुक्त, गीला होवे और भारी चिकनी ऐसे कोई कारण होवे तो उस रक्तार्शको कफका सम्बन्ध जानना । शंका-क्यों जी ! पित्तके अनुबन्धकी बवासीर क्यों नहीं कही ? उत्तर-रक्तके और पित्तके प्रायः करके समान लक्षण होनेसे नहीं कहे, क्योंकि पहले २४ वें श्लोकमें कहि आये हैं कि "पित्ताकृतिसमन्विताः" इति ॥ बवासीरका पूर्वरूप । विष्टम्भोऽन्नस्य दौर्बल्यं कुक्षेराटोप एव च । कार्श्यमुद्गार- बाहुल्यं सक्थिसादोऽल्पविट्कता ॥ ३१ ॥ ग्रहणीदोषपाण्ड्वार्ते- राशङ्का चोदरस्य च। पूर्वरूपाणि निर्दिष्टान्यर्शसामभिवृद्धये ॥३२ अन्नका परिपाक अच्छी तरह हो नहीं, अन्न कूखमें रहे, देहमें दुर्बलता हो, कूखमें अफारा हो, अग्नि मन्द हो जावे, डकार बहुत आवै, जंघामें पीडा, थोडा दस्त उतरे, संग्रहणी और पाण्डुरोगकी भ्रांति होना, क्योंकि, उनके लक्षण मिलते हैं और उदर- रोगकी शंका होना ये लक्षण होवें तब जानना कि पुरुषके बवासीर रोग होवेगा ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (६३) शंका-केवल गुदामें दोषोंके कोपसे बवासीर रोग होती है फिर सब देहमें कृशत्व और काला हो जाना कैसे है ? उत्तर। पञ्चात्मा मारुतः पित्तं कफो गुदवलित्रये । सर्व एव प्रकुप्यन्ति गुदजानां समुद्भवे ॥ ३३ ॥ तस्मादशांसि दुःखानि बहुव्याधि- कराणि च । सर्वदेहोपतापीनि प्रायः कृच्छ्रतमानि च ॥ ३४ ॥ गुदाके तीन आंटोंमें बवासीरके मस्से प्रगट होनेसे पांच प्रकारकी वायु, पांच प्रकारका पित्त, पांच प्रकारका कफ ये सब दोष कुपित होते हैं । प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान ये पांच प्रकारकी वायु, हृदय, गुदा, नाभि, कण्ठ और सर्व देह ये इनके क्रमसे स्थान हैं तथा आलोचक, रंजक, साधक, पाचक, भ्राजक इन भेदोंसे पित्त पांच प्रकारका है । इनके स्थान-आलोचक नेत्रोंमें, रञ्जक यकृत् और प्लीहोंमें, साधक हृदयमें, पाचक पक्वाशय और आमाशयमें, भ्राजक त्वचामें रहता है । ऐसे ही कफ भी अवलम्बक, क्लेदक, बोधक, तर्पक और श्लेष्मक इन पांच भेदके क्रमकरके हृदय, आमाशय जीभ, मस्तक और सन्धि इन पांचों स्थानोंमें रहता है । इस प्रकार सर्व दोष अपने पांच पांच स्वरूपोंसे कुपित होते हैं, इससे यह रोग (बवासीर) बहुत दुःखकारक और अनेक प्रकारकी व्याधि (उदर और अग्निमांद्य इत्यादि उपद्रव) कर्ता सर्व देहको क्लेशदायक और विशेषकरके कृच्छ्र- साध्य तथा असाध्य जानना ॥ सुखसाध्यके लक्षण । बाह्यायां तु वलौ जातान्येकदोषोल्वणानि च । अ॒र्शांसि सुखसाध्यानि न चिरोत्पतितानि च ॥ ३५ ॥ बाहरके आंटेमें भई हो, एक दोषोल्वण हो और जिसको एक वर्ष व्यतीत न भया हो, ऐसी बवासीर सुखसाध्य है ॥ कृच्छ्रसाध्य लक्षण । द्वंद्वजानि द्वितीयायां वलौ यान्याश्रितानि च । कृच्छ्रसाध्यानि तान्याहुः परिसंवत्सराणि च ॥ ३६ ॥ दो दोषोंसे प्रगट भई हो और दूसरी वली अर्थात् आंटेमें होय और जिसको एक वर्ष व्यतीत हो गया हो ऐसी बवासीरके मस्से कृच्छ्रसाध्य होते हैं और जो बाहरकी वलीमें द्विदोषोल्वण होय और एक दोषोल्वण दूसरी वली (दूसरे आंटे) में होवे तो यह भी कृच्छ्रसाध्य जानना ॥
( ६४ ) माधवनिदान ।
( ६४ ) माधवनिदान । असाध्यके लक्षण । सहजानि त्रिदोषाणि यानि चाभ्यन्तरावलिम् । जायन्तेऽर्शांसि संश्रित्य तान्यसाध्यानि निर्दिशेत् ॥ ३७॥ सहज कहिये जन्म होनेके समयसे जो होय अथवा तीन दोषोंसे प्रगट भई हो और जो तीसरा अन्तका आंटा है उसमें भई हो सो बवासीर असाध्य जानना ॥ याप्यलक्षण । शेषत्वादायुषस्तानी चतुष्पादसमन्विते । याप्यन्ते दीप्तकायाग्नेः प्रत्याख्येयान्यतोऽन्यथा ॥ ३८॥ यदि असाध्य बवासीर होय और उस रोगीका आयुष्य बाकी हो और चतुष्पाद सम्पत्ति ( वैद्य, औषध, परिचारक और रोगी ये जैसे चाहिये वैसे ) होवे और रोगीकी जठराग्नि प्रदीप्त होवे तो रोग याप्य जानना । इसीसे विपरीत होवे तो रोगीको वैद्य छोड़ देवे ॥ प्रसंगवशसे रोगी, वैद्य, औषध और सेवकके लक्षण कहते हैं- वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः । एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः ॥ ३९ ॥ वैद्य, रोगी, औषध और सेवक ये कर्मसाधन हेतु चिकित्साके ( चार ) पाद हैं ॥ तत्रादौ वैद्यलक्षण । तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयं कृती । लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्कृतभेषजः ॥४०॥ प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यव- सायी प्रियंवदः । सत्यधर्मपरो यश्च वैद्य ईदृक् प्रशस्यते ॥४१॥ गुरुसे भले प्रकार शास्त्रको पढा हो और दूसरे वृद्ध वैद्यकी चिकित्सा अर्थात् इलाज जिसने देखा हो और आप चिकित्सा करनेमें चतुर हो तथा सिद्धहस्त अर्थात् जिस रोगीका इलाज करे सो शीघ्र अच्छा हो जावे, पवित्र रहे, शूर हो, श्रेष्ठ औषधि चन्द्रोदय आदि रसादिक सामग्री जिसके समीप रहा करे, तत्काल जिसकी बुद्धि स्फुरणवाली होय, बुद्धिमान्, संसारके व्यवहारको जाननेवाला हो, प्रियवचन बोलने- वाला, सत्य और धर्मका आचरण करनेवाला ऐसा वैद्य प्रशंसाके योग्य होता है ॥ निषिद्धवैद्यके लक्षण । कुचैलः कर्कशः स्तब्धः कुग्रामी स्वयमागतः । पञ्च वैद्या न पूज्यन्ते धन्वन्तरिसमा अपि ॥ ४२ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६५ ) मैले वस्त्रवाला, बुरा बोलनेवाला, अभिमानी, व्यवहारमें न समझे और जो बिना बुलाये आवे ये पांच वैद्य श्रीधन्वन्तरिके समान भी हों तो भी पूजने योग्य नहीं हैं ॥ रोगीके लक्षण । आयुष्मान् सत्त्ववान् साध्यो द्रव्यवानात्मवानपि । उच्यते व्याधितः पादो वैद्यवाक्यकृदास्तिकः ॥ ४३ ॥ आयुवाला, बलयुक्त साध्य, द्रव्यवान्, ज्ञानी, वैद्यका आज्ञाकारी और आस्तिक ऐसा रोगी होना चाहिये ॥ उत्तम औषधिके लक्षण । प्रशस्तदेशसंभूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् । अल्पमात्रं बहुगुणं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥ ४४ ॥ उत्तम स्थानोंमें प्रगट हुई हो और शुभ दिनमें उसको उखाडी हो, थोडी मात्रा देनेसे बहुत गुण करे, दुर्गंधरहित, उत्तम स्वरूप और रसयुक्त हो सो औषधि उत्तम है ॥ दुष्ट औषधिके लक्षण । वल्मीककुत्सितानूपश्मशानोषरमार्गजाः । जन्तुवह्निहिमव्याप्ता नौषध्यः कार्यसाधकाः ॥ ४५ ॥ इतने स्थानकी औषधें कार्य करनेवाली नहीं होती हैं-बांबीकी, खोटी धरतीकी, जलके समीपकी, इमशानकी, ऊषरकी, जहां रेहं चूना निकलता होय तहांकी और रास्तेकी, कीडोंकी खाई, अग्निसे जली हुई, जाडेकी मारी ऐसी औषधें कार्य करने- वाली नहीं हैं ॥ दूतके लक्षण । स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे । वैद्यवाक्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः ॥ ४६ ॥ नवीन अवस्थाका, बलवान्, रोगीकी रक्षा करनेमें तत्पर होवे, वैद्यके वचनका करनेवाला होवे, आलस्यरहित ऐसा परिचारक अर्थात् दूत होय । इन पूर्वोक्तको चतुष्पाद सम्पत्ति कहते हैं सो यह आयु शेषके बिना नहीं मिलते ॥ ४ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ६६ ) माधवनिदान ।
( ६६ ) माधवनिदान । अब उपद्रवसे असाध्यत्व कहते हैं- हस्ते पादे गुदे नाभ्यां मुखे वृषणयोस्तथा । शोथो हृत्पार्श्वशूलं च यस्यासाध्योऽर्शसो हि सः ॥ ४७ ॥ जिसके हाथ, पैर, गुदा, नाभि, मुख और अण्डकोश इनमें सूजन हो, हृदय और पसवाडे दूखें वह रोगी असाध्य जानना ॥ हृत्पार्श्वशूलं संमोहश्छर्दिरङ्गस्य रुगुज्वरः । तृष्णा गुदस्य पाकश्च निहन्युर्गुदजातुरम् ॥ ४८ ॥ हृदय और पसवाडोंमें दर्द होय, इन्द्रिय और मन इनमें मोह होय, वमन, अङ्गोंमें पीडा, ज्वर, प्यास, गुदाका पकना अर्थात् गुदाके ऊपर पीले फोडे ये लक्षण होनेसे बवासीरवाला रोगी असाध्य जानना ॥ तृष्णारोचकशूलार्तमतिप्रसृतशोणितम् । शोथातिसारसंयुक्तमर्शॉसि क्षपयन्ति हि ॥ ४९ ॥ प्यास, अरुचि, शूल इनसे पीडित, जिसके अत्यन्त रुधिर बहे और सूजन अति- सार ये होयँ उस रोगीका बवासीर नाश कर देता है ॥ मेढ्रादिष्वपि वक्ष्यन्ते यथास्वं नाभिजान्यपि । गण्डूपदास्यरूपाणि पिच्छिलानि मृदूनि च ॥ ५० ॥ मेढ्र कहिये लिंग, आदिशब्दकरके नाक कान इत्यादि स्थानोंमें दोषभेद करके बवासीर होती है सो आगे कहेंगे । उसी प्रकार नाभिस्थानमें भी अर्शरोग होता है वह केंचुआके मुखके समान गाढी और नरम होय ॥ चर्मकीलकी संप्राप्ति । व्यानो गृहीत्वा श्लेष्माणं करोत्यर्शस्त्वचो बहिः । कीलोपमः स्थिरखरं चर्मकीलं तु तद्विदुः ॥ ५१ ॥ व्यानवायु कफको लेकर त्वचामें कीलके सदृश स्थिर और खरदरी ऐसे बवा- सीरको करे उसको चर्मकील कहते हैं । “त्वचो बहिः” इसके कहनेसे गुद होठका त्याग कहा ॥
भाषाटीकासमेत । ( ६७ ) वातादिभेदकरके उसके लक्षण । वातेन तोदपारुष्ये पित्तादतिसरक्तता । श्लेष्मणा स्निग्धता चास्य ग्रथितत्वं सवर्णता ॥ ५२ ॥ वातसे सुईके चुभानेसे जैसे पीडा होती है ऐसी पीडा हो, पित्तसे कठोरता, कफसे काला और कुछ तथा चिकनी गांठके समान वर्ण होवै ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरी- भाषाटीकायामर्शोरोगः समाप्तः ॥ अथ मन्दाग्निरोगनिदानम् । अर्शरोगसे मन्दाग्नि होती हैं, इसीसे मन्दाग्निरोगको कहते हैं— मन्दस्तीक्ष्णोऽथ विषमः समश्चेति चतुर्विधः । कफपित्तानिलाधिक्यात्तत्साम्याज्जाठरोऽनलः ॥ १ ॥ मनुष्यके कफकी प्रकृतिसे मंदाग्नि, पित्तकी प्रकृतिसे तीक्ष्णाग्नि, वातकी प्रकृ- तिसे विषमाग्नि तथा वात, पित्त, कफ इनके समान होनेसे समाग्नि होवे है । ऐसी अग्नि चार प्रकारकी है । इसमें मन्दाग्निको दुर्जय होनेसे प्रथम कही और जाठर शब्द कहनेसे धातुकी अग्निका त्याग जानना ॥ अजीर्णरोग । विषमो वातजान् रोगांस्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तजान् । करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान् कफसंभवान् ॥ २ ॥ विषमाग्नि वातजन्य ८० रोगोंमेंसे किसी रोगको प्रगट करे और सामान्य ज्वरा- तिसारादिकको प्रगट करे, तीक्ष्णाग्नि पित्तके ४० रोगोंमेंसे किसी रोगको प्रगट करे । उसी प्रकार मन्दाग्नि कफजन्य २० रोगोंमेंसे किसी रोगको पैदा कर आल- स्यादिकोंको उत्पन्न करती है ॥ समाग्न्यादिकोंके लक्षण । समा समाग्नेरशिता मात्रा सम्यग्विपाच्यते । स्वल्पापि नैव मन्दाग्नेर्विषमाग्नेस्तु देहिनः ॥ ३ ॥ कदाचित्पच्यते सम्यक्
कदाचिन्न विपच्यते। मात्रातिमात्राप्याशिता सुखं यस्य विप- च्यते ॥ ४ ॥ तीक्ष्णाग्निरिति तं विद्यात्समाग्निः श्रेष्ठ उच्यते ॥ समाग्निवाले पुरुषके यथोचित आहार भले प्रकार पाचन होता है और मन्दाग्नि- वाले पुरुषको थोडा भी आहार यथार्थ नहीं पचता और विषमाग्निवाले मनुष्यको कभी अच्छी तरहसे अन्न पचे और कभी नहीं पचे और बहुत भोजन करा हुआ भी जिसके सुखपूर्वक पचजावे उसको तीक्ष्णाग्नि कहते हैं । इन चारों प्रकारकी अग्निमें समाग्नि उत्तम है । तीक्ष्णाग्निके कहनेसे भस्मकका ग्रहण नहीं करना चाहिये क्योंकि अत्यन्त तीक्ष्णाग्निको भस्मक कहते हैं उसके लक्षण चरकमें कहे हैं ॥ यथा- नरे क्षीणकफे पित्तं कुपितं मारुतानुगम् ॥ ५ ॥ सोष्मणा पाचकस्थाने बलमग्नेः प्रयच्छति । तदा लब्धबलो देहं रूक्षं यत्सानिलोऽनलः ॥ ६ ॥ अभिभूय पचत्यन्नं तैक्ष्ण्यादाशु मुहुर्मुहुः । पक्त्वाऽन्नं स ततो धातूञ्शोणितादीन्पचत्यपि ॥ ७ ॥ ततो दौर्बल्यमातङ्कं मृत्युं चोपनयेत् परम् । भुक्तेऽन्ने लभते शान्तिं जीर्णमात्रे प्रताम्यति । तृट्कासदाहमोहाः स्यु- र्व्याधयोऽत्यग्निसंभवाः ॥ ८ ॥ क्षीणकफवाले पुरुषके कफ कुपित हो वायुसे मिलकर ऊष्माके साथ पाचक- स्थानमें जाकर अग्निको बल देवे तब जठराग्नि वातकी सहायता पाकर प्रबल होकर देहको रूखा कर देवे और उसके जोरसे बारंबार अन्नको पचावे । अन्नको पचाय पीछे रुधिरादि धातुओंको पचावे, रुधिर आदिके पचनेसे देहमें दुर्बलताका रोग और मृत्युको मनुष्य प्राप्त होवे, जब अन्नको खावे तब तो शांति हो जाय और जब अन्न पचजाय तब मूर्च्छित होय । प्यास, खांसी, दाह, मोह, (कुछ सुध न रहै) ये रोग अत्यन्त अग्निसे होते हैं ! इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायामग्निमांद्यनिदानं समाप्तम् ॥
अथाजीर्णनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( ६९ ) अथाजीर्णनिदानम् । अग्निमांद्य और अजीर्ण इनका परस्पर कारण है, इसीसे अग्निमांद्यके पीछे अजीर्णनिदानको कहते हैं- आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानिलैस्त्रिभिः । अजीर्णं केचि- दिच्छन्ति चतुर्थं रसशेषतः ॥ १ ॥ अजीर्णं पञ्चमं केचिन्निर्दोषं दिनपाकि च । वदन्ति षष्ठं चाजीर्णं प्राकृतं प्रतिवासरम् ॥ २ ॥ मनुष्यके कफसे आम, पित्तसे विदग्ध, वातसे विष्टब्ध ऐसे तीन प्रकारका अजीर्णरोग होता है । और जो भोजन करा सो पक्व होय नहीं रस शेष रहे सो रसशेषसे चतुर्थ अजीर्ण होय है । और रात्रि दिनमें जो आहार पचे और जिसमें अफरा, हडफूटन कुछ होय यह पांचवां अजीर्ण किसीके मतसे है । और जो नित्य ही स्वाभाविक अजीर्ण रहे अर्थात् विकृतिजन्य न होय उसको छठा अजीर्ण कहते हैं इस अजीर्णके पचानेके अर्थ सुश्रुतमें वामपार्श्वशयनादिक उपाय कहे हैं सो करने चाहिये ॥ भुक्त्वा शतपदं गच्छेदामपार्श्वेन संविशेत् । शब्दरूपरसस्पर्श- गन्धांश्च मनसः प्रियान् ॥ भुक्तवानुपसेवेत तेनान्नं साधु तिष्ठति ३॥ भोजन करे पीछे सौ पेंड डोलना, बांई करवट शयन करना, अपने मनको जो प्रिय शब्द, रूप, रस, स्पर्श, सुगन्ध उनको सेवन करना इस प्रकार करनेसे अन्न भले प्रकार पचे है ॥ अजीर्णके कारण । अत्यम्बुपानाद्विषमाशनाच्च सन्धारणात् स्वप्नविपर्ययाच्च । कालेऽपि सात्म्यं लघु चापि भुक्तमन्नं न पाकं भजते नरस्य॥४॥ ईर्ष्याभयक्रोधपरिप्लुतेन लुब्धेन शुग्दैन्यनिपीडितेन । प्रद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानमन्नं न सम्यक्परिपाकमेति ॥ ५ ॥ बहुत जल पीनेसे, भोजनके समयको छोड पीछे भोजन करनेसे, मल, मूत्र आदि वेगोंके रोकनेसे, दिनमें सोनेसे, रातमें जागनेसे इन कारणोंसे भोजनके समय यदि १ शंका-आमादिक तीनों अजीर्ण और रसशेषमें क्या भेद है? उत्तर-आम, विदग्ध, विष्टब्ध ये तीनों अजीर्ण अन्नसे उत्पन्न होते हैं और रसशेष अजीर्ण आहारके रससे उत्पन्न होता है ॥
( ७० ) माधवनिदान ।
( ७० ) माधवनिदान । लघु और स्निग्ध गरम आदिगुणयुक्त भी हितकारी पदार्थ खाय तो भी अन्न अच्छी रीतिसे नहीं पचे ये देहके कारण कहे । अब अजीर्णके कारण जो मनसे सम्बन्ध रखते हैं उनको कहते हैं-ईर्ष्या कहिये परद्रव्यको न देख सकना, डरना, क्रोध करना इन कारणोंसे युक्त तथा लोभ, शोक, दीनतासे पीडित और मत्सरता करना इन कारणोंसे मनुष्यके भोजन करा हुआ अन्न भले प्रकार पचता नहीं है ॥ आमादिक अजीर्णोंके लक्षण । तत्राामे गुरुतोत्क्लेशः शोथो गण्डाक्षिकूटगः । उद्गारश्च यथाभुक्तमविदग्धः प्रवर्त्तते ॥ ६ ॥ उन चारों अजीर्णोंमें प्रथम आमाजीर्णके लक्षण कहते हैं-पेट और अंग भारी हो, वमनके आनेकेसे प्रतीत हो, कपोल और नेत्रोंमें सूजन होवै और इसी अजी- र्णके प्रभावसे जैसा भोजन करा होय मीठा आदि उसी प्रकारकी डकार आवे ॥ विदग्धाजीर्णके लक्षण । विदग्धे भ्रमतृण्मूर्च्छाः पित्ताच्च विविधा रुजः । उद्गारश्च सधूमाम्लः स्वेदो दाहश्च जायते ॥ ७ ॥ विदग्ध अजीर्णमें भ्रम, प्यास और मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं और पित्तके अनेक रोग प्रगट हों तथा धुएँके साथ खट्टी डकार आवे पसीना आवे और दाह होय ॥ विष्टब्ध अजीर्णके लक्षण । विष्टब्धे शूलमाध्मानं विविधा वातवेदनाः । मलवाताप्रवृत्तिश्च स्तम्भो मोहोऽङ्गपीडनम् ॥ ८ ॥ विष्टब्ध अजीर्णके ये लक्षण हैं-शूल, अफरा, अनेक वातकी पीडा, मल और अधोवायुका रुकजाना, देह जकडजाय, मोह और देहमें पीडा होय ॥ रसशेष अजीर्णके लक्षण । रसशेषेऽन्नविद्वेषो हृदयाशुद्धिगौरवे । रसशेष अजीर्णके ये लक्षण हैं-अन्नमें अरुचि, हृदयमें शुद्धि न होय और देह भारी होय ॥ अजीर्णके उपद्रव । मूर्च्छा प्रलापो वमथुः प्रसेकः सदनं भ्रमः । उपद्रवा भवन्त्येते मरणं चाप्यजीर्णतः ॥ ९ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ७१ ) मूर्च्छा, बडबड, ओकारी अर्थात् वमन, लारका गिरना, ग्लानि, भ्रम ये अजी- र्णके उपद्रव हैं और बहुत बडा अजीर्ण मनुष्यको मार भी डालता है ॥ बहुत भोजन ही अजीर्णका हेतु है, उसीको कहते हैं- अनात्मवन्तः पशुवद् भुञ्जते येऽप्रमाणतः । रोगानीकस्य ते मूलमजीर्णं प्राप्नुवन्ति हि ॥ १० ॥ जिन मनुष्योंकी इन्द्रियें स्वाधीन नहीं हैं वे पशुके समान अप्रमाण भोजन करते हैं उनके रोगोंका कारण अजीर्णरोग प्रगट होता है ॥ अत्र कहते हैं कि, अजीर्णरोगसे विषूचिकारोगकी उत्पत्ति होती है, इसलिये अजीर्णके अनन्तर विषूचिकाको कहते हैं- अजीर्णमामं विष्टब्धं विदग्धं च यदीरितम् । विषूच्यलसकौ तस्माद्भवेच्चापि विलम्बिका ॥ ११ ॥ आम, विष्टब्ध और विदग्ध ये जो अजीर्ण कहे हैं इनसे विषूचिका ( हैजा ) अलसक और विलंबिका पैदा होवे है इनसे चौथा रसशेष अजीर्णको विषूच्यादि- कोंको उत्पादक नहीं लिखा है । इसका कारण यह है कि, उस रसाजीर्णको अपरि- णाममात्रत्वकरके विषूचिका आदिके आरम्भत्व स्वभावादिकोपमतके कहनेसे आम, विदग्ध और विष्टब्ध इनसे क्रमपूर्वक विषूचिका, अलसक, विलंबिका ये प्रगट होती हैं । ऐसे कार्त्तिककुण्ड आचार्य कहता है सो असत्य है क्योंकि विदग्ध अजीर्णको विलंबिकाका प्रगट करना असम्भव है. क्योंकि उस विलंबिकाका आगे कफ वातसे प्रगट होना कहेंगे और विदग्धभावको पित्तजन्यता है इसलिये यह मत मन्तव्य नहीं है । इसी कारण तीनों अजीर्ण मिलकर विषूचिका आदिको प्रगट करते हैं यह बकुल आचार्यका मत है ॥ विषूचिकाकी निरुक्ति कहते हैं- सूचीभिरिव गात्राणि तुदन् संतिष्ठतेऽनिलः । यत्राजीर्णे च सा वैद्यैर्विषूचीति निगद्यते ॥ १२ ॥ जिस अजीर्णमें वादी देहको सूईके सदृश पीडा देय अर्थात् सूईसे चुभे उसको वैद्य विषूचिका कहते हैं ॥ न तां परिमिताहारा लभन्ते विदितागमाः । मूढास्तामजितात्मानो लभन्तेऽशनलोलुपाः ॥ १३ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ७२ ) माधवनिदान ।
( ७२ ) माधवनिदान । जिनका आहार परिमाणका है और जो वैद्यविद्याके कहने पर चलते हैं उनको कदाचित् विषूचिका रोग नहीं होय । जो अज्ञानी, जिनकी इंद्रियें वशमें नहीं, जो भोज- नके लालची हैं ऐसे मनुष्योंको यह विषूचिका रोग अवश्य होता है ॥ विषूचिकाके लक्षण । मूर्च्छातिसारो वमथुः पिपासा शूलभ्रमोद्वेष्टनजृम्भदाहाः । वैवर्ण्यकंपौ हृदये रुजश्च भवन्ति तस्यां शिरसश्च भेदः ॥ १४ ॥ मूर्च्छा, अतिसार, वमन, प्यास, शूल, भ्रम, जांघोंमें पीडा जँभाई, दाह, देहका विवर्ण, कम्प, हृदयमें पीडा और मस्तकमें पीडा। ये लक्षण हो उसको विषूचिका कहते हैं । इसीको महामारी अथवा हैजा कहते हैं ॥ अलसकके लक्षण । कुक्षिरानाह्यतेऽत्यर्थं प्रताम्येत्परिकूजति । निरुद्धो मारुतश्चैव कुक्षावुपरि धावति ॥ १५ ॥ वातवर्चोनिरोधश्च यस्यात्यर्थं भवेदपि । तस्यालसकमाचष्टे तृष्णोद्गारौ तु यस्य च ॥ १६ ॥ कूखमें और पेटमें अफरा हो, मोह हो, पीडासे पुकारे, पवन चलनेसे रुककर कूखमें और कण्ठादि स्थानोंमें फिरे, मल मूत्र और गुदाकी पवन रुक, प्यास बहुत लगे, डकार आवे ये लक्षण जिसमें होयँ उसको अलसकरोग कहते हैं ॥ विलम्बिकाके लक्षण । दुष्टं तु भुक्तं कफमारुताभ्यां प्रवर्त्तते नोर्ध्वमधश्च यस्याम् । विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्स्यामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः॥ १७ जिस मनुष्यके भोजन करा हुआ अन्न-कफ वात करके दूषित हो, ऊपर नीचे नहीं जाय अर्थात् वमन विरेचन न होय उसको वैद्यविद्याके जाननेवाले जिसकी चिकित्सा नहीं ऐसी विलंबिका रोग कहते हैं । कोई शंका-करे कि, अलसक और विलंबिका इन दोनोंकी वात कफके प्रबल होनेसे ऊपर नीचे प्रवृत्ति होती है । इन दोनोंमें भेद क्या है ? सो कहो । उत्तर-अलसकमें शूल आदि घोरपीडा होती है और विलंबिकामें नहीं होती इतना ही भेद है ॥ अजीर्णसे प्रगट विषूच्यादिको कहकर अजीर्णजन्य आमके दूसरे कार्य्यान्तर कहते हैं- यत्रस्थमामं विरुजेत्तमेव देशं विशेषेण विकारजातैः । दोषेण येनावततं शरीरं तल्लक्षणैरामसमुद्भवैश्च ॥ १८ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
कोई स्थान नियत नहीं है यह दिखाया ॥
भाषाटीकासमेत । ( ७३ ) जिस ठिकानेपर आम रहता है उस ठिकानेपर जिस दोषसे वह स्थान व्याप्त हो उसके लक्षण ( पीडा, दाह गौरव आदि ) करके और आमजन्य विकार ( आमवाता- दिक ) विशेष पीडा होती है, इस लिये जाना गया कि, और ठिकानेपर थोडी पीडा होती है और “ यत्र ” इस सर्वनामशब्दसे कुपित हुए वातादिकोंके सदृश आमका कोई स्थान नियत नहीं है यह दिखाया ॥ विषूचिका और अलसक इनके असाध्य लक्षण । यः श्यावदन्तौष्ठनखोऽल्पसंज्ञो वम्यर्दितोऽभ्यन्तरयातनेत्रः । क्षामस्वरः सर्वविमुक्तसन्धिर्यायान्नरः सोऽपुनरागमाय ॥ १९ ॥ जिस रोगीके दांत नख होठ काले पडजावें और संज्ञा जाती रहे, वमनसे पीडित होवे और नेत्र भीतरको बैठजायँ मन्द स्वर हो तथा हाथपैरोंकी संधि ढीली पडजाय वह मनुष्य बचे नहीं । विलंबिका स्वरूपसे ही असाध्य है यह जैज्जट आचार्यका मत है ॥ [ निद्रानाशोऽरतिः कम्पो मूत्राघातो विसंज्ञिता । अमी उपद्रवा घोरा विषूच्यां पञ्च दारुणाः ॥ २० ॥ प्रायेणाहारवैषम्यादजीर्णं जायते नृणाम् । तन्मूलो रोगसंवातस्तद्विनाशाद्विनश्यति ॥२१॥ निद्राका नाश, मनका न लगना, कम्प, मूत्रका रुकना, संज्ञाका नाश ये विषूचिकाके घोर पांच उपद्रव हैं । बहुधा भोजनकी विषमतासे अजीर्णरोग मनु- ष्योंको होता है, वही अजीर्ण सब रोगोंका कारण है उस अजीर्णरोगके नाश होनेसे सब रोगोंका नाश होता है ॥ ये दोनों श्लोक क्षेपक हैं । ] अजीर्ण जाता रहा उसके लक्षण । उद्गारशुद्धिरुत्साहो वेगोत्सर्गो यथोचितः । लघुता क्षुत्पिपासा च जीर्णाहारस्य लक्षणम् ॥ २२ ॥ शुद्ध डकार आवें, शरीर और मनका प्रसन्न होना, जैसा भोजन करा हो उसके सदृश मल मूत्रकी भले प्रकार प्रवृत्ति होना, शरीर हलका होय परन्तु कोष्ठ विशेष हलका हो, भूख और प्यास लगे, भोजन पचनेके उत्तर ये लक्षण होते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायामजीर्णरोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ७४ ) माधवनिदान ।
( ७४ ) माधवनिदान । अथ कृमिरोगनिदानम् । —————— अजीर्णसे कृमिरोग प्रगट होय है इसीसे अजीर्गरोगके अनन्तर कृमिरोग कहे हैं— कृमयस्तु द्विधा प्रोक्ता बाह्याभ्यन्तरभेदतः । बहिर्मलकफासृग्विड्जन्मभेदाच्चतुर्विधाः ॥ १ ॥ कृमिरोग दो प्रकारका है । एक बाहरका दूसरा भीतरका । तहां बाहरके मल ( पसीना आदि ) और कफ, रुधिर, विष्ठा इन कारणोंसे बहिः कृमिरोग चार प्रकारका है ॥ बाह्यकृमियोंके नाम । नामतो विंशतिविधा बाह्यास्तत्र मलोद्भवाः । तिलप्रमाणसंस्थान- वर्णाः केशाम्बराश्रयाः ॥२॥ बहुपादाश्च सूक्ष्माश्च यूकालिक्षादि- नामतः । द्विधा ते कुष्ठपिडिकाकण्डूगण्डान्प्रकुर्वते ॥ ३ ॥ उस कृमिरोगके बीस नामोंसे बीस भेद हैं। तहां बाहरके मलसे प्रगट कृमि तिलके समान परिमाण और आकृति और श्वेत कृष्णवर्णवाली होती हैं। वस्त्र और केशोंमें रहनेवाली होती हैं तथा बहुत पैरकी और छोटी जूँ लीख नामोंसे प्रसिद्ध दो प्रका- रकी हैं । ये कृमियें कोढ, पिडिका, खाज इत्यादिरोग प्रगट करे हैं ॥ कृमिरोगका कारण । अजीर्णभोजी मधुराम्लनित्यो द्रवप्रियः पिष्टगुडोपभोक्ता । व्यायामवर्जी च दिवाशयानो विरुद्धभुक्संलभते कृमींश्च ॥ ४ ॥ अजीर्णमें भोजन करे, प्रतिदिन मीठा खट्टा खावे तथा पतला पदार्थ ( जैसे कढी रायता आदि ) खावे, पीसा अन्न मैदा आदि और गुडके पदार्थ खावे और भोजन करके परिश्रम न करे, दिनमें सोवे, विरुद्ध भोजन, जैसे दूध मछली आदिको खावे ऐसे पुरुषके कृमिरोग प्रगट होता है ॥ कौन कारणसे कौनसी कृमि प्रगट होती है माषपिष्टान्नलवणगुडशाकैः पुरीषजाः । मांसमत्स्यगुडक्षीरदधिशुक्तैः कफोद्भवाः ॥ विरुद्धाजीर्णशाकाद्यैः शोणितोत्था भवन्ति हि ॥ ५ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (७६) उड़द पीसा अन्न ( लड्डू घेवर गूंझा आदि ) नोनके गुडके तथा शाक आदि ऐसे पदार्थ खानेसे मलकी कृमि प्रगट होती है। मांस मछली गुड दूध दही कांजी ऐसे पदार्थ खानेसे कफकी कृमि पैदा होती है। विरुद्धपदार्थ जैसे दूध मछली और आधा कच्चा आधा पक्का शाक जैसे हरा चनेका आदि ऐसे भोजनोंसे रुधिरजन्य कृमि पैदा होती है ॥ पेटमें कृमि पडगई हों उसके लक्षण । ज्वरो विवर्णता शूलं हृद्रोगः सदनं भ्रमः । भक्तद्वेषोऽतिसारश्च संजातक्रिमिलक्षणम् ॥ ६ ॥ ज्वर हो, शरीरका रंग और प्रकारका होजावे, शूल, हृदय दूखे, वमनकीसी इच्छा हो, भ्रम, भोजन बुरा लगे, दस्त होयें ये लक्षण जिसके पेटमें गिंडोहा आदि कृमि पड जाती हैं उसको होते हैं ॥ कफकी कृमिके लक्षण । कफादामाशये जाता वृद्धाः सर्पन्ति सर्वतः । पृथुब्रध्ननिभाः केचित्केचिद्गण्डूपदोपमाः ॥ ७ ॥ रूढधान्याङ्कुराकारास्तनुदीर्घास्तथाऽणवः । श्वेतास्ताम्रावभासाश्च नामतः सप्तधा तु ते ॥ ८ ॥ अन्नादा उंदरावेष्टा हृदयादा महारुजः । चुरवो दर्भकुसुमाः सुगन्धास्ते च कुर्वते ॥ ९ ॥ हृल्लासमास्यस्रवणमविपाकमरोचकम् । मूर्च्छांच्छर्दितृषानाहकार्य्यश्वयथुपीनसान् ॥ १० ॥ कफसे आमाशयमें प्रगट हुई कृमियें जब बढ जाती हैं तब चारों तरफ डोलती हैं, उनमेंसे कोई मोटी चामकी बाधीके सदृश, कोई गिंडोहेके आकार, कोई धान्यके अँकुरके समान होती हैं। कितनी छोटी, बडी, चौडी होती हैं और किसीका वर्ण श्वेत, किसीका तांबेके समान होता है। उन्होंके सात नाम हैं। सो इस प्रकार- १ अन्नाद, २ उदरावेष्ट, ३ हृदयाद, ४ महारुज, ५ चुरु, ६ दर्भकुसुम और ७ सुगन्ध ये नाम कोई सार्थक हैं और कोई निरर्थक हैं। व्यवहारके निमित्त पहले आचायोंने कहे हैं। इन कृमियोंसे वमनकीसी इच्छा होय, मुखसे पानी गिरे, अन्नका पाक न होवे, अरुचि, मूर्च्छा, वमन, प्यास, अफरा, शरीर कृश होवे, सूजन और पीनस इतने विकार होते हैं ॥
( ७६ ) माधवनिदान ।
( ७६ ) माधवनिदान । रुधिरकी कृमिके लक्षण । रक्तवाहिशिरास्थाना रक्तजा जन्तवोऽणवः । अपादा वृत्तताम्राश्च सौक्ष्म्यात्केचिददर्शनाः ॥ ११ ॥ केशादा रोमविध्वंसा रोमद्वीपा उदुम्बराः । षट् ते कुष्ठैककर्माणः सह सौरसमातरः ॥ १२ ॥ रुधिरकी बहनेवाली नाडियोंमें रुधिरसे प्रगट कृमि बारीक, पादरहित, गोले तांबेके रंगके होते हैं, कोई बहुत बारीक होती हैं, वह देखनेसे भी नहीं दीखे। ये कृमि छः प्रकारकी हैं। उनके नाम ये हैं-१ केशाद, २ रोमविध्वंस, ३ रोमद्वीप, ४ उदुम्बर, ५ सौरस, ६ मातर ये कुष्ठको पैदा करती हैं ॥ विष्ठासे प्रटग कृमिके लक्षण । पक्वाशयपुरीषोत्था जायन्तेऽधोविसर्पिणः । वृद्धास्ते स्युर्भवेयुश्च ते यदाऽऽमाशयोन्मुखाः ॥ १३ ॥ तदास्योद्गारनिश्वासा विड्गन्धानुविधायिनः । पृथुवृत्ततनुस्थूलाः श्यावपीतसितासिताः ॥ १४ ॥ ते पञ्च नाम्ना कृमयः ककेरुकमकेरुकाः । सौसुरादामलूनाश्च लेलिहा जनयन्ति च ॥ १५ ॥ विड्भेदशूलविष्टम्भकार्श्यपारुष्यपाण्डुताः । रोमहर्षाग्निसदनं गुदकण्डूर्विमार्गगाः ॥ १६ ॥ पक्वाशयमें विष्ठासे प्रगट कृमि गुदाके मार्ग होकर बाहर निकलती हैं। जब ये बढ जाती हैं तब आमाशयमें प्राप्त होकर डकार और श्वाससे विष्ठाकीसी वास आने लगती है । ये कृमि बडी, छोटीं, गोल, मोटी, रंगमें, काली, पीली, सफेद नीली होती हैं। इनके पांच नाम हैं-१ कके रुक, २ मके रुक, ३ सौसुराद, ४ आमलून, ५ लेलिह । जब ये कृमि मार्गको छोड अन्य मार्गमें जाती हैं तब इतने रोग प्रगट करैं हैं। दस्तका पतला होना, शूल, अफरा, देहमें कृशता तथा देहमें कठोरता, पाण्डुरोग, रोमांच, मन्दाग्नि और गुदामें खुजलीका होना ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां कृमिरोगनिदानं समाप्तम् ॥ १ संमूलाख्येति पाठान्तरम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ पाण्डुरोगनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( ७७ ) अथ पाण्डुरोगनिदानम् । पाण्डुरोगाः स्मृताः पञ्च वातपित्तकफैस्त्रयः । चतुर्थः सन्निपातेन पञ्चमो भक्षणान्मृदः ॥ १ ॥ मलसे प्रगट कृमिरोग पांडु ( पीलिया ) रोगको प्रगट करे है. इसी कारण कृमि- रोगके अनन्तर पांडुरोगका निदान कहते हैं । तहां प्रथम पांडुरोगकी संख्यारूप सम्प्राप्ति कहते हैं-१ वातका, २ पित्तका, ३ कफका, ४ सन्निपातका और ५ माटीके खानेसे पांडुरोग पांच प्रकारका कहा है ॥ पांडुरोगके कारण और सम्प्राप्तिके लक्षण । व्यवायमम्लं लवणानि मद्यं मृदं दिवास्वप्नमतीव तीक्ष्णम् । निषेव्यमाणस्य विदूष्य रक्तं दोषास्त्वचं पाण्डुरतां नयन्ति॥२॥ अति मैथुन, खट्टे पदार्थका भोजन, नोनका पदार्थ खानेसे, बहुत मद्य पीनेसे, मिट्टी खानेसे, दिनमें सोनेसे, अत्यन्त तीखा पदार्थ खानेसे इन कारणोंसे तीनों दोष रुधिरको बिगाड देहकी त्वचाको पीले रंगकी कर देते हैं । इस जगह रुधिरका तो उपलक्षणमात्र है, रक्तके कहनेसे त्वचा मांस इनको दूषित करते हैं यह दृढबलने कहा है । हारीतने रसको दूष्य कहा है दोष नाम वातादिक और दूष्य कहिये रसरक्तादि ॥ पांडुरोगके पूर्वरूप । त्वक्स्फोटनष्ठीवनगात्रसादमृद्भक्षणप्रेक्षणकूटशोथाः । विण्मूत्रपीतत्वमथाविपाको भविष्यतस्तस्य पुरःसराणि ॥ ३ ॥ त्वचाका फटना, मुखसे बारम्बार थूकना, अंगोंका जकडना, मिट्टी खानेकी इच्छा, नेत्रोंपर सूजन, मल, मूत्र पीले हों, अन्नका परिपाक न होय ये लक्षण पांडु- रोग प्रगट होनेवाला होय है तब होते हैं ॥ वातपांडुरोगके लक्षण । त्वङ्मूत्रनयनादीनां रूक्षकृष्णारुणात्मता । वातपाण्ड्वामये कम्पतोदानाहभ्रमादयः ॥ ४ ॥ वातके पांडुरोगमें त्वचा, मूत्र, नेत्र इनमें रूखापना कालापना और लाली होती है तथा कंप, सुई छेदनकासा चुभना, अफरा, भ्रम, आदिशब्दसे भेद और शूला- दिक भी होते हैं ॥
(७८) माधवनिदान ।
(७८) माधवनिदान । पित्तजपांडुरोगीके लक्षण । पीतमूत्रशकृन्नेत्रो दाहतृष्णाज्वरान्वितः । भिन्नविट्कोऽतिपीताभः पित्तपाण्डामयी नरः ॥ ५ ॥ पित्तपांडुरोगीके ये लक्षण होते हैं—मल मूत्र और नेत्र पीले हों, दाह, प्यास, ज्वर इनसे पीडित हो, मल पतला हो और उस रोगीके देहकी कांति अत्यन्त पीली होती है ॥ कफपांडुरोगीके लक्षण । कफप्रसेकश्वयथुतन्द्रालस्यातिगौरवैः । पाण्डुरोगः कफाच्छुक्लैस्त्वङ्मूत्रनयनाननैः ॥ ६ ॥ मुखसे कफका गिरना, सूजन, तन्द्रा, आलसक शरीरका भारी होना, त्वचा, मूत्र, नेत्र, मुख इनका सफेद होना इन लक्षणोंसे कफका पांडुरोग जानना ॥ सन्निपातयुक्त पांडुरोगके असाध्य लक्षण । ज्वरारोचकहृल्लासच्छर्दितृष्णाक्लमान्वितः । पाण्डुरोगी त्रिभिर्दोषैस्त्याज्यः क्षीणो हतेन्द्रियः ॥ ७ ॥ ज्वर, अरुचि, ओकारी ( उबकाई ), वमन, प्यास और क्लम इतने उपद्रवयुक्त जो त्रिदोषजन्य पांडुरोगी क्षीण होगया हो और जिसकी इंद्रियें अपना अपना विषय ग्रहण करनेकी शक्ति न रखती हों तो उसको वैद्य त्याग दे ॥ मिट्टीखानेसे प्रगट पांडुरोगकी सम्प्राप्ति । मृत्तिकादनशीलस्य कुप्यत्यन्यतमो मलः । कषाया मारुतं पित्तमूपरा मधुरा कफम् ॥८॥ कोपयेन्मृद्रसादींश्च रौक्ष्याद् भुक्तं च रूक्षयेत् । पूरयत्यविपक्कैव स्रोतांसि निरुणद्ध्यपि ॥ ९ ॥ इन्द्रियाणां बलं हत्वा तेजो वीर्यौजसी तथा। पाण्डु- रोगं करोत्याशु बलवर्णाग्निनाशनम् ॥ १० ॥ १ चरकमें लिखा है—सर्वान्नसेविनः सर्वे दुष्टा दोषास्त्रिदोषजम् । त्रिलिंगं संप्रकुर्वन्ति पांडुरोगं सुदुःसहम् ॥ सम्पूर्ण अन्नोंके सेवन करनेवाले पुरुषके तीनों दोष दुष्ट हुए त्रिदोषज पांडुरोगको करते हैं जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हैं उसको सन्निपातका पांडुरोग जानना और वह असाध्य है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (७९) मिट्टी खानेका जिस मनुष्यको अभ्यास पडजाय उसके वातादिक दोष कुपित होवें, कषेली मिट्टीसे वात कुपित होय, खारी मिट्टीसे पित्त और मीठी मिट्टीसे कफ कुपित होवे। फिर वही मिट्टी पेटमें जाकर रसादिक धातुओंको रूखा करे । जब रौक्ष्य गुण प्रगट होजाय तब जो अन्न खाय सो रूखा होजाय । फिर वही मिट्टी पेटमें बिना पके रसको रस बहनेवाली नसोंमें प्राप्त कर उनके मार्गको रोकदे, रसके बहने- वाली नसोंका मार्ग जब रुकजाय तब इन्द्रियोंका बल अर्थात् अपने अपने विषय ग्रहण करनेकी शक्तिका नाश होय, शरीरकी कांति तेज और ओज कहिये सब धातुओंका सार हृदयमें रहता है सो क्षीण होकर पाण्डुरोग प्रगट करे उसमें बल, वर्ण और अग्नि इनका नाश होता है ॥ पांडुके विशेष लक्षण । शूनाक्षिकूटगण्डभ्रूः शूनपन्नाभिमेहनः । कृमिकोष्ठोऽतिसार्येत मलं चासृक्कफान्वितम् ॥ ११ ॥ नेत्र, कपोल, भ्रुकुटी, पैर, नाभि और लिंग इनमें सूजन हो और कोठेमें क्रिमि पडजॉय तथा रुधिर और कफ मिला दस्त उतरे सब पाण्डुरोगोंमें जब पेटमें कृमि पडजॉय हैं तब ये पूर्वोक्त लक्षण होते हैं । यह जैज्जट आचार्यका मत है और कोई कहता है-ये मृत्तिकाजन्य पांडुरोगके लक्षणहैं। क्योंकि, मृत्तिकाजन्य पाण्डुरोगके लक्षण अनन्तर लिखे हैं परन्तु विदेहने तो ये मृत्तिकाजन्य पांडुरोगके लक्षण स्पष्ट कहे हैं ॥ असाध्य पांडुरोगके लक्षण । पाण्डुरोगश्चिरोत्पन्नः खरीभूतो न सिद्ध्यति । कालप्रकर्षा- च्छूनाङ्गो यो वा पीतानि पश्यति ॥ १२ ॥ बद्धालपविट् सह- रितं सकफं योऽतिसार्यते । दीनः श्वेतातिदिग्धाङ्गश्छर्दि- मूर्च्छातृषान्वितः ॥ १३ ॥ स नास्त्यसृक्क्षयाद्यस्तु पाण्डुः श्वेतत्वमाप्नुयात् । पाण्डुदन्तनखो यस्तु पाण्डुनेत्रश्च यो भवेत् ॥ १४॥ पाण्डुसङ्घातदर्शी च पाण्डुरोगी विनश्यति । अन्तेषु शूनं परिहीनमध्यं म्लानं तथा तेषु च मध्यशूनम् ॥ १५ ॥ गुदे च शोफस्यथ मुष्कयोश्च शूनं प्रताम्यं तमसंज्ञकल्पम् । विवर्जयेत्पाण्डुकिनं यशोर्थी तथातिसारज्वरपीडितं च ॥ १६ ॥ बहुत दिनका पांडुरोग बहुत काल बीतनेसे पुराना होजाता है सो अच्छा नहीं होय । अथवा-सब देहमें सूजन आगई होवे और उसको पदार्थ पीले दीखें सो भी
( ८० ) माधवनिदान ।
( ८० ) माधवनिदान । असाध्य है। अथवा-जिस मनुष्यका बँधाहुआ मल थोडा हरे रंगका कफमिश्रित उतरे सो भी असाध्य है । अथवा-जो पुरुष दीन कहिये ग्लानियुक्त हो और जिसकी देहका श्वेत वर्ण हो और वमन, मूर्च्छा, प्यास इनसे पीडित होवे सो पांडु- रोगी नष्ट होवे । अथवा-रुधिरक्षय होनेसे जो पांडुरोग श्वेतत्वको प्राप्त होय सो भी असाध्य है । जिसके दांत, नख और नेत्र पीले होंय वह रोगी असाध्य है । जिसको सब पदार्थ पीलेही पीले दीखें वह रोगी मरे । हाथ, पैर, शिर, इनमें सूजन हो और जिसका मध्य पतला होय ऐसा पांडुरोगी असाध्य है, इससे विपरीत साध्य है। जिस रोगीके देहके मध्यमें सूजन हो और हाथ, पग, शिर ये सूखजायँ तथा गुदा, लिङ्ग इनमें सूजन होय तथा मरेके समान होगया होय ऐसे पांडुरोगीको जिस वैद्यको यशकी इच्छा हो सो त्याग दे । इसी प्रकार अतिसार और ज्वर इनसे पीडित रोगीको वैद्य त्याग देवे परन्तु इस अन्तके श्लोकमें जो “ पाण्डुकिनं ” यह पाठ है। इस जगह पालकिनं ऐसा पाठ कोई आचार्य मानते हैं सो ठीक है क्योंकि ऐसा पढनेसे पांडुरोगकी अवस्था अर्थात् पांडुरोगका भेद जो पालकी है उसके भी लक्षण इस पाठसे आगये । सो सुश्रुतमें लिखा है, इसीका आश्रय लेकर किसी अन्यने भी लिखा है। यथा- अन्ते शूनः कृशो मध्ये त्वथवा गुदशेफसि ॥ शूनो ज्वरातिसाराद्यैर्मृतकल्पस्तु पालकी ॥ १७ ॥ जिस मनुष्यके हाथ पैरोंके ऊपर सूजन और देहका मध्य कृश होगया अथवा गुदा लिंगपर सूजन हो तथा ज्वर अतिसारके मुर्देके समान हो ये लक्षण पालकी रोगके हैं । पांडुरोगका भेद कामला है ॥ कामलाके लक्षण । पाण्डुरोगी तु योऽत्यर्थं पित्तलानि निषेवते । तस्य पित्तमसृङ्मांसं दग्ध्वा रोगाय कल्पते ॥ १८ ॥ हारिद्रनेत्रः स भृशं हारिद्रत्वङ्नखाननः । रक्तपित्तशकृन्मूत्रो भेकवर्णो हतेन्द्रियः ॥ १९ ॥ दाहाविपाकदौर्बल्यसदनारुचिकर्षितः । कामला बहुपित्तेषा कोष्ठशाखाश्रया मता ॥ २० ॥ १ सकामलापालकिपाण्डुरोगः कुम्भाह्वयो लाघविकोऽलसाख्यः । इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ८१ ) जो पाण्डुरोगी अत्यन्त पित्तकारक वस्तुओंके सेवन करे उसके पित्त, रुधिर मांसको जलाय ( दुष्ट कर ) कामलारूप रोग प्रगट करनेको समर्थ होय, उस मनु- ष्यके नेत्र अत्यन्त पीले होयँ, त्वचा, नख और मुख ये पीले होयँ, रक्तपित्तयुक्त मल, मूत्र काले होयँ अथवा पीले होयँ, वह मनुष्य वर्षाऋतुमें मेंढकके समान पीला होवे, इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट होय, दाह, अन्न पचे नहीं, दुर्बलता, अंगग्लानि, अन्नमें अरुचि इनसे पीडित होय. जिसमें पित्त प्रवल है ऐसी यह कामला एक कोष्ठाश्रय और दूसरी शाखा ( रक्तादि धातु ) आश्रित है । जैसे कासरोगसे भी राजयक्ष्मा पैदा होती है और स्वतन्त्र भी होती है उसी प्रकार कामला स्वतन्त्र भी होती है ॥ अब कहते हैं कि, पाण्डुरोगको उपेक्षा करनेसेही कामलादिक होते हैं उसीकी दूसरी अवस्था कुंभकामला है । अथ कुम्भकामलाके लक्षण । कालान्तरात्खरिभूता कृच्छा स्यात्कुम्भकामला । बहुत कालसे पुरानी पडनेसे जो कुंभकामला होवे सो कृच्छ्रसाध्य होती है । कुम्भ कहिये कोष्ठ तद्गत जो कामला उसको कुम्भकामला कहते हैं अर्थात् कोष्ठाश्रय कामला ॥ असाध्य कामलाके लक्षण । कृष्णपीतशकृन्मूत्रो भृशं शूनश्च मानवः । संरक्ताक्षिमखच्छर्दिंविण्मूत्रो यश्च ताम्यति ॥ २१ ॥ जिस मनुष्यका मल काला और मूत्र पीला हो और शरीरपर सूजन विशेष होवे और नेत्र मुख, वमन, मल और मूत्र ये अत्यन्त लाल होयँ, मोह होय वह कामलावान् रोगी बचे नहीं ॥ दाहारुचित्तृडानाहतन्द्रामोहसमन्वितः । नष्टाग्निसंज्ञः क्षिप्रं च कामलावान्विपद्यते ॥ २२ ॥ दूसरे असाध्य लक्षण-दाह, अरुचि, प्यास, अफरा, तन्द्रा इन लक्षणयुक्त तथा मन्दाग्नि और विस्मृतिवान् कामलावाला रोगी तत्काल मरे ॥ १" स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च । हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥"