भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 404 में से

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पृष्ठ 89

भाषाटीकासमेत । ( ७१ ) मूर्च्छा, बडबड, ओकारी अर्थात् वमन, लारका गिरना, ग्लानि, भ्रम ये अजी- र्णके उपद्रव हैं और बहुत बडा अजीर्ण मनुष्यको मार भी डालता है ॥ बहुत भोजन ही अजीर्णका हेतु है, उसीको कहते हैं- अनात्मवन्तः पशुवद् भुञ्जते येऽप्रमाणतः । रोगानीकस्य ते मूलमजीर्णं प्राप्नुवन्ति हि ॥ १० ॥ जिन मनुष्योंकी इन्द्रियें स्वाधीन नहीं हैं वे पशुके समान अप्रमाण भोजन करते हैं उनके रोगोंका कारण अजीर्णरोग प्रगट होता है ॥ अत्र कहते हैं कि, अजीर्णरोगसे विषूचिकारोगकी उत्पत्ति होती है, इसलिये अजीर्णके अनन्तर विषूचिकाको कहते हैं- अजीर्णमामं विष्टब्धं विदग्धं च यदीरितम् । विषूच्यलसकौ तस्माद्भवेच्चापि विलम्बिका ॥ ११ ॥ आम, विष्टब्ध और विदग्ध ये जो अजीर्ण कहे हैं इनसे विषूचिका ( हैजा ) अलसक और विलंबिका पैदा होवे है इनसे चौथा रसशेष अजीर्णको विषूच्यादि- कोंको उत्पादक नहीं लिखा है । इसका कारण यह है कि, उस रसाजीर्णको अपरि- णाममात्रत्वकरके विषूचिका आदिके आरम्भत्व स्वभावादिकोपमतके कहनेसे आम, विदग्ध और विष्टब्ध इनसे क्रमपूर्वक विषूचिका, अलसक, विलंबिका ये प्रगट होती हैं । ऐसे कार्त्तिककुण्ड आचार्य कहता है सो असत्य है क्योंकि विदग्ध अजीर्णको विलंबिकाका प्रगट करना असम्भव है. क्योंकि उस विलंबिकाका आगे कफ वातसे प्रगट होना कहेंगे और विदग्धभावको पित्तजन्यता है इसलिये यह मत मन्तव्य नहीं है । इसी कारण तीनों अजीर्ण मिलकर विषूचिका आदिको प्रगट करते हैं यह बकुल आचार्यका मत है ॥ विषूचिकाकी निरुक्ति कहते हैं- सूचीभिरिव गात्राणि तुदन् संतिष्ठतेऽनिलः । यत्राजीर्णे च सा वैद्यैर्विषूचीति निगद्यते ॥ १२ ॥ जिस अजीर्णमें वादी देहको सूईके सदृश पीडा देय अर्थात् सूईसे चुभे उसको वैद्य विषूचिका कहते हैं ॥ न तां परिमिताहारा लभन्ते विदितागमाः । मूढास्तामजितात्मानो लभन्तेऽशनलोलुपाः ॥ १३ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA