भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

कदाचिन्न विपच्यते। मात्रातिमात्राप्याशिता सुखं यस्य विप- च्यते ॥ ४ ॥ तीक्ष्णाग्निरिति तं विद्यात्समाग्निः श्रेष्ठ उच्यते ॥ समाग्निवाले पुरुषके यथोचित आहार भले प्रकार पाचन होता है और मन्दाग्नि- वाले पुरुषको थोडा भी आहार यथार्थ नहीं पचता और विषमाग्निवाले मनुष्यको कभी अच्छी तरहसे अन्न पचे और कभी नहीं पचे और बहुत भोजन करा हुआ भी जिसके सुखपूर्वक पचजावे उसको तीक्ष्णाग्नि कहते हैं । इन चारों प्रकारकी अग्निमें समाग्नि उत्तम है । तीक्ष्णाग्निके कहनेसे भस्मकका ग्रहण नहीं करना चाहिये क्योंकि अत्यन्त तीक्ष्णाग्निको भस्मक कहते हैं उसके लक्षण चरकमें कहे हैं ॥ यथा- नरे क्षीणकफे पित्तं कुपितं मारुतानुगम् ॥ ५ ॥ सोष्मणा पाचकस्थाने बलमग्नेः प्रयच्छति । तदा लब्धबलो देहं रूक्षं यत्सानिलोऽनलः ॥ ६ ॥ अभिभूय पचत्यन्नं तैक्ष्ण्यादाशु मुहुर्मुहुः । पक्त्वाऽन्नं स ततो धातूञ्शोणितादीन्पचत्यपि ॥ ७ ॥ ततो दौर्बल्यमातङ्कं मृत्युं चोपनयेत् परम् । भुक्तेऽन्ने लभते शान्तिं जीर्णमात्रे प्रताम्यति । तृट्कासदाहमोहाः स्यु- र्व्याधयोऽत्यग्निसंभवाः ॥ ८ ॥ क्षीणकफवाले पुरुषके कफ कुपित हो वायुसे मिलकर ऊष्माके साथ पाचक- स्थानमें जाकर अग्निको बल देवे तब जठराग्नि वातकी सहायता पाकर प्रबल होकर देहको रूखा कर देवे और उसके जोरसे बारंबार अन्नको पचावे । अन्नको पचाय पीछे रुधिरादि धातुओंको पचावे, रुधिर आदिके पचनेसे देहमें दुर्बलताका रोग और मृत्युको मनुष्य प्राप्त होवे, जब अन्नको खावे तब तो शांति हो जाय और जब अन्न पचजाय तब मूर्च्छित होय । प्यास, खांसी, दाह, मोह, (कुछ सुध न रहै) ये रोग अत्यन्त अग्निसे होते हैं ! इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायामग्निमांद्यनिदानं समाप्तम् ॥