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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १४४ ) माधवनिदान ।

( १४४ ) माधवनिदान । वृते ॥ २३ ॥ स्वेददाहौष्ण्यमूर्च्छाः स्युः समाने पित्तसंयुत । कफेन संगे विण्मूत्रे गात्रहर्षश्च जायते ॥ २४ ॥ अपाने पित्त- युक्ते तु दाहौष्ण्यं रक्तमूत्रता । अधःकाये गुरुत्वं च शीतता च कफावृते ॥ २५ ॥ व्याने पित्तावृते दाहो गात्रविक्षेपणं क्लमः । स्तंभनो दंडकश्चापि शोथशूलौ कफावृते ॥ २६ ॥ प्राणवायु पित्तसंयुक्त होनेसे वमन और दाह उत्पन्न होय और कफसंयुक्त होनेसे दुर्बलपना, ग्लानि, तन्द्रा और मुखमें विरसता ये होयँ । उदानवायु पित्त- युक्त होनेसे दाह, मूर्च्छा, भ्रम, अनायास श्रम ये होयँ और कफयुक्त होय तौ पसीना नहीं आवे, रोमाञ्च, अग्नि मन्द होय और शीत लगे । समानवायु पित्तयुक्त होनेसे पसीना, दाह, गरमी और मूर्च्छा ये होते हैं और कफयुक्त होनेसे मलमूत्रका रुकना और रोमाञ्च होय । अपानवायु पित्तयुक्त होनेसे दाह, गरमी, लाल मूत्र होता है और अपानवायु कफयुक्त हो तो कमरके नीचेके भागमें भारीपना और सरदीका लगना होय । व्यानवायु पित्तयुक्त होनेसे दाह गात्रोंका विक्षेप अर्थात् इधर उधरका फेरना और श्रम होय और कफयुक्त होनेसे शरीर लकडीके समान स्तंभ होय, सूजन और शूल होय । इस जगह प्राणादि पंच वायुओंके परस्पर मिलनेसे बीस प्रकारके आवरण चरकोक्त जान लेने और वाग्भटके मतसे आवरण बाईस प्रकारके हैं, हमने ग्रन्थके विस्तारभयसे छोड दिये हैं ॥ आक्षेपकके सामान्य लक्षण । यदा तु धमनीः सर्वाः कुपितोऽभ्येति मारुतः । तदा क्षिपत्याशु मुहुर्मुहुर्देहं मुहुश्चरः । मुहुर्मुहुस्तदाक्षेपादाक्षेपक इति स्मृतः ॥२७॥ जिस कालमें वायु कुपित होकर सब धमनी नाडियोंमें जाकर प्राप्त होय तब उस जगह वह बारम्बार संहार करके देहको बारंबार आक्षिप्त करती है अर्थात् हाथीपर बैठनेवाले पुरुषके समान सब देहको चलायमान करे उस देहको बारम्बार चलानेको आक्षेपक रोग कहते हैं ॥ आक्षेपकके अपतन्त्र और अपतानक ऐसे दो अवस्था- विशेषको कहते हैं-- क्रुद्धः स्वैः कोपनैर्वायुः स्थानादूर्ध्वं प्रवर्त्तते । पीडयन् हृदयं गत्वा शिरःशंखौ च पीडयेत् ॥ २८ ॥ धनुर्वन्नामयेद्गात्रा- १-ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्गा धमनीः ।

भाषाटीकासमेत । ( १४५ ) प्याक्षिपेन्मोहयेत्तथा । स कृच्छ्रादुच्छ्वसेच्चापि स्तब्धाक्षोऽथ निमीलकः ॥ २९ ॥ कपोत इव कूजेच्च निस्संज्ञः सोऽप- तन्त्रकः । दृष्टिं संस्तभ्य संज्ञां च हत्वा कण्ठेन कूजति ॥ ३० ॥ हृदि मुक्ते नरः स्वास्थ्यं याति मोहं वृते पुनः । वायुना दारुणं प्राहुरेके तदपतानकम् ॥ ३१ ॥ रूक्षादि स्वकारणोंसे कोपको प्राप्त भई जो वायु सो अपने स्थानको छोड ऊपर जाकर प्राप्त हो और हृदयमें जाकर पीडा करे, मस्तक और कनपटी इनमें पीडा करे और देहको धनुषके समान नवाय देवे और चले तो मूर्च्छित कर दे, वह रोगी बडे कष्टसे श्वास ले, नेत्र जकड जावें अथवा मिच जावें, कबूतरके समान गूंजे तथा बेहोश हो इस रोगको अपतंत्रक कहते हैं । दृष्टिका स्तंभन हो जाय, संज्ञा जाती रहे, गलेमें घुरघुर शब्द होय, वायु जब हृदयको छोडे तब रोगीको होश होय और वायु हृदयको व्याप्त करे तब फेर मोह हो जाय । इस भयंकर रोगको कोई अपतानक ऐसे कहते हैं ॥ अब कहते हैं कि, दण्डापतानक, अन्तरायाम, बहिरायाम और अभिघात इन भेदोंसे आक्षेपकयोग चार प्रकारका है, उनके लक्षण लिखते हैं- दंडापतानकके लक्षण । कफान्वितो भृशं वायुस्तास्वेव यदि तिष्ठति । दण्डवत्स्तंभयेद्देहं स तु दण्डापतानकः ॥ ३२ ॥ वायु अत्यन्त कफयुक्त होकर सब धमनी नाडियोंमें प्राप्त हो और सब देहको दण्ड (लकडी) के समान स्तब्ध जकड दे वह दंडापतानक होता है ॥ अब अन्तरायाम और बहिरायाम इनके साधारण रूपको कहते हैं- धनुस्तुल्यं नमेद्यस्तु स धनुःस्तम्भसंज्ञितः । जो वायु धनुषके समान शरीरको बांका कर दे उसको धनुःस्तंभसंज्ञक कहते हैं ॥ अन्तरायामके लक्षण । अङ्गुलीगुल्फजठरहृद्वक्षोगलसंश्रितः। स्नायुप्रतानमनिलो यदा क्षिपति वेगवान् ॥ ३३ ॥ विष्टब्धाक्षः स्तब्धहनुर्भग्नपार्श्वः कफं वमन् । अभ्यन्तरं धनुरिव यदा नमति मानवः ॥ ३४ ॥ तदा सोऽभ्यन्तरायामं कुरुते मारुतो बली ॥ ३५ ॥

( १४६ ) माधवनिदान ।

( १४६ ) माधवनिदान । पैरकी उंगली, घोंटू, हृदय, पेट, उरःस्थल और गला इन ठिकानोंमें रहा जो वायु वह वेगवान् होकर जो वहां नसोंका जाल उसको सुखाय बाहर निकाल दे उस मनुष्यके नेत्र स्थिर होजायँ, मोडा रहिजाय, पसवाडोंमें पीडा होय, मुखसे कफ गिरे और जिससमय मनुष्य धनुषके सदृश नीचेको नवजाय तब वह बली वायु अन्तरायाम रोगको करे ॥ बाह्यायामके लक्षण । बाह्यः स्नायुप्रतानस्थो बाह्यायामं करोति च । तमसाध्यं बुधाः प्राहुर्वक्षःकट्यूरुभञ्जनम् ॥ ३६ ॥ बाहरकी नसोंमें रहती जो वात सो बाह्यायाम अर्थात् पीठको बांकी कर दे उरस्थल कमर और जांघोंको मोड दे, ऐसे इस रोगको पंडित असाध्य कहते हैं ॥ अब पूर्वोक्त आक्षेपकको पित्तकफका अनुबन्ध होता है, उसको कहते हैं- कफपित्तान्वितो वायुर्वायुरेव च केवलः । कुर्यादाक्षेपकं त्वन्यं चतुर्थमभिघातजम् ॥ ३७ ॥ कफपित्तयुक्त वायु अथवा केवल वायु आक्षेपकरोगको करे और दूसरा कहिये दण्डापतानकादि तीनोंकी अपेक्षा चतुर्थ अभिघातज आक्षेपक रोगको करे । इसके लक्षण-“ यदा तु धमनीः सर्वाः ” इत्यादि पूर्वोक्त सामान्यलक्षणोंसे जानने । इस श्लोकका गदाधरने ऐसा अर्थ करा है कि, 'कफपित्तान्वितः' इत्यादि निमित्तभेद करके चार प्रकारका आक्षेपकरोग प्रगट हो, सो ऐसे एक कफान्वित वायुसे, दूसरा पित्तान्वित वायुसे, तीसरा केवल वायुसे और चौथा दंडादिके चोट लगनेसे कुपित वायुसे । इस पक्षमें गर्भपात और रुधिरका अतिस्राव जो होता है सो केवल वातजन्य जानना और उस ठिकाने बारंबार आक्षेपक होता है । इसका कारण यह है कि, ये सब आक्षेपकके भेद हैं ॥ असाध्यत्वको कहते हैं- गर्भपातनिमित्तश्च शोणितातिस्रवाच्च यः । अभिघातनिमित्तश्च न सिद्ध्यत्यपतानकः ॥ ३८ ॥ गर्भपातके होनेसे अथवा अति रक्तस्त्रावके होनेसे अथवा अभिघात कहिये दण्डादिकोंकी चोट लगनेसे जो प्रगट अपतानकरोग सो असाध्य है ॥ पक्षाघातके लक्षण । गृहीत्वाऽर्धं तनोर्वायुः शिरास्नायू विशोष्य च । पक्षमन्यतरं हन्ति सन्धिबन्धान्विमोक्षयन् ॥ ३९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १४७ ) कृत्स्नोऽर्द्धकायस्तस्य स्यादकर्मण्यो विचेतनः । एकाङ्गरोगं तं केचिदन्ये पक्षवधं विदुः ॥ ४० ॥ वायु आधे शरीरको पकड सब शरीरकी नसोंको सुखायकर दहने या बांये अंगके बाहु कक्षा पार्श्वादिकोंमेंसे किसी एकको नाश करदे और सन्धिके बंधनोंको शिथिल करदे, पीछे उस रोगीके सब वा आधे अंग हलें चलें नहीं और उसको थोडा भी देखनेका स्पर्श आदिका ज्ञान नहीं रहे इसको एकांगरोग कहते हैं, दूसरे पक्षवध कहते हैं । इसीको पक्षाघात कहते हैं । लोकमें लकवा कहते हैं ॥ सर्वाङ्गरोगके लक्षण । सर्वाङ्गरोगस्तद्वत्स्यात्सर्वकायाश्रितेऽनिले । तद्वत् कहिये “ शिरास्नायु ” इत्यादि सम्प्राप्ति लक्षण इससे जानने । सर्व शिराओं ( नाडियों ) में वायु प्राप्त होनेसे उसको सर्वांगरोग कोई कहते हैं ॥ अब साध्यासाध्यके ज्ञानार्थ और दोषोंका सम्बन्ध कहते हैं- दाहसंतापमूर्च्छाः स्युर्वायौ पित्तसमन्विते । शैत्यशोथगुरु- त्वानि तस्मिन्नेव कफान्विते ॥ ४१ ॥ शुद्धवातहतं पक्षं कृच्छ्रसाध्यतमं विदुः । साध्यमन्येन संसृष्टमसाध्यं क्षयहेतु- कम् ॥ ४२ ॥ गर्भिणीसूतिकाबालवृद्धक्षीणेष्वासृक्स्रुतौ । पक्षाघातं परिहरेद्वेदनारहितो यदि ॥ ४३ ॥ पक्षबंधकी वायु कफपित्तयुक्त होवे तो दाह, सन्ताप और मूर्च्छा होय और वही वायु कफयुक्त होय तो शीत सूजन भारीपन ये लक्षण होयें और केवल वायुसे प्रगट पक्षाघात अत्यन्त कष्टसाध्य होता है और दोषोंसे ( पित्तसे या कफसे ) संसृष्ट होनेसे साध्य होता है। क्षयसे प्रगट भया पक्षाघात असाध्य होता है। गर्भिणी, प्रसूति, बालक, वृद्ध और क्षीण इनके भया तथा रुधिरके स्रावसे प्रगट भया पक्षाघात पीडा- रहित हो तो उसको वैद्य त्यागदे अर्थात् असाध्य जान चिकित्सा न करे ॥ अर्दितरोगके लक्षण । उच्चैर्व्याहरतोऽत्यर्थं खादतः कठिनानि च । हसतो जृम्भतो वापि भाराद्विषमशायिनः ॥ ४४ ॥ शिरोनासाौष्ठचिबुक- ललाटेक्षणसन्धिगः । अर्दयत्यनिलो वक्त्रमर्द्दितं जनयत्यतः ॥ ४५ ॥ वक्रीभवति वक्त्रार्धं ग्रीवा चाप्यपवर्तते । शिर- श्चलति वाक्स्तंभो नेत्रादीनां च वैकृतम् ॥ ४६ ॥ ग्रीवा-

( १४८ ) माधवनिदान ।

( १४८ ) माधवनिदान । चिबुकदन्तानां तस्मिन् पार्श्वे च वेदना । तमर्दितमिति प्राहुर्व्याधि व्याधिविशारदाः ॥ ४७ ॥ ऊंचे स्वरसे वेदादिकका पाठ करनेसे अथवा कठिन पदार्थ सुपारी आदिके खानेसे, बहुत हँसनेसे, बहुत जंभाईके लेनेसे, बोझा ढोनेसे, ऊंचे नीचे स्थानमें सोनेसे कोपको प्राप्त भई वायु मस्तक, नाक, होठ, ठोडी, ललाट और नेत्र इनकी संधियोंमें प्राप्त हो मुखमें पीडा करे, अर्दित रोग उत्पन्न हुए उस पुरुषका मुख आधा टेढा होजाय, ग्रीवा ( नाड ) टेढी होजाय, मस्तक हिला करे, अच्छी तरह बोला जाय नहीं, नेत्र, भ्रुकुटी, गाल इनकी विकृति कहिये पीडा, फरकना, टेढा होना इत्यादि होयँ और जिस तरफ अर्दित रोग होय उस तरफ नाड, ठोडी और दांत इनमें पीडा होय । व्याधि जाननेमें जो कुशल वैद्य हैं वे इस व्याधिको अर्दित- रोग ऐसे कहते हैं। शंका-क्योंजी ! अर्दित रोगमें और पक्षाघातमें क्या भेद है ? उत्तर-वेग होनेसे अर्दितरोगमें कभी १ पीडा होती है और पक्षाघातमें सदा पीडा होती है। अर्दितरोग चार प्रकारका है ॥ अर्दितरोगके असाध्य लक्षण । क्षीणस्याऽनिमिषाक्षस्य प्रसक्ताव्यक्तभाषिणः । न सिध्यत्यर्दितं गाढं त्रिवर्षं वेपनस्य च ॥ ४८ ॥ क्षीण पुरुषके, पलक नहीं लगे ऐसे पुरुषके अत्यन्त शुद्ध बोले नहीं ऐसे पुरुषके, अर्दित रोगको प्रगट भये तीन वर्ष व्यतीत होगये हों अथवा त्रिवर्ष कहिये मुख, नाक और नेत्र इन तीनोंका स्राव होय ऐसा और कम्पयुक्त पुरुषको अर्दितरोग साध्य नहीं होय ॥ अब आक्षेपकसे लेकर अर्दितपर्यन्त रोगोंका वेग कहते हैं- गते वेगे भवेत्स्वास्थ्यं सर्वेष्वाक्षेपकादिषु । आक्षेपकादि सब वातरोगोंमें वेग शांत होनेसे स्वास्थ्य कहिये पीडा कम होय जैसे मस्तकके ऊपरका भार ( बोझा ) उतारनेसे सुखकी प्राप्ति होती है ॥ हनुग्रहके लक्षण । जिह्वानिर्लेखनाच्छुष्कभक्षणादभिघाततः । कुपितो हनुमूलस्थः स्रंसयित्वाऽनिलो हनुम् ॥ ४९ ॥ १ अथवा यथोक्त सब लक्षणयुक्त अर्दितरोग है उससे विपरीत अर्धांगवातके लक्षण जानने। परन्तु सुश्रुतमें मुखमात्रमें ही अर्दितरोग लिखा है। अर्धशरीरको अर्धांगवात करके लब्ध होनेसे नहीं लिखा, सोई माधवने पाठ लिखा है ।

भाषाटीकासमेत । ( १४९ ) करोति विवृतास्यत्वमथवा संवृतास्यताम् । हनुग्रहः स तेन स्यात्कृच्छ्राच्चर्वणभाषणम् ॥ ५० ॥ जिह्वाके अतिघर्षण करनेसे, चना आदि सूखी वस्तुके खानेसे अथवा किसी प्रकार चोटके लगनेसे हनुमूल ( कपोल ) के अर्थात् डाढकी जड़में रहनेवाली जो वायु सो कुपित होकर हनुमूलको नीचे कर मुखको खुला ही रखदे अथवा मुखको बन्द करदे, उसको हनुग्रहरोग कहते हैं । तब उस मनुष्यका खाना बोलना कठिनतासे होय ॥ मन्यास्तम्भके लक्षण । दिवास्वप्नासमस्थानविकृतोर्ध्वनिरीक्षणैः । मन्यास्तम्भं प्रकुरुते स एव श्लेष्मणा युतः ॥ ५१ ॥ दिनमें सोनेसे, नीचे ऊंचे स्थानमें सोनेसे, ऊंचेको विकृतिपूर्वक देखनेसे इन कारणोंसे कोपको प्राप्त भई जो वात सो कफयुक्त होकर मन्या ( नाड़ी ) स्तंभन करे, इस रोगको मन्यास्तंभरोग कहते हैं ॥ जिह्वास्तम्भके लक्षण । वाग्वाहिनीशिरासंस्थो जिह्वां स्तम्भयतेऽनिलः । जिह्वास्तम्भः स तेनान्नपानवाक्येष्वनीशता ॥ ५२ ॥ वायु वाणीके बहनेवाली नाडियोंमें प्राप्त हो जिह्वाका स्तंभन करदे, उसको जिह्वा स्तंभ कहते हैं। यह अन्नपानकी तथा बोलनेकी सामर्थ्यका नाश करती है ॥ शिराग्रहके लक्षण । रक्तमाश्रित्य पवनः कुर्यान्मूर्धधराः शिराः । रूक्षाः सवेदनाः कृष्णाः सोऽसाध्यः स्याच्छिराग्रहः ॥ ५३ ॥ वायु रुधिरका आश्रयकर मस्तकके धारण करनेवाली नाडीको रूखी पीडायुक्त और काली करदे, यह शिराग्रहरोग असाध्य है ॥ गृध्रसीके लक्षण । स्फिक्पूर्वा कटिपृष्ठोरुजानुजङ्घापदं क्रमात् । गृध्रसी स्तंभरुक्तोदैर्गृह्णाति स्पन्दते मुहुः ॥ ५४ ॥ वाताद्वातकफात्तन्द्रागौरवारोचकान्विता ॥ ५५ ॥ १ मन्या-गलेकी नाड़ीको कहते हैं। २ 'शिरोग्रहः' ऐसा भी पाठ है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १५० ) माधवनिदान ।

( १५० ) माधवनिदान । प्रथम स्फिक् कहिये कमरके नीचेका भाग जिसको कूला कहते हैं उसको स्तंभित कर दे, पीछे क्रमसे कमर, पीठ, ऊरु, जानु, जंघा और पग इनको स्तम्भित करदे अर्थात् ये रहिजाय, वेदना और तोद कहिये चोटनेकीसी पीडा होय और बारम्बार कम्प होय, यह गृध्रसीरोग बादीसे होता है और वात कफसे होय तो इसमें तन्द्रा, भारीपना और अरुचि ये विशेष होयँ । इस प्रकार गृध्रसीरोग दो प्रकारका है ॥ विश्वाचीके लक्षण । तलं प्रत्यङ्गुलीनां याः कण्डरा बाहुपृष्ठतः । बाह्वोः कर्मक्षयकरी विश्वाची चेति सोच्यते ॥ ५६ ॥ बाहुके पिछाडीसे लेकर हाथके ऊपरले भागपर्यंत प्रत्येक उंगलीके नीचे मोटी नसें उनको दुष्ट कर हाथसे लेना देना पसारना मुट्टी मारनी इत्यादिक कार्योंका नाश- कर्ता जो रोग होय उसको विश्वाचीरोग कहते हैं ॥ क्रोष्टुशीर्षके लक्षण । वातशोणितजः शोथो जानुमध्ये महारुजः । ज्ञेयः क्रोष्टुकशीर्षस्तु स्थूलः क्रोष्टुकशीर्षवत् ॥ ५७ ॥ वातरक्तसे दोनों जानुओं (घोण्टुओं) की संधिमें अत्यन्त पीडाकारक सूजन हों और वे स्यार (गीदड) के मस्तकसमान मोटे हों उसको क्रोष्टुशीर्ष कहते हैं ॥ खंज और पांगुलेके लक्षण । वायुः कट्याश्रितः सक्थ्नः कण्डरामाक्षिपेद्यदा । खञ्जस्तदा भवेज्जन्तुः पङ्गुः सक्थ्नोर्द्वयोर्वधात् ॥ ५८ ॥ कमरमें रहा जो वात सो जंघाकी नसोंको ग्रहण कर एक पगको स्तंभित कर दे उसको खोडा कहते हैं और दोनों जंघाओंकी नसोंको पकड दोनों स्तम्भित कर दे उसको पांगुला कहते हैं ॥ कलायखंजके लक्षण । प्रकामं वेपते यस्तु खञ्जन्निव च गच्छति । कलायखञ्जं तं विद्यान्मुक्तसन्धिप्रबन्धनम् ॥ ५९ ॥ जो पुरुष चलते समय थरथर कांपे और खंज अर्थात् एक पैरसे हीन मालूम होय, इस रोगमें संधिंके बंधन शिथिल होते हैं, इस रोगको कलायखंज कहते हैं ॥ वातकंटकके लक्षण । रुक्पादे विषमे न्यस्ते श्रमाद्वा जायते यदा । वातेन गुल्फमाश्रित्य तमाहुर्वातकंटकम् ॥ ६० ॥

