माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ६७ ) वातादिभेदकरके उसके लक्षण । वातेन तोदपारुष्ये पित्तादतिसरक्तता । श्लेष्मणा स्निग्धता चास्य ग्रथितत्वं सवर्णता ॥ ५२ ॥ वातसे सुईके चुभानेसे जैसे पीडा होती है ऐसी पीडा हो, पित्तसे कठोरता, कफसे काला और कुछ तथा चिकनी गांठके समान वर्ण होवै ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरी- भाषाटीकायामर्शोरोगः समाप्तः ॥ अथ मन्दाग्निरोगनिदानम् । अर्शरोगसे मन्दाग्नि होती हैं, इसीसे मन्दाग्निरोगको कहते हैं— मन्दस्तीक्ष्णोऽथ विषमः समश्चेति चतुर्विधः । कफपित्तानिलाधिक्यात्तत्साम्याज्जाठरोऽनलः ॥ १ ॥ मनुष्यके कफकी प्रकृतिसे मंदाग्नि, पित्तकी प्रकृतिसे तीक्ष्णाग्नि, वातकी प्रकृ- तिसे विषमाग्नि तथा वात, पित्त, कफ इनके समान होनेसे समाग्नि होवे है । ऐसी अग्नि चार प्रकारकी है । इसमें मन्दाग्निको दुर्जय होनेसे प्रथम कही और जाठर शब्द कहनेसे धातुकी अग्निका त्याग जानना ॥ अजीर्णरोग । विषमो वातजान् रोगांस्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तजान् । करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान् कफसंभवान् ॥ २ ॥ विषमाग्नि वातजन्य ८० रोगोंमेंसे किसी रोगको प्रगट करे और सामान्य ज्वरा- तिसारादिकको प्रगट करे, तीक्ष्णाग्नि पित्तके ४० रोगोंमेंसे किसी रोगको प्रगट करे । उसी प्रकार मन्दाग्नि कफजन्य २० रोगोंमेंसे किसी रोगको पैदा कर आल- स्यादिकोंको उत्पन्न करती है ॥ समाग्न्यादिकोंके लक्षण । समा समाग्नेरशिता मात्रा सम्यग्विपाच्यते । स्वल्पापि नैव मन्दाग्नेर्विषमाग्नेस्तु देहिनः ॥ ३ ॥ कदाचित्पच्यते सम्यक्