माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १६० ) माधवनिदान । शीतल, गरम, पतले, शुष्क, भारी, चिकने ऐसे परस्पर विरुद्ध भोजनसे जीर्ण, अजीर्ण उसी प्रकार दंड कसरतके करनेसे, चित्तके क्षोभसे, दिनमें सोनेसे, रात्रिमें जागना इन कारणोंसे कफ मेदयुक्त अत्यन्त संचित भया आमयुक्त वात इतर दोषों अर्थात् पित्तको आच्छादित कर ऊरुओंमें आयकर प्राप्त होय और ऊरुओंके हाडोंको आर्द्र कफसे परिपूर्ण करे, तब उनके ऊरु स्तंभित हों ( जकड जायें ) और शीतल तथा निर्जीव हो जायें और दूसरे पुरुषके ऊरुके समान उछरके चलना इस विषयमें असमर्थ होंय और भारी, अत्यन्त पीडायुक्त होंय, चिन्ता, अंगोंका गोडना, आर्द्रता ( गीला ), तन्द्रा, वमन, अरुचि और ज्वरसहित मनुष्यको दोनों ऊरु जकड जायें, बडे कष्टसे चले और शून्यता होय इस रोगको ऊरुस्तम्भ कहते हैं और कोई आढ्यवात कहते हैं ॥ ऊरुस्तंभका पूर्वरूप । प्राग्रूपं तस्य निद्राऽतिध्यानं स्तिमितता ज्वरः । लोमहर्षोऽरुचिश्छर्दिर्जङ्घोर्वोः सदनं तथा ॥ ६ ॥ निद्रा बहुत आवे, अत्यन्त चिन्ता, मन्दता, ज्वर, रोमांच, अरुचि, वमन, जंघा और ऊरु इनमें पीडा होय, यह ऊरुस्तम्भके पूर्वरूप होते हैं ॥ ऊरुस्तम्भके लक्षण । वातशङ्किभिरज्ञानात्तस्य स्यात्स्नेहनात्पुनः । पाद्योः सदनं सुप्तिः कृच्छ्रादुद्धरणं तथा ॥ ७ ॥ जङ्घोरुग्लानिरत्यर्थं शश्व- द्दाहाह्ववेदना । पादं च व्यथतेऽत्यर्थं शीतस्पर्शं न वेत्ति च ॥ ८ ॥ संस्थाने पीडने गत्यां चलने चाप्यनीश्वरः । अन्यस्येव हि संभग्नावूरू पादौ च मन्यते ॥ ९ ॥ पैरोंका सोना, संकोच होना इत्यादिक वातरोगके समान चिह्न मिलनेसे उस मनुष्यको वातरोगकी शंका होय, तब मनुष्य तैलादिक स्नेहन चिकित्सा करे तो उसके दूना रोग बढे, पीडा होय तथा पैर सोय जावे तथा बडे कष्टसे पैर उठाया और धरा जाय, जंघा और ऊरुओंमें अधिक पीडा होय और निरन्तर दाह तथा वेदना होय, पैरोंमें व्यथा होय, शीतल पदार्थका स्पर्श मालूम न होय पैरके उठानेमें रगड़नेमें अथवा चलनेमें अथवा हिलानेमें असमर्थ होय, पैर और ऊरु ये टूटेसे तथा अन्य मनुष्यकेसे मालूम हों ये लक्षण ऊरुस्तम्भके हैं । व्याधिके स्वभावसे यह ऊरुस्तम्भ त्रिदोषका एक ही है, वातादि भेदोंसे अनेक प्रकारका नहीं है ॥
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