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भाषाटीकासमेत । ( १५१ ) ऊंची नीची जगहमें पैर पडनेसे अथवा श्रमके होनेसे कुपित वायु टकनोंमें प्राप्त होकर पीडा करे तो इस रोगको वातकण्टक कहते हैं ॥ पादहर्षके लक्षण । पादयोः कुरुते हर्षं पित्तासृक्सहितोऽनिलः । विशेषतश्च क्रमतः पादहर्षं तमादिशेत् ॥ ६१ ॥ जिसके पैर हर्षयुक्त झनझनाहट पीडायुक्त होंय और अत्यन्त सोय जावें उसको पादहर्ष रोग कहते हैं । यह कफवातके कोपसे होय है ॥ अंसशोष अपबाहुकके लक्षण । अंसदेशे स्थितो वायुः शोषयेदंसबन्धनम् । शिराश्चाकुंच्य तत्रस्थो जनयेदपबाहुकम् ॥ ६२ ॥ कन्धेम रहा जो वायु सो कुपित होकर उसके बन्धनको सुखाय दे तब अंस- शोष रोग प्रगट होय और कन्धेमें रहा जो वायु सो नसोंको संकोच करके अप- बाहुक रोग प्रगट करे ॥ मूकादिक तीन रोगोंके लक्षण । आवृत्य वायुः सकफो धमनीः शब्दवाहिनीः । नरानकरोत्यक्रियकान्मूकमिन्मिनगद्गदान् ॥ ६३ ॥ कफयुक्त वायु शब्दके बहनेवाली नाडियोंमें प्राप्त होकर मनुष्योंकी वचन- क्रियारहित मूक, मिन्मिन और गद्गद ऐसा करदे । मूक कहिये जिससे बोला न जाय, मिन्मिन कहिये गिनगिनायकर नाकसे बोले और गद्गद बोलते समय बीचमें पद और व्यञ्जनोंको न बोले और मन्द बोले इन रोगोंके कारण सदृश होकर रोगोंके भिन्न भिन्न प्रकार होते हैं । वे दोषोंके उत्कर्ष करके अथवा प्रारब्धवशसे होते हैं ऐसा जानना ॥ तूनीरोगके लक्षण । अधो या वेदना याति वर्च्चोमूत्राशयोत्थिता । भिन्दन्तीव गुदोपस्थं सा तूनी नाम नामतः॥ ६४ ॥ पक्वाशय और मूत्राशयसे उठी जो पीडा सो नीचे जाकर प्राप्त हो और गुदा तथा उपस्थ कहिये स्त्रीपुरुषोंके गुह्यस्थान इनमें भेद करे अर्थात् पीडा करे उसको तूनीरोग कहते हैं ॥ १ अद्य इति गुदोपस्थम् ।

( १५२ ) माधवनिदान ।

( १५२ ) माधवनिदान । प्रतूनीके लक्षण । गुदोपस्थोत्थिता चैव प्रतिलोमं प्रधावति । वेगैः पक्वाशयं याति प्रतूनी चेह सोच्यते ॥ ६५ ॥ गुदा और उपस्थ इनसे उठी जो पीडा उलटी ऊपर जायकर प्राप्त हो और जोरसें पक्वाशयमें प्राप्त हो और तूनीके समान पीडा करे उसको प्रतूनी कहते हैं ॥ आध्मानरोगके लक्षण । साटोपमत्युग्ररुजमाध्मानमुदरं भृशम् । आध्मानमिति जानीयाद्घोरं वातनिरोधजम् ॥ ६६ ॥ गुडगुडशब्दयुक्त अत्यन्त पीडायुक्त ऐसा उदर (पक्वाशय) अत्यन्त फूले अर्थात् बादीसे भरकर चामकी थैलीके समान होजाय इस भयंकर रोगको आध्मानरोग कहते हैं, यह वातके रुकनेसे होता है ॥ प्रत्याध्मानके लक्षण । विमुक्तपार्श्वहृदयं तदेवामाशयोत्थितम् । प्रत्याध्मानं विजानीयात्कफव्याकुलितानिलम् ॥ ६७ ॥ और वही आध्मानरोग आमाशयमें उत्पन्न होय तो उसको प्रत्याध्मान कहते हैं इसमें पसवाडे और हृदयमें पीडा नहीं होय और वायु कफकरके व्याकुल हो ॥ वाताष्ठीलाके लक्षण । नाभेरधस्तात्सञ्जातः सञ्चारी यदि वाऽचलः । अष्ठीलावद् घनो ग्रन्थिरूर्ध्वमायत उन्नततः ॥ वाताष्ठीलां विजानीयाद्बहिर्मार्गावरोधिनीम् ॥ ६८ ॥ नाभीके नीचे उत्पन्न भई और इधर उधर फिरे अथवा अचल अष्ठीला (गोल- पाषाण) के समान कठिन ऊपरका भाग कुछ लम्बा होय और आडी कुछ ऊंची होय और बहिर्मार्ग कहिये अधोवायु, मल, मूत्र इनका अवरोध कहिये (रुकना) हो ऐसे गांठको वाताष्ठीला कहते हैं ॥ १ "श्रमातुरण पानीयं पीत्वा वेगविधारणम् । धावतो वा पिबेत्तोयं भुञ्जतो वा विदाहि च ॥ तथा पयोऽम्बुपानाद्वा दुर्जरा पललेन वा । साऽष्ठीला नाम विख्याता गुर्वी कुक्षिश्रितापि वा" इति आत्रेयः।

भाषाटीकासमेत । ( १५१ ) प्रत्यष्ठीलाके लक्षण । एतामेव रुजायुक्तां वातविण्मूत्ररोधिनीम् । प्रत्यष्ठीलामिति वदेज्जठरे तिर्यगुत्थिताम् ॥ ६९ ॥ वाताष्ठीला ही अत्यन्त पीडायुक्त वात मूत्र मलके रोध करनेवाली और जो उद- रमें तिरछी प्रगट भई होय उसको प्रत्यष्ठीला कहते हैं ॥ मूत्रावरोधके लक्षण । मारुते विगुणे बस्तौ मूत्रं सम्यक्प्रवर्तते । विकारा विविधाश्चापि प्रतिलोमे भवन्ति हि ॥ ७० ॥ बस्ती (मूत्रस्थान) में वायु अनुलोमगतिसे गमन करे तो मूत्र अच्छी रीतिसें उतरे ऐसे प्रतिलोमसे गमन करे तो अनेक प्रकारके पथरी मूत्रकृच्छ्रादि विकार उत्पन्न होयं ॥ कंपवायुके लक्षण । सर्वाङ्गकम्पः शिरसो वायुर्वेपथुसंज्ञकः ॥ ७१ ॥ सब अंगोंको और मस्तकको जो कम्पावे उस वायुको वेपथु (कम्प) वायु कहते हैं ॥ खल्लीके लक्षण । खल्ली तु पादजङ्घोरुकरमूलावमोटिनी । और जो वायु पैर, जंघा, ऊरु और हाथके मूलमें कम्पन करे उसको खल्ली (मूलामना) रोग कहते हैं ॥ ऊर्ध्ववातके लक्षण टीकाकारने लिखे हैं- अधः प्रतिहतो वायुः श्लेष्मणा मारुतेन च । करोत्युद्गारबाहुल्यमूर्ध्ववातं प्रचक्षते ॥ ७२ ॥ कफवातकरके पीडित नीचेकी वायु डकार बहुत लावे उस वातको ऊर्ध्व वात कहते हैं ॥ परन्तु तोडरानन्दने कुछ विलक्षण लिखा है । यथा- भुक्तेऽप्यभुक्ते सुप्ते वा यस्योद्गारः प्रजायते । सततं घोषवांश्चाति ह्युर्ध्ववातं तमादिशेत् ॥ ७३ ॥ भोजन करनेके पीछे अथवा भोजनके पहिले अथवा सोनेके समय डकार निरंतर शब्दवान् आवे उसको ऊर्ध्ववात कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १५४ ) माधवनिदान ।

( १५४ ) माधवनिदान । प्रलापके लक्षण । स्वहेतुकुपिताद्वातादसंबद्धानिरर्थकम् । वचनं यन्नरो ब्रूते स प्रलापः प्रकीर्तितः ॥ ७४ ॥ अपने हेतुओंसे कुपित भई जो वात सो असंबद्ध अर्थरहित वाणी बोले अर्थात् बकवाद करे अथवा बड़बड शब्द करे उसको प्रलाप कहते हैं ॥ रसाज्ञानके लक्षण । भुञ्जानस्य नरस्यान्नं मधुरप्रभृतींरसान् । रसज्ञो यन्न जानाति रसाज्ञानं तदुच्यते ॥ ७५ ॥ जो मनुष्य भोजन करे उसकी जीभको मधुर ( मीठा ) खट्टा इत्यादिक रसोंका ज्ञान न होय उस रोगको रसाज्ञान कहते हैं ॥ अनुक्तवातरोगसंग्रहार्थ कहते हैं- स्थानानामनुरूपैश्च लिङ्गैः शेषान्विनिर्दिशेत् । सर्वेष्वेतेषु संसर्ग पित्ताद्यैरुपलक्षयेत् ॥ ७६ ॥ स्थान और नाम इनके अनुरूप कहिये तुल्य ऐसे लक्षणोंसे शेष वातव्याधि जाननी । स्थानानुरूप कहिये जैसे कुक्षिशूल, नखभेद इत्यादिक । नामानुरूप कहिये जैसे शूलके कहनेसे कीलनिखातवत् पीडा जाननी । उसी प्रकार तोदभेदा- दिक करके भी पीडा विशेष जाननी चाहिये और पित्त, कफ, रुधिर इनके संस- र्गसे द्विदोषज व्याधि जाननी चाहिये ॥ साध्यासाध्य विचार । हनुस्तंभादिताक्षेपपक्षाघातापतानकाः । कालेन महताऽऽढ्यानां यत्नात्सिध्यन्ति वा न वा ॥ ७७ ॥ नरान्बलवतस्त्वेतान्साधयेन्निरुपद्रवान् ॥ ७८ ॥ हनुस्तंभ, अर्दित, आक्षेप, पक्षाघात, अपतानक ये वातव्याधि बहुत दिनमें बड़े परिश्रमसे धनी पुरुषोंके ही यत्नसाध्य होती है अथवा कभी साध्य नहीं होयँ परन्तु बलवान् पुरुषके ये वातव्याधि नई प्रगट भई हों और उपद्रव रहित हों तो उनकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ वातव्याधिके उपद्रव । विसर्पदाहरुक्संगमूर्च्छारुच्यग्निमार्दवैः । क्षीणमांसबलं वाता घ्नन्ति पक्षवधादयः ॥ ७९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १५५ ) विसर्परोग, दाह, शूल, मलमूत्रका निरोध, मूर्च्छा, अरुचि, मंदाग्नि इन लक्षण- युक्त जो और बलक्षीण होगया होय ऐसे पुरुषोंको पक्षवधादिक विकार मारक अर्थात् प्राणके हरणकर्त्ता होते हैं ॥ असाध्य लक्षण । शूनं सुप्तत्वचं भग्नं कम्पाध्माननिपीडितम् । रुजार्त्तिमन्तं च नरं वातव्याधिर्विनाशयेत् ॥ ८० ॥ सूजनवाला, जिसकी त्वचा सोईगई होय अर्थात् जिसको स्पर्श होनेका ज्ञान न होय, जिसकी हड्डी टूटगई होय, कम्प और अफरा इनसे अत्यन्त पीडित होय, रुजा और आर्ति कहिये शूलयुक्त ऐसे मनुष्यको यह वातव्याधिरोग नाश करता है ॥ अब पांच प्रकारकी प्रकृतिस्थ वायुके लक्षण और कार्य कहते हैं— अव्याहतगतिर्यस्य स्थानस्थः प्रकृतौ स्थितः । वायुः स्यात्सोऽधिकं जीवेद्वीतरोगः समाः शतम् ॥ ८१ ॥ जिस पुरुषकी वायु अव्याहतगति और अपने आश्रयसे रहनेवाली और प्रकृति- स्थित कहिये न वृद्ध क्षीण होय, वह पुरुष निरोगी होकर “ अधिकं समाः शतम्” कहिये एक सौ बीस वर्ष और पांच दिन पर्यन्त जीवे ॥ इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां वातव्याधिनिदानं समाप्तम् ॥ अथ वातरक्तनिदानम् । शंका-क्योंजी ! सुश्रुतने तो वातव्याधि अध्यायमें वातरक्त कहा है फिर माध- वने पृथक् क्यों कहा है ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है, परन्तु क्रियाविशेष ज्ञाप- नार्थ माधवने अलग लिखा है और इसी रीतिसे चरकमें भी वातव्याधि अध्यायके पीछे वातरक्ताध्याय कहा है ॥ लवणाम्लकटुक्षारस्निग्धोष्णाजीर्णभोजनैः । क्लिन्नशुष्काम्बुजा- नूपमांसपिण्याकमूलकैः ॥१॥ कुलित्थमषनिष्पावशाकादि- पललेक्षुभिः । दध्यारनालसौवीरसूक्ततक्रसुरासवैः ॥ २ ॥ विरुद्धाध्यशनक्रोधदिवास्वप्नप्रजागरैः। प्रायशः सुकुमाराणां

( १५६ ) माधवनिदान ।

( १५६ ) माधवनिदान । मिथ्याहारविहारिणाम् ॥ ३ ॥ स्थूलानां सुखिनां चाथ वात- रक्तं प्रकुप्यति ॥ ४ ॥ नोन, खटाई, कडवी, खारी, चिकना, गरम, कच्चा ऐसे भोजनसे, सडे और सूखे ऐसे जलसंचारी जीवोंके और जलके समीप रहनेवाले जीवोंके मांससे, पिण्याक ( खल ), मूली, कुलथी, उडद, निष्पाव ( सेम ), शाक ( तरकारी ), पलल ( मांस ), ईख, दही, कांजी, सौवीर मद्य, सूक्त ( सिरका आदि ) छाछ, दारू, आसव ( मद्य विशेष ), विरुद्ध जैसे दूध, मछली, अध्यशन ( भोजनके ऊपर भोजन ), क्रोध, दिनमें निद्रा, रातमें जागना इन कारणोंसे विशेष करके सुकुमार पुरुषोंके और मिथ्या आहार विहार करनेवाले पुरुषोंके और जो मोटा होय तथा सुखी होय ऐसे मनुष्योंके वातरक्त रोग होता है ॥ वातरक्तकी सम्प्राप्ति । हस्त्यश्वोष्ट्रैर्गच्छतश्चाश्वतश्च विदाह्यन्नं सविदाहाशनस्य । कृत्स्नं रक्तं विदहत्याशु तच्च त्रस्तं दुष्टं पादयोश्रीयते तु । तत्संपृक्तं वायुना दूषितेन तत्प्राबल्यादुच्यते वातरक्तम्॥५॥ हाथी, घोडा, ऊंट इनपर बैठकर जानेसे ( यह वायुके बढनेका और विशेष करके रुधिरके उतरनेका कारण है ), विदाहकारी अन्नके खानेवाले पुरुषके इसीसे दग्ध- रुधिरकी वृद्धि होती है, गरमागरम अन्नके खानेवाले ऐसे पुरुषके सब शरीरके रुधिर दुष्ट होकर पैरोंमें इकठा होय और वह दुष्ट वायुसे दूषित होकर मिलै, इस रोगमें वायु प्रबल है, इसीसे इस रोगको वातरक्त कहते हैं ॥ वातरक्तका पूर्वरूप । स्वेदोऽत्यर्थं न वा कार्ण्य स्पर्शाज्ञत्वं क्षतेऽतिरुक् । सन्धि- शैथिल्यमालस्यं सदनं पिटिकोद्गमः ॥ ६ ॥ जानुजङ्घोरु- कट्यंसहस्तपादाङ्गसन्धिषु । निस्तोदः स्फुरणं भेदो गुरुत्वं सुप्तिरेव च ॥ ७ ॥ कण्डूः सन्धिषु रुग्भूत्वा भूत्वा नश्यति चासकृत् । वैवर्ण्यं मण्डलोत्पत्तिर्वातासृक्पूर्वलक्षणम् ॥ ८ ॥ १ रुजस्तीव्राः ससन्तापाः इत्यादिना रक्तगतस्य वातस्य लक्षणं वातव्याधावेवोक्तं तत्तश्च वातरक्तविधानं पुनरुक्तं हि स्यात्, नैवं वातरक्तं दुष्टेन वातेन रक्तेन च विशिष्टसम्प्राप्तिकं यद्विकारान्तरमेवे । रक्तगतवाते तु वात एव दुष्टो रक्तमदुष्टमेव गच्छतीति भेदः । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (१९७) पसीने बहुत आवे अथवा नहीं आवें, शरीर काला होजाय, शरीरमें स्पर्शका ज्ञान जाता रहे और थोडीसी चोट लगनेसे पीडा अधिक होय, संधि ढीली होजायँ आलस्य आवे, ग्लानि हो, शरीरमें फुन्सी उठें, घोंटू, जंघा, ऊरू, कमर, कन्धा, हाथ, पैर, सन्धि और अंगोंमें सूईके चुभानेकीसी पीडा होय, स्फुरण ( फरकना ), तोडनेकीसी पीडा, भारीपण, बधिरता ये लक्षण होते हैं और संधियोंमें खुजली चले और शूल होकर वारंबार नाश होजाय, शरीरका विवर्ण होजाय, रुधिरके चकत्ता देहमें पडजायँ ये वातरक्तके पूर्वरूप होते हैं ॥ अब वातरक्तको अन्य दोषोंका संसर्ग होनेसे उसके लक्षण न्यारे न्यारे लिखते हैं- वाताधिकेऽधिकं तत्र शूलस्फुरणतोदनम् । शोथश्च रौक्ष्यं कृष्णत्वं श्यावतावृद्धिहानयः ॥ ९ ॥ धमन्यङ्गुलिसन्धीनां सङ्कोचोऽङ्गग्रहोऽतिरुक् । शीतद्वेषानुपशयस्तम्भवपथुसुप्तयः १० वाताधिक वातरक्तमें शूल, अंगोंका फरकना, चोटनेकीसी पीडा ये अधिक होते हैं । सूजन, रूखापना, नीलापना अथवा श्यामवर्णता एवं वातरक्तके लक्षणोंकी वृद्धि होय और क्षणभरमें ह्रास ( कम ) हो, धमनी और अंगुलियोंकी संधियोंमें संकोच, शरीर जकडबंध होय, अत्यन्त पीडा होय, सर्दी बुरी लगे और शीतके सेवन करनेसे दुःख होय, स्तम्भ होय, कम्प और शून्यता हो ये लक्षण होते हैं ॥ रक्ताधिकके लक्षण । रक्ते शोफोऽतिरुक्क्लेदस्ताम्रश्चिमचिमायते । स्निग्धरूक्षैः शमं नैति कण्डूक्लेदसमन्वितः ॥ ११ ॥ रक्ताधिक वातरक्तमें सूजन, अत्यन्त पीडा और उसमेंसे तांबेके रंगका क्लेद बहे, उस सूजनमें चिमचिम वेदना होय, स्निग्ध अथवा रूखे पदार्थोंसे शांति न होय, उसमें खुजली और पानी निकले ॥ पित्ताधिकके लक्षण । पित्ते विदाहः संमोहः स्वेदो मूर्च्छा मदः सतृट् । स्पर्शासहत्वं रुग्रागः शोफः पाको भृशोष्णता ॥ १२ ॥ पित्ताधिक वातरक्तमें अत्यन्त दाह, इंद्रियोंको मोह, पसीना, मूर्च्छा, मस्त रहना, प्यास, स्पर्श बुरा मालूम हो, पीडा, लाल रंग, सूजन, छोटे छोटे पीले फोडे, अत्यन्त गरमी ये लक्षण होते हैं ॥

( १५८ ) माधवनिदान ।

( १५८ ) माधवनिदान । कफाधिकके लक्षण । कफे स्तैमित्यगुरुतासुप्तिस्निग्धत्वशीतताः । कण्डूर्मन्दा च रुग्द्वन्द्वे सर्वलिङ्गं च सङ्करात् ॥ १३ ॥ कफाधिक वातरक्तमें स्तैमित्य (गीले कपड़ेसे आच्छादित समान), भारीपणा, शून्यता, चिकनापना, शीतलता, खुजली और मन्द पीड़ा ये लक्षण होते हैं । दो दोषोंके वातरक्तमें दो दोषोंके लक्षण और तीनों दोषोंके वातरक्तमें तीनों दोषोंके लक्षण होते हैं ॥ पैरोंमें वातरक्त हुआ होय उसकी उपेक्षा करनेसे हाथोंमें होय है, उसको कहते हैं— पादयोर्मूलमास्थाय कदाचिद्धस्तयोरपि । आखोर्विषमिव क्रुद्धं तद्देहमनुसर्पति ॥ १४ ॥ वह वातरक्त पैरोंके मूलमें होकर कदाचित् हाथोंमें भी होय है । सो आखु (मूसे) के विष सदृश सर्व देहमें मन्द मन्द फैल जाय, यह वातरक्त चरकने दो प्रकारका कहा है एक उत्तान दूसरा गम्भीर, त्वचा और मांस इनमें होय सो उत्तान और गम्भीर इसकी अपेक्षा भीतरी होय है ॥ असाध्य लक्षण । आजानुस्फुटितं यच्च प्रभिन्नं प्रस्रुतं च यत् । उपद्रवैर्यच्च जुष्टं प्राणमांसक्षयादिभिः । वातरक्तमसाध्यं स्याद्याप्यं संवत्सरोत्थितम् ॥ १५ ॥ आजानु (जंघाके नीचेको भाग) पर्यन्त गया भया वातरक्त असाध्य है, जिसकी त्वचा फटगई होय, चिरगया होय और जो स्रावयुक्त होय ऐसा वातरक्त प्राणमांसक्षयादिक उपद्रवयुक्त होय, आदिशब्दसे जो आगे (श्रम अरोचक श्वास) इत्यादिक कहेंगे वे भी लक्षण होयँ सो भी असाध्य है। वातरक्त प्रगट भये वर्ष दिन व्यतीत होगया होय सो याप्य होय है, वर्ष दिनके पहिले साध्य होय है, परंतु उसमें स्फुटितादि लक्षण न होय तो साध्य है ॥ उपद्रव । अस्वप्नारोचकश्वासमांसकोथशिरोग्रहाः । मूर्च्छातिमदरुक्कृष्णाज्वरमोहप्रवेपकाः ॥ १६ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत। ( १५९ ) हिक्कापाङ्गुल्यवीसर्पपाकतोदभ्रमक्लमाः ॥ १७ ॥ अङ्गुलीवक्रतास्फोटदाहमर्मग्रहार्बुदाः । एतैरुपद्रवैर्वर्ज्यं मोहेनैकेन चापि यत् ॥ १८ ॥ निद्रानाश, अरुचि, श्वास, मांसका सडना, मस्तकका जकडना, मूर्च्छा, अत्यन्त पीडा, प्यास, ज्वर, मोह, कम्प, हिचकी, पांगुलापना, विसर्परोग, पकना, नोचने- कीसी पीडा, भ्रम, अनायास श्रम, उंगली टेढी होजाय, फोडा, दाह, मर्मस्थानोंमें पीडा, अर्बुद (गांठ) हो इन उपद्रवयुक्त वातरक्तवाला रोगी असाध्य है अथवा एक मोहयुक्तही होय तो भी असाध्य जानना ॥ साध्यासाध्यविचार । "अकृत्स्नोपद्रवं याप्यं साध्यं स्यान्निरुपद्रवम् । एकदोषानुगं साध्यं नवं याप्यं द्विदोषजम् ॥ त्रिदोषजमसाध्यं स्याद्यस्य च स्युरुपद्रवाः ॥ जिस वातरक्तमें सब उपद्रव होवे नहीं वह याप्य है और निरुपद्रव साध्य, जो एक दोषका होय वह साध्य है और द्विदोषज याप्य और त्रिदोषज तथा उपद्रव- युक्त होय तो वातरक्त असाध्य है। यह श्लोक क्षेपक है माधवका नहीं है ॥" इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां वातरक्तनिदानं समाप्तम् ॥ अथोरुस्तंभनिदानम् । --०००-- शीतोष्णद्रवसंशुष्कगुरुस्निग्धैर्निषेवितैः । जीर्णाजीर्णे तथा- याससंक्रोधस्वप्नजागरैः ॥१॥ संश्लेष्ममेदःपवनः साममत्यर्थ- संचितम् । अभिभूयेतरं दोषमूरू चेत्प्रतिपद्यते ॥ २ ॥ सक्थ्यस्थीनि प्रपूर्यान्तः श्लेष्मणा स्तिमितेन च । तदा स्तम्भाति तेनोरू स्तब्धौ शीतावचेतनौ ॥ ३॥ परकीयाविव गुरू स्यातामतिभृशव्यथौ । ध्यानाङ्गमर्दस्तैमित्यतंद्राच्छ- र्द्यरुचिज्वरैः ॥ ४ ॥ संयुक्तौ पादसदनकृच्छ्रोद्धरणसुप्तिभिः । तमूरुस्तंभमित्याहुराढ्यवातमथापरे ॥ ५ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १६० ) माधवनिदान ।

( १६० ) माधवनिदान । शीतल, गरम, पतले, शुष्क, भारी, चिकने ऐसे परस्पर विरुद्ध भोजनसे जीर्ण, अजीर्ण उसी प्रकार दंड कसरतके करनेसे, चित्तके क्षोभसे, दिनमें सोनेसे, रात्रिमें जागना इन कारणोंसे कफ मेदयुक्त अत्यन्त संचित भया आमयुक्त वात इतर दोषों अर्थात् पित्तको आच्छादित कर ऊरुओंमें आयकर प्राप्त होय और ऊरुओंके हाडोंको आर्द्र कफसे परिपूर्ण करे, तब उनके ऊरु स्तंभित हों ( जकड जायें ) और शीतल तथा निर्जीव हो जायें और दूसरे पुरुषके ऊरुके समान उछरके चलना इस विषयमें असमर्थ होंय और भारी, अत्यन्त पीडायुक्त होंय, चिन्ता, अंगोंका गोडना, आर्द्रता ( गीला ), तन्द्रा, वमन, अरुचि और ज्वरसहित मनुष्यको दोनों ऊरु जकड जायें, बडे कष्टसे चले और शून्यता होय इस रोगको ऊरुस्तम्भ कहते हैं और कोई आढ्यवात कहते हैं ॥ ऊरुस्तंभका पूर्वरूप । प्राग्रूपं तस्य निद्राऽतिध्यानं स्तिमितता ज्वरः । लोमहर्षोऽरुचिश्छर्दिर्जङ्घोर्वोः सदनं तथा ॥ ६ ॥ निद्रा बहुत आवे, अत्यन्त चिन्ता, मन्दता, ज्वर, रोमांच, अरुचि, वमन, जंघा और ऊरु इनमें पीडा होय, यह ऊरुस्तम्भके पूर्वरूप होते हैं ॥ ऊरुस्तम्भके लक्षण । वातशङ्किभिरज्ञानात्तस्य स्यात्स्नेहनात्पुनः । पाद्योः सदनं सुप्तिः कृच्छ्रादुद्धरणं तथा ॥ ७ ॥ जङ्घोरुग्लानिरत्यर्थं शश्व- द्दाहाह्ववेदना । पादं च व्यथतेऽत्यर्थं शीतस्पर्शं न वेत्ति च ॥ ८ ॥ संस्थाने पीडने गत्यां चलने चाप्यनीश्वरः । अन्यस्येव हि संभग्नावूरू पादौ च मन्यते ॥ ९ ॥ पैरोंका सोना, संकोच होना इत्यादिक वातरोगके समान चिह्न मिलनेसे उस मनुष्यको वातरोगकी शंका होय, तब मनुष्य तैलादिक स्नेहन चिकित्सा करे तो उसके दूना रोग बढे, पीडा होय तथा पैर सोय जावे तथा बडे कष्टसे पैर उठाया और धरा जाय, जंघा और ऊरुओंमें अधिक पीडा होय और निरन्तर दाह तथा वेदना होय, पैरोंमें व्यथा होय, शीतल पदार्थका स्पर्श मालूम न होय पैरके उठानेमें रगड़नेमें अथवा चलनेमें अथवा हिलानेमें असमर्थ होय, पैर और ऊरु ये टूटेसे तथा अन्य मनुष्यकेसे मालूम हों ये लक्षण ऊरुस्तम्भके हैं । व्याधिके स्वभावसे यह ऊरुस्तम्भ त्रिदोषका एक ही है, वातादि भेदोंसे अनेक प्रकारका नहीं है ॥

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भाषाटीकासमेत । ( १६१ ) असाध्यलक्षण । यदा दाहार्त्तितोदार्त्तो वेपनः पुरुषो भवेत् । ऊरुस्तम्भस्तदा हन्यात्साधयेदन्यथा नवम् ॥ १० ॥ जिस समय पुरुष दाह, शूल और तोद (नोचनेकीसी पीडा) इनसे पीडित होकर कंपयुक्त होय उस समय वह ऊरुस्तंभरोग उसका नाश करे है और ये लक्षण न होंय और रोग नया होय तो यह रोग साध्य है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्य्यबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् ऊरुस्तम्भनिदानं समाप्तम् ॥ अथामवातनिदानम् । विरुद्धाहारचेष्टस्य मन्दाग्नेर्निश्चलस्य च । स्निग्धं भुक्तवतो ह्यन्नं व्यायामं कुर्वतस्तथा ॥ १ ॥ वायुना प्रेरितो ह्याभः श्लेष्मस्थानं प्रधावति । तेनात्यर्थं विदग्धोऽसौ धमनीः प्रति- पद्यते ॥ २ ॥ वातपित्तकफैर्भूयो दूषितः सोऽन्नजो रसः । स्रोतांस्यभिस्पन्दयति नानावर्णोऽतिपिच्छिलः ॥ ३ ॥ जन- यत्याशु दौर्बल्यं गौरवं हृदयस्य च । व्याधीनामाश्रयो ह्येष आमसंज्ञोऽतिदारुणः ॥ ४ ॥ युगपत्कुपितावेतौ त्रिकसन्धि- प्रवेशकौ । स्तब्धं च कुर्वतो गात्रमामवातः स उच्यते ॥ ५ ॥ विरुद्ध आहार (क्षीर-मत्स्यादि) और विरुद्ध विहार करनेवाले मनुष्यकी, मन्द अग्निवालेकी, जो दंडकसरत न करे और चिकना अम्ल खायकर दण्डकसरत करने- वाले ऐसे पुरुषकी आम वायुसे प्रेरित होकर कफके आमाशयादि स्थानके प्रति जायकर (प्राप्त होय) और उस कफसे अत्यन्त दूषित होकर वही आम धमनीनाडि- योंमें प्राप्त होकर भीतर वह अन्नका रस (आम) वात और कफपित्तसे दूषित होकर नाडियोंके छिद्रोंमें भरजाय, वह अनेक प्रकारके रंगका अतिगाढा होय है और शीघ्र दुर्बलताको तथा हृदयको भारी करता है । व्याधिके उत्पन्न करनेका (आश्रय) स्थान है अर्थात् प्रायः रोग आमाशयके विकृत होनेपरही होता है । इस अत्यन्त भयंकर रोगकी आमसंज्ञा कही है । पीछे यह वात कफ एक ही कालमें ७

( १६२ ) माधवनिदान ।

( १६२ ) माधवनिदान । कुपित होकर त्रिकसंधियोंमें जायके प्रवेश करे तब देह जकडीसी हो जाय, इस रोगको आमवात कहते हैं ॥ आमवातके सामान्य लक्षण । अङ्गमर्दोऽरुचिस्तृष्णा आलस्यं गौरवं ज्वरः । अपाकः शूनताऽङ्गानामामवातः स उच्यते ॥ ६ ॥ अंगोंका टूटना, अरुचि, प्यास, आलस्य, भारीपना, ज्वर, अन्नका न पचना और देहमें सूजनसी हो जाय, इस रोगको आमवात कहते हैं ॥ जब आमवात अत्यन्त बढ़गया होय उसके लक्षण कहते हैं- स कष्टः सर्वरोगाणां यदा प्रकुपितो भवेत् । हस्तपादशिरो- गुल्फत्रिकजानूरुसन्धिषु ॥ ७ ॥ करोति सरुजं शोथं यत्र दोषः प्रपद्यते । स देशो रुजतेऽत्यर्थं व्याविद्ध इव वृश्चिकैः ॥ ८ ॥ जनयेत्सोऽग्निदौर्बल्यं प्रसेकारुचिगौरवम् । उत्साह- हानिं वैरस्यं दाहं च बहुमूत्रताम् ॥ ९॥ कुक्षौ कठिनतां शूलं तथा निद्राविपर्ययम् । तृट्छर्दिभ्रममूर्च्छाश्च हृद्ग्रहं विड्बिबन्धताम् ॥ १० ॥ जाड्यान्त्रकूजमानाहं कष्टांश्चा- न्यानुपद्रवान् ॥ ११ ॥ यह आमवात जिस समय बढ़े उस समय रोगोंमें कष्टकर्त्ता होता है अर्थात् सब रोगोंसे बढ़कर कष्टदायक है । हाथ, पैर, मस्तक, घोंटू, त्रिकस्थान, जानु, जंघा इनकी सन्धियोंमें पीडायुक्त सूजन करे और जिस ठिकाने आम जाय उसी ठिकाने बीछूके डंक मारनेकीसी पीडा करे, यह रोग मंदाग्नि, मुखसे पानीका गिरना, अरुचि, देह भारी, उत्साहका नाश, मुखमें विरसता, दाह, बहुत मूत्रके उतरना, कूखमें कठिनता, शूल, दिनमें निद्रा आवे, रातिमें जाग, प्यास, वमन, भ्रम, मूर्च्छा, हृदयमें दुःख, मलका अवरोध, जड़ता ( काम करनेकी शक्तिसे रहित ) आंतोंका गूंजना, अफरा तथा अत्यन्त उपद्रव कहिये वातव्याधिमें कहे कलायखंजादिकोंको करे ॥ १ अविपक्वरसं पक्वं दुर्गन्धं बहुपिच्छिलम् । सदनं सर्वगात्राणामाम इत्यभिधीयते ॥ आम- मन्नरसं केचित्केचित्तं मलसञ्चयम् । प्रथमां दोषदुष्टिं वा केचिदामं प्रचक्षते ॥ आहारस्य रसः शेषो यो न पक्वोऽभिलाघवात् । स मूढं सर्वरोगाणामित्यभिधीयते ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १६३ ) आमवातका विशेष लक्षण । पित्तात्सदाहरागं च सशूलं पवनानुगम् । स्तैमित्यं गुरु कण्डूकं कफजुष्टं तमादिशेत् ॥ १२ ॥ पित्तसे जो आमवात होय उसमें दाह और लाल रंग होय है। वादीके आम- वातमें शूल होय है। कफसम्बन्धी आमवातमें देहमें आर्द्रता ( गीला ) और भारीपन तथा खुजली चले है ॥ साध्यासाध्यविचार । एकदोषानुगः साध्यो द्विदोषो याप्य उच्यते । सर्वदेहचरः शोथः स कृच्छ्रः सान्निपातिकः ॥ १३ ॥ एक दोषका आमवातरोग साध्य है, दो दोषोंका याप्य है और सर्वदेह विचरने- वाली सूजन अथवा त्रिदोषसे प्रगट आमवातरोग कष्टसाध्य जानना ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् आमवातनिदानं समाप्तम् ॥ अथ शूलनिदानम् । ඞ——𑁍——ඞ दोषैः पृथक्समस्तामद्वन्द्वैः शूलोऽष्टधा भवेत् । सर्वेष्वेतेषु शूलेषु प्रायेण पवनः प्रभुः ॥ १ ॥ वात, पित्त, कफ इनसे तीन प्रकारका, एक सन्निपातसे, एक आमसे और तीन द्वन्द्वज ऐसे सब मिलकर आठ प्रकारका शूलरोग है। इन सब शूलोंमें वादीका शूल प्रबल है। ज्वरके समान शूलरोगकी प्रथम उत्पत्ति हारीतमें कही है, सो इस प्रकार- कामदेवके नाश करनेके अर्थ शिवने क्रोधसे त्रिशूलको फेंका, उस त्रिशूलको अपने सन्मुख आता हुआ देख कामदेव भयभीत होकर विष्णु भगवान्‌के देहमें प्रवेश करगया । तदनन्तर वह त्रिशूल विष्णुकी हुंकारसे मूर्च्छित होकर गिरा तो पृथ्वीमें शूल इस नामसे प्रसिद्ध भया। तबसे वह शूल पञ्चभूतात्मकदेहधारी मनुष्योंको पीडा करने लगा। इस प्रकार इसकी उत्पत्ति है । शिवके त्रिशूलसे उत्पन्न भया तथा शूलके घावके समान पीडा करे है इसीसे इसको शूल कहते हैं ॥ १ अनंगनाशाय हरस्त्रिशूलं मुमोच कोपान्मकरध्वजश्च । तमापतन्तं सहसा निरीक्ष्य भया- र्दितो विष्णुतनूं प्रविष्टः ॥ स विष्णुहुंकारविमोहितात्मा पपात भूमौ प्रथितः स शूलः । स पञ्च- भूतानुगतः शरीरं प्रदूषयत्यस्य हि पूर्वसृष्टिः ॥